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Chapter 23 of 27 12 min read

दो वादे

नागमणि की रात by Avni Oberoi

किआरा का फुसफुसाया हुआ वादा अभी हवा में ही तैर रहा था, चाँदनी अभी उसके गीले गालों पर ही काँप रही थी, जब उसने बहुत धीरे से करवट ली, ताकि शिवांश की नींद न टूटे। और ठीक उसी पल, अँधेरे में, एक आवाज़ उभरी। धीमी, पर पत्थर जैसी सख़्त।

"मैं सोया नहीं था, किआरा।"

और किआरा जम गई। सौ साल की वो नागिन, जो हर धड़कन पहचान सकती थी, आज एक साधारण सी इंसानी ग़लती में पकड़ी गई थी। उसने अपना पूरा राज़, अपनी पूरी मौत की योजना, एक ऐसे आदमी के कान में उँडेल दी थी जो जागा हुआ था।

"शिवांश... तुमने... तुमने कितना सुना?"

"हर एक लफ़्ज़। कि तुम कल रात मणि नहीं, मुझे चुनोगी। कि तुम ख़ुद उस वेदी पर चढ़ जाओगी। कि तुम मुझे जीते देखकर, फिर जाते हुए, मुझसे विदा लोगी। चुपचाप। मुझे बताए बिना। एक और बार।"

"मैंने तुम्हें फिर मरते हुए नहीं देखना, शिवांश! सौ साल पहले मैंने वो देखा था, तुम्हारा हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा हुआ, और तुम बुझते हुए। वो एक दृश्य मुझे सौ साल जलाता रहा। मैं वो दोबारा नहीं जी सकती। मैं नहीं जी सकती।"

"तो सुन ले, किआरा। क्योंकि अब झूठ बराबर हो गया है। मैंने भी वही ठाना है। एक-एक लफ़्ज़ में, जो तुमने मुझसे छुपाया, मैं तुमसे छुपा रहा था। भैरवी ने कहा था ना, मुहर एक पहरेदार के लहू से जुड़ी है। तो कल रात, अगर किसी को उस वेदी पर लहू देना है, तो वो पृथ्वी देगा। मैं दूँगा। और तुम्हें जीने को कहूँगा।"

और उस छोटे से तंबू में, चाँदनी की एक पतली लकीर के नीचे, दो लोग बैठे थे, आमने-सामने, और उन दोनों के बीच एक ही सच नंगा पड़ा था। दोनों ने एक ही रात, एक ही अँधेरे में, एक-दूसरे के लिए मरने की क़सम खाई थी। और दोनों को लगता था कि उनका राज़ महफ़ूज़ है।

"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, शिवांश। तुम्हें कोई हक़ नहीं कि तुम फिर से अपने आप को उस वेदी पर झोंक दो। मैं इसीलिए सौ साल पहरा देती रही, ताकि तुम एक दिन लौटो और जियो, मरो नहीं!"

"और तुम्हें? तुम्हें हक़ है? तुम मुझे सोया समझकर मेरे माथे पर हाथ फेरते हुए विदा ले रही थी, और तुम मुझसे हक़ की बात कर रही हो? हम दोनों एक ही गुनाह कर रहे हैं, किआरा। एक-दूसरे को बचाने के नाम पर, एक-दूसरे को अकेला छोड़ जाने का।"

और वो सच था। ये कोई ऐसी लड़ाई नहीं थी जिसमें कोई जीतता। दोनों सही थे, और इसीलिए दोनों हार रहे थे। दोनों जीना चाहते थे, पर सिर्फ़ दूसरे के लिए। और ये ज़िद, ये प्यार, ये उन्हें उसी पुराने तराज़ू की तरफ़ धकेल रही थी, जहाँ हमेशा एक ही पलड़ा भारी होता था। मौत का।

"तो फिर बस करो, किआरा। ये तराज़ू, ये कल रात मैं मरूँ या तुम, ये मुझे मंज़ूर नहीं। कोई तीसरा रास्ता होगा। और अगर होगा, तो सिर्फ़ एक ही जगह मिलेगा। भैरवी के पास। अभी। इसी वक़्त। रात अभी बाक़ी है।"

