इशिता सिन्हा ने अपने पिता को अपनी आँखों के सामने बर्बाद होते देखा। मशहूर आविष्कारक किशोर सिन्हा की सारी मेहनत, उनके पेटेंट, एक ही रात में वर्धान इंडस्ट्रीज़ के नाम हो गए, और अदालत ने उस अकेले आदमी को उस दैत्य के सामने हरा दिया। दस साल बाद इशिता उसी कंपनी में सबसे चमकती इंटर्न बनकर दाख़िल होती है, एक ही मक़सद के साथ: वो सबूत ढूँढना जो उसके पिता को इंसाफ़ दिलाएगा। कंपनी का कमज़ोर समझा जाने वाला वारिस आदित्य वर्धान उसे अपनी ख़ुफ़िया रिसर्च टीम के लिए चुन लेता है, क्योंकि वो अकेला है जो उस पर सच में यक़ीन करता है। पर जैसे-जैसे इशिता गहराई में उतरती है, सच का चेहरा बदलने लगता है: चोरी वर्धान ने नहीं, उसके अपने ख़ानदान के किसी अपने ने की थी। अब हर झूठ भारी पड़ता है, हर धड़कन दो आक़ाओं के बीच बँटी है, और जिस आदमी से उसे मोहब्बत हो रही है, उसी से उसे सबसे बड़ा राज़ छिपाना है। दफ़्तर की सियासत, एक तिल-तिल कसता हुआ जाल, और एक ऐसी मोहब्बत जिसकी बुनियाद ही एक जासूस का झूठ है। जब असली गद्दार का नक़ाब उतरेगा, तो टूटेगा दिल भी और झूठ भी।
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