अद्विका देशमुख के पास सिर्फ़ एक वर्दी थी, एक बीमार भाई की फ़ीस, और माँ की आख़िरी निशानी, एक पुराना लॉकेट। मुंबई की मशहूर 'राठौर ग्रैंड' होटल चेन में वेट्रेस अद्विका को एक चमकती दावत के बीच, सैकड़ों लोगों के सामने, एक ऐसे जुर्म के लिए बेइज़्ज़त करके निकाल दिया जाता है जो उसने किया ही नहीं। और उसी रात, बारिश में भीगी एक बेंच पर, एक बूढ़ा वकील उसे बताता है कि जिस होटल ने आज उसे कुत्ते की तरह निकाला, उसकी असली मालकिन वही है। जिस दादा से वो कभी मिली नहीं, देवनारायण राठौर, अपनी पूरी चेन उसके नाम कर गया है, बस एक शर्त पर, कि एक साल तक उसे उसी होटल में, सबसे नीचे से, गुमनाम बनकर काम करना होगा। एक बार भी सच बोला, तो वसीयत रद्द, और सब कुछ उन्हीं रिश्तेदारों के पास चला जाएगा जो उसे मिटा देना चाहते हैं। अंदर उसका सामना है घमंडी कार्यवाहक सीईओ रेयांश से, वो आदमी जिसे देवनारायण ने अपना बेटा बनाकर पाला, और जिसके पैरों तले से ज़मीन उसी दिन खिसक जाएगी जिस दिन अद्विका अपना नाम वापस लेगी। एक तरफ़ बोर्डरूम में वसीयत तुड़वाने की साज़िशें, दूसरी तरफ़ उसी दुश्मन से पनपती एक धीमी, सुलगती मोहब्बत। वो रोज़ बेइज़्ज़त होती है, और रोज़ अपना ही साम्राज्य चुपचाप संभालती है। किसी को नहीं पता कि जिस लड़की को वो पैरों की धूल समझते हैं, इस पूरे महल की गुमनाम मालकिन वही है।
विषय-सूची
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मुंबई की मशहूर राठौर ग्रैंड होटल में वेट्रेस अद्विका को एक जुर्म के लिए, जो उसने किया ही नहीं, सैकड़ों मेहमानों के सामने बेइज़्ज़त करके बारिश में निकाल दिया जाता है। उसी रात एक बूढ़ा वकील उसे बताता है कि जिस होटल ने उसे कुत्ते की तरह निकाला, उसकी असली मालकिन वही है, उस दादा की इकलौती वारिस जिससे वो कभी मिली ही नहीं।
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अगली सुबह वकील विश्वनाथ अद्विका को वसीयत की पूरी क्रूर शर्त बताता है, एक साल गुमनाम रह कर सबसे नीचे से काम करना, वरना सब कुछ गिद्ध जैसे रिश्तेदार जयदेव के पास। दादा की चिट्ठी, दोस्त जूही की अनजानी ज़िद, और उस घमंडी रेयांश का सच जान कर, अद्विका फ़ैसला करती है, वो अपना नाम एक साल के लिए दफ़ना कर, उसी होटल में गुमनाम बन कर वापस जाएगी।
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अद्विका देशमुख बन कर, अद्विका उसी राठौर ग्रैंड के सबसे नीचे के दर्जे पर लौट आती है, जहाँ बड़े दिल वाला बंसी उसे अपना लेता है और तहख़ाने की दुनिया उसके सामने खुलती है। घमंडी रेयांश उसे पहचान नहीं पाता, पर उसका न झुकना उसे खटकता है, और पहले ही दिन वो उसे तोड़ने के लिए एक नामुमकिन काम देता है, जिसे अद्विका ख़ामोशी से, चतुराई से पूरा कर के अपना पहला अनदेखा जवाब दे देती है।
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दीवारों के पीछे अद्विका अपने ही साम्राज्य की अंदरूनी सड़न देखती है, कटी पगारें, पैडेड बिल और चुपचाप होती लूट, और मल्होत्रा की डूबती हुई बड़ी दावत को अकेले दम पर बचा कर तहख़ाने के हर नौकर का दिल जीत लेती है। तभी चालीस साल से घर की रखवाली करती शारदा ताई की नज़र उसके लॉकेट पर पड़ती है, और वो एक ऐसा नाम फुसफुसाती है जो अद्विका ने आज तक किसी ज़िंदा इंसान के मुँह से नहीं सुना।
