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Chapter 6 of 27 10 min read

सपनों का ज़हर

नागमणि की रात by Avni Oberoi

सुबह होने से पहले का वो सलेटी उजाला जब रात हार मान रही होती है और दिन अभी हिम्मत नहीं जुटा पाया होता। शिवांश अपने तंबू में जागा हुआ था, फिर से, तीसरी रात। सोना उसके लिए अब आराम नहीं, एक और सफ़र था।

उसकी गोद में एक स्केचबुक थी, और उसके हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद चल रहे थे। कोयले की एक-एक लकीर से एक चेहरा उभर रहा था, वो चेहरा जो सपने में उसके सामने खड़ा था। ऊँची पेशानी। गहरी, ग़मगीन आँखें। और होंठों के कोने में एक ऐसी उदासी जो सदियों पुरानी लगती थी।

"कौन हो तुम? मैं तुम्हें बनाता क्यों जा रहा हूँ, जब मैंने तुम्हें कभी देखा ही नहीं? या... देखा है?"

कल रात तहख़ाने में देखी वो मूरत अब भी उसकी आँखों के पीछे जल रही थी। अपना ही चेहरा, सौ साल पुराने पत्थर में, और उससे लिपटी एक नागिन। उसने वो बात किसी को नहीं बताई थी, नव्या को भी नहीं। कुछ था जो उसे रोक रहा था, जैसे वो राज़ पहले उसी का था, और सबसे पहले उसी को समझना था।

और तभी तंबू का परदा हिला, और भोर की पहली किरण के साथ किआरा अंदर आई, चाय की एक प्याली थामे, वैसे ही बिना खटखटाए जैसे वो सौ साल से इसी आदमी को चाय देती आई हो।

"जाग गए, साहब? रात फिर नहीं सोए ना। आपकी आँखें बता रही हैं।"

और फिर उसकी नज़र स्केचबुक पर पड़ी। और चाय की प्याली उसके हाथ में जम गई।

क्योंकि उस काग़ज़ पर, कोयले की लकीरों में, वो ख़ुद थी। हूबहू। वही आँखें, वही उदासी। शिवांश ने उसका चेहरा बनाया था, सोने से पहले, उससे मिलने से पहले। और सबसे डरावनी बात, उसने वो ग़म बनाया था जो किआरा सौ साल से अपने सीने में छिपाए घूम रही थी।

"हाँ। ये तुम हो। सपने में तुम्हारा चेहरा धुँधला था, बरसों तक। पर कल रात से... बिलकुल साफ़ है। जैसे किसी ने कोहरा हटा दिया हो।"

"ये मैं नहीं हूँ, साहब। बस एक औरत है। हर सपने में एक औरत होती है। और ये उदासी, ये आपने अपने मन से भरी है।"

"नहीं, किआरा। मैंने इसे भरा नहीं। मैंने इसे देखा। और मैं इसे तुम्हारी आँखों में भी देखता हूँ, हर बार जब तुम सोचती हो कि मैं देख नहीं रहा। तुम इतनी उदास क्यों हो? इतनी जवान लड़की, इतना पुराना ग़म?"

और फिर उसने स्केचबुक का अगला पन्ना पलटा, और किआरा की साँस रुक गई। दूसरे पन्ने पर एक और तस्वीर थी। एक तहख़ाना। एक जलता हुआ पत्थर। और उसके सामने घुटनों के बल गिरी एक औरत, किसी को अपनी बाँहों में थामे।

"और ये। ये कल रात का सपना है। इस औरत ने किसी को अपनी गोद में लिया है, और वो मर रहा है, और वो... वो उसे बचा नहीं रही। वो सिर्फ़ उस पत्थर की रखवाली कर रही है, जबकि उसका आदमी उसकी बाँहों में दम तोड़ रहा है। मुझे समझ नहीं आता, किआरा। वो उसे बचाती क्यों नहीं?"

और किआरा को लगा जैसे किसी ने उसके सीने में हाथ डाल कर उसका सौ साल पुराना सबसे गहरा ज़ख़्म निचोड़ दिया हो। वो उसे बचाती क्यों नहीं। यही सवाल उसने ख़ुद से सौ साल पूछा था, हर रात। और उसका कोई जवाब नहीं था जो उस दर्द को कम करता।

"शायद... शायद वो जानती थी कि अगर उसने पत्थर छोड़ा, तो और लाखों मरेंगे। शायद उसने अपने प्यार को इसलिए नहीं बचाया, क्योंकि वो कायर थी। बल्कि इसलिए, क्योंकि वो पहरेदार थी। और पहरेदार को कभी माफ़ी नहीं मिलती। न दुनिया से, न अपने आप से।"

"तुम... तुम इसे ऐसे बता रही हो जैसे तुम वहाँ थीं। जैसे तुमने उस औरत का दर्द ख़ुद जिया हो। और मैं वही उदासी तुम्हारी आँखों में भी देखता हूँ, हर बार जब तुम सोचती हो कि मैं देख नहीं रहा। इतनी जवान लड़की, इतना पुराना ग़म। ये कहाँ से आया, किआरा?"

