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Chapter 12 of 27 12 min read

बंधन की डोर

नागमणि की रात by Avni Oberoi

नागमणि की उस धड़कन की ख़बर पूरे कैंप में जंगल की आग की तरह फैल गई। शिवांश की मशीनें रात-भर चलती रहीं, नव्या नाप लेती रही, ठाकुर के आदमी पहरा देते रहे। और उस सारे शोर के बीच, आधी रात, दो लोग चुपके से कैंप की रोशनी से परे, टीलों की ओट में निकल आए।

उस आख़िरी पत्थर के पीछे धड़कती उस रोशनी ने कुछ तोड़ दिया था, किसी बाँध की तरह। शिवांश अब वो आदमी नहीं रहा था जो हर बात का सबूत माँगता था। और किआरा अब वो पहरेदार नहीं रह पाई थी जो अपना चेहरा पत्थर की तरह जमाए रख सके।

"मैं और नहीं कर सकता ये, किआरा। दिन-भर तुम्हारे पास से गुज़रना, और ऐसे बर्ताव करना जैसे मेरे अंदर कुछ टूट नहीं रहा। तुम जो भी हो, नागिन, देवी, या कोई सपना, मुझे परवाह नहीं। मैंने अपनी पूरी उम्र तुम्हें ढूँढा है। और अब जब तुम मिली हो, तो मैं तुम्हें फिर से खोने के डर में जीना नहीं चाहता।"

"शिवांश, तुम नहीं जानते तुम क्या माँग रहे हो। मेरे पास जो है, वो प्यार नहीं, एक श्राप है। जिसने भी मुझे चाहा, उसने अपनी जान से उसकी क़ीमत चुकाई। मैं तुम्हारे लिए मौत हूँ। मुझसे दूर रहो, यही मेरा तुमसे सबसे बड़ा प्यार होगा।"

"तो मुझे मार दो। पर मुझसे ये मत कहो कि मैं तुम्हारे पास से दूर चला जाऊँ। मैंने सौ बार वो सपना जिया है जिसमें मैं तुम्हें खोता हूँ। एक बार, सिर्फ़ एक बार, मुझे वो सपना जीने दो जिसमें मैं तुम्हें पाता हूँ।"

"और अगर तुम्हें पाने की क़ीमत तुम्हारी जान हो? अगर मुझे चाहने का मतलब तुम्हारा मरना हो, जैसे पहले हुआ था?"

"तो मैं जीते-जी तुम्हें चाहते हुए मरना चुनूँगा, बजाय इसके कि मैं तुमसे डर कर, ख़ाली हाथ, पूरी उम्र और जिऊँ। मैं वो ज़िंदगी पहले ही जी चुका हूँ, किआरा। एक ख़ाली ज़िंदगी। मुझे वो दोबारा नहीं चाहिए।"

और उसका हाथ उसके हाथ में था, और सौ साल की बर्फ़ पिघलने लगी। किआरा ने आँखें बंद कर लीं। वो शब्द, जो उसने सौ साल से किसी से नहीं कहे थे, अब उसके होंठों पर आ कर काँप रहे थे। और उसने उन्हें रोका नहीं। पहली बार, उसने ख़ुद को हारने दिया।

"मैं तुमसे प्यार करती हूँ। ... लो, कह दिया। मैंने वो कह दिया जो मुझे कभी नहीं कहना था। मैं तुमसे तब से प्यार करती हूँ, जब इस रेगिस्तान में रेत भी नहीं थी। और यही मेरा सबसे पुराना, सबसे गहरा गुनाह है।"

और वो रुक नहीं पाई। सौ साल का बाँध टूट रहा था। उसने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया, उसकी आँखों में देखा, और वो पूरा सच उसके होंठों के ठीक पीछे आ खड़ा हुआ। पृथ्वी। मणि। वो रात। बस एक लफ़्ज़, और सौ साल की दीवार बह जाती।

"शिवांश, तुम्हें एक बात बतानी है। तुम्हारे उस सपने का सच। वो औरत, वो पहरेदार, वो मौत... वो कोई सपना नहीं है। वो सच है, और वो सौ साल पहले सच में हुई थी। और तुम उसका हिस्सा थे, किसी और चेहरे में, किसी और..."