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दुबई के रईस निवेशक फ़ैसल अल-रशीद के सामने राठौर ग्रैंड डूबते-डूबते बचता है, जब दुभाषिये के ग़ायब होते और मल्विका के चुपचाप आग लगाते ही सेवा की क़तार से अद्विका आगे बढ़ कर, मेहमान की अपनी ज़ुबान में, वो सौदा अकेले दम पर बचा लेती है। रेयांश एक नौकरानी में एक चेयरमैन का ठहराव देख कर उसे भूल नहीं पाता, और उसी रात, हर उसूल तोड़ कर, उसे अपने फ़्लोर पर अपनी निजी सेवा में खींच लेता है।
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रेयांश की निजी परछाईं बन कर अद्विका उस घमंड के पीछे का थका, बेख़्वाब इंसान देखती है, जो अपने पालने वाले देवनारायण के दिए डूबते साम्राज्य को अकेले सँभाले खड़ा है, और पानी भरते-भरते लूट का वो सिरा भी पकड़ लेती है जो सीधे किसी बड़े बाबू की जेब में जाता है। रात के सन्नाटे में शहर की तरफ़ देखते हुए रेयांश उसी गुमनाम वारिस से अपने डर का राज़ बाँट बैठता है जो उसके ठीक पीछे खड़ी उसका पानी भर रही है, और तभी एक गिरी हुई वसीयत की फ़ाइल उठाते हुए उनके हाथ मिल जाते हैं, अद्विका के होंठों से 'दादाजी' निकलते-निकलते रुक जाता है, और रेयांश उस आधे लफ़्ज़ को पकड़ लेता है।
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मल्विका, अद्विका को ख़तरा मान कर उसके बंद लॉकर में एक मेहमान के हीरे रखवा कर चोरी का इल्ज़ाम मढ़ देती है, और इस बार फ़ैसला ख़ुद रेयांश को सुनाना है, जो पहली बार किसी को बेइज़्ज़त करने से पहले ठिठक जाता है। अद्विका गिड़गिड़ाने के बजाय मास्टर चाबी के रजिस्टर पर मल्विका के ही आदमी का नाम रौशनी में ले आती है, अपना पहला ख़ामोश तमाचा, पर उसी रात मल्विका उसे सुनसान गलियारे में घेर कर धमकी देती है कि उसका हर छुपा राज़ वो खोद कर निकाल कर रहेगी।
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देवनारायण का छोटा भाई जयदेव राठौर अदालत में वसीयत को चुनौती दे देता है, कि गुमनाम वारिस वाली शर्त एक फ़रेब है, और अगर साल पूरा होने तक कोई वारिस सामने न आया तो पूरी चेन उसकी, और रेयांश दो पाटों के बीच पिस कर ठान लेता है कि चेन के अपने जासूस उस वारिस को जयदेव से पहले ढूँढ निकालेंगे, ये जाने बिना कि वो वारिस रोज़ सुबह उसकी कॉफ़ी उसी के हाथ से बना कर देता है। आख़िर में जयदेव के जासूस का पहला सुराग़ अर्नव के छोटे परिवार की एक पीली तस्वीर तक पहुँचता है, एक नन्ही बच्ची का चेहरा और उसकी माँ के गले में वही लॉकेट, और जयदेव उसे रौशनी में उठा कर हुक्म देता है, इस बच्ची को ढूँढो, ये ज़िंदा है।
