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Chapter 5 of 30

पहली टक्कर

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

शारदा की उँगली अब भी हवा में काँप रही थी, कभी उस धुँधले चेहरे पर, कभी अद्विका पर। ... 'ये तो छोटे मालिक का है।' वो वाक्य किसी नंगी तलवार की तरह हवा में लटका था। और अद्विका जानती थी, इसी धार पर उसका पूरा साल टँगा है। एक ग़लत शब्द, और सब राख।

"छोटे मालिक?" ... अद्विका ने हँसने की कोशिश की, पर आवाज़ काँप गई। "ताई, आप कुछ और समझ रही हैं। ये तो बस माँ की एक पुरानी तस्वीर है। मुझे तो ख़ुद नहीं पता ये कौन है। ... भगवान के लिए, इसे यहीं छोड़ दीजिए।"

पर शारदा की आँखें उस झूठ पर एक पल को नहीं रुकीं। चालीस साल से वो इंसानों को पढ़ती आई थी। ... और इस लड़की के चेहरे पर उसे झूठ नहीं, एक बच्ची का ख़ौफ़ दिखा। वो ख़ौफ़, जो अपने सच को जान की तरह सीने से चिपकाए हो।

शारदा ने वो लॉकेट धीरे से बंद किया, और वापस अद्विका की मुट्ठी में रख कर उसकी उँगलियाँ ऊपर मोड़ दीं। ... "रख इसे, सँभाल के। ... सुन छोरी, मैंने बहुत राज़ इन दीवारों में दफ़न होते देखे हैं। एक और सही। ... तू कौन है, ये तेरा राज़ है। जिस दिन ख़ुद बताना चाहेगी, बता देना। उस दिन तक, ये बुढ़िया अंधी है।"

अद्विका का गला रुँध गया। इतने दिनों से जिस बोझ को वो अकेली ढो रही थी, आज पहली बार किसी ने बिना पूछे उसका एक कोना अपने कंधे पर उठा लिया था। ... "ताई... मैं... शुक्रिया।"

"शुक्रिया-वुक्रिया रहने दे।" ... शारदा की आवाज़ फिर सख़्त हो गई, पर उसमें अब एक फ़ौलादी ममता थी। "इन दीवारों के अंदर गिद्ध घूमते हैं, बेटी। इनकी नज़र जिस पर पड़े, उसे नोच कर रख देते हैं। ... आज से मेरी नज़र तुझ पर है। सिर झुका कर चल, और इस लॉकेट को छुपाए रख। अब ये बात यहीं दफ़न।"

उस रात अद्विका ने वो लॉकेट अपनी वर्दी के अंदर, दिल के ठीक ऊपर छुपा लिया। ... तीन सौ बावन दिन बाक़ी थे। और अगले कुछ ही दिनों में, पूरे महल की साँसें एक ही नाम पर अटक गईं, एक ऐसा नाम जो सात समंदर पार से आ रहा था, और जिसकी हाँ या ना पर राठौर ग्रैंड की ज़िंदगी और मौत टँगी थी।

"छोटी! ओ छोटी, तूने सुना?" ... बंसी लगभग दौड़ता हुआ स्टोर में घुसा, आँखें बच्चे की तरह चौड़ी। "आज दुबई से एक बहुत बड़ा शेख़ आ रहा है! जनाब फ़ैसल अल-रशीद! इतना पैसा है कि हमारे जैसे दस होटल वो नाश्ते में ख़रीद ले! ... पूरा मैनेजमेंट कल रात से तैयार बैठा है!"

"एक अकेले मेहमान के लिए इतनी हलचल?" ... अद्विका ने पोंछा निचोड़ते हुए चुपचाप पूछा। "इतने बड़े होटल की साँस एक अकेले आदमी पर क्यों अटकी है, भैया?"

"अरे इसीलिए तो, छोटी! ... ये होटल ऊपर से जितना चमकता है, अंदर से उतना ही खोखला हो चुका है। बैंकों ने हाथ खड़े कर दिए, और जो बचता है वो तेरे 'बड़े बाबू' जैसे लोग चट कर जाते हैं। ... ये शेख़ ही डूबते जहाज़ की आख़िरी रस्सी है। ये मुकर गया, तो चार हज़ार नौकर सड़क पर। मैं, तू, सब।"

अद्विका का हाथ पोंछे पर रुक गया। चार हज़ार नौकर। ... ये कोई आँकड़ा नहीं था। ये बंसी था, ये शारदा ताई थीं, ये तहख़ाने का हर वो चेहरा जिसने उसे बिना जाने अपना लिया था। ... और जो आदमी आज ये जुआ खेल रहा था, वो रेयांश था, जिसकी ज़मीन एक दिन उसके अपने ही पैरों तले से खिसकनी थी।

