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Chapter 10 of 30

तूफ़ान में साथ

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

रिकॉर्ड वाले उस कमरे में वक़्त जैसे ठहर गया। ... स्लेटी सूट वाले अजनबी का हाथ शारदा की मुट्ठी में दबी उसी फ़ाइल की तरफ़ बढ़ रहा था। ... और उसी पल, अरब सागर के उस पार, उस रात के नसीब तय करने वाले तूफ़ान की पहली गड़गड़ाहट लुढ़क गई।

" हाँ हाँ साहब, अभी निकालती हूँ, अभी।" ... शारदा ने आवाज़ में चालीस बरस की थकी फ़रमाँबरदारी भर ली और अलमारी की तरफ़ लपकी। " इतनी सारी फ़ाइलें हैं बाबू, बुढ़िया की आँखें अब कहाँ पढ़ पाती हैं..."

और उसी अफ़रा-तफ़री की ओट में शारदा के नाख़ून ने वो सर्टिफ़िकेट फ़ाइल से अलग कर लिया, जिस पर छोटे मालिक का आधा-कटा नाम दबा था। ... उसे सीने से लगा कर ब्लाउज़ में छुपाया। ... और बची फ़ाइल, जिसमें अब बस सादा फ़ॉर्म था, उस आदमी के आगे कर दी।

उस आदमी ने फ़ाइल झपट कर खोली और सरसरी नज़र से पन्ने पलटे। ... " अद्विका देशमुख।" ... उसकी उँगली एक पल रुकी, फिर आगे बढ़ गई। " देशमुख... इस शहर में ऐसी लाखों देशमुख हैं। इसमें तो कुछ भी नहीं।"

" और निकाल दूँ बाबू? पूरी अलमारी निकाल देती हूँ।" ... शारदा ने एक साथ दस फ़ाइलें खींच कर मेज़ पर ढेर लगा दिया, ताकि उस बची फ़ाइल पर उसकी नज़र दोबारा न ठहरे। " लीजिए साहब, सब हाज़िर है। इस ग़रीब की जान तो इन्हीं फ़ाइलों में अटकी रहती है।"

" रहने दीजिए, माताजी। सब की तस्वीर मैं ऊपर ले जा कर मिलाऊँगा।" ... उसने पूरा ढेर बग़ल में दबा लिया। " मैनेजमेंट को पिछले दो महीने की हर नई औरत का हिसाब चाहिए। ... एक भी नाम छूटा, तो दोबारा आऊँगा। और अगली बार इतनी आसानी से नहीं।"

दरवाज़ा बंद हुआ, और शारदा के घुटने जवाब दे गए। ... उसने ब्लाउज़ से वो बचाया काग़ज़ निकाला और नन्हे बच्चे की तरह सीने से भींच लिया। ... पर वो जानती थी, गिद्धों के हाथ अब हर नई भरती की तस्वीर लगेगी। ये दीवार बच गई, पर दौड़ बाक़ी थी।

जो तूफ़ान सुबह गुर्रा रहा था, रात होते-होते उसने पूरी मुंबई को जबड़े में ले लिया। ... और उसी रात रेयांश ने शहर के एक भूले कोने की गाड़ी मोड़ी। ... देवनारायण राठौर का पहला होटल, 'पुराना राठौर हाउस', वो कमरा जिससे ये साम्राज्य शुरू हुआ। और परछाईं बनी अद्विका साथ थी।

" सोच रही होगी, इस तूफ़ान में यहाँ क्या करने आए हैं।" ... रेयांश की आँखें सड़क पर जमी थीं। " परसों ट्रस्ट की बैठक है। जयदेव के लोग इस पुराने खंडहर को बेच देना चाहते हैं। ... जिस पत्थर से बूढ़े ने सब खड़ा किया, उसे कौड़ियों में बेच देंगे। मेरे जीते-जी नहीं।"

अद्विका ख़ामोश बाहर देखती रही, पर उसका दिल एक अजीब दर्द से भर आया। ... जिस पहले होटल की बात रेयांश इतनी हसरत से कर रहा था, वो उसके अपने दादा का पहला सपना था। ... और वो आदमी, जिसे कुछ पता नहीं था, उसी की विरासत बचाने जा रहा था।

पुराना राठौर हाउस उन्हें धूल भरी चादरों की ख़ामोशी में निगल गया। ... रेयांश ने अभी तिजोरी से वो काग़ज़ निकाला ही था, कि पूरे शहर की बत्ती गुल हो गई। ... बाहर गली नाला बन गई, गाड़ी फँसी, फ़ोन मर गए, और वो दोनों उस बंद होटल में अकेले क़ैद हो गए।

" रुकिए सर, हिलिए मत।" ... अद्विका ने अँधेरे में टटोल कर एक पुरानी मोमबत्ती और माचिस ढूँढ कर काँपती लौ जला दी। " पुराने होटलों की यही एक अच्छी बात है सर। इनके पास आज भी वो चीज़ें हैं, जो आपके पाँच सितारा जनरेटरों के पास नहीं।"

