सौ साल से किआरा एक राज़ की अकेली पहरेदार है। राजस्थान के उजड़े नाग मंदिर के तहख़ाने में दबी है नागमणि, वो दिव्य सर्पमणि जिसकी एक झलक तक़दीरें पलट दे, और किआरा कोई मामूली लड़की नहीं, वो इच्छाधारी नागिन है जिसने एक सदी पहले उसी मणि की हिफ़ाज़त में अपना पहला और आख़िरी प्यार खो दिया था। फिर एक रोज़ रेत के तूफ़ान के साथ आता है शिवांश, सरकारी परमिट और आधुनिक मशीनों से लैस एक पुरातत्वविद्, जिसकी कलाई पर ठीक वही निशान है जो सौ साल पहले उस मर्द की कलाई पर था जिसे किआरा बचा नहीं पाई थी। वो लौट आया है, नए चेहरे में, बिना कोई याद लिए। मणि तक पहुँचने से पहले उसकी खुदाई रोकने के लिए किआरा एक स्थानीय गाइड बनकर उसी कैंप में घुस जाती है, पर हर रात बीते जनम की यादें दोनों के सपनों में सुलगने लगती हैं। और अँधेरे में एक और साया है, तक्षक, वो पुराना दुश्मन नाग जो सदी की उस एक रात का सौ बरस से इंतज़ार कर रहा है जब नागमणि किसी की भी हो सकती है। किआरा के सामने फिर वही चुनाव है जिसने उसे एक बार तोड़ दिया था, अपना फ़र्ज़ या अपना प्यार। इस बार वो दोनों को बचा पाएगी, या नागमणि की उस रात एक अधूरी कहानी फिर अधूरी रह जाएगी।
विषय-सूची
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सौ साल पहले नागमणि की उस आख़िरी रात, इच्छाधारी नागिन किआरा और मंदिर के जवान पहरेदार पृथ्वी को दुश्मन नाग तक्षक ने सनसनाते तहख़ाने में घेर लिया, और मणि बचाने की क़ीमत में किआरा को अपना पहला और आख़िरी प्यार अपनी बाँहों में मरता देखना पड़ा। आज, सौ बरस बाद, रेत के तूफ़ान के साथ सरपगढ़ में जीपों का एक क़ाफ़िला उतरता है, और खुदाई का सरकारी परमिट थामे पुरातत्वविद् शिवांश की कलाई पर किआरा वही निशान देखती है जो कभी पृथ्वी की कलाई पर था। मरा हुआ आदमी लौट आया है, नए चेहरे में, बिना कोई याद लिए।
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किआरा अपनी गुरु, प्राचीन नागिन भैरवी के पास पहुँचती है, जो उसका सबसे बड़ा डर सच कर देती है, नागमणि की रात कुछ ही हफ़्तों में लौट रही है, और उससे पहले किसी इंसान का तहख़ाना खोलना क़यामत होगी। भैरवी उसे उस लौटे हुए इंसान को मारने से और उसके पास जाने से, दोनों से रोकती है, यह याद दिलाते हुए कि एक इंसान से प्यार ही उन्हें पिछली बार ले डूबा था। न मार सकती, न डरा सकती, किआरा एक ही रास्ता चुनती है, इंसानी रूप लेकर उसी कैंप में गाइड बन जाना, और नौकरी माँगने पहुँची किआरा से शिवांश कहता है कि उसे लगता है वो दोनों पहले कहीं मिले हैं।
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कैंप की ज़िंदगी खुलती है, मनोहर किआरा को अपनी बेटी की तरह अपना लेता है और सरपगढ़ की नाग-कथाएँ हँसी और डर के साथ सुनाता है, जबकि नव्या को उस गाइड पर शक होने लगता है जो एक ऐसे मंदिर के बारे में बहुत ज़्यादा जानती है जिसमें कोई गाँववाला घुसता तक नहीं। किआरा चुपचाप अपनी मुहिम शुरू करती है, सर्वे को बंजर ज़मीन की तरफ़ मोड़ती है, श्राप की चेतावनियाँ बोती है, और शिवांश के पास होने की जलन झेलती है। पर जब शिवांश का रडार ठीक तहख़ाने वाली जगह पर एक छिपा रास्ता पकड़ लेता है, किआरा का काबू एक पल के लिए फिसलता है और लैंप की रोशनी में उसकी आँखें सुनहरी चमक उठती हैं, ठीक उसी पल नव्या मुड़ती है।
