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Chapter 25 of 27 11 min read

टूटी मुहर

नागमणि की रात by Avni Oberoi

अँधेरे में सिर्फ़ एक आवाज़ थी। गरम लहू की, ठंडे पत्थर पर टपकने की। टप। टप। और फिर, एक चिंगारी। एक मशाल जली। करमवीर, जो ऊपर का मोर्चा छोड़कर उस सुरंग से नीचे उतर आया था, अपनी काँपती मशाल ऊपर उठाए खड़ा था, और उसकी रोशनी में जो दिखा, उसने उसकी साँस रोक दी।

"हे भगवान... किआरा... नहीं। ये... ये क्या हो गया।"

और उस पीली रोशनी में वो लहू दिखा, जो लाल नहीं था। वो चाँदी जैसा था, चमकता हुआ, जैसे पिघला हुआ चाँद। और वो किआरा का था। वो वेदी के नीचे गिरी थी, उसका इंसानी रूप टूट-टूट कर आधा नागिन हो चला था, और शिवांश उसे अपनी गोद में थामे बैठा था, उसके हाथ उसी चाँदी में सने हुए।

"किआरा। किआरा, आँखें खोलो। मेरी तरफ़ देखो। तुमने ये क्यों किया? वो वार मेरे लिए था। तक्षक मुझ पर झपटा था, मुझ पर, और तुम... तुम बीच में क्यों आ गई?"

क्योंकि उस काले पल में, जब तक्षक शिवांश के लहू के लिए उस पर टूटा था, किआरा उससे तेज़ थी। उसने शिवांश को धक्का दिया और ख़ुद उस वार के आगे आ गई। तक्षक का दंश, जो एक पहरेदार का लहू माँगता था, एक नागिन की देह में उतर गया। वो चीख़ किआरा की थी। और वो चटकता पत्थर वेदी का कोना था, जिससे टकरा कर वो गिरी थी।

"मैंने तुमसे कहा था ना, शिवांश। मैं तुम्हें फिर मरते नहीं देख सकती। सौ साल पहले मैं चूक गई थी। तुम्हारा हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा था, और मैं तुम्हें थाम नहीं पाई। इस बार... इस बार मैं नहीं चूकी।"

और वहीं, उस टूटती वेदी के नीचे, सौ साल पुराना वो तराज़ू ठीक उलटकर खड़ा हो गया। एक सदी पहले, किआरा ने शिवांश को अपनी तरफ़ हाथ बढ़ाते, बुझते देखा था। और आज, शिवांश अपने प्यार को अपनी बाँहों में, चाँदी बहाते, बुझते देख रहा था। तराज़ू वही था। बस पलड़े बदल गए थे।

"अब मैं समझा, किआरा। सौ साल पहले तुमने क्या झेला होगा। ये देखना, कि जिससे तुम सबसे ज़्यादा प्यार करते हो, वो तुम्हारी बाँहों में बुझ रहा है, और तुम कुछ नहीं कर सकते। सौ साल तुमने ये दर्द अकेले उठाया। और मैंने तुमसे पूछा था कि तुमने उस रात मणि क्यों चुनी। मुझे माफ़ कर दो। मुझे माफ़ कर दो कि मैं समझा नहीं।"

"अब तो समझ गए ना। बस यही काफ़ी है, शिवांश। सौ साल में पहली बार, कोई मेरा वो दर्द जानता है। तुम रोना मत। तुम्हारे आँसू मेरी इस चाँदी से कहीं ज़्यादा भारी हैं। और अभी रोने का वक़्त नहीं है। अभी सोचने का वक़्त है।"

"नागिन का लहू! बेवक़ूफ़ औरत! मुझे पहरेदार का लहू चाहिए था, तेरा नहीं! सौ साल की मेरी तैयारी, और तूने आख़िरी पल में सब गड़बड़ कर दिया! अब न मुहर टूटी, न नई हुई। तू बस बेकार में मर रही है।"