और नागमणि की रात का सूरज उगने से पहले, आख़िरी अँधेरे में, दो प्रेमी रेगिस्तान की उस टूटी बावड़ी की तरफ़ चले, जहाँ भैरवी उनका इंतज़ार कर रही थी, जैसे उसे पता हो कि वो आएँगे। सौ साल पुरानी नागिन एक सूखे पीपल के नीचे बैठी थी, पत्थर जैसी स्थिर, और उसकी आँखों में वो थकान थी जो सिर्फ़ सदियों से आती है।

"भैरवी। कोई और रास्ता बताओ। कोई भी। मुहर को नई करने के लिए मेरी जान चाहिए, ये तुमने कहा। पर क्या सच में सिर्फ़ यही एक रास्ता है? सौ साल में तुमने जो कुछ पढ़ा, सुना, देखा, उसमें कहीं, कहीं तो कोई और दरवाज़ा होगा।"

"बेटी, मैं तुझे झूठी उम्मीद नहीं दूँगी। मुहर एक नागिन की ख़ुशी से दी हुई क़ुर्बानी माँगती है। ये कोई सौदा नहीं, ये एक बलिदान है, अपनी मर्ज़ी का। और इस वंश की आख़िरी नागिन तू है। ये सच मैंने तुझसे नहीं छुपाया।"

"पर भैरवी, मुझे एक बात समझाओ। तुमने कहा मुहर एक पहरेदार के लहू से जुड़ी है। अगर एक नागिन की जान उसे नई करती है, तो एक पहरेदार का लहू उसका क्या करता है? क्योंकि तक्षक को मुहर तोड़नी है। और वो किसी नागिन की क़ुर्बानी से नहीं टूटेगी। तो वो किससे टूटेगी?"

और भैरवी एक पल के लिए बिल्कुल शांत हो गई। हवा रुक गई। सूखे पीपल के पत्ते तक नहीं हिले। किआरा ने महसूस किया कि कोई बहुत पुरानी, बहुत भारी चीज़ अब बाहर आने वाली है, वो आख़िरी दफ़्न सच, जो भैरवी ने शायद जान-बूझकर आख़िरी दम तक रोके रखा था।

"सुन, पृथ्वी। और ध्यान से सुन, क्योंकि ये वो सच है जिससे मैं तुझे बचाना चाहती थी। नागमणि की रात, जब चाँद उस सुराख़ पर आता है, तो मुहर दो तरफ़ खुलती है। एक नागिन की ख़ुशी से दी हुई जान उसे नई कर देती है। और एक पहरेदार का लहू, अगर उसी वेदी पर बहाया जाए, उसे तोड़ देता है। एक ही मुहर। दो चाबियाँ। एक बनाती है, एक मिटाती है।"

और वो लफ़्ज़ किआरा के सीने में ठंडे पानी की तरह उतर गए। एक पहरेदार का लहू। वेदी पर। शिवांश का लहू। पृथ्वी का लहू। सौ साल पहले जो लहू बहा था, वो कोई हादसा नहीं था। वो एक चाबी थी। और तक्षक को वो चाबी फिर चाहिए थी।

"रुको। रुको, भैरवी। एक पहरेदार का लहू मुहर तोड़ता है। और मैं... मैं उस पहरेदार का पुनर्जन्म हूँ। मेरे लहू में वही चाबी है। यानी..."

"यानी तू ही वो हथौड़ा है, पृथ्वी, जिसकी तक्षक को सौ साल से तलाश है। इसीलिए वो लौटा है। मणि उसे तेरे बिना नहीं टूटेगी। उसे उस वेदी पर, नागमणि की रात, तेरा जीवित पहरेदार-लहू चाहिए। मरा हुआ पृथ्वी उसके किसी काम का नहीं। उसे ज़िंदा पृथ्वी चाहिए।"

"इसीलिए... इसीलिए बावड़ी पर, उस रात, तक्षक ने शिवांश को मार डालने का मौक़ा होते हुए भी नहीं मारा। मुझे लगा वो मुझे तड़पाना चाहता है। पर वो... वो शिवांश को बचा कर रख रहा था।"

और अचानक, सौ दिनों की हर बात, हर धमकी, हर हमला, किआरा की आँखों के सामने एक नए रंग में खुलने लगा। तक्षक की हर वो चीख़ कि वो पृथ्वी को फिर मार डालेगा। हर वो पल जब उसने शिवांश की जान की क़ीमत लगाई। सब एक नाटक था। एक बहुत लंबा, बहुत सब्र भरा नाटक।