"और सुन, अच्छी बात बताऊँ?" ... बंसी थोड़ा फूल कर बोला। "उस दिन तूने जो मल्होत्रा साहब की दावत बचाई, उसकी चर्चा अब पूरे तहख़ाने में है। ख़ुद शारदा ताई तेरा नाम लेती हैं! ... पर आज बिल्कुल आँखों से ओझल रहना। और वो मल्विका बीबीजी, उसकी नज़र आज बाज़ जैसी होगी।"

"मैं भला कहाँ चमकूँगी, भैया?" ... अद्विका ने सिर झुका कर, बड़ी मासूमियत से कहा। "पानी पिलाने वाली नौकरानी को कौन देखता है। ... और छुपने की सबसे अच्छी जगह तो यही होती है, सबकी आँखों के ठीक सामने।"

पर क़िस्मत को आज उसका छुपना मंज़ूर नहीं था। दोपहर होते-होते बैंक्वेट फ़्लोर पर हाथ कम पड़ गए, और शारदा ताई ने अपनी नई छोरी को ऊपर, पानी के काम पर लगा दिया, उसी संगमरमर की दुनिया में, जहाँ आज राठौर ग्रैंड की ज़िंदगी और मौत का फ़ैसला होना था।

ठीक तीन बजे, राठौर ग्रैंड की लॉबी में एक अजीब सी ख़ामोशी छा गई। जनाब फ़ैसल अल-रशीद अंदर दाख़िल हुए, बर्फ़ जैसा सफ़ेद लिबास, हर क़दम में पैसे का ठंडा घमंड। ... उनके पीछे रेयांश था, थका हुआ, पर चेहरे को पत्थर की तरह साधे। और एक तरफ़ दीवार से टिकी, बिल्ली की तरह ख़ामोश, मल्विका सब देख रही थी।

"राठौर ग्रैंड में आपका स्वागत है, जनाब अल-रशीद।" ... रेयांश की आवाज़ नपी-तुली और शाही थी। "ये होटल एक इमारत नहीं, एक विरासत है। और आपका निवेश इसे एक नई बुलंदी देगा। आइए, मैं ख़ुद आपको पूरा महल दिखाता हूँ।"

जनाब अल-रशीद ने बहुत हल्का सा सिर झुकाया। "अस्सलामु अलैकुम।" ... उनकी आवाज़ गहरी और ठंडी थी। "आपकी इमारत ख़ूबसूरत है, मिस्टर सिंघानिया। पर मैं पत्थरों में नहीं, लोगों में पैसा लगाता हूँ। ... मैं देखने आया हूँ कि इन दीवारों के पीछे कोई रूह बची है या नहीं। और रूह लफ़्ज़ों से नहीं, बर्ताव से दिखती है।"

और यहीं पहली दरार पड़ी। जिस दुभाषिये को अल-रशीद की ज़ुबान के लिए बुलाया गया था, वो ऐन वक़्त पर ग़ायब था, बताया गया, उसकी बुकिंग किसी ग़लती से रद्द हो गई। ... एक ग़लती, जो शायद ग़लती थी ही नहीं। और अब मेहमान जब भी अपनी ज़ुबान में कोई बात कहता, मैनेजमेंट के चेहरे सफ़ेद पड़ जाते।

मल्विका आगे बढ़ी, होंठों पर एक रेशमी मुस्कान। "रेयांश, मेहमान सफ़र से थक गए हैं। इतनी छोटी-छोटी बारीकियों में क्या रखा है?" ... वो नरमी से बोली, पर उसका हर लफ़्ज़ रेयांश के पैरों तले से ज़मीन खींच रहा था। वो चाहती थी कि ये सौदा आज यहीं दम तोड़ दे। रेयांश डूबे, तो ताज उसके घर लौट आए।

घबराहट में, एक बड़े मैनेजर ने अपने साथी के कान में, ये समझते हुए कि अरबी मेहमान हिंदी नहीं जानता, दबी आवाज़ में कह दिया, "इन तेल वाले शेख़ों के तो बस नख़रे हैं। पैसा फेंको, और झुक कर सलाम बजाओ।" ... हवा जम गई। क्योंकि अल-रशीद ने बीस साल मुंबई में कारोबार किया था। वो एक-एक लफ़्ज़ समझ गए।

अल-रशीद का चेहरा पत्थर हो गया। "मैंने काफ़ी देख लिया, मिस्टर सिंघानिया।" ... वो पलटे, आवाज़ में अब बर्फ़ थी। "पैसा किसी के सामने गिड़गिड़ाता नहीं। और जहाँ मेहमान की इज़्ज़त पीठ पीछे उतार दी जाए, वहाँ न मेरी रूह है, न मेरा पैसा। ... ख़ुदा हाफ़िज़।"

