Chapter 2 of 27 10 min read
मणि की पहरेदार
किआरा अपनी गुरु, प्राचीन नागिन भैरवी के पास पहुँचती है, जो उसका सबसे बड़ा डर सच कर देती है, नागमणि की रात कुछ ही हफ़्तों में लौट रही है, और उससे पहले किसी इंसान का तहख़ाना खोलना क़यामत होगी। भैरवी उसे उस लौटे हुए इंसान को मारने से और उसके पास जाने से, दोनों से रोकती है, यह याद दिलाते हुए कि एक इंसान से प्यार ही उन्हें पिछली बार ले डूबा था। न मार सकती, न डरा सकती, किआरा एक ही रास्ता चुनती है, इंसानी रूप लेकर उसी कैंप में गाइड बन जाना, और नौकरी माँगने पहुँची किआरा से शिवांश कहता है कि उसे लगता है वो दोनों पहले कहीं मिले हैं।
सरपगढ़ की रेत के बहुत नीचे, वहाँ जहाँ इंसान की कोई सुरंग नहीं पहुँचती, एक और दुनिया है। पत्थर की नागिनों से सजी एक गुफ़ा, जहाँ पानी टपकता है और उसकी हर बूँद सौ साल पुरानी लगती है।
और उस गुफ़ा के बीचोंबीच, एक पत्थर की शिला पर बैठी थीं भैरवी। किआरा की गुरु। नागिनों के पहरेदार-ख़ानदान की सबसे बूढ़ी नागिन, जिसकी उम्र किसी को नहीं पता, और जिसकी आँखें सदियों का बोझ ढोती थीं।
सारी रात किआरा रेत में भटकती रही थी, उस काफ़िले के आने के बाद। सौ साल की उसकी शांति एक ही शाम में टूट गई थी। इंसानी नींद उसे नहीं आती थी, पर आज पहली बार उसने उसकी ज़रूरत महसूस की, कुछ पलों के लिए भूल जाने की ज़रूरत।
जब भोर से पहले का अँधेरा सबसे गहरा हुआ, तो वो नागों की उस पुरानी गुफ़ा में उतरी, जहाँ वो सिर्फ़ तब जाती थी जब उसके पास ख़ुद कोई जवाब न बचे।
"भैरवी माँ। वो लौट आया है।"
"मैं जानती हूँ, बच्ची। रेत ने मुझे कल रात ही बता दिया था। एक क़ाफ़िला आया है, मशीनों वाला, और उनके सरदार की कलाई पर पहरेदारों का निशान है।"
"तो ये सच है? वो... वो पृथ्वी है?"
"रूह लौटती है, किआरा, जब कोई काम अधूरा रह जाए। पर ये मत भूल कि जो लौटता है, वो वो नहीं होता जो गया था। चेहरा नया, नाम नया, और सबसे ख़तरनाक... याद ख़ाली।"
"अगर मैं उसे याद दिला दूँ? अगर मैं उसे बताऊँ कि वो कौन था, कि हम..."
"तो तू उसे दूसरी बार मार देगी।"
किआरा ठिठक गई। गुफ़ा में पानी की एक बूँद गिरी, और उसकी आवाज़ बंदूक़ की तरह गूँजी।
"सुन मेरी बात। मणि की रात लौट रही है। गिनती के दिन बचे हैं। उस रात मणि किसी के भी हाथ लग सकती है, किसी के भी। और अगर ये इंसान अपनी मशीनों से उस रात से पहले तहख़ाना खोल देगा, तो मुहर वक़्त से पहले कमज़ोर होगी, और तक्षक को वो मौक़ा मिल जाएगा जिसका उसने सौ साल इंतज़ार किया है।"
"तो मैं इन्हें रोक दूँगी। जैसे मैंने बाक़ी सबको रोका। एक साँप, एक श्राप, एक डरावनी रात, और ये भाग जाएँगे।"
"नहीं। ये लुटेरे नहीं हैं, बच्ची, ये सरकार है। एक को डराओगी, तो वो दस और लाएगा, बंदूक़ों के साथ, काग़ज़ों के साथ। और अगर तूने किसी इंसान को मारा, तो और आदमी आएँगे, और मंदिर का राज़ पूरी दुनिया के अख़बारों में होगा। मारना और डराना, दोनों रास्ते बंद हैं।"
"तो मैं क्या करूँ? हाथ पर हाथ धर के बैठी रहूँ जब तक वो मणि तक न पहुँच जाए?"
