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Chapter 15 of 27 12 min read

तुमने चुना था

नागमणि की रात by Avni Oberoi

सुबह सलेटी रंग में उतरी, बिना किसी गरमाहट के। रात-भर दोनों में से कोई सोया नहीं था। कैंप अपनी आदत की भागदौड़ में जाग गया, चाय के बर्तन खनके, मशीनें गूँजीं, पर उन दो लोगों के बीच, जो अभी-अभी सौ साल बाद मिले और फिर बिछड़ गए थे, एक सदी पुरानी चुप पसरी हुई थी।

शिवांश ने ख़ुद को काम में गाड़ दिया था। वो नक़्शों पर झुका रहा, नापें लेता रहा, नव्या को आदेश देता रहा, और एक बार भी किआरा की तरफ़ नहीं देखा। जैसे नज़र मिलाते ही, वो याद फिर से जाग जाएगी। जैसे उसका काम, अब उसकी ढाल था।

और किआरा उस चुप को और नहीं सह पाई। दोपहर के सन्नाटे में, जब बाक़ी टीम खाने के लिए तंबू में गई, वो उस खुदाई के गड्ढे के पास पहुँची, जहाँ शिवांश अकेला, एक टूटे शिलालेख को घूर रहा था, पर पढ़ नहीं रहा था।

"तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया। और उस शिलालेख को तुम पिछले एक घंटे से एक ही जगह से देख रहे हो। तुम पढ़ नहीं रहे, शिवांश। तुम बस मुझसे नज़र चुरा रहे हो।"

"मेरे पास बहुत काम है, किआरा। ठाकुर के आदमी कभी भी लौट सकते हैं। वो डॉक्टर नागपाल हर पत्थर पर नज़र रखे है। मुझे इस जगह की फ़िक्र है। बस।"

"मुझे मालूम है तुम्हें किसकी फ़िक्र है। और मुझे मालूम है तुम्हारे अंदर क्या चल रहा है, क्योंकि वही सौ साल से मेरे अंदर चल रहा है। एक बार मेरी तरफ़ देख लो। सिर्फ़ एक बार। और मुझसे वो कह दो जो तुम कल रात से अपने अंदर दबाए हो।"

और उसने नज़र उठाई। और उसकी आँखों में जो था, वो ग़ुस्सा नहीं था। ग़ुस्सा होता तो आसान होता। उसमें एक गहरा, थका हुआ दर्द था, वो दर्द जो किसी अपने से मिलता है, किसी दुश्मन से नहीं।

"मैं तुम्हें देखता हूँ, किआरा, और मुझे दो औरतें दिखती हैं। एक वो, जिसे मैं सौ साल से प्यार करता हूँ, जिसका चेहरा मैंने हर सपने में देखा। और एक वो, जिसने मुझे ज़मीन पर मरते देखा, मेरा बढ़ा हुआ हाथ देखा, और मुँह फेर लिया। और मैं इन दोनों को अलग नहीं कर पा रहा। दोनों का एक ही चेहरा है। तुम्हारा।"

"तो सुनो। आज मैं तुम्हें वो बताऊँगी जो उस रात तुम मरते हुए नहीं जान पाए। वो मणि, जिसे तुम एक पत्थर कहते हो, वो सिर्फ़ एक पत्थर नहीं है, शिवांश। वो एक जेल है। उसके अंदर एक ऐसा अँधेरा बंद है, जिसे मेरे पुरखों ने अपनी जान देकर सील किया था।"

"एक अँधेरा। एक जेल। बड़ी-बड़ी बातें।"

"मज़ाक़ मत उड़ाओ। मेरे पुरखे उसे 'वो जो नीचे सोता है' कहते थे। एक ऐसी भूख, जो युगों पहले इस धरती को निगल रही थी। नदियाँ सूख गई थीं, फ़सलें राख हो गई थीं, और जो उसकी छाया में आ जाता, वो इंसान नहीं रह जाता था। मेरी जात ने अपनी सैकड़ों जानें देकर उसे उस मणि में क़ैद किया था। और वो क़ैद, सिर्फ़ एक पहरेदार के लहू से टिकी रहती है। मुझसे।"

"और तक्षक? वो इस सबमें कहाँ है?"