और वो रुक गई। क्योंकि उसे भैरवी के शब्द याद आ गए। अगर उसे सब याद आ गया, तो उसे ये भी याद आएगा कि वो सब ख़त्म कैसे हुआ था। और वो याद उसे तेरे पास नहीं, तेरे ख़िलाफ़ खड़ा कर देगी। किआरा ने अपना हाथ पीछे खींच लिया, जैसे किसी ने उसे आग से खींचा हो।

"मैं उसका हिस्सा था? किसी और चेहरे में क्या, किआरा? रुको मत। तुम क्या कहने वाली थीं? पूरा करो, प्लीज़।"

"कुछ नहीं। ... कुछ नहीं, शिवांश। बस इतना कि तुम्हें कल फिर उस तहख़ाने में नहीं उतरना चाहिए। आज के लिए, बस इतना काफ़ी है। मुझे... मुझे जाना होगा।"

और वो पलट कर अँधेरे में चली गई, वो आख़िरी लफ़्ज़ अपने सीने में वापस दफ़्न कर के, जो उन दोनों के बीच सौ साल की दीवार गिरा सकता था। क्योंकि वो जानती थी, वो दीवार गिरते ही, उसके पीछे से एक और चीज़ निकल आएगी। उसका सबसे पुराना, सबसे रिसता हुआ ज़ख़्म।

वो सीधे उस पुराने खंडहर में गई, जहाँ भैरवी रहती थी। पर आज वो सलाह के लिए नहीं आई थी। वो भागती हुई आई थी, अपनी ही याद से, जो उस बंद दरवाज़े के पीछे से, अब खुल कर बाहर बह रही थी।

"तूने उसे बता दिया?"

"नहीं। पर मैं बताने ही वाली थी, माँ। और जैसे ही मैं रुकी, वो रात... वो पूरी रात मेरी आँखों के सामने आ खड़ी हुई। जैसे कल की बात हो। मैं उससे भाग नहीं पा रही।"

और वो रात लौट आई, पूरी की पूरी। मणि का कक्ष, दहकता हुआ। मुहर, दरारों से रिसती हुई रोशनी। बाहर तूफ़ान, और अंदर, वो तीन जीव जिन पर एक सदी टिकी थी। पृथ्वी, ज़मीन पर गिरा, अपने ही ख़ून में, तक्षक के डंक से नीला पड़ता हुआ, और फिर भी अपना काँपता हाथ किआरा की तरफ़ बढ़ाता हुआ। और तक्षक, बीच में खड़ा, उसी क्रूर मुस्कान के साथ, एक हाथ में मौत, दूसरे में एक सौदा थामे।

मुहर उस रात भी कमज़ोर पड़ रही थी, ठीक आज की तरह। तक्षक का डंक पृथ्वी की रगों में फैल रहा था, और उसकी साँसें उखड़ रही थीं। और जैसे ही उसने पृथ्वी को गिरते देखा, तक्षक ने किआरा की तरफ़ मुड़ कर अपना सौदा फेंका, बहुत आराम से, जैसे किसी खेल का पासा, ये जानते हुए कि इस पासे पर एक प्यार की जान टिकी है।

"उस रात तक्षक ने तेरे सामने वही तराज़ू रखा था। एक पलड़े में नागमणि, दूसरे में पृथ्वी की आख़िरी साँस। उसने कहा था, मणि मुझे दे दे, किआरा, और मैं इसे जीने दूँगा। बस मणि छोड़ दे, और अपना प्यार वापस ले ले।"

"और मैंने मणि चुनी, माँ। उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया, आख़िरी दम पर, और मैंने... मैंने उसका हाथ नहीं थामा। मैंने मणि पकड़ ली। उसकी आँखों में इस दुनिया की आख़िरी चीज़ जो थी, वो मेरी तरफ़ बढ़ा हुआ, काँपता हुआ हाथ था, और उसके ऊपर मेरा चेहरा, जो उसे थामने के बजाय एक पत्थर पर झुका था।"

"क्योंकि अगर तू मणि छोड़ती, तो जो अँधेरा उसके अंदर बंद है, वो आज़ाद हो जाता। और तब सिर्फ़ पृथ्वी नहीं, लाखों पृथ्वी मरते, हर घर में, हर गाँव में। तूने एक जान बचाने के बदले, अनगिनत जानें चुनीं। ये कमज़ोरी नहीं थी, किआरा। ये सबसे भारी फ़र्ज़ था, जो किसी के कंधे पर कभी पड़ा हो।"

