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Chapter 2 of 30

एक साल की शर्त

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

बारिश थम चुकी थी, पर हवा में अब भी उसकी नमी बसी थी। और फ़ोर्ट के एक पुराने वकील-दफ़्तर में, धूल और सीलन भरी फ़ाइलों की महक के बीच, एक आवाज़ गूँजी। तीखी, और इनकार से भरी।

"एक साल?! ... आप कह रहे हैं कि मैं उसी होटल में, उन्हीं लोगों के आगे, पूरे एक साल तक फ़र्श घिसूँ? ... जिन्होंने कल रात मुझे कुत्ते की तरह बाहर फेंका?"

"मैं नहीं कह रहा, बेटी। ... देवनारायण राठौर की वसीयत कह रही है। ... और वसीयत से बहस नहीं होती। उससे बस सहमत या असहमत हुआ जाता है।"

बूढ़े वकील ने चश्मा नाक पर टिकाया, और वसीयत का वो मोटा पन्ना ऐसे उठाया जैसे कोई हकीम कोई बहुत कड़वी दवा उठाता है।

"शर्त, पहली। वारिस, यानी तुम, राठौर ग्रैंड में पूरे एक साल काम करेगी। सबसे नीचे के दर्जे से। एक आम नौकर की तरह, जिसे कोई नहीं जानता।"

"और दूसरी?"

"दूसरी... इस पूरे साल किसी को कानोंकान ख़बर नहीं होगी कि तुम कौन हो। न तुम्हारा असली नाम, न तुम्हारा ख़ून, न ये कि तुम किसकी वारिस हो। ... तुम गुमनाम रहोगी। बिल्कुल गुमनाम।"

अद्विका के होंठों पर एक कड़वी सी हँसी तैर गई।

"वाह। ... मरते हुए दादाजी ने अपनी पोती के लिए क्या ख़ूब तोहफ़ा छोड़ा है। ... एक पूरा महल, जिसमें उसे नौकरानी बन कर रहना है।"

"और ये सबसे ज़रूरी बात सुन लो। ... अगर तुमने एक बार भी, सिर्फ़ एक बार भी अपना असली नाम ज़ाहिर कर दिया... तो वसीयत उसी घड़ी रद्द हो जाएगी।"

"रद्द? ... मतलब क्या है इसका?"

"मतलब, ये पूरा साम्राज्य, ये पूरी चेन, एक-एक ईंट, चली जाएगी देवनारायण के छोटे भाई के पास। जयदेव राठौर। ... और उसके पीछे खड़े गिद्धों के पूरे झुंड के पास।"

जयदेव राठौर। अद्विका ने वो नाम पहली बार सुना था। पर विश्वनाथ के कहने के अंदाज़ में ही उस नाम का सारा ज़हर घुला हुआ था।

"वो लोग बरसों से इस चेन पर गिद्ध की तरह मँडरा रहे हैं। ... देवनारायण के मरते ही वो वसीयत तुड़वाने कोर्ट जा पहुँचे हैं। उन्हें बस एक बहाना चाहिए। एक ग़लती। ... और वो ग़लती, बेटी, तुम्हारा सिर्फ़ एक शब्द है।"

अद्विका कुछ नहीं बोली। वो खिड़की की तरफ़ मुड़ गई, जहाँ बाहर गीली सड़क पर शहर फिर से रेंगने लगा था। विश्वनाथ ने एक पल उसे देखा, फिर बहुत आहिस्ता से एक और काग़ज़ बढ़ाया। पीला पड़ा हुआ, तह किया हुआ, हाथ से लिखा।

"ये वसीयत नहीं है। ... ये उनकी चिट्ठी है। देवनारायण ने अपने आख़िरी दिनों में, अपने काँपते हाथों से, सिर्फ़ तुम्हारे लिए लिखी थी। ... पढ़ोगी?"