चार हज़ार नौकरों की ज़िंदगी, राठौर ग्रैंड की आख़िरी साँस, दरवाज़े की तरफ़ मुड़ रही थी। रेयांश का चेहरा राख हुआ जा रहा था, ज़ुबान तालू से चिपक गई थी। ... और वहीं, हॉल के किनारे, पानी की सुराही थामे एक दुबली नौकरानी सब देख रही थी। और उस पल, उसके अंदर की नौकरानी पीछे हट गई, और मालकिन आगे आ गई।

"अस्सलामु अलैकुम, जनाब। ... अहलन व सहलन।" ... अद्विका उन्हीं की ज़ुबान में बोल रही थी, शांत और अदब से भरी। मेहमान के क़दम ठिठक गए। "जो लफ़्ज़ अभी आपके कानों में पड़ा, वो इस घर की आवाज़ नहीं, एक थके इंसान की भूल थी। ... और माफ़ी के लिए झुकना नहीं पड़ता, बस सच्चाई काफ़ी होती है, जनाब।"

अल-रशीद पलटे, और पहली बार उनकी सपाट आँखों में कुछ हिला। एक पानी पिलाने वाली लड़की, उन्हीं की ज़ुबान में, उन्हीं के अदब के साथ। "तुम... तुम मेरी ज़ुबान बोलती हो?" ... उन्होंने परखते हुए पूछा। "तो बताओ, इस होटल में मुझे अपना पैसा क्यों लगाना चाहिए? कोई एक सच्ची वजह।"

"इसलिए नहीं कि ये होटल सबसे बड़ा है, जनाब।" ... अद्विका ने उनकी आँखों में सीधे देखा, आवाज़ में एक गहराई जो नौकरानी की नहीं हो सकती थी। "बल्कि इसलिए, कि इसकी बुनियाद जिस नाम पर रखी है, वो नाम आज तक किसी का क़र्ज़ नहीं भूला। ऊपर की चमक झूठी हो सकती है, पर नींव की ईमानदारी नहीं। ... ये रूह अभी ज़िंदा है, जनाब।"

और अगले कुछ मिनटों में, उस नौकरानी ने वो कर दिखाया जो पूरा बोर्डरूम न कर पाया। उसने मेहमान और मैनेजमेंट के बीच का पुल बन कर हर बात का तर्जुमा किया, और जो इज़्ज़त पीठ पीछे उतर गई थी, उसे वापस उनके कंधों पर रख दिया। ... मेहमान की आँखों की बर्फ़ धीरे-धीरे एहतराम में बदल गई।

जनाब अल-रशीद ने एक हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया, और अब उनकी नज़र मैनेजमेंट पर नहीं, अद्विका पर टिकी थी। "मैं इस निवेश पर ग़ौर करूँगा, मिस्टर सिंघानिया।" ... फिर वो अद्विका की तरफ़ मुड़े। "तुम्हारे इस महल में कम से कम एक इंसान को मेहमाननवाज़ी का मतलब पता है। ... शुक्रन, बेटी।"

जैसे ही ख़तरा टला, रेयांश और मल्विका फ़ौरन आगे बढ़ आए, राहत की साँस और मेहमान की तारीफ़, दोनों समेटते हुए। अल-रशीद को पूरे अदब से गाड़ी तक छोड़ा गया, सौदा फिर से ज़िंदा था। ... पर उस हॉल में दो जोड़ी आँखें ऐसी थीं, जो मेहमान को नहीं, उस लौटती हुई नौकरानी को देख रही थीं।

रेयांश की नज़र उस नौकरानी की पीठ पर जमी रह गई। एक पानी पिलाने वाली लड़की, जो अभी उस मेहमान के सामने चट्टान बनी खड़ी थी, जिसके आगे मैनेजर काँप रहे थे। वो ठहराव, किसी चेयरमैन जैसा। ... उसके ज़हन में कहीं कुछ खटका, कोई धुँधली याद, जिसे वो पकड़ नहीं पा रहा था, पर छोड़ भी नहीं पा रहा था।

"दिलचस्प है, है ना?" ... मल्विका उसके पास आ कर नरमी से बोली, पर उसकी आँखें रेयांश का चेहरा पढ़ रही थीं। "एक पानी पिलाने वाली नौकरानी, जो शेख़ की ज़ुबान बोलती है, और भरे हॉल में मैनेजमेंट को मेहमानदारी सिखाती है। ... आख़िर ये लड़की है कौन, रेयांश? और तुम इसे इतने ग़ौर से देख क्यों रहे हो?"