"तक्षक उस भूख का चेला है। उसका वारिस। वो मणि इसलिए नहीं चाहता कि उसमें ताक़त है। वो उसे इसलिए चाहता है कि उसे तोड़ कर, जो अंदर सोता है, उसे जगा सके। वो उस अँधेरे का दरवाज़ा है, शिवांश। और सौ साल पहले, वो उस दरवाज़े को खोलने से बस एक साँस दूर था। तुम्हारी साँस।"

और पहली बार, शिवांश की आँखों में उस दर्द के साथ कुछ और भी आया। एक डर, जो सिर्फ़ अपने लिए नहीं था। किआरा जो कह रही थी, अगर उसका आधा भी सच था, तो उसकी अपनी मौत उस तराज़ू का सबसे छोटा पलड़ा थी। पर उसका दिल, वो अब भी उसी छोटे पलड़े में अटका हुआ था।

"उस रात तक्षक अगर वो मणि ले जाता, तो वो जेल टूट जाती। और जो चीज़ उसमें बंद है, वो आज़ाद हो जाती। तुम मरते, ये सच है। पर तुम अकेले नहीं मरते। तुम्हारे साथ ये गाँव मरता। ये शहर मरता। लाखों लोग, जिन्हें मैं जानती भी नहीं, जिनके बच्चे उस रात सो रहे थे, वो सब मरते। मेरे एक हाथ में तुम्हारी एक जान थी, और दूसरे में अनगिनत जानें। तुम बताओ, मैं क्या चुनती?"

और यही किआरा का सबसे भारी सच था। ये कोई चुनाव नहीं था जो प्यार और फ़र्ज़ के बीच होता है। ये एक चुनाव था जो एक जान और अनगिनत जानों के बीच था। और कोई भी दिल, कितना भी बड़ा हो, उस तराज़ू में एक जान को अनगिनत जानों से भारी नहीं तौल सकता था। सिवाय एक दिल के। उसी के, जो उस एक जान से प्यार करता था।

"तुम सही कह रही हो। मेरा दिमाग़ तुम्हारी हर बात मानता है। लाखों जानें, एक जान से भारी हैं। ये गणित है। ये सही है। पर मैं उस रात गणित नहीं था, किआरा! मैं तुम्हारा प्यार था! और जब मौत मेरी आँखों में थी, तो मैं दुनिया के बारे में नहीं सोच रहा था। मैं सिर्फ़ ये सोच रहा था कि तुम आओगी। और उस आख़िरी पल में, तुम्हारे सामने भी वही एक चीज़ होनी चाहिए थी। मैं। पर तुमने मुझे नहीं चुना। तुमने चुना था। और वो चुनाव मैं नहीं था।"

और किआरा के पास इसका कोई जवाब नहीं था, क्योंकि दोनों सच थे। उसका फ़र्ज़ सच था, और उसका दर्द भी। यही उस रात की क्रूरता थी, और यही आज की भी। दो सच, जो एक-दूसरे को काट रहे थे, और उनके बीच में, एक प्यार, जो लहूलुहान पड़ा था।

"तो मैं क्या करूँ, शिवांश? सौ साल पहले जो हुआ, उसे कैसे बदलूँ? मैं वापस उस रात में नहीं जा सकती। मैं बस इतना कह सकती हूँ कि जिस दिन मैंने तुम्हारा हाथ छोड़ा, उसी दिन मैंने अपना दिल भी दफ़्न कर दिया था। मैं तब से ज़िंदा नहीं हूँ, बस साँस ले रही हूँ।"

"मुझे वो पीपल याद है, किआरा। वो रातें, जब तुम मेरे कंधे पर सिर रख कर तारे गिनती थीं, और कहती थीं कि हर जनम में मुझे ढूँढ लोगी। मैंने पूरी उम्र उन्हीं रातों का ग़म काटा है, बिना जाने कि वो असली थीं। और अब जब वो असली निकलीं, तो उनके साथ ये भी असली निकला कि उन्हीं हाथों ने, जो मेरे बाल सहलाते थे, मुझे मरने के लिए छोड़ दिया।"

"और अब? अब जब वो रात फिर आ रही है? जब वो तराज़ू फिर तुम्हारे सामने रखा जाएगा? अगर उस रात फिर वही होता है, किआरा, अगर तक्षक फिर मेरी जान को मणि के बदले माँगता है, तो तुम फिर क्या चुनोगी? सच बताओ। मुझे झूठी तसल्ली मत देना। तुम फिर मणि चुनोगी। है ना?"