क्योंकि किआरा का लहू उस मुहर को तोड़ नहीं सकता था, वो सिर्फ़ एक पहरेदार का लहू करता। और उसकी क़ुर्बानी पूरी नहीं हुई थी, वो बीच में टूट गई थी। तो मुहर न नई हुई, न टूटी, बस और चौड़ी हो गई, और उस दरार से वो अनादि भूख अब रिस-रिस कर बाहर आ रही थी। तक्षक की साफ़-सुथरी योजना बिखर गई थी। पर किआरा भी।

और उस चौड़ी होती दरार से एक ठंडी हवा बहने लगी, जो इस दुनिया की नहीं थी। मशाल की लौ काँपी, फिर नीली पड़ गई। सेहन के पत्थरों पर पाला जमने लगा, और हवा में वो पुरानी, गहरी आवाज़ फिर उभरी, अब पहले से कहीं ज़्यादा साफ़, कहीं ज़्यादा भूखी, जैसे ज़मीन के बहुत नीचे कोई अपनी सौ साल पुरानी नींद से पूरी तरह जाग रहा हो, और अपनी क़ैद की सलाख़ों को टटोल रहा हो।

"पीछे हट, नाग! एक क़दम भी आगे बढ़ा, तो इस बूढ़े ठाकुर की तलवार तेरी उस चिकनी खाल में उतरेगी! मैंने ज़िंदगी भर लालच किया, पर आज, इस लड़की के लिए, मैं तेरे और इनके बीच खड़ा हूँ! सुना तूने?"

"तू? एक टूटा हुआ बूढ़ा, एक जंग लगी तलवार के साथ? हट जा, करमवीर, मेरे रास्ते से। पर... नहीं। रुक। खड़ा रह वहीं। मैं तुझे बाद में समझाऊँगा कि समझदारी किधर है।"

"नहीं, किआरा, तुम मरोगी नहीं। मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगा। भैरवी ने कहा था, तीसरा रास्ता हमारे बीच है। सोचो। सोचो मेरे साथ। कोई रास्ता होगा जिसमें तुम भी बचो, और ये दुनिया भी।"

"कोई तीसरा रास्ता नहीं है, शिवांश। मुहर टूट रही है, और उसे सिर्फ़ एक नागिन की ख़ुशी से दी क़ुर्बानी नई कर सकती है। मैं ही वो नागिन हूँ। मैं वैसे भी जा रही हूँ। तो मुझे जाने दो, पर इस बार पूरा करने दो। मेरी क़ुर्बानी को बेकार मत जाने दो।"

"नहीं। मैं वो नहीं करूँगा जो तुमने सौ साल पहले किया था, और फिर सौ साल अकेले जलती रही। मैं तुम्हें उस वेदी पर नहीं चढ़ने दूँगा, और अकेले तो बिल्कुल नहीं। तुम्हें खोकर ये दुनिया बचाने का कोई मतलब नहीं, किआरा। कोई मतलब नहीं।"

और वहीं, उसी वेदी पर, सौ साल बाद, वही चुनाव फिर आ बैठा। अपने प्यार को बचाओ, या पूरी दुनिया को। वो चुनाव, जिसने उन्हें एक बार तोड़ दिया था। वो तराज़ू, जिसका एक पलड़ा हमेशा किसी की मौत से भारी होता था।

"जो करना है, जल्दी करो! मैं इस शैतान को ज़्यादा देर नहीं रोक सकता! ये मुझे खिलौने की तरह हटा देगा! जल्दी!"

और तभी शिवांश ने वो किया, जो सौ साल पहले न वो कर पाया था, न किआरा। उसने किसी एक पलड़े को नहीं चुना। उसने पूरा तराज़ू ठुकरा दिया। न किआरा, न दुनिया। दोनों।

"रुको। किआरा, सुनो। भैरवी ने कहा था, तीसरा रास्ता हम दोनों के बीच है। एक पहरेदार का लहू मुहर तोड़ता है। एक नागिन की जान उसे बनाती है। पर हम दो अलग लोग नहीं हैं, किआरा। हम एक ही आत्मा के दो टुकड़े हैं। सौ साल से। तक्षक इसी बंधन को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। तो क्या हो, अगर हम उसी बंधन को हथियार बना लें?"

