Chapter 21 of 30
दुश्मन या पनाह
गलियारे में 'मालकिन' का लफ़्ज़ हवा में लटका है, और एक बरस का सारा सच दोनों के बीच नंगा हो जाता है, रेयांश हफ़्तों से जानता था और फिर भी उसने अद्विका को बचाया, और अद्विका ने उससे मोहब्बत करते हुए भी झूठ बोला। वो लड़ते हैं, टूटते हैं, और मलबे के बीच भी मोहब्बत खड़ी रहती है, पर आख़िर में दोनों उलटे फ़ैसले कर बैठते हैं, रेयांश ठान लेता है कि वो अपना सब कुछ दे कर भी अद्विका को साल पार करवा कर चेन उसके नाम कर देगा, और अद्विका, गिद्धों के जानलेवा हुक्म और उसकी बर्बादी से डर कर, तय करती है कि वो पूरी विरासत छोड़ कर चली जाएगी ताकि दोनों ज़िंदा रहें, मोहब्बत की एक बराबरी पर रुकी जंग।
'मालकिन।' ... वो एक लफ़्ज़ गलियारे की टिमटिमाती बत्ती के नीचे हवा में लटका रह गया, और उसके साथ एक बरस की बुनी हुई ख़ामोशी भी।
अद्विका के हाथ में ट्रे अब भी थी, दस्ताने अब भी सफ़ेद, पर वो चेहरा जो अभी-अभी सैकड़ों की भीड़ में नहीं टूटा था, इस एक आदमी की आँखों के सामने काँच हो चला था।
'मैं... मैं मालकिन नहीं हूँ, सर।' ... अद्विका की आवाज़ निकली, पर उसमें वो सादगी नहीं थी जो एक बरस से उसकी ढाल रही थी। ... 'मैं बस एक नौकरानी हूँ। आप थके हुए हैं, आपको कोई ग़लतफ़हमी हो गई है। ... मैं वापस काम पर चली जाती हूँ।'
'मत करो, अद्विका।' ... रेयांश ने उसकी बात बीच में ही काट दी, आवाज़ में न गुस्सा था, न जीत, बस एक भयानक थकान। ... 'मैंने कल रात नहीं जाना। न आज रात। ... हफ़्ते बीत गए, अद्विका। उस रात से, जब मैंने तुम्हारे कमरे के दरवाज़े पर गुड़िया कहा था, और तुम्हारा हाथ अपने-आप उस लॉकेट पर चला गया था।'
अद्विका को वो दराज़ याद आई, जिसमें उसका असली नाम, कुणाल का खोदा हुआ काग़ज़, ताले में बंद पड़ा था।
और उस दराज़ की चाबी इसी आदमी के पास थी। जो सच अभी-अभी मल्विका भरी महफ़िल में नहीं खोल पाई, वो इस आदमी की मुट्ठी में हफ़्तों से बंद था, और उसने किसी से नहीं कहा था।
'हफ़्तों से?' ... अद्विका की आवाज़ काँपी, और पहली बार उसमें कोई नौकरानी नहीं, कोई और बोली। ... 'तो हफ़्तों से तुम जानते थे कि मैं कौन हूँ, और हर रोज़ मुझसे चाय मँगवाते रहे, फ़ाइलें उठवाते रहे, मुझे अपने पीछे-पीछे घुमाते रहे। ... ये जानते हुए कि मैं वही हूँ जो तुमसे सब कुछ छीन लेगी। ये कैसा खेल था, रेयांश?'
'खेल?' ... रेयांश एक कड़वी हँसी हँसा। ... 'हाँ। शुरू में खेल ही था। मैंने सोचा, इसे परखूँगा, देखूँगा ये किसकी भेजी हुई है, क्या चाहती है। ... मैंने अपने दिल पर बर्फ़ जमा ली थी, अद्विका। हर सुबह ख़ुद से कहता था, ये तेरी दुश्मन है, इसका ये झुका हुआ सिर भी तेरा ताज छीनने आया है।'
'दुश्मन।' ... अद्विका ने वो लफ़्ज़ ऐसे दोहराया जैसे किसी ने उसे थप्पड़ मारा हो। ... 'तो जिन रातों में मैं तुम्हारे पास खड़ी थी, तुम मुझे दुश्मन गिन रहे थे। ... मैं तुम्हारे लिए एक चेहरा नहीं, एक ख़तरा थी, जिसे तुम रोज़ अपनी नज़रों में तौलते थे।'
पर वो बर्फ़ कभी जमी ही नहीं रह पाई, और दोनों ये जानते थे।
गलियारे की हवा भारी हो चली, दूर कहीं आख़िरी बर्तन धुल रहे थे, और उन दोनों के बीच एक बरस का दबा हुआ सच अब चिंगारी पकड़ने लगा।
'और वो सब?' ... अद्विका ने एक क़दम आगे बढ़ाया, ट्रे अब भी सीने से चिपकी हुई। ... 'वो रातें जब तुमने मुझे अपने साथ फ़ाइलों पर बिठाया, अपने डर का हाल सुनाया, अपनी बेख़्वाबी दिखाई। ... वो भी परख थी, रेयांश? मुझे साफ़-साफ़ बताओ, उसमें से कुछ भी सच था, या मैं बस तुम्हारी बिछाई हुई एक चाल थी?'