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नव्या की शक भरी नज़र से बाल-बाल बचकर किआरा तहख़ाने वाली सुरंग की खुदाई को धीमा करने का बहाना गढ़ती है, पर शिवांश की तरफ़ खिंचाव हर पल भारी होता जाता है। एक आधी दबी लिखाई पढ़ते हुए किआरा वो प्राचीन पंक्ति शिवांश के समझने से पहले ही बोल देती है, और वो उस गाइड को यूँ देखता है जो मरी हुई ज़बान को माँ-बोली की तरह पढ़ती है। फिर खुदाई में एक नागिन और एक पहरेदार की तस्वीर दीवार पर उभरती है, और शिवांश को अजनबियों के लिए एक अनजाना ग़म घेर लेता है। मनोहर किआरा को चेताता है कि सरपगढ़ का असली ख़तरा इंसानी चेहरा पहनता है, और ठीक तभी ठाकुर करमवीर सिंह झूठी मेहमाननवाज़ी और एक ज़मींदार की मुस्कान के साथ कैंप म
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सुरंग की कमज़ोर छत बैठ जाती है और शिवांश मलबे में दब जाता है, और ख़ुद को रोक न पाकर किआरा अपनी असली ताक़त से मिट्टी चीर कर उसे निकालती है। अँधेरे में, उसकी देह उसकी देह से सटी हुई, दोनों पर एक ही दृश्य टूट पड़ता है, सौ साल पहले नागमणि की आख़िरी रात, जिसे कोई नहीं समझ पाता। शिवांश काँपता हुआ जागता है, उसी चेहरे को अपने सामने पाकर जिसे वो बचपन से सपनों में देखता आया है, और किआरा को वो बात समझ आ जाती है जो सब बदल देती है, पिछले जनम की यादें उसमें भी लौट रही हैं। उस रात अकेले, शिवांश तहख़ाने का एक ढीला पत्थर निकालता है, और उसके पीछे ख़ज़ाना नहीं, सौ साल पुरानी एक मूरत मिलती है, हूबहू उसका अपना चेह
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दोनों के सपने और गहरे होते जाते हैं, और शिवांश भोर में किआरा से मिलने से पहले ही अपने सपने से उसका चेहरा काग़ज़ पर उतार देता है, जिसमें किआरा अपना सौ साल पुराना ग़म एक अजनबी के हाथों खिंचा देखती है। इतिहास दोहराने के डर से किआरा उसे दूर धकेलती है और खुदाई को नाकाम करने की कोशिश करती है, और दोनों में हार जाती है, क्योंकि शिवांश हर दिन उस पर और भरोसा करता जाता है। मनोहर इस खिंचाव को पनपता इश्क़ समझ कर पूरे कैंप में शादी की तैयारियाँ शुरू कर देता है। पर उसी शाम गाँव का एक आदमी कुएँ पर अधमरा मिलता है, गले पर दो नुकीले ज़ख़्म, और जहाँ सब श्राप चिल्लाते हैं, किआरा उस डंक को अपने लहू में पहचान लेती ह
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किआरा को यक़ीन हो जाता है कि सौ साल पुराना उसका दुश्मन लौट आया है, तक्षक, जिसकी गद्दारी ने आख़िरी रात पृथ्वी की जान ली थी, और जो अब खुदाई, मणि और ख़ुद उसके इर्द-गिर्द मँडरा रहा है। वो अकेले में उसके सामने आता है, पूरी शराफ़त और सधे हुए ज़हर के साथ, और उसे एक सौदे की पेशकश करता है, यह बताते हुए कि उसने इस एक रात का पूरा एक सदी इंतज़ार किया है, और उसे नागमणि भी चाहिए और, आज भी, किआरा भी। पुरानी नफ़रत और उससे भी पुराने इतिहास से भरी उस टक्कर के आख़िर में तक्षक अपनी शर्त रखता है, नागमणि की रात मणि छीनने में उसका साथ दे, वरना वो लौटे हुए पृथ्वी को फिर से मार डालेगा और किआरा को देखने पर मजबूर करेगा,
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किआरा एक उस्तरे की धार पर दोहरा खेल खेलती है, तक्षक को झूठी ख़बर देती है कि खुदाई तहख़ाने की तरफ़ बढ़ रही है, जबकि सच में वो उसे रोज़ पीछे खींच रही है। शिलालेखों पर झुके-झुके वो और शिवांश और क़रीब आते हैं, और शिवांश उसे अपने उस सपने की बात बताता है जिसमें वो हर बार एक औरत को खोता है, यह जाने बिना कि वो औरत उसी के सामने बैठी है। इसी बीच नव्या, कैंप और शिवांश की सच्ची फ़िक्र में, गाइड पर अपने शक लेकर ठाकुर करमवीर के पास पहुँच जाती है, और अनजाने में किआरा के दुश्मन के हाथ में पहला सिरा थमा देती है।