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अद्विका की दोहरी ज़िंदगी उसकी असली दुनिया में रिसने लगती है जब रूममेट जूही उसकी आधी रात की वापसी, छुपे फ़ोन कॉल और भाई की फ़ीस के अचानक आए पैसों को जोड़ कर उस पर शक करने लगती है, और अद्विका उसे सच बताते-बताते रुक जाती है। उधर विश्वनाथ चेताता है कि गिद्ध अब उसके बचपन की खुदाई कर रहे हैं, और तभी रिकॉर्ड वाले कमरे में शारदा ताई के हाथ में उसकी वही फ़ाइल है जिसमें बाप का असली नाम एक परत नीचे दबा है, जब एक स्लेटी सूट वाला अजनबी अंदर आ कर पिछले दो महीनों में भरती हुई हर औरत की फ़ाइल माँगता है।
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स्लेटी सूट वाले जासूस के सामने शारदा ताई चतुराई से अद्विका के बाप के नाम वाला काग़ज़ बचा ले जाती है, और उसी रात एक भयंकर तूफ़ान और शहर भर की बत्ती गुल अद्विका और रेयांश को देवनारायण के बंद पड़े पहले होटल में अकेला क़ैद कर देती है, जहाँ मोमबत्ती की रौशनी में रेयांश अपने पालने वाले, अपने क़र्ज़ और उस गुमनाम वारिस के डर का राज़ उसी वारिस के सामने खोल बैठता है, और दोनों एक ऐसी लकीर के ठीक कगार पर आ जाते हैं जिसे पार नहीं करना चाहिए।
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ट्रस्ट की बैठक में जयदेव और मल्विका एक जाली फ़ॉरेंसिक ऑडिट के सहारे रेयांश को ही चेन का लुटेरा साबित कर के उसे कुर्सी से हटाने की चाल चलते हैं, और ऐन डूबते वक़्त अद्विका सेवा की क़तार से एक फुसफुसाहट में उसे वो सिरा थमा देती है जो उस झूठ को काट देता है, रेयांश बच निकलता है पर समझ जाता है कि कोई अंदर उसे एक साये की तरह बचा रहा है। उसी रात अपने ही हाथों असली वेंडर फ़ाइलें खंगालते हुए उस पर एक दग़ा खुलती है, हर फ़र्ज़ी भुगतान के नीचे उसके अपने सबसे भरोसेमंद दाएँ हाथ कुणाल का दस्तख़त है, और वही ग़द्दार चुपके से उसी नौकरानी की फ़ाइल बना रहा है जिसने आज उसे बचाया।
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रेयांश अब यक़ीन कर चुका है कि कोई अंदर उसे एक साये की तरह बचा रहा है, और अपने ही जाल बिछा कर वो उस साये को ढूँढने निकलता है, जिसका हर सिरा उसी नौकरानी अद्विका पर जा टिकता है, जबकि चालीस साल की वफ़ादार शारदा ताई लॉकेट, नाम और चेहरे को जोड़ कर उसे अकेले में बता देती है कि वो देवनारायण का ख़ून है और फिर उसकी ख़ामोश ढाल बनना चुनती है। उसी रात रेयांश का अपना ग़द्दार कुणाल वही फ़ाइल उसकी मेज़ पर ला रखता है, एक नाम पर लाल घेरा, कि 'अद्विका देशमुख' का नाम किसी स्कूल रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता, और जिस औरत ने उसे दो बार बचाया वो और वो झूठा नाम एक ही निकलते हैं।
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रेयांश अद्विका को रात के सन्नाटे में अपने कमरे में बुला कर कुणाल की वो फ़ाइल उसके सामने रख देता है, एक झूठा नाम, तीन गुमनाम बचाव, और यह डर कि कहीं वो उसी सीलबंद वसीयत के वारिस की भेजी जासूस तो नहीं। घिरी हुई अद्विका इनकार के बजाय एक आधा सच देती है, कि हाँ, नाम उसका जन्म का नहीं, और वो एक ख़तरनाक अतीत से छुप रही है, और असली राज़ उसी आधे सच के नीचे चीख़ता रहता है। तोड़ने के लिए शुरू हुई पूछताछ पिघल कर क़ुरबत बन जाती है, इल्ज़ाम भूख में बदल जाता है, और रेयांश उसका आधा झूठ इसलिए मान लेता है क्योंकि वो मानना चाहता है। आख़िर में वो फ़ाइल अपनी दराज़ में ताला लगा कर उसका राज़ उसी के पास रहने देता है,