'सच?' ... रेयांश की आवाज़ अचानक तीखी हो गई, और वो एक क़दम और पास आ गया। ... 'तुम मुझसे सच की बात कर रही हो? ... मैंने तुम्हें कितनी बार मौक़ा दिया, अद्विका। उस रात तुम्हारे कमरे में, एक-एक दरवाज़ा खोला, हर सवाल एक रास्ता था कि तुम ख़ुद बोल दो और बच जाओ। ... और तुमने हर बार सीधे मेरी आँखों में देख कर झूठ चुना।'
'क्योंकि मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था!' ... अद्विका की आवाज़ पहली बार ऊँची हुई, फिर फ़ौरन दबी, इस डर से कि कोई सुन न ले। ... 'एक बार भी सच बोला, और वसीयत रद्द, सब कुछ जयदेव के पास। इस चेन के चार हज़ार नौकर, बंसी, शारदा ताई, हर वो चेहरा जिसने मुझे अपनाया, सब सड़क पर। ... मैंने तुमसे जो कहा, हर लफ़्ज़ सच था, रेयांश। बस पूरा सच नहीं कहा। क्योंकि पूरा सच मुझे नहीं, उन सबको डुबो देता।'
'जानती हो सबसे बुरा क्या है?' ... रेयांश की आवाज़ अचानक धीमी पड़ गई, जैसे कोई अंदर से टूट रहा हो। ... 'उन्हीं रातों में मैंने तुम्हें अपने सबसे बड़े डर का हाल सुनाया था। उस गुमनाम वारिस का डर, जो किसी भी दिन आ कर मेरा सब कुछ ले जाएगी। ... और तुम मेरे सामने खड़ी मेरा पानी भरती रहीं, अपना चेहरा पत्थर बनाए, मन ही मन जानती हुई कि वो वारिस तुम ख़ुद हो। ... मैंने अपने क़ातिल के कंधे पर सिर रख कर अपना डर रोया, अद्विका।'
और उन दोनों के बीच वो एक रात आ खड़ी हुई जो दोनों को याद थी।
पंद्रह रातों की तड़प के बाद पार की गई वो दहलीज़, वो बोसा जिसे उन्होंने एक-दूसरे को चुनते हुए बाँटा था, और जो उसी रात ज़हर बन गया था, जब अद्विका उसे उसी दहलीज़ पर छोड़ कर भाग गई थी।
'तुम पूछते हो मैं उस रात भागी क्यों थी?' ... अद्विका की आँखें भर आईं, पर उसने आँसू गिरने नहीं दिए। ... 'क्योंकि मैं उस आदमी से मोहब्बत कर बैठी थी जिसका सब कुछ मुझे एक दिन छीनना है। ... वो बोसा मेरे मुँह में पिघले सीसे सा भारी था, रेयांश। और हर बार जब तुमने मुझ पर भरोसा किया, वो भरोसा मेरे अपने सीने में छुरी बन कर उतरा।'
'तो फिर मुझे एक बात समझाओ।' ... रेयांश और पास आ गया, आवाज़ अब काँपती हुई। ... 'अगर मैं तुम्हारा दुश्मन था, तो तुमने मुझे दो बार क्यों बचाया? उस जाली वोट में, उस डूबते सौदे में, हर बार तुम एक साये की तरह मेरे पीछे खड़ी थीं। ... जिस आदमी का ताज तुम्हें छीनना है, उसे तुमने अपने ही हाथों दो बार डूबने से बचाया। क्यों, अद्विका?'