और किआरा वहीं जम गई। क्योंकि वो झूठ नहीं बोल सकती थी, और सच बोलती तो उसे खो देती। उसका फ़र्ज़ आज भी वही था। मणि आज भी उतनी ही ख़तरनाक थी। और अगर सच में वो तराज़ू फिर रखा गया, तो... वो शब्द उसके गले में अटक गया।

"मैं... मैं नहीं जानती। मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगी। मैं वो पहरेदार हूँ जो सौ साल से इस दुनिया और उस अँधेरे के बीच खड़ी है। और अगर उस रात सिर्फ़ यही दो रास्ते हुए, तो शायद... शायद मुझे फिर वही करना पड़े। पर इस बार मैं तुम्हारे साथ मरूँगी। इस बार मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी।"

"मुझे तुम्हारे साथ मरना नहीं है, किआरा। मैं पहले ही एक बार तुम्हारे लिए मर चुका हूँ। मुझे... मुझे बस अकेला छोड़ दो। थोड़ी देर के लिए। मुझे नहीं पता मैं तुम्हारे इतने पास खड़ा रह कर, ये सब कैसे सोचूँ।"

और इस बार, किआरा ने उसे रोका नहीं। उसने उसे जाने दिया। क्योंकि वो जानती थी कि कुछ ज़ख़्म बातों से नहीं भरते। और जो ज़ख़्म सौ साल पुराना हो, उसे एक दोपहर में नहीं सिला जा सकता। वो वहीं खड़ी रह गई, उस टूटे शिलालेख के पास, और उसका अपना दिल भी उतना ही टूटा हुआ था।

रात गहरा गई। शिवांश कैंप से दूर, टीलों के पार, अकेला चला गया, जहाँ सिर्फ़ रेत थी और चाँद। वो कुछ देर एक चट्टान पर बैठा रहा, सिर हाथों में। और तभी, उसे लगा जैसे हवा एकदम ठंडी हो गई हो। रेगिस्तान की गरम रात में, एक अजीब, तहख़ाने जैसी ठंडक।

उसने सिर उठाया। कुछ ही क़दम दूर, एक आदमी खड़ा था। लंबा, सुंदर, गहरे रंग के कपड़ों में, चेहरे पर एक ऐसी शांत मुस्कान जो देखते ही रीढ़ में एक अनजाना डर भर देती थी। शिवांश ने उसे कभी नहीं देखा था। और फिर भी, उसके अंदर कोई बहुत पुरानी चीज़ चीख उठी, ख़तरा।

"रात के इस पहर में, अकेले, रेगिस्तान में। बड़ी हिम्मत है तुममें, पुरातत्ववेत्ता। या शायद हिम्मत नहीं। शायद बस इतना दर्द कि अब किसी और चीज़ से डर नहीं लगता। मैं वो दर्द पहचानता हूँ। मैंने उसे बहुत क़रीब से देखा है।"

"कौन हो तुम? इस वक़्त, यहाँ? गाँव के हो? मैंने तुम्हें कैंप में नहीं देखा।"

"मैं इस ज़मीन का हूँ, इससे भी पुराना जितना ये मंदिर है। और मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। मैंने तुम्हें पहले भी देखा है, इसी रेत पर, बहुत साल पहले। एक अलग चेहरे में। एक अलग नाम में। ... पृथ्वी।"

और वो नाम, जो शिवांश ने सिर्फ़ अपनी लौटती याद में सुना था, जो सिर्फ़ उसका और किआरा का राज़ था, वो एक अजनबी के मुँह से निकला। शिवांश की साँस रुक गई। और उसी पल, उस आदमी की आँखें, एक झपकी के लिए, दो सुनहरी दरारों में बँट गईं, और फिर वापस इंसानी हो गईं।

"तुम... तुम भी उन्हीं में से हो। तुम इंसान नहीं हो। उस रात, मेरी छाती में जो डंक उतरा था... वो तुम थे। तुमने मुझे मारा था।"