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रेयांश का भरोसा पा कर अद्विका उसकी जंग के और क़रीब खिंच आती है, वो उसे फ़ाइलों, फ़ैसलों और उन बेख़्वाब रातों में साथ रखने लगता है जो अब सिर्फ़ काम की नहीं रहीं, और उसी घमंडी आदमी के सामने अपने गुमनाम वारिस के डर का राज़ खोलते हुए वो अनजाने में उसी वारिस के और पास आता जाता है। नीचे तहख़ाने में बंसी की चुहलबाज़ी और शारदा ताई की डरी हुई चेतावनी इस उठती मोहब्बत को घेर लेती हैं, कि जिस हाथ को वो दिल दे रही है, उसी को एक दिन उसे ख़ाली करना है। रेयांश और उस साम्राज्य, दोनों पर अपना दावा फिसलता देख कर मल्विका शक से आगे बढ़ कर हरकत में आती है और अद्विका देशमुख का अतीत खोदने के लिए एक निजी जासूस छोड़ दे
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पंद्रह रातों से रुकी वो दहलीज़ आख़िरकार पार हो जाती है, कुणाल की ग़द्दारी का फंदा साथ मिल कर कसते-कसते रेयांश और अद्विका के बीच वो बोसा उतर आता है जिसका दोनों को इंतज़ार था, और एक पल को दोहरी ज़िंदगी ख़ामोश पड़ जाती है, बस दो लोग जिन्होंने एक-दूसरे को चुन लिया। पर यही मध्य-बिंदु है, मंज़िल नहीं, उसी रात वो बोसा ज़हर बन जाता है, क्योंकि अद्विका उसी आदमी से मोहब्बत कर बैठी है जिसका सब कुछ उसे एक दिन छीनना है, वो राज़ अब उसके मुँह में सीसे सा भारी है, और वो टूट कर उसे रोक देती है। उधर पूरे महल में मल्विका अपने हथियार को छुरी में बदल चुकी है, कटे हुए नाम, स्कूल के रिकॉर्ड और लॉकेट को जोड़ कर वो गु
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मल्विका के बम के बाद रेयांश का हिसाब: वो पहले इनकार करता है, फिर एक-एक कड़ी, वो नामुमकिन ठहराव, बेमेल काग़ज़, दादाजी के नाम पर उसका सहम जाना, और वो अनजाना साया जिसने उसे दो बार बचाया, सब भयानक तरीक़े से जुड़ जाती हैं, और उसे यक़ीन हो जाता है कि जिस नौकरानी से वो मोहब्बत करता है, वही गुमनाम मालकिन है जो उसका सब कुछ छीन लेगी। मल्विका उसे एक शैतानी सौदा देती है, साथ मिल कर वसीयत तुड़वाओ, वारिस को बदनाम करो, साम्राज्य और जीतने वाली शाख़ दोनों तुम्हारे, वरना एक वर्दी वाली के हाथों सब लुटा दो, और आधी रात रेयांश वो फ़ाइल कोट में दबाए अद्विका के दरवाज़े पर आ खड़ा होता है, ये ख़ुद न जानते हुए कि वो उसे
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रेयांश आधी रात अद्विका के तंग कमरे में उसका सच कोट में दबाए उतरता है, पर उसे बेनक़ाब करने के बजाय वो एक-एक कर के रहम के दरवाज़े खोलता है, लॉकेट, नाम, वो अनजाना साया, हर सवाल एक मौक़ा कि वो ख़ुद सच बोल दे और बच जाए। पर वसीयत की शर्त में बँधी अद्विका हर बार वही आधा सच चुनती है, हर लफ़्ज़ सच, पर असली नाम उसी के नीचे दफ़्न, और उसे अपनी आँखों में झूठ बोलते देख कर रेयांश टूट जाता है और तय करता है कि वो नहीं बताएगा कि वो जानता है, बस देखेगा, और कल की कोमलता एक ठंडे खेल में जम जाती है। आख़िर में दरवाज़े पर रुक कर वो देवनारायण का वो निजी नाम हवा में छोड़ देता है जिससे बूढ़ा अपनी खोई पोती को पुकारता था,