एक ऐसा सवाल जिसका सही जवाब उसकी पूरी दुनिया जला देता। इतना पुराना ग़म, क्योंकि मैं इतनी पुरानी हूँ। और ये ग़म तुम्हारा है, पृथ्वी। तुम्हारी मौत का। पर किआरा ने वो जवाब निगल लिया, जैसे वो सौ साल से हर सच निगलती आई थी।

"मुझे उदासी अच्छी लगती है, साहब। कुछ लोगों को होती है। और आपको मुझ पर नहीं, अपनी खुदाई पर ध्यान देना चाहिए। ठाकुर की नज़र आप पर है, और वक़्त कम है।"

पर तंबू से बाहर निकलते ही उसने एक गहरी साँस ली, जैसे डूबते हुए इंसान को हवा मिली हो। ये और नहीं चल सकता, उसने ख़ुद से कहा। जितना वो क़रीब आ रहा है, उतना ख़तरा है, उसके लिए, मणि के लिए, और सबसे ज़्यादा, मेरे उस संकल्प के लिए जो अब रेत की तरह ढह रहा है।

"बस। आज से मैं उसे दूर रखूँगी। और उसकी खुदाई को इतना नाकाम कर दूँगी कि वो हार कर लौट जाए। यही उसे बचाने का इकलौता रास्ता है। उसे मुझसे दूर करना।"

उस दिन किआरा ने अपना सबसे ठंडा रूप ओढ़ा। उसने खुदाई की हर दिशा को उलझाया, हर नाप में शक बोया, मज़दूरों में डर फैलाया, और शिवांश से रूखा बर्ताव किया। पर हुआ उल्टा।

"तुम आज मुझसे दूर-दूर भाग रही हो, किआरा। और मुझे नहीं पता क्यों, पर इससे मुझे यक़ीन हो रहा है कि तुम कुछ छिपा रही हो जो मुझसे जुड़ा है। जितना तुम दूर जाती हो, उतना मैं समझता हूँ कि तुम मेरे लिए मामूली गाइड नहीं हो।"

और यही उसकी हार थी। वो जितना उसे धकेलती, वो उतना उस पर भरोसा करता। जितना वो खुदाई को नाकाम करती, वो उतना उसे ज़रूरी समझता, क्योंकि सिर्फ़ किआरा ही थी जो हर पहेली सुलझा देती थी। वो दोनों जंग हार रही थी, दिल की भी और फ़र्ज़ की भी।

और इस सारी तनातनी को दूर से देख रहा था एक जोड़ी आँखें, जिनके लिए ये कोई त्रासदी नहीं, एक प्रेम-कहानी थी। मनोहर।

"देखा? देखा तूने? साहब सुबह से बिटिया के पीछे-पीछे घूम रहे हैं, और बिटिया मुँह फुला के भाग रही है। अरे ये तो पक्का इश्क़ है! जब लड़की भागती है ना, तभी समझो फँसी है!"

"मनोहर काका! क्या बकवास कर रहे हो? मैं और साहब? मैं यहाँ काम करने आई हूँ!"

"अरे काम तो बहाना है, बिटिया! देख, साहब जवान, तू जवान, दोनों अकेले, रेगिस्तान में, चाँदनी रात... मैं तो कहता हूँ नाग पंचमी तक शादी करा देते हैं! मैं ख़ुद ढोल बजाऊँगा! पूरे कैंप को बता दूँ?"

और किआरा को हँसना पड़ा, अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, इस भोले आदमी की बात पर। शादी। नाग पंचमी तक। मनोहर को क्या पता कि उसने सौ साल पहले भी यही सपना देखा था, इसी आदमी के साथ, और नाग पंचमी की उस रात, वो सपना राख हो गया था।

"काका, कुछ जोड़े इस दुनिया के लिए नहीं बने होते। उनकी कहानी शुरू होने से पहले ख़त्म हो जाती है। मेरी और साहब की कहानी भी वैसी ही है। इसे यहीं रोक दो।"

"हट! ये सब किताबी बातें हैं। मैंने तेरी आँखें देखी हैं, बिटिया, जब तू साहब को देखती है। उसमें डर है, ग़म है, पर एक चीज़ और भी है। मोहब्बत। और मोहब्बत को कोई कहानी नहीं रोक सकती। कोई नहीं।"

और फिर से, उस अनपढ़ रसोइए ने, बिना जाने, वो सच कह दिया जिससे किआरा सबसे ज़्यादा डरती थी। मोहब्बत को कोई कहानी नहीं रोक सकती। सौ साल पहले भी नहीं रोक पाई थी। और शायद इस बार भी न रोक पाए।