अद्विका वो चिट्ठी नहीं लेना चाहती थी। पर उसका हाथ, उसके मन से पहले, आगे बढ़ गया। काग़ज़ पुराना था, और उस पर लिखे अक्षर एक बूढ़े, थके हुए हाथ के थे।

"मेरी बच्ची... तू मुझे नहीं जानती। और शायद जान कर मुझसे नफ़रत ही करेगी। ... और सच कहूँ, तो तुझे उसका पूरा हक़ है।"

"मेरा एक ही बेटा था। तेरा बाप। ... और मैंने अपने ग़ुरूर में, अपने ही हाथों उसे ख़ुद से दूर कर दिया। एक झगड़ा हुआ, और मेरी ज़िद जीत गई। ... मेरा बेटा हार गया।"

"मैंने सोचा वो लौट आएगा। माफ़ी माँग लेगा। ... वो कभी नहीं लौटा। और जब मैंने उसे ढूँढना शुरू किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वो जा चुका था। ग़रीबी में, गुमनामी में, मुझसे नाराज़।"

अद्विका के हाथ में वो काग़ज़ हल्का सा काँपा। ये वो कहानी थी जो उसकी माँ ज़िंदगी भर नहीं बता पाई। उसका बाप, जिसका उसे आज तक चेहरा तक नहीं दिखा।

"अपने बेटे से मैं कभी माफ़ी नहीं माँग सका। पर तू उसकी निशानी है। तू है, तो शायद उसका कुछ हिस्सा अब भी इस दुनिया में है। ... इसलिए ये सब तेरा है, बच्ची। ये कोई इनाम नहीं। ये एक बूढ़े की माफ़ी है।"

"पर मैं चाहता हूँ, तू ये ताज पहनने से पहले उसकी क़ीमत जान ले। वो ताज, जो मैंने तेरे बाप को कभी नहीं पहनने दिया। ... इसलिए एक साल, सबसे नीचे से। ताकि तू अपनी आँखों से देख ले कि मेरे अपने, असल में कौन हैं।"

चिट्ठी वहीं ख़त्म हो जाती थी। नीचे एक काँपते हाथ के दस्तख़त। देवनारायण राठौर। और अद्विका को समझ नहीं आ रहा था कि वो इस अजनबी बूढ़े पर आग बरसाए, या फूट-फूट कर रोए।

"बहुत आसान है, ना? ... मर कर एक चिट्ठी छोड़ देना। सारी उम्र का पछतावा एक काग़ज़ में लपेट कर, पोती के गले में डाल देना।"

"जब मेरी माँ दो-दो घरों के बर्तन माँज कर मुझे और सोनू को पाल रही थी... तब कहाँ था ये साम्राज्य? कहाँ थे ये दादाजी? ... अब, जब सब कुछ लुट चुका है, तब आई है ये वसीयत।"

कहते-कहते अद्विका का हाथ अनजाने में फिर उसी लॉकेट पर चला गया। और इस बार, पहली बार, उसके मन में एक अजीब सा ख़याल कौंधा। कहीं इसमें बंद वो धुँधला चेहरा...

विश्वनाथ की नज़र फिर उस लॉकेट पर आ ठहरी। कुछ था जो वो जानता था। और कुछ था जो वो अभी ज़ुबान पर नहीं लाना चाहता था। उसने बस इतना कहा,

"कुछ चेहरे, बेटी, हम उम्र भर अपने सीने से लगाए घूमते हैं, ये जाने बिना कि वो किसके हैं। ... वक़्त आने पर, सब पता चलेगा। ... अभी नहीं।"

अद्विका ने लॉकेट वापस अपने कुर्ते में छुपा लिया, और अपनी आवाज़ में फिर से लोहा भर लिया।

"और वो आदमी? ... जिसने कल रात मुझे 'पैरों की धूल' कहा। जिसने भरी महफ़िल में मेरा बिल्ला उतरवाया। रेयांश सिंघानिया। ... इस पूरे तमाशे में वो कहाँ खड़ा है?"

एक पल के लिए विश्वनाथ ख़ामोश रहा। फिर उसने चश्मा उतारा, आँखें मलीं, और बहुत आहिस्ता से बोला।

"रेयांश सिंघानिया। ... देवनारायण ने उसे सड़क से उठाया था। एक अनाथ लड़का, जिसे उन्होंने अपने बेटे की तरह पाला। ... और आज पूरी दुनिया यही समझती है कि इस चेन का अगला मालिक वही है।"

"मालिक..."

