Chapter 14 of 27 12 min read
पहली दहलीज़
मौत के इतने पास से लौटी दो जानें अँधेरे में अकेली रह जाती हैं, जहाँ सौ साल से रुका हुआ चुंबन आख़िरकार उतर आता है, और उस एक छुअन में शिवांश को सब याद आ जाता है, पृथ्वी की ज़िंदगी, उनका प्यार, और नागमणि की उस आख़िरी रात उसकी अपनी मौत। पर यही मोड़ है, अंत नहीं, और उसी साँस में ये भी लौट आता है कि सब ख़त्म कैसे हुआ था, और शिवांश पूछता है कि वो उस औरत से प्यार कैसे करे जिसने उसे मरते देखा और मणि उठा ली।
उस रात ठाकुर के आदमी कैंप के मुहाने तक आए, लाठियाँ थामे, चेहरे बाँधे। पर वो हमला नहीं था। वो एक नाप थी। शिवांश टीम के सामने आ खड़ा हुआ, परमिट हाथ में, और उनसे कहा कि एक भी क़दम आगे बढ़े तो दिल्ली तक ख़बर जाएगी। और आदमी, किसी अनदेखे इशारे पर, जितने चुपचाप आए थे, उतने ही चुपचाप लौट गए।
ये करमवीर का पहला वार नहीं था। ये उसकी पहली धमकी थी। अगली बार वो काग़ज़ नहीं, कुछ और लेकर आएगा। पर आज रात के लिए, तूफ़ान टल गया था। और जब भीड़ छँटी, धूल बैठी, और कैंप की बत्तियाँ एक-एक कर बुझीं, तो टीलों की ओट में, उस टूटे मंदिर की सीढ़ियों पर, दो लोग रह गए। अकेले।
मौत इतने पास से गुज़री थी कि दोनों की साँसें अब भी तेज़ थीं। किआरा एक पत्थर पर बैठी थी, हाथ अब भी हल्के काँपते हुए। और शिवांश उसके ठीक सामने, ज़मीन पर, उसके घुटनों के पास। कोई मशीन नहीं, कोई भीड़ नहीं, कोई राज़ की परत नहीं। सिर्फ़ एक इंसान, और एक नागिन, और उनके बीच सौ साल की एक चुप।
"आज जब वो आदमी लाठियाँ लेकर बढ़ रहे थे ना, मुझे उनका डर नहीं लगा। मुझे बस एक डर लगा। कि कहीं तुम्हें कुछ हो न जाए। मेरी पूरी उम्र में किसी चीज़ ने मुझे इतना नहीं डराया, जितना तुम्हें खोने के ख़याल ने।"
"मुझे कुछ नहीं होता, शिवांश। मैं वो नहीं हूँ जो टूट जाए। सौ लाठियाँ भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। तुम्हें मेरी नहीं, अपनी फ़िक्र करनी चाहिए।"
"तुमने कल जो मुझे दिखाया, वो कोई और होता तो जान के लिए भाग जाता। पर मैं सारी रात सो नहीं पाया, किआरा। इसलिए नहीं कि मैं डरा हुआ था। इसलिए कि मुझे लग रहा था जैसे बरसों बाद, आख़िरकार, कोई खिड़की खुल गई हो। जैसे मैं तुम्हें हमेशा से जानता था, और अब बस याद आ रहा है।"
और यहीं किआरा को डरना चाहिए था। यही वो पल था जहाँ भैरवी की चेतावनी उसके कानों में गूँजनी चाहिए थी। जो इंसान याद रखता है, वो मरने वाले इंसान से ज़्यादा ख़तरनाक होता है। उसे उठ कर चले जाना चाहिए था। पर वो हिली नहीं।
"शिवांश, कुछ खिड़कियाँ बंद ही अच्छी होती हैं। उनके पीछे रोशनी नहीं, तूफ़ान होता है। तुम्हें जो याद आ रहा है ना, उसे आने मत दो। मेरी बात मानो। जो भूल गया है, उसी में तुम्हारी ज़िंदगी है।"
"तो फिर एक बात बता दो। सिर्फ़ एक। जब मैं तुम्हारा नाम सुनता हूँ, तो मेरे सीने में एक ऐसा दर्द उठता है जो मेरा है ही नहीं। किसी और का है। किसी और वक़्त का। ऐसा क्यों होता है, किआरा? तुम जानती हो। मैं तुम्हारी आँखों में देख सकता हूँ कि तुम जानती हो।"