"तुझे लगता है ये सिर्फ़ एक चमकता पत्थर है, जिसे लोग लालच में ढूँढते हैं। पर तू भूल रही है, बच्ची, कि हम नागों ने ये मणि इसलिए नहीं बनाई कि इसे कोई पहने। हमने इसे इसलिए बनाया कि इसके अंदर कुछ बंद रहे।"
"आप वही पुरानी बात फिर छेड़ रही हैं, भैरवी माँ। मणि के अंदर का वो अँधेरा। मैंने आज तक उसे देखा नहीं।"
"भगवान करे कभी न देखे। जिस दिन तूने उसे देखा, उस दिन मुहर टूट चुकी होगी। और तक्षक... तक्षक उस अँधेरे को बाहर लाना चाहता है। वो सिर्फ़ मणि का लोभी नहीं है, किआरा। वो उस चीज़ का ग़ुलाम है जो अंदर बंद है।"
किआरा ने उस वक़्त उस बात को पूरी तरह नहीं समझा। बस एक ठंडक उसकी रीढ़ में उतर गई। भैरवी की बातें हमेशा ऐसी होती थीं, आज छोटी लगतीं, और सालों बाद उनका असली वज़न खुलता।
"एक ही रास्ता है, और वो तुझे पसंद नहीं आएगा। अगर तू बाहर से नहीं रोक सकती, तो अंदर से रोक। इंसानी रूप ले। उनके बीच जा। उनकी बन जा। और उनकी खुदाई को, बिना किसी को शक हुए, गलत रास्ते पर मोड़ती रह, जब तक रात न निकल जाए।"
और यहीं, इसी पल, कहानी का पहिया घूम गया। किआरा समझ गई कि उसे क्या करना है। और साथ ही ये भी कि इसकी क़ीमत क्या होगी।
"यानी मुझे उसी आदमी के पास जाना होगा। उसके साथ चलना, उससे बात करना, उसके लिए रास्ता बनाना... उसी आदमी के, जिसे मैंने अपनी बाँहों में मरते देखा।"
"जाना, हाँ। पर छूना नहीं। दिल से नहीं। याद है ना, किआरा, पिछली बार क्या हुआ था जब एक नागिन ने एक इंसान से प्यार किया? एक पहरेदार मरा, और तू सौ साल रोई। प्यार ने हमें डुबोया था। दोबारा मत डूबना।"
"मैंने सौ साल पहले क़सम खाई थी, भैरवी माँ। किसी इंसान से प्यार नहीं करूँगी। वो क़सम आज भी ज़िंदा है।"
"क़समें रेत की दीवारें होती हैं, बच्ची। और वो आदमी उसी चेहरे के साथ लौटा है जिसके लिए तूने वो दीवार बनाई थी। सावधान रहना। उसे रोक, पर उससे बच।"
"मैं उसे नहीं बचाऊँगी क्योंकि मैं उससे प्यार करती हूँ, भैरवी माँ। मैं उसे रोकूँगी क्योंकि मुझे मणि बचानी है। बस। दिल का इसमें कोई काम नहीं।"
"जा, बच्ची। पर एक बात याद रख। सौ साल पहले भी तूने यही कहा था, कि दिल का कोई काम नहीं। और फिर तूने उसी दिल की वजह से सब कुछ खोया।"