"जिस कुर्सी पर वो आज बैठा है, बेटी... वो कुर्सी असल में तुम्हारी है। ... जिस दिन तुम अपना नाम वापस लोगी, उस दिन उसके पैरों तले से ये सारी ज़मीन खिसक जाएगी। ... उसके पास कुछ नहीं बचेगा। कुछ भी नहीं।"

और तब अद्विका के होंठों पर एक बहुत महीन, बहुत ठंडी मुस्कान तैर गई। जिस आदमी ने उसे धूल कहा था... वो एक दिन उसी धूल के आगे बेघर खड़ा होगा। और उसे इसकी भनक तक नहीं होगी।

उस शाम अद्विका पटरी के उस पार, शहर के एक भूले-बिसरे कोने में, अपने किराए के छोटे से कमरे में लौटी। और दरवाज़ा खोलते ही, एक पूरा तूफ़ान उस पर टूट पड़ा। जिसका नाम था, जूही।

"कहाँ थी तू?! ... रात भर फ़ोन बंद, सुबह से नदारद! मैं तो बस पुलिस को फ़ोन करने ही वाली थी! ... और ये क्या हुलिया बना रखा है? कल वाली वर्दी में ही घूम रही है? ड्यूटी पे नहीं गई क्या आज?"

अद्विका कुछ कहती, उससे पहले ही जूही ने उसका हाथ पकड़ कर उसे अंदर खींच लिया, उसके गीले, उलझे बाल देखे, और उसका अपना चेहरा एकदम उतर गया।

"रुक ज़रा... तेरी वर्दी से बिल्ला कहाँ गया? ... अद्विका। ... उन्होंने तुझे निकाल दिया, है ना?"

अद्विका में इतनी हिम्मत नहीं थी कि बता पाती, उसे कैसे निकाला गया। कि कैसे सैकड़ों लोगों के सामने उसे पैरों की धूल कहा गया। उसने बस हल्के से सिर हिला दिया।

"वो... वो घमंडी, दौलत के नशे में चूर लोग! ... तूने उस होटल के लिए अपनी जान लगा दी, अद्विका! रात-रात भर! और उन्होंने तुझे एक झटके में बाहर फेंक दिया? ... सुन ले, ऐसे लोगों को ना, ऊपर वाला ख़ुद अपने हाथों से सज़ा देता है।"

अद्विका ने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोकी। ऊपर वाले की सज़ा। ... अगर जूही को ज़रा भी अंदाज़ा होता कि वो सज़ा इस वक़्त उसी के कमरे में, गीले बालों के साथ, उसकी चाय का इंतज़ार कर रही है।

"चल बैठ। ... मैं चाय चढ़ाती हूँ। और सुन, ये रोना-धोना बिल्कुल नहीं। कल हम दोनों मिल कर नई नौकरी ढूँढेंगे। सामने वाली मीना दीदी बता रही थी, माहिम में एक नया कैफ़े खुला है..."

"जूही... एक बात पूछूँ? ... अगर तेरे पास कोई ऐसी चीज़ हो, जो असल में तेरी है, पर उसे वापस पाने के लिए तुझे उन्हीं लोगों के आगे झुकना पड़े, जिन्होंने तुझे कुचला था... तो तू क्या करती?"

जूही एक पल के लिए रुकी, हाथ में अदरक कूटते-कूटते। फिर वो पलटी, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो अद्विका को हमेशा से उससे बाँधे रखती थी। सीधी-सादी, ज़िद्दी ईमानदारी।

"देख। जो मेरा है, वो मेरा है। ... झुकना पड़े, रेंगना पड़े, नाटक करना पड़े, जो भी करना पड़े। ... पर मैं अपनी चीज़ उन कमीनों के हाथ में सिर्फ़ इसलिए नहीं छोड़ दूँगी कि उन्होंने मुझे एक बार कुचला था। ... कुचला है ना? तो अब उठूँगी भी उन्हीं के आँगन में।"

"पर ये सब ऊँची-ऊँची बातें छोड़। ... तेरे पास ऐसा है भी क्या जो किसी बड़े आदमी का माल हो? ... तेरे पास तो कुल जमा एक टूटा फ़ोन है, और मैं। ... बस।"

अद्विका हँस दी। पर उस हँसी के पीछे, कहीं गहरे, कुछ बदल रहा था। जूही को ख़बर तक नहीं थी कि उसने अभी-अभी अपनी सबसे अच्छी दोस्त के अंदर एक चिंगारी सुलगा दी है। ... जो मेरा है, वो मेरा है।