और वो और क़रीब आ गया। इतना क़रीब कि किआरा उसकी साँस अपने चेहरे पर महसूस कर सकती थी। चाँद ठीक उनके ऊपर था, आधा, और उसकी दूधिया रोशनी में उस मंदिर की टूटी मूरतें उन्हें देख रही थीं, जैसे सौ साल से इसी पल का इंतज़ार कर रही हों।
"मत करो। शिवांश, प्लीज़, मत करो। अगर तुमने मुझे छुआ, तो जो टूटेगा, उसे मैं फिर कभी नहीं जोड़ पाऊँगी। मैं सौ साल से एक दीवार के पीछे छिपी हूँ। उस दीवार को मत गिराओ।"
"मैं दीवारें गिराने के लिए ही तो बना हूँ, किआरा। ज़मीन के नीचे दबी हर चीज़ को बाहर लाना, यही मेरा काम है। और तुम, तुम इस पूरी दुनिया में सबसे गहरी दबी हुई चीज़ हो।"
और फिर वो हुआ, जो सौ साल से रुका हुआ था। उसने अपनी हथेली उसके गाल पर रखी, बहुत हल्के से, जैसे कोई कँपकँपाती लौ को हवा से बचा रहा हो। और किआरा, जिसने एक सदी से किसी को अपने पास नहीं आने दिया था, जिसने ख़ुद को पत्थर बना लिया था, उस एक छुअन में पिघल गई। और उनके होंठ मिल गए।
और उस चुंबन में वक़्त टूट गया। ये आज का चुंबन नहीं था। ये सौ साल का था। रेगिस्तान की गरमी और नागिन की ठंडक, एक इंसान की धड़कन और एक अमर आत्मा की तड़प, सब एक साथ बह पड़े। जैसे कोई बाँध, जो एक सदी से एक-एक बूँद रोके खड़ा था, आख़िरकार पूरा का पूरा टूट गया हो।
और ठीक उसी पल, शिवांश के अंदर आख़िरी दीवार गिरी। वो जो याद उसके अंदर कहीं गहरे, ताले में बंद पड़ी थी, वो अचानक फूट पड़ी। दर्द नहीं, रोशनी। एक बिजली, जो उसकी रीढ़ से होते हुए उसके पूरे वजूद में दौड़ गई। और उस बिजली की चमक में, उसे सब कुछ दिखने लगा।
उसे याद आया। इसी रेगिस्तान की एक और सुबह, जब वो इंसान नहीं, इस मंदिर का जवान पहरेदार पृथ्वी था। उसे याद आई वो बावड़ी, जहाँ उसने पहली बार किआरा को पानी से निकलते देखा था, आधी नागिन, आधी चाँदनी, और अपना दिल वहीं, उसी पानी में गिरा दिया था। उसे याद आईं वो रातें, वो वादे, वो हँसी। सब लौट आया, एक ही साँस में।
"मैंने तुम्हें... मैंने तुम्हें उसी बावड़ी में देखा था। पहली बार। तुम्हारे बाल भीगे हुए थे, और तुमने मुझसे कहा था, इंसान, तू डरता क्यों नहीं? किआरा... मुझे याद आ रहा है। सब याद आ रहा है। तुम... तुम मेरी थीं। मैं तुम्हारा था।"
"पृथ्वी... नहीं... शिवांश... हे भगवान, तुम्हें याद आ रहा है। मैंने ये कभी नहीं होने देना चाहा था। पर तुम्हें याद आ रहा है।"
और एक पल के लिए, बस एक पल के लिए, सौ साल का ग़म ग़ायब हो गया। दो प्रेमी, जो एक सदी पहले मौत से बिछड़ गए थे, फिर से एक-दूसरे के सामने खड़े थे। किआरा हँस रही थी और रो रही थी, एक साथ। और शिवांश उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिए, ऐसे देख रहा था जैसे कोई प्यासा सौ साल बाद पानी देखता है।
"तुमने वादा किया था, किआरा। उस पीपल के नीचे। तुमने कहा था कि चाहे जो हो जाए, चाहे कितने जनम बीत जाएँ, तुम मुझे पहचान लोगी। और देखो, मैं वापस आ गया। मैं तुम्हें ढूँढते हुए वापस आ गया। सौ साल लगे, पर मैं आ गया।"
