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Chapter 3 of 30

सबसे नीचे से

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

सुबह के पौने पाँच बजे थे। और राठौर ग्रैंड का वो चेहरा जाग रहा था, जिसे किसी मेहमान ने कभी नहीं देखा। ... ऊपर संगमरमर के महल में झूमर सो रहे थे। पर नीचे, तहख़ाने के उस सीलन भरे गलियारे में, स्लेटी वर्दियों का एक पूरा रेला हरकत में था।

तीन हफ़्ते लगे थे। एक दरख़्वास्त, एक इंटरव्यू, एक मेडिकल। तब जा कर अद्विका देशमुख को इसी होटल में, उसी दर्जे से एक पायदान और नीचे, नौकरी मिली थी। ... वही दरवाज़े। बस वर्दी और भी नीची। और इस बार, अपनी मर्ज़ी से।

जिस घड़ी उसने पहली हाज़िरी लगाई, उसी घड़ी वो एक साल का ख़ामोश काउंटडाउन भी शुरू हो गया, जिसे सिर्फ़ वो और एक बूढ़ा वकील जानता था। ... तीन सौ पैंसठ दिन। और उसका सिर्फ़ एक शब्द, जो सब ख़त्म कर सकता था।

"ए! नई वाली! ... इधर, इधर आ। अरे तू ही, और कौन! ... देख, पहला उसूल, बाल्टी हमेशा बाएँ हाथ में, पोंछा दाएँ में। दूसरा उसूल, लिफ़्ट नंबर दो मेहमानों की है, हम उसमें साँस भी नहीं लेते। और तीसरा उसूल... अरे तेरा नाम क्या है भई?"

ये था बंसी। इस तहख़ाने का सबसे बड़ा दिल, और सबसे तेज़ ज़ुबान, जिसकी रफ़्तार के आगे मुंबई की लोकल ट्रेन भी हाँफ जाए।

"अद्विका, भैया। ... अद्विका देशमुख।"

"अद्विका! ... वाह, बड़ा भारी-भरकम नाम है। यहाँ चलेगा नहीं। यहाँ तू 'छोटी'। ... और ये मुँह लटका के मत घूमना। नीचे वाले हम लोग हँसी में ऊपर वालों से कहीं ज़्यादा अमीर हैं। ... ले, चाबियाँ पकड़, तेरा फ़्लोर आज सातवाँ है।"

अद्विका ने चुपचाप चाबियाँ थाम लीं, बाल्टी उठाई, और उस चमचमाते फ़र्श पर पोंछा फेरने लगी, जिसकी वो अकेली मालकिन थी। ... हर टाइल, हर झूमर, काग़ज़ों में सिर्फ़ उसका था। और वो, इसी फ़र्श पर, घुटनों के बल बैठी थी।

काम करते-करते उसका हाथ एक पल को अपने गले पर गया। वर्दी के नीचे छुपा वही पुराना लॉकेट। माँ की आख़िरी निशानी। और उसके अंदर वो धुँधला सा चेहरा, जिसे वो आज तक पहचान नहीं पाई थी।

"बस एक साल, माँ। ... तीन सौ पैंसठ दिन। ... इनके पैरों तले, इन्हीं की धूल बन कर।"

पर उस पहली सुबह ही अद्विका को समझ आ गया कि तहख़ाने की अपनी एक अलग दुनिया थी। और सबसे नए नौकर के हिस्से में आता था, सबका बचा-खुचा ग़ुस्सा।

फ़्लोर सुपरवाइज़र, एक कड़वी अधेड़ औरत, ने अद्विका के साफ़ किए कमरे में एक न दिखने वाली धूल ढूँढी, और पूरी बाल्टी का गंदा पानी दोबारा उसी चमकते फ़र्श पर उलट दिया। "दोबारा," उसने बस इतना कहा। "तेरे जैसी दस रोज़ आती हैं, और शाम तक भाग जाती हैं।"

अद्विका ने कुछ नहीं कहा। उसने चुपचाप फिर से पोंछा उठाया। पर उसकी गर्दन नहीं झुकी। आँखें नीची नहीं हुईं। और यही एक चीज़ थी, जो इस पूरे तहख़ाने में किसी को हज़म नहीं होती थी।

बंसी दबे पाँव उसके पास आया, इधर-उधर देखा कि सुपरवाइज़र गई या नहीं, फिर अपनी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल ली।

"छोटी, एक बात कान में डाल ले। ... तू आँखें थोड़ी नीची रखा कर। ये जो तेरी सीधी नज़र है ना, यहाँ बहुत महँगी पड़ती है। ... ख़ास कर के जिस दिन 'वो' नीचे आते हैं।"

"वो? ... वो कौन, बंसी भैया?"