"साथ...? तुम्हारा लहू, और मेरी क़ुर्बानी, एक साथ, एक ही मुहर पर, एक ही पल में...?"

"अलग-अलग, तुम्हारा लहू तोड़ता, मेरी अकेली जान काफ़ी नहीं। पर साथ, एक-दूसरे से बँधे हुए, शायद वो टूटती नहीं, नई होती है। और क़ीमत, किआरा, क़ीमत दो में बँट जाती है। इतनी हल्की कि वो हम दोनों में से किसी को पूरा न निगल पाए। एक की मौत नहीं। दो की एक साझा साँस।"

और वहीं, उस टूटती वेदी के नीचे, वो तीसरा रास्ता आख़िरकार दिखा। जो किसी किताब में नहीं था, किसी याद में नहीं था। वो ठीक उसी चीज़ में छुपा था जिसे तक्षक सौ साल से तोड़ने की कोशिश कर रहा था। उनका बंधन। दो आत्माएँ, एक सदी के आर-पार एक-दूसरे से बँधी, मिलकर उस मुहर को नई कर सकती थीं, और क़ीमत को इस तरह बाँट सकती थीं कि वो किसी एक को न मिटाए।

"तो हम साथ चढ़ेंगे उस वेदी पर। साथ। जैसा हमने वादा किया था, कल रात। दो वादे नहीं। एक। साथ का। इस बार मैं तुमसे नहीं छुपाऊँगी। इस बार हम सचमुच साथ हैं।"

"एक। और इस बार, किआरा, कोई अकेला नहीं मरेगा। हम दोनों साथ चढ़ेंगे, साथ देंगे, और साथ लौटेंगे। या नहीं लौटेंगे। पर साथ। हमेशा की तरह अलग-अलग नहीं। बस इस बार, साथ।"

और घायल किआरा को अपनी बाँहों में थामे, अपने ही लहू और उसकी चाँदी को एक कर, शिवांश उस वेदी की तरफ़ मुड़ा। वो करने, जो अकेले कोई नहीं कर सकता था। साथ। और एक पल के लिए, उस मरती हुई रोशनी में, वो हारे हुए नहीं लगे। वो पूरे लगे।

"बहुत ख़ूब। आख़िरकार तुम दोनों समझ ही गए। साथ। एक आत्मा के दो टुकड़े। कितना सुंदर। और कितना देर से। मैं तो कब से इसी पल का इंतज़ार कर रहा था।"

"तू झूठ बोल रहा है, तक्षक। तू ये कभी नहीं चाहता था। तू हमें अलग करना चाहता था, हमारा बंधन तोड़ना चाहता था।"

"नहीं? पृथ्वी, तू सच में सोचता है ये तीसरा रास्ता तूने अभी, इसी पल खोजा? मैं सौ साल से जानता हूँ कि तुम दोनों का बंधन ही इस मुहर की आख़िरी चाबी है। इसीलिए मैंने तुम्हें साथ आने दिया। इसीलिए मैंने तुम्हें फिर से प्यार करने दिया। तुम्हारी हर चोरी की मुलाक़ात, हर चुंबन, मैं देखता रहा, और मुस्कुराता रहा।"

और एक ठंडी दहशत उन दोनों पर रेंग गई। तक्षक ने कोई भूल नहीं की थी। उनका प्यार, उनका मिलना, उनका ये आख़िरी 'साथ' का फ़ैसला, ये सब उसके जाल का हिस्सा था, शुरू से।

"और देख, मेरे हाथ में क्या है। तेरे लहू की एक बूँद, पृथ्वी। सूखी, पर ज़िंदा। उस दिन की, जब सुरंग की छत तुझ पर गिरी थी, और मैंने तुझे बचने दिया था। उसी दिन मैंने ये बूँद उठा ली थी। और तब से, सौ दिन से, मैं इसी बूँद से इस मुहर को अंदर से खरोंच रहा हूँ, दरार-दरार। तुम्हारी 'साथ की क़ुर्बानी' शुरू होने से बहुत पहले, मैंने तोड़ना शुरू कर दिया था।"

