DesiHub

Chapter 8 of 30

गिद्धों की उड़ान

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

उस सुबह राठौर ग्रैंड के संगमरमरी दरवाज़ों के सामने काली गाड़ियों का एक लंबा काफ़िला आ कर रुका, और होटल के बूढ़े दरबान की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई। ... जिस आदमी के लिए वो दरवाज़े खुले थे, वो कोई मेहमान नहीं था। वो जयदेव राठौर था, देवनारायण का छोटा भाई, उस गिद्धों की शाख़ का सरदार जो भाई की मौत के बाद से इस डूबते साम्राज्य पर मंडरा रहा था। ... और आज वो मंडरा नहीं रहा था। आज वो उतर रहा था।

ऊपर सबसे आलीशान सुइट में, जयदेव मख़मल की एक ऊँची कुर्सी में धँसा बैठा था, और उसकी बेटी मल्विका उसके सामने आ खड़ी हुई। ... एक मामूली वेट्रेस के हाथों भरी लॉबी में मिली वो मात, अब भी उसकी आँखों में सुलग रही थी।

"एक लड़की है, पापा।" ... मल्विका ने बिना कोई भूमिका बाँधे कहा, आवाज़ में एक बारीक धार। "एक मामूली नौकरानी। पर उसकी आँखों में वो ठहराव है जो नौकरों में नहीं होता। ... रेयांश की सख़्त नज़र उस पर आ कर नरम पड़ जाती है, और उसकी उँगलियाँ इस होटल के हिसाब-किताब तक पहुँच रही हैं।" ... "मैंने उसे तोड़ने की कोशिश की। वो टूटी नहीं। उसने भरी लॉबी में मुझे मात दे दी।"

"एक नौकरानी?" ... जयदेव हल्के से हँसा, और वो हँसी किसी ठंडे तहख़ाने से उठती हुई लगी। "बेटी, तू शेर के शिकार पर निकली है, और तेरी नज़र एक चींटी पर अटक गई है।" ... उसने आगे झुक कर कहा, हर लफ़्ज़ शहद में लिपटा। "मुझे इस होटल की एक वेट्रेस से कोई मतलब नहीं। मुझे तो ये पूरा राठौर ग्रैंड चाहिए, ईंट से ईंट तक। ... और उसे लेने का वक़्त अब आ गया है।"

"अदालत?" ... मल्विका की आँखें सिकुड़ीं। "पर वसीयत तो सील है, पापा। और चाचाजी ने उसमें किसी वारिस का नाम रख छोड़ा है। जब तक वो सील नहीं टूटती..."

"नाम रखा है, पर आज तक सामने कोई नहीं आया।" ... जयदेव उठ खड़ा हुआ और खिड़की से मुंबई के उस समंदर को देखने लगा जो कभी उसके भाई का था। "मेरे वकील कल अदालत में एक ही बात कहेंगे। ... कि ये गुमनाम वारिस वाली शर्त एक फ़रेब है, एक बूढ़े, सठियाए आदमी की आख़िरी सनक। और अगर ये वारिस इतना ही सच्चा है, तो सामने आ कर अपना दावा क्यों नहीं करता?"

उसने पलट कर देखा, आँखों में बर्फ़। "क़ानून साफ़ कहता है। अगर साल पूरा होने तक कोई वारिस अपना दावा ले कर सामने न आया, तो ये पूरी चेन मेरी। ... और साल ख़त्म होने में अभी तीन सौ चवालीस दिन बाक़ी हैं।" ... वो धीरे से मुस्कुराया। "मैं इंतज़ार कर सकता हूँ, बेटी। हर बीतता दिन मेरा है। जितना ये वारिस छुपा रहेगा, उतना ही ये महल मेरी मुट्ठी में उतरता जाएगा।"

मल्विका के होंठों पर एक ठंडी मुस्कान फैल गई। "और अगर ये वारिस साल पूरा होने से पहले सामने आ गया, पापा? ... तब?"