"अरे 'वो' मतलब 'वो'! ... रेयांश सिंघानिया। कार्यवाहक सीईओ। इस पूरे महल के मालिक। ... वो जब गलियारे से गुज़रते हैं ना, तो एसी की हवा भी दो डिग्री और ठंडी हो जाती है। एक बार जिसको घूर लें, उसकी नौकरी वहीं, उसी फ़र्श पर, दम तोड़ देती है।"

अद्विका के हाथ पोंछे पर ठहर गए। रेयांश सिंघानिया। वो नाम उसके सीने पर किसी पुराने ज़ख़्म की तरह चिपका था। जिस आदमी ने भरी महफ़िल में उसे 'पैरों की धूल' कहा था, और जिसे भनक तक नहीं थी कि वो 'धूल' अब उसी के महल का पट्टा मुट्ठी में दबाए बैठी है।

"पर मालिक तो देवनारायण राठौर थे ना? ... मैंने सुना, वो गुज़र गए। ... अब ये पूरा साम्राज्य किसका हुआ?"

"यही तो सारा लफ़ड़ा है, छोटी!" ... बंसी की आँखें किसी बड़े राज़ की तरह चमकीं। "बड़े मालिक तो चल बसे, पर वसीयत पर ताला पड़ा है! ... कोई कहता है सब रेयांश साहब का, कोई मालिक के भाई जयदेव साहब का। ... और एक अफ़वाह तो ये भी है कि कोई गुमनाम वारिस है, जिसे आज तक किसी ने देखा ही नहीं।"

अद्विका ने बड़ी मुश्किल से अपने चेहरे को सपाट रखा। वो गुमनाम वारिस, जिसे आज तक किसी ने नहीं देखा... इस वक़्त बंसी से दो हाथ की दूरी पर, उसी का पोंछा लगा रही थी।

"ख़ैर, अपने को क्या!" ... बंसी ने कंधे उचकाए। "मालिक कोई भी हो, पोंछा तो अपुन को ही लगाना है। चल, ये आधी रोटी रख, मेरी तरफ़ से। ... और वो सातवें वाला प्रेसिडेंशियल सुइट... बाप रे। उसमें तो अपुन साँस लेने से भी डरते हैं।"

"शुक्रिया, भैया।"

अद्विका के होंठों पर पहली बार एक सच्ची, नन्ही सी मुस्कान आई। इस पूरे पत्थर के महल में, बंसी की ये आधी रोटी ही उसकी अकेली गर्मजोशी थी।

वो सारी बेइज़्ज़ती वो किसी बैंक में ब्याज समेत जमा कर रही थी। और जब भी हिम्मत टूटती, उसका हाथ उस लॉकेट पर चला जाता। उस अजनबी चेहरे पर, जो शायद उसका बाप था, जिसके बारे में विश्वनाथ कुछ जानता था, पर बताता नहीं था। 'वक़्त आने पर,' उसने कहा था। ... और अद्विका को अब उस वक़्त का इंतज़ार था।

पर उस दोपहर, तहख़ाने की हवा अचानक बदल गई।

"छोटी! ... सब छोड़, सातवें पे चल, जल्दी! ... मल्होत्रा साहब वापस आ रहे हैं! ... और सुइट में... हे भगवान... सुइट में कुछ गड़बड़ हो गई है!"

मल्होत्रा साहब। ... अद्विका की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। वही मेहमान, जिनकी सफ़ेद बंडी पर गिरी वाइन की एक बूँद ने, तीन हफ़्ते पहले, उसकी सारी दुनिया छीन ली थी। और आज उन्हीं की एक दस्तख़त पर इस डूबते साम्राज्य की, उसके अपने साम्राज्य की, तिमाही टिकी थी।

अद्विका जब सातवें फ़्लोर के प्रेसिडेंशियल सुइट में पहुँची, तो वहाँ अफ़रा-तफ़री मची थी। छत के एक कोने से बारिश का पानी रिस कर, बैठक के बीचोंबीच, उस बेशक़ीमती क्रीम क़ालीन पर एक बदनुमा, गीला दाग़ छोड़ गया था। ठीक वहाँ, जहाँ मेहमान को बैठना था।

और मेहमान के आने में सिर्फ़ बाईस मिनट बाक़ी थे। वैसा क़ालीन पूरे मुंबई में नहीं मिलता था, सुखाने का सवाल ही नहीं था। दो सीनियर सुपरवाइज़र, और ख़ुद फ़्लोर मैनेजर, उस दाग़ के आगे बुत बने खड़े थे।