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बावड़ी पर एक रात के सर्वे में दोनों का सारा कवच उतर जाता है, और जैसे ही उनकी उँगलियाँ पानी में छूती हैं, सौ साल पुरानी एक ही याद दोनों पर एक साथ टूट पड़ती है, इसी बावड़ी में उनका बीता जनम का प्यार। उनके होंठ मिलने से ठीक एक साँस पहले तक्षक अपने असली नाग-रूप में बावड़ी पर टूट पड़ता है, और शिवांश को बचाने के लिए किआरा को अपना असली रूप धरना पड़ता है। मशाल की रोशनी में शिवांश उस औरत की जगह एक विशाल नागिन देख लेता है, और उसका दिमाग़ उस सच को सँभाल नहीं पाता, वो बेहोश होकर गिर पड़ता है।
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शिवांश होश में आता है, यक़ीन नहीं कर पाता कि बावड़ी में देखी नागिन ज़हर थी, बुख़ार था, या सपना, और किआरा, अंदर से टूटते हुए, उसे यही झूठ पर यक़ीन करने देती है, उसे और अपने राज़ दोनों को बचाने के लिए। भैरवी उसे ठंडे लफ़्ज़ों में चेताती है कि जो इंसान याद रखता है, वो मरने वाले इंसान से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक होता है। रात को शिवांश, बहुत धीरे, किआरा से कहता है कि उसे परवाह नहीं कि उसने क्या देखा, कि उसने पूरी उम्र एक ऐसी औरत का ग़म काटा जिससे वो कभी मिला ही नहीं, और अब वो उसके सामने खड़ी है, और सीधे पूछता है, तुम सच में कौन हो।
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सब्र खोकर तक्षक किआरा की सुस्ती को ही उसके ख़िलाफ़ हथियार बना लेता है, आधी रात ठाकुर करमवीर की हवेली में एक अजनबी जौहरी बनकर पहुँचता है, और उसे तहख़ाने की ठीक जगह और नागमणि की तक़दीर पलट देने वाली ताक़त का लालच देकर इंसानी हवस को वो हथौड़ा बना देता है जिससे मुहर टूटे। करमवीर परमिट और ज़मीन के हक़ की धमकी देकर खुदाई तेज़ करवाता है, और किआरा शिवांश को धीमा करने और तक्षक की इंसानी कठपुतली को रोकने के बीच फँस जाती है। उसके दबाव में शिवांश की टीम तहख़ाने की बाहरी दीवार तोड़ देती है, और रडार आख़िरी पत्थर के पीछे कुछ ऐसा पकड़ता है जो किसी मशीन पर नहीं आता, एक धड़कती हुई रोशनी, नागमणि जागने लगी है।
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तहख़ाना खुलने के बावजूद इश्क़ उमड़ पड़ता है, एक चुराए हुए, तड़पते पल में किआरा और शिवांश आख़िरकार अपने बीच के खिंचाव को नाम दे देते हैं, और किआरा सब बता देने से बस एक लफ़्ज़ दूर आ कर रुक जाती है। भैरवी और एक उभरती याद से किआरा का सबसे गहरा ज़ख़्म पूरा खुलता है, कि सौ साल पहले तक्षक से मणि बचाने के लिए उसने पृथ्वी की जान के बदले मणि चुनी थी, उसका बढ़ा हुआ हाथ छोड़ दिया था, और आज तक ख़ुद को माफ़ नहीं कर पाई। तभी करमवीर की भेजी एक सरकारी गाड़ी आती है, और उसमें से उतरने वाला शांत, चिकना अफ़सर कोई इंसान नहीं, तक्षक की जात का दूसरा नाग है, इंसानी खाल में, यह पक्का करने आया कि मणि उस रात यहाँ से निकल
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तहख़ाना खुलते ही नागमणि पुकारने लगती है और उसकी नज़दीकी किआरा का इंसानी रूप हिला देती है, और सच के क़रीब पहुँचा शिवांश उसे ठीक उसी फिसलन के बीच थाम लेता है। जो वो समझने लगा है उससे घिरा शिवांश चुपचाप ठान लेता है कि वो अपनी ही खुदाई रोक देगा, ठीक उसी पल जब करमवीर के आदमी ताक़त के बल पर जगह क़ब्ज़ाने बढ़ते हैं।