रेयांश ने उस लौ में उसका चेहरा देखा, और उसके होंठ हल्के से टेढ़े हुए। ... " मोमबत्तियाँ और तुम्हारी ज़बान। ... दोनों ही ज़रूरत से ज़्यादा तेज़ हैं।" ... वो एक धूल भरी कुर्सी पर बैठ गया, और पहली बार उसके कंधे झुक गए।

मोमबत्ती की लौ ने उस पुराने खाने के कमरे को हिला दिया, जहाँ कभी पहली मेज़ लगी थी। ... बाहर तूफ़ान गरज रहा था, और अंदर उस अकेलेपन में महल का वो ठंडा शहज़ादा धीरे-धीरे पिघलने लगा।

" इसी कमरे में बूढ़े ने मुझे उठाया था।" ... रेयांश की आवाज़ अचानक बहुत दूर से आती लगी। " सात-आठ साल का था। यतीम, भूखा, इसी होटल के पीछे कूड़े में खाना ढूँढता। ... और देवनारायण राठौर मुझे उठा कर अंदर ले आए, खाना खिलाया, और फिर कभी वापस नहीं जाने दिया।"

अद्विका ने एक जग से पानी उँडेल कर उसके आगे रखा, वही काम जो वो रोज़ करती थी। ... " तो उन्होंने आपको बेटा बना लिया, सर।" ... और ये कहते हुए उसे अजीब लगा, कि वो बूढ़ा उसका अपना दादा था, जिससे वो कभी मिली ही नहीं।

" बेटा।" ... रेयांश ने वो लफ़्ज़ ऐसे दोहराया जैसे उसका वज़न तोल रहा हो। " सबसे भारी क़र्ज़ वो होता है जो चुकाया न जा सके। ... जो कुछ मैं हूँ, सब उस मरे हुए आदमी का दिया है। ... और एहसान की ये ज़ंजीर मेरे गले में इतनी कसी है कि साँस भी उसी का उधार लगती है।"

और अद्विका ने उस घमंडी सीईओ के पीछे फिर वही थका इंसान देखा, जो एक डूबते साम्राज्य को अकेले अपने कंधों पर उठाए खड़ा था, एक मरे हुए बाप का दिया बोझ, जिसे उतारना उसे बेवफ़ाई लगती थी।

" और सबसे बुरा मज़ाक़ ये है, अद्विका।" ... " बूढ़े ने अपनी वसीयत में कहीं एक नाम छुपा रखा है। कोई वारिस, जिसे मैंने कभी देखा नहीं। ... वो किसी भी दिन इस दरवाज़े से अंदर आ सकता है, और ये सब कुछ, जिसके लिए मैंने ख़ून जलाया, एक पल में उसका हो जाएगा।"

और अद्विका, वो गुमनाम वारिस जिसके डर की बात रेयांश कर रहा था, चेहरा पत्थर बनाए उसके सामने खड़ी रही। ... उसका सबसे बड़ा डर उसी कमरे में उसकी मोमबत्ती जला रहा था, और वो जानता तक नहीं था।

" और अगर वो वारिस... सच में इस सबका हक़दार हुआ तो, सर?" ... अद्विका की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें कुछ था जो नौकरानी की नहीं था। " शायद उस बूढ़े ने उसे यूँ ही नहीं चुना। शायद वो किसी का पुराना क़र्ज़ चुका रहा था।"

रेयांश ने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा, वैसे ही जैसे पहले बैंक्वेट हॉल में देखा था। ... " एक वेट्रेस... वसीयतों और हक़ की बात यूँ करती है, जैसे उसने ख़ुद कोई साम्राज्य खोया हो।" ... अद्विका का दिल एक धड़कन को रुक गया।

" हम ग़रीबों का भी एक साम्राज्य होता है सर, दो वक़्त की रोटी और थोड़ी सी इज़्ज़त।" ... अद्विका ने नज़रें झुका लीं। " और वो भी अक्सर आप जैसे बड़े लोग छीन लेते हैं।"

रेयांश हँसा, पर उस हँसी में ख़ुशी नहीं थी। ... " इज़्ज़त। ... इस चेन के अंदर ही कोई है, अद्विका, जो बरसों से इसे अंदर से खा रहा है। कोई बड़ा हाथ, ऊपर तक पहुँचा हुआ। ... मैं उसकी परछाईं देख सकता हूँ, पकड़ नहीं पाता। और उसी बीच ये गिद्ध बाहर से नोच रहे हैं।"

और अद्विका उस परछाईं की शक्ल जानती थी, जिसे रेयांश पकड़ नहीं पा रहा था, क्योंकि तहख़ाने से उसने वो सिरा ख़ुद देखा था, सब किसी बड़े बाबू की जेब में जाता। ... पर उसे बताना, अपना चेहरा खोलना था। और वो लफ़्ज़ भी उसने पी लिया।

" सर... जो अंदर से खाता है, वो अक्सर सबसे भरोसेमंद चेहरे के पीछे छुपता है।" ... उसने बस इतना कहा। " जिस पर आपको सबसे कम शक हो, हिसाब की किताब वहीं से शुरू कीजिएगा।"