"फ़र्ज़। सब यही कहते हैं। पर सौ साल से हर रात मैं उसका वो बढ़ा हुआ हाथ देखती हूँ, माँ। और हर रात मैं ख़ुद को माफ़ करने की कोशिश करती हूँ, और नहीं कर पाती। दुनिया ने मुझे पहरेदार कहा। पर मैं जानती हूँ मैं क्या हूँ। मैंने उसे मरने दिया। अपने ही हाथों से, मैंने उसे मरने दिया।"

और यही था किआरा का सबसे गहरा ज़ख़्म, आख़िरकार पूरा खुला हुआ। ये नहीं कि तक्षक ने पृथ्वी को मारा। ये, कि उसने ख़ुद, अपने प्यार से बढ़ कर उस पत्थर को चुना था। उसने पूरी दुनिया की पहरेदारी की थी, और उसकी क़ीमत में अपना दिल दफ़्न कर दिया था, और सौ साल में एक बार भी ख़ुद को माफ़ नहीं कर पाई थी।

"और अब क़ुदरत ने वही चेहरा तेरे सामने दोबारा ला खड़ा किया है। और वही रात दोबारा आ रही है। सोच, बेटी। अगर उस रात तक्षक ने फिर वही तराज़ू रखा, मणि, या पृथ्वी की साँस, तो क्या तू दोबारा वही चुनाव कर पाएगी? या इस बार तेरा दिल तेरे फ़र्ज़ को हरा देगा, और पूरी दुनिया जल जाएगी?"

"इस बार मैं वो तराज़ू ही तोड़ दूँगी, माँ। मैंने कहा था ना। न मणि छोड़ूँगी, न उसे। इस बार दोनों बचेंगे, या मैं मिट जाऊँगी।"

"तराज़ू, किआरा, टूटने के लिए नहीं बने होते। वो तौलने के लिए बने होते हैं। और नागमणि की रात, सबका तौल होता है। तेरा भी।"

और अगली दोपहर, जब सूरज रेत को पिघला रहा था, कैंप के रास्ते पर धूल का एक बादल उठा। एक गाड़ी। सफ़ेद, चमचमाती, सरकारी नंबर प्लेट वाली, बिलकुल बेमेल, इस उजाड़ रेगिस्तान में। ठाकुर करमवीर ने अपने ऊपर के ताल्लुक़ात इस्तेमाल किए थे। एक विशेषज्ञ आया था।

पूरा कैंप जमा हो गया। करमवीर सबसे आगे खड़ा था, सीना फुलाए, क्योंकि ये उसकी चाल थी, अपने आदमी को अंदर बिठाना। गाड़ी का दरवाज़ा खुला, और एक आदमी उतरा, कलफ़ लगी सफ़ेद कमीज़, काला चश्मा, और एक शांति जो इस गर्मी में अजीब लग रही थी। उस पर पसीने की एक बूँद तक नहीं थी।

"ये हैं डॉक्टर नागपाल, पुरातत्व विभाग से। ख़ास दिल्ली से भेजे गए हैं। इतनी बड़ी खोज है, तो अब इसकी जाँच और निकासी सरकार की निगरानी में होगी। अब आपकी मनमानी नहीं चलेगी, साहब।"

"नमस्कार। मुझे बताया गया है कि आपको एक असाधारण कलाकृति मिली है। एक ऐसी चीज़, जो किसी भी यंत्र पर दर्ज नहीं होती। ऐसी दुर्लभ चीज़ों को सही हाथों तक पहुँचाना, मेरा ही काम है। अब से, इस तहख़ाने की हर ईंट मेरी निगरानी में उठेगी।"

"माफ़ कीजिए, डॉक्टर, पर ये मेरी खुदाई है, मेरे नाम का परमिट है। मुझे किसी निगरान की ज़रूरत नहीं। और जो चीज़ हमें मिली है, वो अभी बहुत नाज़ुक है, उसे छेड़ना ख़तरनाक हो सकता है।"