उस पूरे दिन किआरा ने ख़ुद से जंग लड़ी। उसने खुदाई को उलझाने के लिए एक झूठा नक़्शा गढ़ा, पर शिवांश ने उसमें एक बारीकी पकड़ ली और हैरान होकर बोला कि किआरा की नज़र किसी पुरातत्वविद् से तेज़ है। उसने रूखा बनने की कोशिश की, पर वो एक कप चाय लाना नहीं भूली। हर वार जो उसने उस पर चलाया, वो पलट कर एक और धागा बन गया जो उन्हें बाँधता गया।

"मैं उसे दूर नहीं कर पा रही। मैं सौ साल तक पहाड़ों को हिला सकती थी, तूफ़ानों को मोड़ सकती थी, पर एक आदमी को अपने दिल से नहीं निकाल पा रही। कैसी पहरेदार हूँ मैं।"

शाम ढली, और उसके साथ हवा में एक बदलाव आया। किआरा ने उसे सबसे पहले महसूस किया, अपनी त्वचा पर, अपने लहू में, एक ठंडी सरसराहट, जो सिर्फ़ एक चीज़ की मौजूदगी में उठती थी।

और तभी गाँव की तरफ़ से एक चीख़ उठी। एक औरत की चीख़, फिर कई आवाज़ें, फिर दौड़ते क़दम। पूरा कैंप उस तरफ़ भागा, और किआरा सबसे आगे, क्योंकि उसका दिल पहले ही जान चुका था।

"कुएँ पर! रामू कुएँ पर पड़ा है! उसका पूरा बदन नीला पड़ गया है, साहब! आँखें खुली हैं पर हिल नहीं रहा! और उसके गले पर... उसके गले पर दो निशान हैं!"

कुएँ के पास भीड़ जमा थी। ज़मीन पर एक जवान गाँववाला पड़ा था, रामू, साँस चल रही थी पर मुश्किल से, बदन ठंडा और नीला। और उसके गले पर, साफ़, गहरे, दो नुकीले ज़ख़्म।

"साँप का काटा है। बड़ा साँप। पर ये सूजन... ये किसी आम ज़हर की नहीं। गाड़ी निकालो, इसे शहर के अस्पताल ले जाना होगा, अभी!"

"अस्पताल नहीं बचाएगा, साहब! ये नागिन का श्राप है! तुमने उसका मंदिर खोदा, और अब वो एक-एक कर के हमें उठाएगी! भागो यहाँ से, सब भागो!"

गाँव में कोहराम मच गया। श्राप। नागिन। मंदिर का ग़ुस्सा। हर ज़बान पर वही डर। पर किआरा भीड़ के बीच खड़ी, उस ज़ख़्म को देख रही थी, और उसका चेहरा राख की तरह सफ़ेद पड़ गया था।

क्योंकि ये नागिन का श्राप नहीं था। और ये कोई मामूली साँप भी नहीं था। किआरा उस डंक को जानती थी। वो ज़हर उसके अपने लहू में सदियों से बहता था, उसके दुश्मन का ज़हर। वो निशान एक चेतावनी था। एक दस्तख़त।

और ये कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं था कि उसने एक गाँववाले को चुना। ये एक पैग़ाम था, सीधे किआरा के लिए। मैं यहाँ हूँ। मैं जब चाहूँ, जिसे चाहूँ, उठा सकता हूँ। और तुम मुझे रोक नहीं सकतीं, क्योंकि रोकने के चक्कर में तुम अपना भेस खो दोगी। रामू पहला था। किआरा जानती थी, आख़िरी नहीं।

"तुम तो मंदिर जानती हो, बिटिया! तुम बताओ ना, कैसे रुकेगा ये श्राप? मेरे बेटे को बचा लो! नागिन को मना लो!"

"नागिन तुम्हारी दुश्मन नहीं है, बहन। जो चीज़ आज रात जागी है, वो नागिन से भी पुरानी है। पर तुम डरो मत। इस बार वो अकेला नहीं है। इस बार उसे रोकने वाली भी लौट आई है।"

"ये इंसान का काटा नहीं। ये नाग का काटा है। और इस डंक को मैं पहचानती हूँ।"

"किआरा? तुम्हें क्या हुआ? तुम ऐसे क्यों देख रही हो, जैसे तुम जानती हो किसने..."

पर किआरा ने जवाब नहीं दिया। उसकी नज़र भीड़ के पार, अँधेरे में डूबे रेगिस्तान की तरफ़ थी, जहाँ कोई नहीं था, और फिर भी कोई था। जो सौ साल बाद, आख़िरकार, लौट आया था। जिसका पहला डंक एक चेतावनी था, और आख़िरी, एक मौत।

"तक्षक। ... तू आ गया।"

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