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मौत के इतने पास से लौटी दो जानें अँधेरे में अकेली रह जाती हैं, जहाँ सौ साल से रुका हुआ चुंबन आख़िरकार उतर आता है, और उस एक छुअन में शिवांश को सब याद आ जाता है, पृथ्वी की ज़िंदगी, उनका प्यार, और नागमणि की उस आख़िरी रात उसकी अपनी मौत। पर यही मोड़ है, अंत नहीं, और उसी साँस में ये भी लौट आता है कि सब ख़त्म कैसे हुआ था, और शिवांश पूछता है कि वो उस औरत से प्यार कैसे करे जिसने उसे मरते देखा और मणि उठा ली।
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याद लौटने के बाद दोनों अपने सबसे सच्चे और सबसे घायल रूप में आमने-सामने आते हैं, किआरा उस असहनीय फ़ैसले का बचाव करती है कि मणि तक्षक के हाथ लगती तो दुनिया पर क़यामत टूट पड़ती, और शिवांश उस औरत को उस औरत से अलग नहीं कर पाता जिसने उसे मरते देखा था। इश्क़ जुड़ता नहीं बल्कि उसी ज़ख़्म पर टूट जाता है, और तभी तक्षक पहली बार सीधे शिवांश के सामने आकर एक ज़हरीला सच घोल देता है, कि उस रात किआरा फिर वही चुनाव करेगी, और जीने का जो रास्ता वो कभी नहीं देगी, वो तक्षक दे सकता है।
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तक्षक टूटे हुए शिवांश को अधूरे सच से पकाता जाता है, ये शक बोता है कि किआरा का प्यार बस अपराधबोध है और नागमणि की ताक़त को उस रास्ते की तरह लटकाता है जिससे शिवांश फिर कभी किसी के रहम पर न रहे, जबकि करमवीर अब खुलकर पुरातत्वविदों को खदेड़ने आ जाता है। शिवांश को अपने दुश्मन की तरफ़ खिसकते देख किआरा के सामने फ़ैसला आ खड़ा होता है, और आख़िर में शिवांश ठंडा होकर तक्षक का प्रस्ताव क़ुबूल करता दिखता है और किआरा से मुँह मोड़ लेता है, जहाँ सुनने वाला तय नहीं कर पाता कि ये दुश्मन की चाल जानने की चाल है या सचमुच का गिरना।
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करमवीर की ज़बरदस्ती जगह हड़पने की कोशिश ख़ूनी हो जाती है, मनोहर और एक गाँव वाला बुरी तरह घायल होते हैं, और इंसानी तथा नाग दोनों ख़तरे एक साथ कैंप पर टूट पड़ते हैं, जबकि किआरा दो मोर्चों पर लड़ते हुए अपना राज़ भी छिपाए रखती है। शिवांश की असली वफ़ादारी सामने आती है कि वो तक्षक के पास गिरा नहीं था बल्कि उसकी चाल जानने उतरा था, और उसी अफ़रा-तफ़री में उन्हें तहख़ाने की भीतरी मुहर अंदर से चटकी हुई मिलती है, यानी नागमणि तक जितना सोचा था उससे कहीं जल्दी पहुँचा जा सकता है और सारी उलटी गिनती एक झटके में ढह जाती है।
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मुहर के अंदर से चटकते ही नागमणि की धड़कती नीली रोशनी पूरे कैंप में फैल जाती है, नव्या की मशीनें मर जाती हैं और वो पुकार किआरा के लहू में इतनी तेज़ हो उठती है कि उसका इंसानी रूप फिसलने लगता है। शिवांश उसे थाम लेता है और किआरा आख़िरकार उसे पूरा सच बता देती है, कि वो कौन है, वो पत्थर दरअसल एक अनादि भूख की जेल है, और तक्षक अगर मुहर तोड़ दे तो वो उस भूख का दरवाज़ा बन जाएगा और पूरी दुनिया जल उठेगी, इसीलिए वो मणि को किसी क़ीमत पर, शिवांश की जान की क़ीमत पर भी, गिरने नहीं दे सकती। तभी खंडहर से भैरवी निकल आती है और वो दफ़्न सच सामने रखती है जो सब कुछ पलट देता है, कि इस मरती हुई मुहर को नागमणि की रात या