जयदेव की मुस्कान ज़रा भी नहीं हिली। "तो हम ये पक्का कर देंगे कि वो सामने आ ही न पाए।" ... "हर वारिस के दो ही अंजाम होते हैं, बेटी। या तो वो ताज पहनता है... या वो ग़ायब हो जाता है। और ग़ायब होना, हमेशा हमारे हाथ में रहता है।"

जयदेव के वकीलों की वो अर्ज़ी अगली सुबह अदालत में दाख़िल हुई, और उसकी ख़बर राठौर ग्रैंड में किसी ठहरे पानी में गिरे पत्थर की तरह फैल गई। ... और उस ख़बर के दो पाटों के बीच सबसे बुरी तरह जो आदमी पिसा, वो रेयांश सिंघानिया था।

बोर्डरूम की लंबी मेज़ के सिरे पर खड़ा रेयांश, अदालत के उस नोटिस को घूर रहा था, जब दरवाज़ा खुला और जयदेव अपनी उसी मख़मली चाल से अंदर दाख़िल हुआ, मल्विका उसके पीछे किसी परछाईं की तरह। ... जयदेव बिन बुलाए एक कुर्सी खींच कर बैठ गया, जैसे कमरा पहले से उसका हो।

"रेयांश, बेटा।" ... जयदेव ने बड़े अपनेपन से कहा, और वो अपनापन किसी छुरी की धार जैसा था। "इतने बरस से इस साम्राज्य की चौकीदारी कर रहे हो। थक गए होगे। ... आख़िर एक अनाथ लड़के के कंधों पर मेरे भाई ने कितना बड़ा बोझ लाद दिया था, है ना?" ... "अब वक़्त आ गया है कि ये बोझ अपने ख़ून के हाथ में लौट आए।"

रेयांश की आवाज़ में बर्फ़ थी। "ये कुर्सी आपके ख़ून की नहीं, जयदेवजी। ये देवनारायण राठौर की वसीयत की है।" ... उसने नोटिस मेज़ पर पटका। "और वो वसीयत सील है, क़ानूनी है, और उसका एक-एक लफ़्ज़ विश्वनाथजी के पास महफ़ूज़ है। आपको इस महल की एक चाबी तक नहीं मिलेगी।"

"वसीयत।" ... जयदेव धीरे से हँसा। "एक गुमनाम वारिस के नाम की वसीयत, जिस वारिस को आज तक किसी ने देखा तक नहीं। ... ज़रा सोचो, बेटा। तुम्हारे सामने दो ही रास्ते हैं।" ... उसने उँगलियों पर गिना, आवाज़ शहद में डूबी। "या तो ये वारिस झूठा है, और तब ये पूरी चेन मेरी। या फिर ये वारिस सच्चा है। और जिस दिन वो दरवाज़े से अंदर आया, उस दिन तुम, रेयांश सिंघानिया, इस महल में एक नौकर से ज़्यादा कुछ नहीं रहोगे।"

जयदेव आगे झुका, आवाज़ शहद में डूबी। "दोनों रास्तों पर तुम हारते हो, बेटा। ... पर मेरे साथ आ जाओ, इस डूबती वसीयत को तुड़वाने में मेरा हाथ थाम लो, तो कम से कम ये कुर्सी तो बची रहेगी। मैं तुम्हें एक नौकर से मालिक बना दूँगा।"

और यही वो सच था जिसने रेयांश को दो पाटों के बीच जकड़ रखा था। ... एक तरफ़ ये गिद्ध, जिनसे उसे नफ़रत थी। और दूसरी तरफ़ वो गुमनाम वारिस, जिसका डर उसकी हर बेख़्वाब रात में उसके सिरहाने बैठा रहता था। ... दोनों ही उससे उसका सब कुछ छीन सकते थे। और वो नहीं जानता था कि किससे ज़्यादा डरे।