"सोचो, किआरा। जब सुरंग की छत गिरी थी, तक्षक चाहता तो मुझे वहीं दबा रहने देता। जब उसने तुम्हें धमकी दी कि वो मुझे मार देगा, वो कभी आया ही नहीं मुझे मारने। हर बार, हर बार, वो मुझे डराता रहा, पर छूता तक नहीं। क्योंकि उसे मेरी मौत नहीं चाहिए थी।"

"उसे तुम्हारी मौत नहीं, तुम्हारा लहू चाहिए। और लहू के लिए तुम्हारा ज़िंदा होना ज़रूरी है, वेदी पर, उसी रात, अपने पैरों पर खड़े। सौ साल से वो तुम्हें मारने की धमकी दे रहा था, जबकि सच ये है कि वो तुम्हें ज़िंदा रखने के लिए सब कुछ करता।"

"और अब समझ, उसने नव्या को क्यों उठाया। वो लड़की उसके किसी काम की नहीं। नव्या सिर्फ़ चारा है। एक ऐसा चारा जिसके पीछे पृथ्वी ख़ुद, अपने पैरों पर, उस वेदी तक चला आएगा। तक्षक जानता है कि तू नव्या को उसके भरोसे नहीं छोड़ेगा। तू जाएगा। और जाकर तू ठीक वहीं खड़ा होगा जहाँ उसे तू चाहिए।"

और वहीं, उस टूटी बावड़ी के किनारे, सूखे पीपल के नीचे, दोनों प्रेमियों को वो जाल अपनी पूरी ठंडक के साथ दिखा। तक्षक ने कोई भूल नहीं की थी। उसने शिवांश की जान पर जो हर धमकी दी थी, वो एक दीवार थी, जिसके पीछे उसका असली मक़सद छुपा था। और वो मक़सद अब नंगा था।

"तो हम शिवांश को वहाँ जाने ही नहीं देंगे। अगर उसका लहू वेदी पर नहीं पहुँचा, तो मुहर टूट ही नहीं सकती। बस इतना सा है। शिवांश उस रात कैंप में रहेगा, तहख़ाने से दूर, और मैं अकेले जाकर नव्या को छुड़ाऊँगी।"

"और नव्या मर जाएगी। तक्षक उसे उसी पल मार देगा जिस पल उसे लगेगा कि पृथ्वी नहीं आ रहा। और तेरी क़ुर्बानी, अकेले, मुहर को नई तो कर देगी, पर तक्षक तेरे मरते ही उस टूटती मुहर पर एक और चाल चल देगा। तू एक जाल का सिर्फ़ एक सिरा काट रही है, बेटी। दूसरा सिरा फिर भी तेरे गले पर रहेगा।"

"नहीं, किआरा। मैं जाऊँगा। नव्या को मरने के लिए नहीं छोड़ सकता, और तुम्हें अकेले उस अँधेरे में नहीं भेज सकता। पर अब हमारे पास एक चीज़ है जो कल तक नहीं थी। हम उसका जाल जानते हैं। और जो जाल दिख जाए, वो कभी-कभी उसी शिकारी के गले की फाँस बन जाता है जिसने उसे बुना।"

और किआरा ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ अब वो अंधा डर नहीं था जो सौ साल उसकी अपनी आँखों में रहा था। वहाँ एक ठंडी, साफ़ समझ थी। शिवांश ने वो देख लिया था जो किआरा सौ साल में नहीं देख पाई थी, कि तक्षक की सबसे बड़ी ताक़त, शिवांश का लहू, अगर सही हाथों में हो, तो शायद उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी बन सकती है।

"पर एक बात गाँठ बाँध ले, पृथ्वी। जाल को जान लेना उसे तोड़ना नहीं होता। तक्षक ने सौ साल इस रात को बुना है। और उस वेदी पर, नागमणि की रात, कोई चतुराई सबसे पुराने क़ानून को धोखा नहीं दे सकती। मुहर एक जान माँगेगी। किसी न किसी की। ये मत सोचना कि तुम दोनों दिमाग़ के ज़ोर से इस क़ीमत से बच निकलोगे।"

और उस चेतावनी के बाद एक भारी चुप्पी छा गई। भैरवी उठी, अपने बूढ़े जोड़ों को सीधा किया, और रेगिस्तान के अँधेरे में घुलने से पहले, एक पल को रुकी। उसकी आँखों में, उस सारी सख़्ती के नीचे, एक चीज़ थी जो किआरा ने पहले कभी नहीं देखी थी। ममता। और डर।