'क्योंकि मैं तुम्हें डूबते नहीं देख सकती थी!' ... लफ़्ज़ उसके मुँह से निकल गए इससे पहले कि वो उन्हें रोक पाती। ... 'तुम्हें, जो रात-रात भर जाग कर एक मरते साम्राज्य को अकेले अपने कंधों पर उठाए रहते हो। तुम्हें, जिसे एक बूढ़े ने यतीम से बेटा बनाया, और तुम उसका एहसान अपनी जान जला कर चुका रहे हो। ... मैं तुमसे नफ़रत करना चाहती थी, रेयांश। जी-जान से चाहती थी। पर कर नहीं पाई।'
एक मंज़िल नीचे बंसी अब भी दावत की ख़ाली मेज़ें समेट रहा था, 'बंसी बहादुर ड्यूटी पर' बुदबुदाता, बिना जाने कि उसकी अद्विका किस आग के बीच खड़ी है। ... और शारदा ताई की वो चेतावनी अद्विका के कानों में गूँज उठी, कि जिस हाथ को वो दिल दे रही है, उसी को एक दिन उसे ख़ाली करना है।
दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं, गलियारे में बस उनकी धड़कनें और दूर की मद्धम खनक रह गई। ... सारे इल्ज़ाम राख हो चुके थे, और उस राख के बीच एक चीज़ अब भी सीधी खड़ी थी, जिसे दोनों में से कोई झुठला नहीं सकता था।
'सुनो मुझे।' ... रेयांश ने उसके काँपते हाथ की तरफ़ देखा, फिर सीधे उसकी आँखों में। ... 'आज रात, भरी महफ़िल में, मैंने अपने ही हाथों वो कुर्सी काट दी जिस पर मैं बैठा हूँ, सिर्फ़ तुम्हें बेनक़ाब होने से बचाने के लिए। ... तुम्हें मिटा देना मुझे बचा लेता, अद्विका। मेरा सब कुछ बच जाता। ... और फिर भी, अगर वो पल दोबारा आए, तो मैं ठीक वही करूँगा।'
'तुम समझ रहे हो तुम क्या कह रहे हो?' ... अद्विका ने सिर हिलाया, जैसे उसे यक़ीन न आ रहा हो। ... 'जिस दिन मैं अपना नाम वापस लूँगी, उसी दिन तुम्हारे पैरों तले से ज़मीन खिसक जाएगी। ये पूरा महल, ये कुर्सी, ये नाम, सब मेरा हो जाएगा, और तुम... तुम कुछ नहीं रहोगे। ... और तुम मुझे बचा रहे हो?'
रेयांश ने एक क़दम और भरा, और अब उनके बीच बस एक साँस की दूरी बची थी।
उसकी आँखों में वो साम्राज्य, वो कुर्सी, वो सारा डर, सब पीछे धुँधला पड़ गया, और सामने बस एक चेहरा रह गया, जो एक बरस से उसका पानी भर रहा था।
'वो कुर्सी एक मरे हुए आदमी का दिया एहसान थी, अद्विका।' ... रेयांश की उँगलियाँ उसके गाल के पास आ कर रुक गईं, छूने और न छूने की दहलीज़ पर। ... 'पर तुम... तुम्हें मैंने ख़ुद चुना। बिना किसी वसीयत के, बिना किसी शर्त के, बिना किसी एहसान के। ... ज़िंदगी में पहली बार किसी चीज़ पर मेरा अपना हक़ है, और वो कोई कुर्सी नहीं, तुम हो।'
एक पल को लगा दीवार गिर जाएगी, दो साँसें एक हो जाएँगी। ... पर अद्विका ने आँखें भींच लीं और आधा क़दम पीछे हट गई, क्योंकि उन दोनों के बीच अब भी वो एक सच छुरी बन कर पड़ा था, जिसे कोई मोहब्बत मेज़ से हटा नहीं सकती थी।
'ये कुछ नहीं बदलता, रेयांश।' ... अद्विका ने अपनी काँपती आवाज़ को क़ाबू में लाने की कोशिश की। ... 'तुम जो भी कहो, जो भी महसूस करो, एक सच नहीं बदलेगा। हम दोनों में से एक को उस दिन सब कुछ गँवाना है जिस दिन मैं अपना नाम लूँगी। ... और वो दिन आ रहा है। हर बीतती रात के साथ पास आ रहा है।'
'तो आने दो उस दिन को।' ... रेयांश ने उसकी आँखों में सीधे देखा, और अब उसकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी। ... 'मैंने फ़ैसला कर लिया है, अद्विका। मैं तुम्हें ये साल पार करवाऊँगा। जयदेव से, मल्विका से, कुणाल से, हर उस हाथ से जो तुम्हें ढूँढ रहा है, मैं तुम्हारे और उनके बीच खड़ा रहूँगा। ... और साल पूरा होते ही, ये पूरी चेन मैं अपने हाथों तुम्हारे नाम कर दूँगा। चाहे इसकी क़ीमत मेरा सब कुछ हो।'