रेयांश देर तक लौ के पार उसे देखता रहा। ... " इस पूरे महल में, जहाँ हर मुस्कान के पीछे छुरी है... एक अकेला सच्चा चेहरा मुझे एक वेट्रेस का मिला है।" ... और ये भरोसा अद्विका को किसी ख़ंजर से गहरा काट गया, क्योंकि वही चेहरा सबसे बड़ा झूठ बोल रहा था।

" आप इतना अकेले क्यों लड़ते हैं, सर?" ... बाहर बिजली कड़की, और अद्विका को विश्वनाथ की घड़ी याद आई, साल पूरा होने में अब भी तीन सौ से ऊपर रातें, इसी आदमी के साथ, जिसे उसे एक दिन तबाह करना था।

" क्योंकि अगर मैंने ये छोड़ दिया, तो उस बूढ़े का दिया सब कुछ, उन गिद्धों का हो जाएगा।" ... रेयांश ने सिर पीछे टिका दिया। " और शायद इसलिए भी, कि इस होटल के सिवा मेरा है ही कौन। ... न माँ, न बाप, न कोई अपना। बस ये दीवारें।"

और अद्विका के अंदर कुछ पिघल कर उस अकेले आदमी की तरफ़ बहने लगा, जिसे उसने अब तक दुश्मन समझा था। ... और उन दोनों के बीच की दूरी हर लफ़्ज़ के साथ घटती जा रही थी।

लौ एक झोंके से लड़खड़ाई, और अद्विका उसे बचाने को आगे झुकी, ठीक उसी पल जब रेयांश भी उठा। ... और अचानक वो दोनों उस नन्ही लौ के दोनों ओर, बहुत क़रीब, आमने-सामने थे। " सर... मोमबत्ती..."

रेयांश का हाथ, बेसाख़्ता, मोमबत्ती थामे उसके हाथ पर आ ठहरा। ... इस बार उसने उसे हटाया नहीं। " रहने दो।" ... उसकी आवाज़ भर्रा गई थी। "बहुत दिनों से... किसी के इतने पास खड़ा नहीं हुआ।"

जो रेयांश अपने नौकरों को इंसान भी नहीं समझता था, उसकी उँगलियाँ अब एक नौकरानी के हाथ पर काँप रही थीं। ... और अद्विका, जिसे पीछे हटना चाहिए था, हिल न सकी, दोनों की साँसें उस लौ पर आ कर मिल रही थीं।

" सर, ये... ठीक नहीं है।" ... पर उन लफ़्ज़ों में कोई ताक़त नहीं थी। ... और वो, अपनी ही बात काटती हुई, दूर जाने के बजाय एक इंच और क़रीब झुक गई।

" तो पहली बार... मैं कुछ ग़लत ही सही।" ... रेयांश की नज़र उसके होंठों पर उतर आई, और उनके बीच बस एक साँस की दूरी रह गई। ... उस एक पल में महल, वसीयत, गिद्ध, सब कुछ उस अँधेरे में घुल गया।

और ठीक उसी पल, जब उनके होंठ एक धड़कन की दूरी पर थे... ... पूरे शहर की बत्ती एक साथ, एक गरज के साथ, वापस जल उठी।

जनरेटर गरजे, पुराने होटल के झूमर एक झटके से रौशन हो गए, और वो नर्म अँधेरा, जिसने उन्हें छुपा रखा था, फट गया। ... दोनों बिजली की तरह अलग छिटक गए, हाँफते हुए, उस बात से हिले जो होते-होते रह गई।

और उसी कच्ची, अचानक रौशनी में, होटल का बड़ा दरवाज़ा एक झोंके से खुला। ... दहलीज़ पर मल्विका खड़ी थी, बारिश में भीगी, आँखों में बर्फ़। ... उसकी नज़र उस अकेली मोमबत्ती, उन दो हाँफते चेहरों, और हवा में तैरती गर्मी को तौल गई।

" अच्छा। ... तो पूरा शहर डूब रहा था, और हमारे सीईओ साहब यहाँ, एक नौकरानी के साथ, मोमबत्ती जला रहे थे।" ... मल्विका की मुस्कान बर्फ़ जैसी ठंडी थी। " मैं तुम्हें ढूँढते-ढूँढते तूफ़ान चीर आई, रेयांश। ... और आज मुझे तुम्हें बचाने की और भी वजहें मिलीं।"

मल्विका की नज़र अद्विका के चेहरे पर एक पल ठहरी, उस ख़तरे को पहचानती जिसे वो पहले ही भाँप चुकी थी। ... और दोनों उस अधूरे बोसे से हिले खड़े थे, उस बात से डरे जो होते-होते रुकी, और इससे भी ज़्यादा कि वो कितना चाहते थे कि वो न रुकती। ... और उनके बीच मुस्कुराती वो दुश्मन खड़ी थी, जिसके हाथ अब एक नया हथियार लग चुका था।

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