और तभी, उस जमे हुए सन्नाटे को चीरता हुआ, वो अंदर आया।

रेयांश सिंघानिया। काला सूट, बर्फ़ जैसा चेहरा। उसकी नज़र एक पल में उस दाग़ पर पड़ी, और कमरे का तापमान सचमुच दो डिग्री और गिर गया।

"बाईस मिनट।" ... उसकी आवाज़ धीमी थी, और इसीलिए और भी ख़तरनाक। "शहर का सबसे बड़ा मेहमान बाईस मिनट में इस दरवाज़े से अंदर आएगा। और तुम सब, इस होटल की सबसे भारी तनख़्वाह वाली अक़्लें, एक दाग़ के सामने बुत बनी खड़ी हो। ... किसी के पास कोई हल?"

किसी की ज़ुबान नहीं खुली। रेयांश की आँखों में एक ठंडी नफ़रत उभरी। उसे एक मिसाल चाहिए थी। किसी का सिर, जिसे काट कर वो बाक़ियों को डरा सके।

और तभी उसकी नज़र दरवाज़े के पास खड़ी उस नई, स्लेटी वर्दी वाली लड़की पर पड़ी, जो चुपचाप, बिना घबराए, उस दाग़ को नाप रही थी। सबसे नई, सबसे आसान शिकार।

"तुम।" ... उसने अद्विका की तरफ़ इशारा किया। "नई हो? अच्छा। तुम्हारे पास पंद्रह मिनट हैं। ये दाग़ ग़ायब होना चाहिए, जैसे कभी था ही नहीं। ... इस पर नज़र पड़ी, तो शाम से पहले तुम्हारा हिसाब हो जाएगा। ... कर सकती हो, या अभी निकल जाओ?"

ये कोई काम नहीं था। ये एक फंदा था। एक नामुमकिन काम, जो सिर्फ़ इसलिए दिया गया था ताकि ये नई लड़की उसमें फँस कर बाहर फेंक दी जाए। ... किसी को यक़ीन था कि लड़की अभी रो देगी।

"साहब... साहब, ये तो आज ही आई है, इसको तो कुछ आता ही नहीं, इसके बजाय अपुन... मेरा मतलब, मैं..."

पर अद्विका ने बहुत हल्के से, बिना उसकी तरफ़ देखे, अपना हाथ उठा कर बंसी को रोक दिया। बंसी की ज़ुबान बीच में ही थम गई।

अद्विका ने न गिड़गिड़ाया, न सफ़ाई दी, न आँखें झुकाईं। उसने बस इत्मीनान से पूरे कमरे पर नज़र दौड़ाई। ... तीन हफ़्ते पहले तक, ऐसे ही कमरे उसके एक इशारे पर सँवरा करते थे।

"जी, साहब। ... हो जाएगा।"

रेयांश की भौंहें ज़रा सी सिकुड़ीं। उसे रोना चाहिए था। गिड़गिड़ाना चाहिए था। ये इत्मीनान, ये ठंडक... उसे खल गई।

"पंद्रह मिनट।" ... उसने घड़ी देखी। "एक भी सेकंड ज़्यादा नहीं।"

और फिर अद्विका ने वो किया, जो कमरे में खड़ा कोई नहीं सोच सका था। उसने उस दाग़ को छुपाने की कोशिश ही नहीं की। वो बंसी की तरफ़ पलटी, और उसकी आवाज़ में अचानक एक ऐसी तराश आ गई, जो एक नौकरानी की नहीं थी।

"बंसी भैया, नीचे हेरिटेज लाउंज में देवनारायण साहब की जो पुरानी कश्मीरी दरी बिछी है ना... वो उठवा कर लाओ। साथ में वो नक्काशीदार तिपाई, और फूलों का बड़ा गुलदस्ता। ... अभी।"

बंसी एक पल को हक्का-बक्का रह गया। एक नई नौकरानी सीधे हुक्म दे रही थी, जैसे ये पूरा फ़्लोर उसी का हो। ... अद्विका को अपनी ग़लती का एहसास हुआ, और उसने फ़ौरन आवाज़ नरम कर ली।

"...अगर आपको ठीक लगे तो, भैया। ... प्लीज़। वक़्त बहुत कम है।"

अगले बारह मिनट में, उस कमरे ने अपना रूप ही बदल लिया। अद्विका ने भारी सोफ़े को थोड़ा घुमाया, दाग़ वाली जगह पर देवनारायण की वो शाही कश्मीरी दरी बिछाई, बीच में नक्काशीदार तिपाई रखी, और उस पर भव्य गुलदस्ता सजा दिया।