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मौत का फ़रमान सुनने के बाद किआरा एक अजीब सी शांति में डूबी है, क्योंकि वो सौ साल से मरने को तैयार है और उसके लिए ये सज़ा नहीं, एक रिहाई है, पर शिवांश ये क़ुबूल नहीं कर पाता। दोनों के बीच वही सौ साल पुराना तराज़ू अब उलटा रखा है, पहले उसने शिवांश को मणि की ख़ातिर मरते देखा था और अब शिवांश को किआरा को मरते देखना है, और इसी उलटी हुई तक़दीर के सामने उनका प्यार और गहरा उतर आता है। शिवांश मान लेता है कि अब वो समझता है कि उस रात किआरा ने मणि क्यों चुनी थी, और इस अधूरी माफ़ी से घाव भरना शुरू होता है, पर वो इस तयशुदा त्रासदी को स्वीकार करने से इनकार कर देता है। रात को अकेले, वो चुपचाप ठान लेता है कि वो
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अपनी ही मौत की याद में उतरते ही शिवांश को सौ साल पुरानी उस रात के टुकड़े दिखते हैं, पर वो जुड़ते नहीं, इसलिए वो किआरा को लेकर भैरवी के पास पहुँचता है और उस अधूरी रीत का पूरा सच माँगता है। भैरवी की ज़ुबानी और शिवांश की लौटती याद से वो राज़ खुलता है जो सब कुछ पलट देता है, कि पृथ्वी उस रात कोई बेबस तमाशाई नहीं था जो बचने के लिए हाथ बढ़ा रहा था, बल्कि उसने ख़ुद को वेदी पर झोंक कर मुहर थामने की कोशिश की थी और तक्षक ने उसे इसीलिए मारा, और मरते हुए उसने मणि किआरा के हाथ में दबा कर उसे थामे रहने को कहा था। यानी किआरा ने मणि को शिवांश पर नहीं चुना था, ख़ुद पृथ्वी ने वो चुनाव किया था और मणि उसके हाथ सौं
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नव्या के अपहरण ने सारे मुखौटे उतार दिए हैं। ठाकुर करमवीर, जिसने जिस ख़ज़ाने की सेवा की वो उसे भी निगलने वाला है, ये समझ कर टूटा और डरा हुआ कैंप में लौटता है और पहली बार दुश्मन के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाता है, जबकि घायल मनोहर किआरा का सच पा लेता है और नागिन जान कर भी उसे अपनी बेटी ही मानता है। बीती रात के सच से जुड़े दोनों प्रेमी और ये नया गठजोड़ मिलकर नागमणि की रात का जवाब बुनते हैं और नव्या को छुड़ाने की चाल चलते हैं। पर जब किआरा तक्षक के सामने नव्या के बदले ख़ुद को पेश करती है और उसे उकसाती है, तो घमंड में आकर तक्षक अपना असली मक़सद खोल देता है, कि उसे मणि की ताक़त नहीं चाहिए, वो तो मुहर तोड़कर उस
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नागमणि की रात से ठीक एक शाम पहले सरपगढ़ नागपंचमी मनाता है, दूध और गेंदे के फूल नाग देवताओं को चढ़ते हैं, और मनोहर अपनी घायल हड्डियों के बावजूद पूरे गाँव को हँसाता-रुलाता इस लोक-रंग की अगुवाई करता है, इस बात से बेख़बर कि जिस नागिन को वो आशीर्वाद दे रहा है वो कल रात मरने वाली है। बीते जनम के सच से हल्के हुए दोनों प्रेमी इस उत्सव से चुराकर अपने आख़िरी कुछ घंटे बटोरते हैं और पहली बार, बिना किसी बोझ के, बिना किसी शक के, एक-दूसरे को खुलकर और आज़ादी से चुनते हैं। पर उसी कोमलता के नीचे दोनों एक-एक राज़ छिपाए हैं, दोनों ने अलग-अलग ठान लिया है कि मुहर की क़ीमत वो अकेले चुकाएँगे ताकि दूसरा बच जाए। और रात
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उसी रात, अपनी विदाई का वादा फुसफुसाकर किआरा जैसे ही करवट लेती है, शिवांश उठ बैठता है और बता देता है कि वो जागा हुआ था, उसने हर लफ़्ज़ सुन लिया है, और यहीं दोनों के छिपे हुए दो वादे आमने-सामने आ जाते हैं, दोनों ने एक ही रात एक-दूसरे के लिए मरने की ठान रखी थी। तीसरा रास्ता ढूँढने की बेचैनी में वो भैरवी के पास पहुँचते हैं, और भैरवी वो आख़िरी डरावना सच खोलती है कि नागमणि की रात मुहर सिर्फ़ एक नागिन की ख़ुशी से दी गई क़ुर्बानी से नई होती है, पर वेदी पर बहा एक पहरेदार का लहू उसी मुहर को तोड़ भी सकता है। तभी दोनों पर वो सच बिजली की तरह गिरता है कि तक्षक शिवांश को कभी मारना ही नहीं चाहता था, उसे पृथ्व