"सौ साल पहले मैंने तुझे मना किया था, किआरा। कि एक इंसान से प्यार मत कर। कि फ़र्ज़ और इश्क़ एक तराज़ू में नहीं आते। आज, इस आख़िरी रात, मैं वो लौटा नहीं सकती। पर इतना कहूँगी। अगर कोई तीसरा रास्ता है, तो वो किसी किताब में नहीं है। वो तुम दोनों के बीच है। जो चीज़ तुम्हें सौ साल से जोड़ रही है, शायद वही तुम्हें बचा भी सके। जा। और जीने की कोशिश करना, मरने की नहीं।"

और भैरवी चली गई, रेत में एक लकीर तक छोड़े बिना। पीछे रह गए दो लोग, एक टूटी बावड़ी के किनारे, और उनके ऊपर एक आसमान, जिसमें चाँद धीरे-धीरे उस बिंदु की तरफ़ बढ़ रहा था, जहाँ पहुँचकर वो सौ साल में एक बार, नागमणि की रात बनाता था।

"भैरवी ने कहा, तीसरा रास्ता हम दोनों के बीच है। मुझे नहीं पता वो क्या है, किआरा। पर मुझे एक बात पता है। सौ साल पहले हम अलग-अलग मरे थे। तुमने मुझे मरते देखा, और अकेली रह गई। इस बार, अगर हमें कुछ भी करना है, तो साथ करेंगे। मैं तुम्हें फिर अकेला नहीं छोड़ूँगा।"

"और मैं तुम्हें। पर शिवांश, एक वादा करो। आज हमने जो सीखा, वो हमारे बीच रहेगा। कोई और चुपके से मरने की योजना नहीं। कोई और अकेला वादा नहीं। जो भी होगा, हम एक-दूसरे को बता कर करेंगे। दो वादे नहीं। बस एक। साथ का।"

"एक वादा। साथ का। मैं क़सम खाता हूँ, किआरा। इस चाँद के नीचे, इस रेत पर, जहाँ सौ साल पहले हमारी कहानी अधूरी रह गई थी। इस बार जो होगा, हम साथ झेलेंगे। साथ जिएँगे, या..."

"या साथ। बस साथ। और कुछ नहीं।"

और उस काँपते चाँद के नीचे, दो लोग, जो कुछ ही घंटों में एक ऐसी रात में उतरने वाले थे जो सौ साल से उनका इंतज़ार कर रही थी, एक-दूसरे की बाँहों में, एक पल के लिए, सब भूल गए। जाल भूल गए, तक्षक भूल गया, मणि भूल गई। बस दो साँसें रहीं, एक-दूसरे में घुलती हुई।

पर उस कोमलता के ठीक बीच, किआरा के दिमाग़ में वो ठंडा सच फिर सुलग उठा। तक्षक को शिवांश की मौत नहीं, उसका जीवित लहू चाहिए। नव्या सिर्फ़ चारा है। और सबसे डरावनी बात, दोनों को उस वेदी तक ले आना, यही तक्षक की असली चाल थी। वो शिवांश को मारने की धमकी देता रहा, ताकि किआरा उसे बचाने में उलझी रहे, और दोनों, हाथ थामे, ख़ुद चलकर उसके जाल में उतर आएँ।

और तभी किआरा की रीढ़ में वो आख़िरी कँपकँपी दौड़ गई। क्योंकि उसे समझ आया कि जाल पहले से बंद था। शिवांश का वहाँ जाना कोई भूल नहीं थी, कोई ख़तरा नहीं था जिससे बचा जा सके। वो जाल का हिस्सा था। नव्या को बचाने जाना ही जाल में उतरना था। और अब उससे बचने का कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि उस रास्ते के दोनों सिरों पर तक्षक खड़ा था। दूर, रेगिस्तान के उस पार, आसमान का रंग बदलने लगा। सूरज उग रहा था। नागमणि की रात का सूरज। और उस सूरज के डूबते ही, वो रात आने वाली थी, जिसके लिए एक जाल सौ साल से बुना जा रहा था, और जिसमें अब, दो प्रेमी, आँखें खुली रखते हुए भी, चलकर उतरने वाले थे।

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