उस रात किआरा ने पानी के एक कुंड में झाँका। और जो सूरत उसने चुनी, वो एक साधारण गाँव की लड़की की थी, धूप में तपी, हँसती आँखों वाली, ऐसी जिस पर कोई दो बार नज़र न डाले। नाम भी उसने साधारण चुना। किआरा। गाइड।
पर कुंड के पानी में, इंसानी चेहरे के पीछे, एक पल को उसकी आँखें सोने जैसी चमकीं, और फिर बुझ गईं। नागिन इंसानी खाल पहन सकती थी, पर अपनी आत्मा नहीं उतार सकती थी। और यही उसका सबसे बड़ा ख़तरा था।
अगली सुबह, मंदिर की खुदाई के कैंप में, तंबू लग रहे थे, और मनोहर हमेशा की तरह अपनी ज़बान चला रहा था, जब एक लड़की धूल भरे रास्ते से चलती हुई आई।
"अरे! ये देखो कौन आया! किआरा बिटिया! साहब, साहब, यही है वो लड़की जिसकी मैं बात कर रहा था। पूरे सरपगढ़ में यही एक है जो उस मंदिर के अंदर बाहर हर पत्थर जानती है। और डरती भी नहीं! बाक़ी तो सब भागते हैं।"
मनोहर को अंदाज़ा भी नहीं था कि वो अपने साहब के सामने एक सौ साल पुरानी नागिन की सिफ़ारिश कर रहा था, उसी नागिन की, जिससे बचने के लिए वो हर रात अपने तंबू के बाहर दूध का कटोरा रखता था।
"और साहब, ये सिर्फ़ रास्ता नहीं दिखाती, ये पुरानी लिखाई भी पढ़ लेती है! दीवारों पर जो साँप-वाँप खुदे हैं ना, वो सब इसे पता है। मेरा तो कहना है, इसे रख लो, वरना ये अकेली ऐसी है जो जानती है और आपको छोड़ के किसी और साहब के साथ चली गई तो?"
"अच्छा? तो तुम्हें डर नहीं लगता उस श्रापित मंदिर से, जहाँ मनोहर के दादा के मुताबिक़ नाग रहते हैं?"
"जो चीज़ आपको जानती हो, साहब, उससे डर कैसा? मंदिर मुझे बचपन से जानता है। मैं उसकी हर सीढ़ी, हर दरार पहचानती हूँ।"
उसने कहा बचपन से। और सुनने वाले जानते थे कि उसका बचपन सौ साल से भी पुराना था, और वो मंदिर सचमुच उसे जानता था, जैसे कोई घर अपने अकेले बचे बाशिंदे को जानता है।
"शिवांश, हमें एक ट्रेंड सर्वेयर चाहिए, गाइड नहीं। हमारे पास मशीनें हैं।"
"मशीनें ज़मीन के नीचे पत्थर देख लेती हैं, मैडम। पर ये नहीं बतातीं कि कौन सी दीवार गिर जाएगी अगर आप उसे छुएँगे, या कहाँ रेत के नीचे चालीस फ़ुट का गड्ढा है जो आपके आदमियों को निगल लेगा। वो मैं बताती हूँ। मुफ़्त में नहीं। पर सस्ते में।"
"और तुम ये सब कैसे जानती हो? गाँव का तो कोई उस मंदिर के तीन सौ फ़ुट अंदर तक नहीं जाता। तुमने वहाँ अंदर, नीचे, ख़ुद देखा है क्या?"