"इसीलिए... इसीलिए ये मुहर सौ साल से अंदर से चटक रही थी। कोई हादसा नहीं था। तू ही था। हर रात, हर दरार, तू।"

"मैं ही। और अब सुन, इस रात का सबसे सुंदर हिस्सा। तुम दोनों उस वेदी पर चढ़ोगे, अपनी साझा क़ुर्बानी देने, और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि दरवाज़ा पहले से खुल चुका है। तुम्हारी क़ुर्बानी मुहर नई नहीं करेगी। वो बस मेरे मालिक का पहला, सबसे मीठा निवाला बनेगी। दो प्रेमी, एक साथ। कितना स्वादिष्ट।"

और जैसे ही निराशा उन्हें घेरने लगी, तक्षक अपनी नागिन जैसी नज़र उस एक आदमी पर घुमा ले गया, जिसका दिल सबसे कमज़ोर था। जो दो दिन पहले तक सबसे बड़ा लालची था। ठाकुर करमवीर।

"और तू, ठाकुर। तू सच में सोचता है, ये दुनिया बचाकर, ये तुझे जीने देंगे? तेरे ख़ानदान ने पीढ़ियों इस मणि की सेवा की, मेरे मालिक की सेवा की, बिना जाने। उसके जागते ही, वो तेरी वफ़ादारी नहीं भूलेगा। तेरे पास एक ही रास्ता है, बूढ़े। उस लड़के को पकड़, उसे वेदी से दूर खींच, और मैं तुझे इस भूख से बचा लूँगा। वरना तू भी इनके साथ जलेगा। सोच ले।"

और करमवीर, जो सिर्फ़ दो दिन पहले नेक बना था, जिसकी पूरी उम्र लालच और डर में बीती थी, उसके अंदर वो पुराना डर फिर पंजे गाड़ने लगा। उसकी मशाल वाला हाथ काँपा। उसकी नज़र मरती हुई नागिन से उस कुंडली मारे नाग की तरफ़ डोली, जो उसे जीने का लालच दे रहा था।

"मैं... मैं मरना नहीं चाहता... मैंने सारी उम्र... सिर्फ़ जीना चाहा..."

"करमवीर, नहीं! मत सुन इसकी बात! इसने तुझे 'हथौड़ा' कहा था, याद है? हथौड़ा तोड़ कर फेंक दिया जाता है, तेरे ही मुँह से सुना था मैंने! ये तुझे नहीं बचाएगा! तू आज एक अच्छा आदमी है, करमवीर, उसी अच्छे आदमी बने रहो!"

"बचाऊँगा। हथौड़े को नहीं, पर एक समझदार साथी को हमेशा। आ जा, करमवीर। आख़िरी बार, अपने ख़ानदान की तरह सोच। मरते हुए महान बनने का कोई इनाम नहीं मिलता। ज़िंदा रहने वाले ही इतिहास लिखते हैं। उस लड़के को पकड़। अभी।"

और वहीं, उस सबसे बुरे पल में, जब किआरा शिवांश की बाँहों में चाँदी बहा रही थी, जब वेदी की मुहर चटक रही थी, जब वो तीसरा रास्ता बस एक साँस दूर था, ठाकुर करमवीर का काँपता हाथ उठा। और फिर, बहुत धीरे, वो हाथ बढ़ा, और शिवांश के कंधे पर आ गिरा, पीछे की ओर खींचता हुआ, वेदी से दूर। करमवीर ने अपना पलड़ा चुन लिया था। और तक्षक मुस्कुराया, क्योंकि उसने अपना आख़िरी पत्ता ठीक उसी पल फेंका था जब वो उन्हें सब कुछ की क़ीमत चुका सकता था। मुहर पहले से टूट रही थी। किआरा बुझ रही थी। और अब, उनका अपना साथी, उनके ख़िलाफ़ मुड़ चुका था।

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