"मैंने हर रात तुम्हारा इंतज़ार किया। हर एक रात। और आज, जब तुम सामने हो, मुझे यक़ीन नहीं हो रहा। मेरे पृथ्वी। तुम सच में लौट आए।"
"सौ साल। और तुम एक दिन भी नहीं बदलीं। वही आँखें, वही ज़िद। मैंने तुम्हें उसी दिन पहचान लिया था, किआरा, जिस दिन तुमने कैंप में पहला क़दम रखा था। मेरा दिमाग़ नहीं जानता था, पर मेरा दिल जान गया था। वो काँप उठा था, जैसे कोई पुरानी घंटी बज गई हो।"
पर याद एक नदी है। और नदी बीच में नहीं रुकती। जो बाँध टूटा था, वो सिर्फ़ मीठी यादों पर नहीं रुका। वो बहता गया, आगे, और आगे, उस रात की तरफ़, जिसे किआरा सौ साल से याद करती थी, और जिसे पृथ्वी सौ साल से भूला हुआ था। नागमणि की आख़िरी रात।
और शिवांश की आँखों के सामने, उसकी बाँहों में किआरा के होते हुए भी, एक और दृश्य उभरने लगा। मणि का दहकता कक्ष। तक्षक की क्रूर हँसी। और एक तेज़, जलता हुआ दर्द, ठीक उसकी अपनी छाती में, जहाँ तक्षक का डंक उतरा था। उसकी मुस्कान जम गई। उसका शरीर अकड़ गया।
"रुको... कुछ और भी है। उस रात... मैं ज़मीन पर था। मेरे अपने ख़ून में। और मैं... मैं तुम्हें बुला रहा था। किआरा, मैं तुम्हारी तरफ़ हाथ बढ़ा रहा था। मुझे... मुझे मेरा हाथ याद आ रहा है, हवा में, तुम्हारी तरफ़।"
"नहीं... शिवांश, उस याद को रोक दो। आगे मत जाओ। प्लीज़, वहीं रुक जाओ, उस पीपल के नीचे। उससे आगे कुछ मत देखो।"
पर वो उसे रोक नहीं सकती थी। कोई भी उसे रोक नहीं सकता था। सौ साल से बंद वो दरवाज़ा, आख़िरकार, पूरा खुल गया था। और उसके पीछे से, वो एक दृश्य निकला जिसने उस चुंबन का सारा शहद ज़हर में बदल दिया।
उसने देखा। ख़ुद को, ज़मीन पर गिरा हुआ, आख़िरी साँसें गिनते हुए, अपना काँपता हाथ किआरा की तरफ़ बढ़ाए हुए। उसने देखा तक्षक को, बीच में खड़ा, एक सौदा फेंकते हुए। और उसने देखा किआरा को। उसकी किआरा को। उसकी तरफ़ बढ़े हुए उस हाथ को छोड़ कर, मुड़ते हुए, और मणि उठा लेते हुए।
और वो आख़िरी चीज़ जो पृथ्वी की मरती आँखों ने इस दुनिया में देखी थी, वो उसका अपना ख़ाली, बढ़ा हुआ हाथ था, और उसके ऊपर किआरा का चेहरा, जो उसे थामने के बजाय एक पत्थर पर झुका हुआ था। ये याद अब शिवांश की भी थी। और उसने शिवांश को अंदर तक चीर दिया।
"तुमने... तुमने मेरा हाथ नहीं थामा।"
एक ही जिस्म में दो यादें टकरा रही थीं। एक, जो अभी-अभी उसे चूमा था, प्यार से भरी। और दूसरी, जो सौ साल पहले उसी औरत की वजह से मरी थी। और शिवांश उन दोनों के बीच फट रहा था, आधा वो प्रेमी जो लौट आया था, आधा वो लाश जो कभी दफ़्न नहीं हुई।
और वो पीछे हट गया। उसके हाथ, जो अभी उसके चेहरे को थामे थे, अब हवा में काँप रहे थे। उसका चेहरा, जो अभी प्यार से दमक रहा था, अब उस दर्द से सफ़ेद पड़ गया था जो सौ साल पुराना था, पर उसके लिए अभी-अभी, इसी पल हुआ था।
"शिवांश, रुको, मेरी बात सुनो! वो इतना आसान नहीं था जितना तुम्हें दिख रहा है! मैंने जो किया, उसके पीछे..."