एक तीखा सवाल। और सही सवाल। नव्या वैज्ञानिक थी, और वैज्ञानिक वही होते हैं जो सुविधा से ज़्यादा सच पर यक़ीन करते हैं। किआरा ने एक साँस ली।
"मेरी दादी वहाँ की पुजारन थीं, मैडम। बचपन में वो मुझे बाहरी सीढ़ियों तक ले जाती थीं। बाक़ी कहानियाँ मैंने उन्हीं से सुनीं। अब वो नहीं रहीं, पर उनकी सिखाई हुई हर बात मुझे याद है। बहुत अच्छी तरह याद है।"
कोई दादी नहीं थी। वो ख़ुद वहाँ की पहली और आख़िरी पुजारन थी, सौ साल से। पर उसका झूठ इतना ठोस था कि नव्या का शक एक पल को थम गया, हालाँकि पूरी तरह मरा नहीं।
झूठ में सच था। सचमुच वहाँ एक ख़तरनाक गड्ढा था। पर किआरा उसे इसलिए नहीं बता रही थी कि किसी की जान बचे। वो इसलिए बता रही थी कि उसका पहला काम था, इन लोगों को अपनी बात पर भरोसा दिलाना, ताकि कल जब वो इन्हें गलत रास्ते पर भेजे, तो कोई सवाल न करे।
"ठीक है। एक हफ़्ते की आज़माइश। तुम रास्ते दिखाओगी, ख़तरे बताओगी, और मेरे सवालों के जवाब दोगी। मंज़ूर?"
"मंज़ूर, साहब।"
और जैसे ही उसने हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया, शिवांश की उँगलियाँ उसकी उँगलियों से छुईं, और दोनों एक पल के लिए ठिठक गए। जैसे किसी बहुत पुरानी किताब का कोई पन्ना अचानक खुल गया हो, और दोनों को उसकी ख़ुशबू आई हो।
"अजीब बात है।"
"क्या हुआ, साहब?"
"तुम्हें देख कर... मुझे लगा जैसे हम पहले कहीं मिले हैं। बेवक़ूफ़ी है, मैं जानता हूँ। मैं पहली बार सरपगढ़ आया हूँ। पर ये एहसास... जैसे तुम्हारा चेहरा मुझे बहुत पहले से पता है।"
और किआरा का पूरा शरीर चीख़ना चाहता था, हाँ, हाँ, हम मिले हैं, तुमने मेरी बाँहों में आख़िरी साँस ली थी। पर उसने अपना चेहरा पत्थर की तरह शांत रखा, और सिर्फ़ एक बात कही, जो सुनने में मामूली थी और जो सचमुच सौ साल पुरानी थी।
"हो सकता है किसी सपने में मिले हों, साहब। कुछ चेहरे हम याद नहीं रखते, पर भूल भी नहीं पाते।"
शिवांश उसकी आँखों से नज़र नहीं हटा पाया। एक अजनबी गाँव में, एक अजनबी लड़की, और एक ऐसा एहसास जिसे उसका विज्ञान नाम नहीं दे सकता था।
"सपने में..."
दोनों एक दूसरे को देखते रहे, एक पल ज़्यादा, दो पल ज़्यादा, जब तक हवा में एक अजीब सी ख़ामोशी न भर गई। और तभी, जैसा कि मनोहर का काम था, उसने वो ख़ामोशी तोड़ दी।
"अरे वाह! पहले ही दिन साहब और गाइड में इतनी जान-पहचान! ये तो अच्छा शगुन है! चलिए, मैं चाय बनाता हूँ, नई नौकरी की चाय! किआरा बिटिया, तेरे लिए भी, ख़ूब मीठी!"
"मीठी नहीं, मनोहर काका। मुझे फीकी पसंद है। मिठास जल्दी ख़त्म हो जाती है। फीकापन साथ रहता है।"
मनोहर हँसा और चाय बनाने भागा, ये समझे बिना कि उस मामूली से मज़ाक में सौ साल का सच छिपा था। किआरा ने मिठास एक बार चखी थी। और वो बहुत जल्दी ख़त्म हो गई थी।
उसे नहीं पता था कि वो लड़की उसके सपनों में सचमुच रहती थी, और सौ साल से इंतज़ार कर रही थी। और अब वो उसके कैंप के अंदर थी, उसकी मौत का इंतज़ाम करने, या शायद, उसकी जान बचाने।
नागिन घर के अंदर आ चुकी थी। और गिनती के दिन बचे थे, नागमणि की उस रात तक।
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