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जयदेव वसीयत की चुनौती को अदालत की सुनवाई तक पहुँचा देता है, जहाँ वो गुमनाम वारिस को एक भूत, एक फ़रेब साबित करने की कोशिश करता है, और घड़ी अब सबके सामने मेज़ पर है, दावा करो तो शर्त टूटे, छुपी रहो तो सब गिद्धों का। गैलरी में बैठी अद्विका पहली बार अपनी लड़ाई की असली क़ीमत समझती है, चार हज़ार नौकरों की रोज़ी, और उसका ज़ख़्म एक मक़सद में बदल जाता है, तभी ऊपर सुइट में जयदेव मल्विका को मख़मली आवाज़ में हुक्म देता है कि अगर वारिस मिल जाए तो दावे से पहले उसे ग़ायब कर दिया जाए।
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मख़मली हुक्म की अगली ही सुबह अद्विका को मल्विका की चाय पर बुलाया जाता है, जहाँ शिकारन अपने शिकार को पास से तौलती है, और नीचे लिनन के कमरे में बंसी शारदा और अद्विका की फुसफुसाहट का एक टुकड़ा सुन कर शानदार तरीक़े से ग़लत समझ बैठता है, ठगनी, जासूस या रेयांश की छुपी बीवी, और ख़ुद को उसका बॉडीगार्ड तैनात कर लेता है। पर उसकी अनाड़ी पहरेदारी मल्विका के जासूस को सीधे उस ईरानी कैफ़े तक ले आती है जहाँ अद्विका विश्वनाथ से मिल रही है, और बारिश से भी धीमी एक क्लिक में जासूस का कैमरा वो एक तस्वीर खींच लेता है जो सब कुछ साबित कर सकती है, गुमनाम वारिस और वसीयत का रखवाला, एक ही मेज़ पर।
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जासूस की तस्वीर मल्विका के हाथ आते ही वो अद्विका का नाम शताब्दी की झलक वाली भरी दावत में सबके सामने खोलने की ठान लेती है, ताकि गुमनामी की शर्त टूटे और साम्राज्य गिद्धों के हाथ आ जाए। ऐन उस पल जब उसकी उँगली अद्विका पर उठती है, रेयांश, जो हफ़्तों से सच जानता है, भीड़ को चीरता हुआ बीच में आ कर तस्वीर को बनावटी बता कर, अपनी सारी शाख़ दाँव पर लगा कर उस बेनक़ाबी को दफ़्न कर देता है, और बाद में गलियारे में काँपती अद्विका के सामने अपना मुखौटा उतार कर वो लफ़्ज़ कह देता है जो एक बरस से सिर्फ़ सुनने वाला जानता था, 'मैं जानता हूँ तुम कौन हो, मालकिन।'
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गलियारे में 'मालकिन' का लफ़्ज़ हवा में लटका है, और एक बरस का सारा सच दोनों के बीच नंगा हो जाता है, रेयांश हफ़्तों से जानता था और फिर भी उसने अद्विका को बचाया, और अद्विका ने उससे मोहब्बत करते हुए भी झूठ बोला। वो लड़ते हैं, टूटते हैं, और मलबे के बीच भी मोहब्बत खड़ी रहती है, पर आख़िर में दोनों उलटे फ़ैसले कर बैठते हैं, रेयांश ठान लेता है कि वो अपना सब कुछ दे कर भी अद्विका को साल पार करवा कर चेन उसके नाम कर देगा, और अद्विका, गिद्धों के जानलेवा हुक्म और उसकी बर्बादी से डर कर, तय करती है कि वो पूरी विरासत छोड़ कर चली जाएगी ताकि दोनों ज़िंदा रहें, मोहब्बत की एक बराबरी पर रुकी जंग।