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सौ साल में एक बार आने वाली नागमणि की रात उतर आई है, चाँद उस सुराख़ की तरफ़ सरक रहा है और हर ताक़त तहख़ाने के उस पुराने सेहन में सिमट आई है। तक्षक अपना असली जाल खोल देता है, बंधी हुई नव्या, पृथ्वी का जीवित पहरेदार-लहू, और जागती हुई नागमणि, सब एक साथ दाँव पर, और मरती हुई मुहर की दरारों से वो अनादि भूख कुलबुलाने लगती है। किआरा अपनी जान देकर मुहर को नई करने वेदी की तरफ़ बढ़ती है, शिवांश उसे रोककर ख़ुद क़ीमत चुकाने झपटता है, और तक्षक उसी मुहर को हमेशा के लिए चूर करने पर तुला है। और जैसे ही चाँद सुराख़ पर पूरा बैठता है और नागमणि सफ़ेद आग की तरह दहकती है और वेदी की मुहर चटकती है, दोनों प्रेमी एक-दूसर
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अँधेरा छँटता है और वो लहू सामने आता है, वो किआरा का था, क्योंकि उस काले पल में तक्षक का वार शिवांश पर पड़ने से पहले किआरा उसके आगे कूद गई थी, और अब वो चाँदी जैसा लहू बहाती वेदी के नीचे गिरी है। सौ साल पुराना तराज़ू ठीक उलटकर सामने आ खड़ा होता है, इस बार शिवांश को अपने प्यार को मरते देखना है, और उसके सामने वही पुराना चुनाव है, अपने प्यार को बचाओ या पूरी दुनिया को। पर इस बार दोनों उस झूठे तराज़ू को ठुकरा देते हैं और पुनर्जन्म में ही छिपा तीसरा रास्ता पा लेते हैं, कि सौ साल से एक-दूसरे से बँधी दो आत्माएँ मिलकर मुहर को नई कर सकती हैं और क़ीमत आपस में बाँट सकती हैं ताकि वो किसी एक को न निगले। पर जै
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करमवीर का काँपता हाथ शिवांश के कंधे पर पड़ता है, पर आख़िरी पल में वो अपनी पूरी उम्र का लालच झटककर शिवांश को वेदी की तरफ़ धकेल देता है और ख़ुद तक्षक पर टूट पड़ता है, बस एक साँस ख़रीदने के लिए, और उसकी क़ीमत अपने लहू से चुकाता है। तभी भैरवी अपने असली रूप में, रेगिस्तान के हर साँप को साथ लिए तहख़ाने में उतरती है और उस रिसती भूख को थामे रखती है, जबकि किआरा और शिवांश आख़िरकार वो करते हैं जो सौ साल की अलग-अलग क़ुर्बानी कभी न कर सकी, पहरेदार का लहू और नागिन की जान, दोनों एक साथ, प्यार के नाम पर, एक ही मुहर पर। और वही बंधन, जिसे तोड़ने में तक्षक ने सौ साल लगाए, उसी को नई करता है, तक्षक अपनी चुराई बूँद
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मुहर बंद है और दुनिया बच गई है, पर उसकी क़ीमत में किआरा की चाँदी शिवांश की बाँहों में बुझती जा रही है, तभी भैरवी वो आख़िरी क़ानून खोलती है, कि पत्थर एक मौत नहीं, एक जान माँगता है, और अगर शिवांश अपने इंसानी बरस इस बंधन में उड़ेल दे तो किआरा को अपनी हस्ती नहीं, बस अपनी सदियों की अकेली अमरता देनी होगी, और दोनों एक साझा इंसानी उमर बाँट लेंगे। सौ साल जो तराज़ू किसी एक की मौत माँगता रहा, वो पहली बार दो ज़िंदगियों को एक में तौल देता है, किआरा की चाँदी गरम इंसानी लहू बन जाती है और उसके सीने में पहली बार एक दिल धड़कता है। बूढ़ा करमवीर मंदिर और अपनी हवेली गाँव के नाम कर, अपने ख़ानदान का लालच अपने साथ ले