"मैं मानता हूँ, वो एक ज़रूरी काम था। पर आज मैं तुम्हें मारने नहीं आया, पृथ्वी। आज मैं तुम्हें एक सच बताने आया हूँ। एक ऐसा सच जो वो लड़की तुम्हें कभी नहीं बताएगी, क्योंकि वो सच उसे तुम्हारी नज़रों में गिरा देगा।"

"मुझे तुम्हारे सच में कोई दिलचस्पी नहीं। तुमने मुझे मारा है। तुम मेरे दुश्मन हो।"

"दुश्मन। हर कहानी में कोई न कोई दुश्मन ठहराया जाता है, पृथ्वी। तुमसे किसने कहा कि वो दुश्मन मैं ही हूँ? एक ज़माने में मैंने इसी लड़की को सर्प-लोक का सिंहासन देना चाहा था। मैंने इसे सब कुछ दिया होता। और इसने एक फ़ानी इंसान को चुना, तुम्हें, जिसे मिट्टी में मिल जाना था। मैंने बस वो लिया जो कभी मेरा था। पर कहानी हमेशा हारने वाले की ज़बानी सुनाई जाती है, और तुम उसी की ज़बानी सुनते आए हो।"

"जो भी हो। मैं तुम्हें वो मणि नहीं दिलाऊँगा। और मैं किआरा के ख़िलाफ़ एक लफ़्ज़ नहीं सुनूँगा।"

"मैं तुमसे मणि नहीं माँग रहा। मैं तुमसे कुछ नहीं माँग रहा। मैं तो बस तुमसे कभी झूठ नहीं बोलूँगा, ये जान लो, क्योंकि उसने बोला है। सोचो, पृथ्वी। सौ साल पहले, जब तुम मर रहे थे, उसने तुम्हारे बदले मणि चुनी थी। और अब, वो रात फिर आ रही है। और मैं तुमसे एक बात पूरे यक़ीन से कह सकता हूँ। जब वो तराज़ू फिर रखा जाएगा, वो फिर वही चुनेगी। पत्थर। हर बार। क्योंकि वो पहरेदार पहले है, प्रेमिका बाद में। उसका दिल तुम्हारा है, पर उसका हाथ हमेशा मणि पर ही जाएगा।"

और शिवांश चुप रहा, क्योंकि वो झूठ नहीं था। ये ठीक वही था जो किआरा ने ख़ुद, कुछ घंटे पहले, अपने आँसुओं के साथ क़ुबूल किया था। मैं नहीं जानती। शायद मुझे फिर वही करना पड़े। तक्षक ने कोई नया ज़हर नहीं दिया था। उसने बस वो ज़हर उठाया था, जो किआरा ख़ुद उसके प्याले में गिरा चुकी थी।

"पर मैं तुम्हें वो दे सकता हूँ जो वो कभी नहीं देगी, पृथ्वी। एक रास्ता। जीने का रास्ता। उस मणि में सिर्फ़ मौत नहीं, ज़िंदगी भी बंद है। एक ऐसी ज़िंदगी जो कभी ख़त्म न हो। तुम्हें उसके फ़र्ज़ का, उसके तराज़ू का, उसके चुनाव का ग़ुलाम बनने की ज़रूरत नहीं। इस बार तुम्हें उसके हाथ का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। इस बार, तुम ख़ुद अपनी ज़िंदगी उठा सकते हो। बस एक बार, मेरी बात सुन लो। सिर्फ़ सुन लो। बाक़ी, तुम्हारी मर्ज़ी।"

और वो आदमी, वो नाग, उस अँधेरे में उतना ही चुपचाप घुल गया जितना आया था, पीछे एक ठंडक और एक ज़हर छोड़ कर। शिवांश अकेला खड़ा रह गया, रेगिस्तान की उस ठंडी रात में, और उसके अंदर वो ज़हर धीरे-धीरे फैलने लगा। क्योंकि तक्षक ने उसे कोई झूठ नहीं बताया था। उसने सच बताया था, और सच से बड़ा कोई ज़हर नहीं होता। किआरा ने आज तक उसे बचाने की बात की थी। तक्षक ने पहली बार, उसे जीने की बात की थी। और एक टूटे हुए इंसान के लिए, वो दोनों में फ़र्क़ करना, अब पहले जैसा आसान नहीं रह गया था।

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