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भागने की तैयारी करती अद्विका को शारदा ताई रोक कर उसके बाप अर्नव का असली सच बताती है, कि उसे कमज़ोरी के लिए नहीं, ग़रीबों की बस्ती को बुलडोज़र से बचाने के लिए, ज़मीर को ताज पर चुनने के लिए घर से निकाला गया था, और विश्वनाथ देवनारायण की वो आख़िरी चिट्ठी ला कर खोलता है जिसमें ये विरासत कोई इनाम नहीं, एक टूटी हुई माफ़ी और एक अधूरी ज़िम्मेदारी निकलती है। अद्विका का फ़ैसला भागने से पलट कर अपना नाम लेने पर जम जाता है, तभी रेयांश बदहवास अंदर आ कर ख़बर देता है कि जयदेव ने काग़ज़ की जंग छोड़ दी है, और उसके बीमार भाई सोनू को एक 'हादसे' में उठा लिया गया है।
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जयदेव अद्विका को अपने सुइट में बुला कर उसका कटा हुआ असली नाम, राठौर, उसके सामने रख देता है और बीमार भाई सोनू को बंधक बना कर सौदा करता है, कि दावेदारी चुपचाप छोड़ दे तो सब ज़िंदा रहेंगे, वरना जिन-जिन को वो प्यार करती है, एक-एक कर के जलेंगे। घिरी हुई अद्विका, रेयांश की चाल पर, फिर से टूटी हुई नौकरानी का नाटक कर के उस काग़ज़ पर दस्तख़त कर देती है, पर झुके हुए सिर की ओट में एक ठंडी मुस्कान के साथ जो सिर्फ़ सुनने वाला देखता है।
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अद्विका का दस्तख़त किया काग़ज़ एक जाल निकलता है, जिसने जयदेव की धमकी और अपहरण को रिकॉर्ड पर ला दिया है, और बीमार भाई सोनू छुड़ा लिया जाता है। अद्विका, रेयांश, विश्वनाथ और तहख़ाने का परिवार जालसाज़ी, तख़्तापलट, ज़बरदस्ती और बरसों की लूट के सारे सबूत जमा कर के तय करते हैं कि सब कुछ राठौर ग्रैंड की शताब्दी दावत में खोला जाएगा, ठीक उसी दिन जब अद्विका का एक साल पूरा होता है और वो क़ानूनन अपना नाम ले सकती है, और अद्विका ख़ुद उसी बोर्डरूम की सेवा के लिए अपना नाम, आख़िरी बार, ड्यूटी-सूची में लिख देती है।
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शताब्दी से एक रात पहले पूरा साल ऐन बेनक़ाबी की दहलीज़ पर बिखरते-बिखरते बचता है, जब किनारे लगी मल्विका अद्विका को एक दिन पहले ही बेनक़ाब करने की आख़िरी चाल चलती है और जयदेव दावत रद्द करवाने के लिए ट्रस्ट की आपात बैठक बुलाता है, पर रेयांश अपनी कुर्सी और साख दाँव पर लगा कर वो एक रात ख़रीद लेता है। बेनक़ाबी की पूर्व-संध्या पर दोनों लीड अपनी सबसे सच्ची, तड़पती रात एक-दूसरे को चुन कर जीते हैं, और भोर में अद्विका आख़िरी बार वर्दी पहनती है, विश्वनाथ उसके हाथ में सीलबंद वसीयत रखता है, और वो बोर्डरूम के दरवाज़ों की ओर चल पड़ती है।
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शताब्दी की भरी बोर्डरूम दावत में जब जयदेव वारिस को एक भूत बता कर पूरी चेन हड़पने खड़ा होता है और मल्विका उसी वर्दी वाली लड़की को पानी लाने का हुक्म देती है, अद्विका ट्रे मेज़ पर रख कर अपना नाम ले लेती है, अद्विका राठौर, देवनारायण की पोती और राठौर ग्रैंड की इकलौती मालकिन, साल पूरा और वसीयत ज़िंदा। विश्वनाथ क़ानूनन उसकी घड़ी की मुहर लगाता है, मल्विका का बेनक़ाबी वाला हथियार एक घंटे की देरी से मुर्दा पड़ जाता है, और कुणाल की जालसाज़ी, तख़्तापलट और जयदेव की अपनी ज़बरदस्ती वाली रिकॉर्डिंग एक ही साँस में गिरती है, जिससे गिद्ध अपनी ही कुर्सी में राख हो जाता है। आख़िर में रेयांश, जो इसी तबादले से क़ान