वो बदनुमा दाग़ अब एक शाही दरी के नीचे दफ़न था। और बैठक अब पहले से कहीं ज़्यादा भव्य लग रही थी। जैसे वो दाग़ कोई ग़लती नहीं, बल्कि किसी सजावट-कार की सोची-समझी शान हो।

तभी दरवाज़ा खुला, और मल्होत्रा साहब अंदर आए। उनकी नज़र सीधे उस शाही दरी और भव्य गुलदस्ते पर पड़ी, और चेहरा खिल गया। "वाह, राठौर ग्रैंड!" वो बोले। "इसे कहते हैं ख़ातिरदारी! ... इस बार तो कमरा पिछली बार से भी शानदार है, रेयांश बेटा।"

रेयांश एक पल के लिए जड़ हो गया। जिस लड़की को उसने ज़लील होने के लिए वो नामुमकिन काम सौंपा था, उसी ने न सिर्फ़ वो कर दिखाया, बल्कि उसकी अपनी नाक भी ऊँची कर दी थी। उसका फंदा, उसी के गले में एक तमग़ा बन कर लटक गया था।

पूरे कमरे में सिर्फ़ एक इंसान जानता था कि ये कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं था। और वो ख़ुद अद्विका थी।

अद्विका ने चुपचाप अपनी बाल्टी समेटी, सिर झुकाया, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। काम हो चुका था। मास्क अपनी जगह वापस आ चुका था।

पर रेयांश की नज़र उस पर से हट नहीं रही थी। कुछ था। उस लड़की के चलने के अंदाज़ में, उन आँखों में, जो एक बार भी उसके सामने झुकी नहीं थीं। ... कोई नौकर उसके सामने ऐसे नहीं चलता था। जैसे कमरा उसका अपना हो।

"रुको।"

अद्विका के क़दम ठिठक गए। वो पलटी। और रेयांश उसे ऐसे देख रहा था, जैसे किसी बहुत पुरानी, धुँधली याद को टटोल रहा हो। कहीं कोई तार हिला था। कोई नज़र, जो उसने पहले कहीं देखी थी, पर याद नहीं आ रही थी।

अद्विका की धड़कन एक पल को रुक गई। उसके अंदर सब कुछ चीख़ रहा था। उसे पहचान मत लेना। एक भी शब्द, और पूरा साल, पूरी वसीयत, सब राख हो जाएगी। ... पर उसका चेहरा पत्थर की तरह शांत रहा।

"तुमसे..." ... वो रुका, आँखें सिकोड़ीं। "तुमसे पहले कहीं मिला हूँ?"

और तब अद्विका ने वो किया, जो उस पूरे तहख़ाने में कोई नहीं करता था। उसने अपनी नज़र नीची नहीं की। उसने सीधे उस आदमी की आँखों में देखा, जिसने उसे धूल कहा था, और जिसकी पूरी ज़मीन उसी के एक दस्तख़त पर टिकी थी।

"नहीं, सर।" ... उसकी आवाज़ बर्फ़ की तरह शांत थी। "आप जैसों को हम जैसे याद रहते हैं। ... हम जैसों को आप जैसे नहीं।"

और फिर वो, बिना मुड़ कर देखे, उस भारी दरवाज़े से बाहर निकल गई। रेयांश वहीं खड़ा रह गया, उस ख़ाली दरवाज़े को घूरता हुआ, और उसके कानों में वो एक लाइन किसी घंटी की तरह गूँजती रही।

आप जैसों को हम जैसे याद रहते हैं, हम जैसों को आप जैसे नहीं। ... उसे नहीं पता था कि वो लड़की सच कह रही थी। वो उसे उम्र भर याद रखेगी, हर उस बेइज़्ज़ती के साथ जो उसने दी थी। और जिस दिन वो अपना नाम वापस लेगी, तो सबसे पहले उसे यही याद दिलाएगी।

पर फ़िलहाल, वो बस एक नौकरानी थी, जो उसका पोंछा लगाती थी। और वो, उस पूरे महल का मालिक, जिसे ये तक नहीं पता था कि जिस ज़मीन पर वो इतने घमंड से खड़ा है, वो उसी 'छोटी' के एक शब्द पर, कभी भी उसके पैरों तले से खिसक सकती है। ... किसी को नहीं पता था। सिवाय एक बूढ़े वकील के, एक स्लेटी वर्दी वाली लड़की के... और आपके।

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