उसने अभी-अभी वो सब कुछ अपने हाथ से देने की बात कही थी, जिसे बचाने में उसने बरसों अपना ख़ून जलाया था।
जिस ताज को पाने के लिए एक बूढ़े ने उसे यतीम से उठा कर पाला था, उसे वो अपने ही हाथों उस लड़की के क़दमों में रखने को तैयार खड़ा था।
'नहीं। ... नहीं, रेयांश।' ... अद्विका ने ज़ोर से सिर हिलाया, और अब उसकी आँखों में मोहब्बत के पीछे डर था। ... 'तुम्हें पता है आज रात मल्विका जाते-जाते क्या कह गई? कि जिस दिन ये बात जयदेव तक पहुँचेगी, हम दोनों एक साथ डूबेंगे। ... और जयदेव तो पहले ही हुक्म दे चुका है, कि वारिस दावा करे उससे पहले उसे ग़ायब कर दो। ... तुम मेरे लिए खड़े हुए, तो वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेंगे।'
'मुझे परवाह नहीं।' ... रेयांश ने कहा, और उसमें कोई हिचक नहीं थी। ... 'कुणाल, मेरा अपना दायाँ हाथ, जयदेव का ख़रीदा हुआ छुरा, वही तुम्हारा असली नाम खोद रहा है। मैं उसे संभाल लूँगा। तुम्हारा सच अब भी मेरी दराज़ में ताले में बंद है, और उसकी चाबी सिर्फ़ मेरे पास है। ... मैं इस महल का हर पत्ता जानता हूँ, अद्विका। तुम अब अकेली नहीं हो।'
पर अद्विका के अंदर एक और फ़ैसला जन्म ले चुका था, उसके फ़ैसले के बिल्कुल उलट।
आज की रात भी कट चुकी थी, तीन सौ सोलह रातें बाक़ी थीं, और उन तीन सौ सोलह रातों में उसे इस आदमी को अपनी ख़ातिर बर्बाद होते नहीं देखना था।
'मैं ये सब नहीं लूँगी, रेयांश।' ... अद्विका ने बहुत धीरे, बहुत साफ़ कहा, और ट्रे को आख़िरकार एक तरफ़ रख दिया। ... 'ये चेन, ये नाम, ये पूरा महल, कुछ नहीं। मैं इस पर अपना दावा छोड़ दूँगी। ... वसीयत की शर्त तोड़ूँगी नहीं, बस चुपचाप साल पूरा होने से पहले चली जाऊँगी। सब कुछ जयदेव के पास चला जाए, पर तुम ज़िंदा रहोगे, और मैं भी।'
'ये मैं तुम्हें कभी नहीं करने दूँगा।' ... रेयांश ने उसका काँधा थाम लिया, आवाज़ में अब आदेश की सख़्ती थी। ... 'तुम्हारे दादा ने ये साम्राज्य तुम्हारे नाम किया, तुम्हारे बाप के नाम की एक टूटी हुई माफ़ी की तरह। मैं उसे गिद्धों के हाथ नहीं जाने दूँगा, और तुम्हें इस तरह चोरों की तरह भागने भी नहीं दूँगा। ... मैं तुम्हें बचाऊँगा, चाहे तुम चाहो या न चाहो।'
'और मैं तुम्हें बचाऊँगी।' ... अद्विका ने उसके हाथ पर अपना हाथ रख दिया, आँखें भीगी हुई, आवाज़ न टूटी, न झुकी। ... 'तुम मेरे लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दोगे, और मैं तुम्हारे लिए अपना सब कुछ छोड़ दूँगी। ... हम दोनों एक-दूसरे को बचाने निकले हैं, रेयांश, दो अलग रास्तों से। और उन दोनों रास्तों के आख़िर में, हम दोनों एक-दूसरे को खो देंगे।'
गलियारे की टिमटिमाती बत्ती एक पल को बुझ कर फिर जल उठी, और उसने उन दो परछाइयों को एक-दूसरे के आमने-सामने जमा हुआ पाया, न पास आते, न पीछे हटते। ... एक बरस से जो एक लफ़्ज़ सिर्फ़ सुनने वाला जानता था, वो अब उन दोनों के बीच एक दीवार बन कर खड़ा था, मालकिन। और उस दीवार के दोनों तरफ़ दो लोग खड़े थे, जिन्होंने एक-दूसरे को चुन लिया था, और ठीक इसीलिए एक-दूसरे को खोने का फ़ैसला कर बैठे थे। ... तीन सौ सोलह रातें बाक़ी थीं, और मोहब्बत की ये जंग एक बराबरी पर आ कर रुक गई थी, जहाँ हार किसी की भी हो, टूटेंगे दोनों।
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