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बेनक़ाबी के बाद तहख़ाने की पूरी दुनिया जश्न मनाती है और अद्विका मालकिन बन जाती है, पर उसकी नज़र उस ख़ाली दरवाज़े पर अटकी है जहाँ से रेयांश निकल गया। ऊपर पुराने दफ़्तर में रेयांश अपना घमंड और अद्विका अपना अपराधबोध पकड़े वहाँ टूटते हैं जहाँ गिद्ध उन्हें नहीं तोड़ पाए थे, और मालकिन का पाला हुआ आदमी बनने से इनकार करते हुए रेयांश उसे बता देता है कि वो राठौर ग्रैंड छोड़ कर जा रहा है, और चला जाता है, पूरे साम्राज्य की मालकिन को उसकी इकलौती चाही हुई चीज़ से ख़ाली छोड़ कर।
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रेयांश के जाने के बाद टूटने के बजाय अद्विका शारदा ताई से वो पुराना ज़ख़्म समझती है, घमंड बनाम प्यार, जिसने देवनारायण और उसके बाप को अलग किया था, और अपनी पहली मालकिन वाली ताक़त नौकरों की कटी पगारें लौटाने और बाप के सपने वाली बस्ती को बुलडोज़र से बचाने में लगा देती है। फिर बारिश में रेयांश को रोक कर वो उसे दया नहीं, बराबरी और एक अधूरा काम देती है, दो नाम पर एक ही दिल, और जब उसका जवाब होंठों पर आता है तभी मल्विका का आख़िरी वार फट पड़ता है, एक क़ानूनी रोक जो पूरे राठौर ग्रैंड को सील कर देगी और सोनू की जान पर तना एक साया।
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मल्विका के आख़िरी वार पर अद्विका और रेयांश तूफ़ान में लौट कर पाते हैं कि उसने सोनू का चारा फेंक कर पूरे भरे राठौर ग्रैंड को हर रास्ता अंदर से सील कर के एक जलते ताबूत में बदल दिया है, पर जिन नौकरों को उस घराने ने पैरों की धूल समझा, वही बंसी और शारदा की अगुवाई में हर मेहमान और सोनू को बचा कर उसका सबसे बड़ा वार नाकाम कर देते हैं और उसका हर हथियार उसी के हाथ में टूट जाता है। बड़ी सीढ़ी पर घिरी मल्विका आग को अपना आख़िरी सील बना लेती है, और जब आग से चाटा शताब्दी का भारी झूमर तीनों पर टूट कर गिरता है तो एक जिस्म दूसरे की ढाल बन जाता है और पूरे शोर के ऐन बीच एक ऐसी ख़ामोशी उतरती है जो नहीं बताती कि दो
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गिरते झूमर के नीचे रेयांश अपना जिस्म अद्विका की ढाल बना कर उसे बचा लेता है, ख़ुद ज़ख़्मी पर ज़िंदा, और नौकरों के हाथों हर जान बच निकलती है, यहाँ तक कि मल्विका भी अद्विका के बढ़े हुए हाथ से, जबकि जयदेव, कुणाल और मल्विका क़ानून के हवाले हो जाते हैं और साल पूरा होते ही वसीयत अद्विका राठौर के नाम पर मुहरबंद हो जाती है। भोर में रेयांश अपना एक बरस पुराना जवाब देता है, कोई पाला हुआ आदमी नहीं बल्कि बराबर का साथी बन कर, देवनारायण की आख़िरी चिट्ठी अर्नव के नाम की टूटी माफ़ी और 'गुड़िया' वाली पुकार ले कर खुलती है, कटी पगारें और बाप की बस्ती लौट आती है, अर्नव की तस्वीर बानी की दीवार पर चढ़ती है, और उन्हीं