"कोई नहीं।" ... रेयांश ने फ़ौरन नज़र हटा ली, आवाज़ को बर्फ़ की तरह सपाट करते हुए। "एक नौकरानी है, जिसने संयोग से एक मुसीबत टाल दी। बस इतना ही।" ... पर उसकी अपनी आवाज़ का झूठ उसे ख़ुद सुनाई दे गया। कोई नौकरानी संयोग से चट्टान नहीं बनती।

पर मल्विका को उसके जवाब में दिलचस्पी नहीं थी। उसकी दिलचस्पी उस एक पल में थी, जब रेयांश की थकी आँखें उस नौकरानी पर एक लम्हे के लिए ठहर गई थीं। ... और वो जानती थी, जो रेयांश की नज़र रोक ले, वही उसका सबसे बड़ा काँटा है। तभी उसे मल्होत्रा की दावत भी याद आई, किसी अनजान नौकरानी की बचाई हुई।

मल्विका ने अपने साथ खड़े एक मुलाज़िम को इशारे से बुलाया। "वो पानी पिलाने वाली लड़की। उसका नाम, उसका काग़ज़, कहाँ से आई, सब मुझे कल सुबह तक चाहिए। ... और हाँ," ... उसके होंठों पर एक ठंडी मुस्कान तैर गई, "मल्होत्रा की दावत भी किसने बचाई, पता करो। मुझे लगता है, दोनों कहानियों में एक ही चेहरा छुपा है।"

उस रात, जब महल की बत्तियाँ मद्धम हो गईं, रेयांश अपने दफ़्तर में अकेला बैठा था, आँखों में नींद नहीं। आज उसका डूबता जहाज़ एक बार फिर किसी अनदेखे हाथ से किनारे लग गया था। पहले मल्होत्रा की दावत, अब अल-रशीद का सौदा। ... और दोनों बार, एक ही दुबली परछाईं तहख़ाने से उठ कर उसे बचा गई थी। उसने घंटी बजाई।

"तुम।" ... रेयांश ने उसे सिर से पैर तक देखा, जैसे किसी उलझी पहेली को सुलझा रहा हो। "एक बैंक्वेट की नौकरानी, जो अरबी बोलती है, शेख़ों के अदब जानती है, और भरे हॉल में मेरे पूरे बोर्ड को ख़ामोश करा देती है। ... ये सब कहाँ से सीखा? सच बताओ। तुम आख़िर हो कौन?"

"मैं कोई नहीं हूँ, सर।" ... अद्विका ने नज़रें झुका लीं, पर उसकी रीढ़ नहीं झुकी। "मैंने दो साल दुबई से लौटे एक बड़े सेठ के घर काम किया था। वहीं उनके मेहमानों की सेवा करते-करते, उनकी ज़ुबान और तौर-तरीक़े सीख गई। ... भूखे पेट को हर हुनर जल्दी आ जाता है, सर। वरना रोटी नहीं मिलती।"

"तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता, है ना?" ... रेयांश लगभग ख़ुद से बोला। "इस महल में हर आदमी मुझसे नज़रें चुराता है। और तुम मेरी आँखों में सीधे देखती हो, जैसे तुम्हें कोई डर ही नहीं। ... मैं अपने होटल के सबसे बुरे वक़्त में, अपनी आँखों के सामने एक ऐसी पहेली खुली नहीं छोड़ सकता, जिसे मैं समझ ही न पाऊँ।"

और तभी रेयांश ने वो फ़ैसला लिया, जो हर उसूल के ख़िलाफ़ था, एक मामूली नौकरानी को अपनी निजी सेवा में रखना। ... वो पहेली कोई नौकरानी नहीं, इस पूरे महल की गुमनाम मालकिन थी। वही इंसान, जिसके अपना नाम लेते ही उसके पैरों तले से पूरी ज़मीन खिसक जानी थी।

"कल से तुम बैंक्वेट फ़्लोर पर काम नहीं करोगी।" ... रेयांश की आवाज़ पत्थर की तरह ठोस और आख़िरी थी। "कल से तुम मेरे फ़्लोर पर, मेरी निजी सेवा में रहोगी। मैं जहाँ रहूँगा, तुम वहीं रहोगी। ... क्योंकि तुम जो भी हो, अद्विका देशमुख, अब मुझे तुम पर नज़र रखनी है।"

और उस एक वाक्य के साथ, दो तक़दीरें एक ही धागे से बँध गईं। जिस आदमी को इस लड़की के अपना नाम वापस लेते ही सब कुछ खोना था, उसी ने उसे अपने सबसे क़रीब खींच लिया था। ... रेयांश को लगा, उसने एक पहेली को अपनी नज़र में क़ैद कर लिया है। पर सच तो ये था, कि उसने आग को अपने सीने से लगा लिया था। और उस आग का नाम, सिर्फ़ एक लड़की जानती थी।

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