"ख़तरनाक। हाँ, बहुत ख़तरनाक। आप सोच भी नहीं सकते कितनी। इसीलिए तो मैं आया हूँ। ये रहे काग़ज़, सब मुहर लगे। उस रात, जब चाँद ठीक शिखर पर होगा, वो पत्थर इस तहख़ाने से निकलेगा। और मैं यहीं रहूँगा, ये पक्का करने कि वो सही जगह पहुँचे।"

"जब चाँद शिखर पर होगा? ये कोई वैज्ञानिक तारीख़ नहीं है, डॉक्टर। ये तो किसी पंडित की बात लगती है। एक पुरातत्ववेत्ता चाँद देख कर कलाकृतियाँ नहीं निकालता।"

"कुछ कलाकृतियाँ, डॉक्टर शिवांश, सिर्फ़ अपनी ही रात में निकलती हैं। आप विज्ञान जानते हैं। मैं वो जानता हूँ जो विज्ञान से पुराना है। इस मामले में, आप बस देखिए, और सीखिए। बाक़ी मुझ पर छोड़ दीजिए।"

और कैंप के किनारे खड़ी किआरा एकदम पत्थर हो गई। उसने काग़ज़ नहीं देखे। उसने उस आदमी की मुहर वाली फ़ाइल नहीं देखी। उसने बस हवा सूँघी। और उस गरम, धूल भरी हवा में, एक ठंडी, चिकनी बू थी, जो उसे बहुत अच्छी तरह से जानी-पहचानी थी।

वो बू किसी इंसान की नहीं थी। वो वही बू थी जो तक्षक के इर्द-गिर्द रहती थी। ठंडी, पुरानी, ज़मीन के नीचे की। ये डॉक्टर नागपाल कोई अफ़सर नहीं था। ये तक्षक की जात का दूसरा नाग था, इंसानी खाल पहने, इंसानी नाम ओढ़े।

"एक नहीं..." "वो अकेला नहीं है। उसने अपनी जात के और बुला लिए हैं। ये अब एक साँप नहीं, एक बिल है।"

और जैसे उसने उसे पहचाना, वैसे ही उसने भी उसे पहचान लिया। डॉक्टर नागपाल का सिर धीरे से घूमा, भीड़ के पार, और उसका काला चश्मा ठीक किआरा पर आ कर रुका, एक पल ज़्यादा। उसके होंठों पर एक बारीक-सी मुस्कान तैरी। दो एक ही आग के जीव, एक-दूसरे को भीड़ में भी पहचान लेते हैं।

"और एक बात, सबके लिए। वो मुहर अब ज़्यादा दिन नहीं टिकेगी। मैं उसकी धड़कन सुन सकता हूँ, यहाँ से भी। इसलिए कोई... होशियारी न दिखाए। जो चीज़ उस रात निकलने वाली है, वो निकल कर रहेगी। और उसे रोकने की कोशिश करने वाला, चाहे इंसान हो या कुछ और, बस रास्ते का एक पत्थर होगा।"

और किआरा समझ गई कि वो क्यों आया है। वो कलाकृति की जाँच करने नहीं आया था। वो ये पक्का करने आया था कि नागमणि उस रात, तक्षक के तयशुदा वक़्त पर, इस तहख़ाने से निकल जाए। वो तक्षक का दूसरा हाथ था, जो अब सीधे कैंप के अंदर, सरकारी मुहर के साथ, आ बैठा था।

और उस एक पल में, किआरा को एक बात साफ़ हो गई। तक्षक अब अकेला चक्कर नहीं काट रहा था। उसकी जात आनी शुरू हो गई थी। ये अब एक दुश्मन का जाल नहीं था। ये एक पूरा बिल था, जो इंसानी चेहरे पहन कर, सरकारी मुहरें थामे, धीरे-धीरे उस मणि के इर्द-गिर्द कसता जा रहा था। एक तरफ़ नव्या का शक, दूसरी तरफ़ करमवीर का लालच, तीसरी तरफ़ तक्षक और अब उसकी जात, और बीच में एक अकेली पहरेदार, एक इंसान का दिल थामे, जिसे वो बचाना चाहती थी और बचा नहीं पा रही थी। सारे धागे एक ही डोर में बुने जा रहे थे, और उस डोर का दूसरा सिरा नागमणि की रात के हाथ में था, जो अब बस कुछ ही साँसों की दूरी पर थी।

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