उस रात अद्विका देर तक छत को घूरती रही। एक तरफ़ था उसका ग़ुरूर, जो चीख़-चीख़ कर कह रहा था, उस नरक में दोबारा कदम मत रखना। और दूसरी तरफ़ थी वो चिंगारी। ... सोनू की अधूरी फ़ीस। और वो हज़ारों लोग, जिनके चूल्हे उस चेन से जलते थे।

अगली सुबह अद्विका फिर विश्वनाथ के दफ़्तर में खड़ी थी। पर आज उसकी आँखों में रात भर की थकान नहीं थी। एक अजीब सी ठंडक थी। उसने वो लिफ़ाफ़ा, वो वसीयत उठाई, और सीधे वकील की आँखों में देखा।

"एक शर्त पर मैं ये सब मंज़ूर करूँगी, वकील साहब।"

"शर्त? ... बेटी, वसीयत तुम पर शर्तें रखती है। तुम वसीयत पर नहीं।"

"ये शर्त उस काग़ज़ से नहीं है। ... ख़ुद से है। मैं ये साल पूरा करूँगी। गुमनाम रहूँगी। सबसे नीचे से, फ़र्श से शुरू करूँगी। ... पर इसलिए नहीं कि मुझे ये महल चाहिए।"

"तो फिर किसलिए?"

"इसलिए कि जिस दिन मैं अपना नाम वापस लूँगी... उस दिन इस पूरे राठौर ग्रैंड को पता चलेगा कि जिसे उन्होंने पैरों की धूल कहकर निकाला था, इस महल की मालकिन वही थी। ... हर रोज़। हर सुबह। उनकी आँखों के ठीक सामने।"

विश्वनाथ ने काँपते हाथों से क़लम आगे बढ़ाई। अद्विका ने वसीयत का वो पन्ना अपनी तरफ़ खींचा, जहाँ 'स्वीकृति' के नीचे एक ख़ाली लकीर बरसों से उसका इंतज़ार कर रही थी।

एक पल को उसका हाथ ठिठक गया। उस लकीर पर दस्तख़त का मतलब था, अद्विका देशमुख को एक पूरे साल के लिए ज़िंदा दफ़ना देना। दोबारा, अपनी मर्ज़ी से, किसी की कुछ न बनना।

"माफ़ कर देना, माँ। ... एक साल के लिए, मुझे एक बार फिर 'कोई नहीं' बनना पड़ेगा।"

और फिर उसने दस्तख़त कर दिए। अद्विका देशमुख। अपने असली नाम, राठौर को, उसने अपने ही हाथों उस काग़ज़ की एक लकीर के नीचे दफ़ना दिया।

फिर उसने अपना वही टूटा हुआ मोबाइल निकाला। राठौर ग्रैंड की वेबसाइट खोली। 'करियर' का पन्ना। ... 'हाउसकीपिंग और सर्विस स्टाफ़, नई भर्ती।' और वो एक नए इंटरव्यू की दरख़्वास्त भरने लगी।

नाम के ख़ाने में उसने लिखा, अद्विका देशमुख। ... वही लड़की, जिसे कल रात इसी होटल ने कुत्ते की तरह बाहर फेंका था, आज उसी होटल की सबसे नीची नौकरी के लिए, दोबारा हाथ जोड़ कर दरख़्वास्त दे रही थी।

"तुम्हें अंदाज़ा है, तुम क्या करने जा रही हो, बेटी? ... तुम अपने पैरों से चल कर, शेरों की माँद में वापस जा रही हो।"

"नहीं, वकील साहब। ... मैं शेरों की माँद में नहीं जा रही। ... मैं अपनी माँद में वापस जा रही हूँ। ... फ़र्क़ बस इतना है, कि अभी शेरों को नहीं पता कि माँद असल में किसकी है।"

और अद्विका ने 'भेजें' का बटन दबा दिया। ... दरख़्वास्त चली गई। उसी घड़ी, एक साल का वो ख़ामोश खेल शुरू हो गया। जिस दरवाज़े ने कल रात उसे धक्के देकर बारिश में फेंका था, अद्विका देशमुख कल सुबह, अपनी मर्ज़ी से, मुस्कुराते हुए, उसी दरवाज़े से अंदर जाने वाली थी। ... इस बार, हमेशा के लिए वापस लेने, जो उसका था।

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