"मैं मर रहा था, किआरा। मैं तुम्हारी बाँहों की तरफ़ हाथ बढ़ा रहा था। और तुमने... तुमने मेरा हाथ छोड़ दिया। एक पत्थर के लिए। मैंने पूरी उम्र एक औरत का ख़्वाब देखा। एक ऐसी औरत, जिसके लिए मैं सौ बार मर सकता था। और वो औरत, तुम हो, जिसने मुझे मरते देखा और मुँह फेर लिया।"
और यही था नागमणि की रात का सबसे क्रूर मज़ाक़। जिस चुंबन ने उन्हें सौ साल बाद मिलाया था, उसी चुंबन ने उन्हें फिर से तोड़ दिया। जो याद प्यार लौटाने आई थी, वही याद उस प्यार के साथ, उस प्यार को ख़त्म करने वाला ज़ख़्म भी लौटा लाई थी। मिलन और बिछोह, एक ही साँस में।
"हाँ, मैंने मणि उठाई थी। पर अगर मैं उसे छोड़ती, तो जो उसमें बंद है, वो आज़ाद हो जाता। सिर्फ़ तुम नहीं, ये पूरी दुनिया... शिवांश, मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था! मैंने तुम्हें बचाने के बदले लाखों को चुना, और उस एक फ़ैसले ने मुझे सौ साल जलाया है!"
"लाखों। दुनिया। मुहर। ये सब बहुत बड़े शब्द हैं, किआरा। पर मैं उस रात दुनिया नहीं था। मैं बस एक लड़का था, ज़मीन पर, जो तुमसे प्यार करता था, और जो तुम्हारा नाम लेते-लेते मर गया, ये सोचते हुए कि तुम आओगी। और तुम नहीं आईं।"
और किआरा के पास इसका कोई जवाब नहीं था। क्योंकि जो उसने कहा, वो सच था। और जो शिवांश ने कहा, वो भी सच था। यही उस ज़ख़्म की सबसे बड़ी क्रूरता थी। इसमें कोई झूठा नहीं था। दोनों सच्चे थे, और उसी सच ने उन्हें सौ साल पहले, और आज फिर, दो अलग किनारों पर खड़ा कर दिया था।
"मैं हर रोज़ उस पल में लौटती हूँ, शिवांश। हर रोज़ अपनी याद में मैं अपना हाथ बढ़ाती हूँ, तुम्हारी तरफ़। और हर रोज़ मेरा हाथ मणि पर ही रुक जाता है। सौ साल से। तुम जो सज़ा मुझे देना चाहते हो, मैंने ख़ुद को उससे कहीं बड़ी सज़ा दी है।"
"मुझे सब याद आ गया है, किआरा। तुम्हारी हँसी, तुम्हारे वादे, वो बावड़ी, सब। पर उन सबके साथ, मुझे ये भी याद आ गया है कि तुमने मुझे मरते हुए देखा, और मेरे बढ़े हुए हाथ के बजाय, एक पत्थर चुना। अब तुम ही बता दो। मैं उस औरत से प्यार कैसे करूँ, जिसने मेरी जान से बढ़ कर एक मणि को चुना था?"
और चाँद की उस दूधिया रोशनी में, टूटे मंदिर की उन सीढ़ियों पर, दो प्रेमी खड़े थे, जिनके बीच की दूरी अभी एक साँस की थी, पर जिनके बीच अब सौ साल की एक लाश पड़ी थी। शिवांश को सब याद आ गया था। और यही, किआरा का सबसे बड़ा डर था। क्योंकि अब जो इंसान उसके सामने खड़ा था, वो उसका खोया हुआ प्यार भी था, और उसका सबसे गहरा इल्ज़ाम भी। मिलन की वो पहली दहलीज़, पार करते ही, एक और बिछोह की पहली दहलीज़ बन गई थी। और नागमणि की असली रात, अभी बाक़ी थी।
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