"मैं आपका कोई रास्ता नहीं चुनता, जयदेवजी।" ... रेयांश ने सीधे उसकी आँखों में देखा। "मैं इस चेन को उस दिन तक अपने कंधों पर उठाऊँगा, जिस दिन इसका असली वारिस आ कर इसकी बागडोर सँभाल ले। ... और अगर वो सच में कहीं है, तो सुन लीजिए, मैं उसे ढूँढ निकालूँगा। आपसे पहले।"

जयदेव उठा, और उसकी मुस्कान और गहरी हो गई। "ढूँढ लो, बेटा। ज़रूर ढूँढ लो।" ... दरवाज़े पर रुक कर उसने पलटे बिना कहा। "पर याद रखना। जिस वारिस को तुम बचाने के लिए ढूँढ रहे हो, वही एक दिन तुम्हारा गला काटेगा। ... और घड़ी चल रही है, रेयांश। टिक... टिक... टिक। हर बीतता दिन, मेरा है।"

उस रात रेयांश देर तक अकेला अपने दफ़्तर में बैठा रहा, मेज़ पर वही दो पुराने बिल, वही काला कुआँ जिसमें हर महीने करोड़ों गिर रहे थे। ... और पहली बार उसे लगा कि शायद ये अंदर की लूट और ये बाहर के गिद्ध, दोनों के तार कहीं एक ही हाथ में जा कर जुड़ते हैं। ... उसने ठान लिया, वो चेन के अपने जासूस उसी गुमनाम वारिस को ढूँढने पर लगा देगा, जयदेव के उस तक पहुँचने से पहले।

और अगली सुबह, जब पहली रौशनी उसके फ़्लोर की ऊँची खिड़कियों पर फिसली, वही लड़की उसकी कॉफ़ी ले कर उसके पीछे आ खड़ी हुई जिसे वो पूरी रात ढूँढने की ठान रहा था। ... अद्विका ने चुपचाप प्याला उसकी मेज़ पर रखा, और सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि जिस गुमनाम वारिस के डर से ये आदमी रात भर सोया नहीं, वो उसी की कॉफ़ी में चीनी घोल रही थी।

रेयांश ने खिड़की से बाहर, जागते शहर को देखते हुए कहा, आवाज़ में एक थकान जो हुक्म की नहीं थी। "एक अजीब बात बताऊँ, अद्विका?" ... "इस पूरे महल में, कहीं एक सील बंद काग़ज़ पर एक नाम लिखा है। एक अजनबी का नाम, जिसे मैंने कभी देखा नहीं। ... और वो नाम, किसी भी दिन, इस दरवाज़े से अंदर आ कर, मेरे हाथ से ये सब कुछ छीन सकता है। जो मैंने अपना ख़ून जला कर खड़ा किया, एक अजनबी बस अपना नाम बता कर ले जाएगा।"

अद्विका का हाथ प्याले पर एक पल को ठहर गया, फिर उसने बड़ी नरमी से कहा, आवाज़ में कोई कँपकँपी नहीं। "जो चीज़ किसी की अपनी होती है, सर, वो सच में उसी की होती है। काग़ज़ पर चाहे कोई भी नाम लिखा हो।" ... उसने नज़र झुकाए रखी। "और क्या पता, वो अजनबी आपसे ये महल छीनने न आ रहा हो। शायद वो तो बस अपना खोया हुआ नाम वापस लेने आ रहा हो।"

रेयांश ने पलट कर उसे एक अजीब नज़र से देखा, जैसे किसी नौकरानी के मुँह से निकले ये लफ़्ज़ उसे किसी गहरी जगह छू गए हों। "अपना खोया हुआ नाम..." ... उसने धीरे से दोहराया। फिर उसकी आँखों में वही पुरानी सख़्ती लौट आई। "नाम और साम्राज्य, अद्विका, इस दुनिया में दोनों एक ही चीज़ हैं। ... और मैंने अपने जासूस उस नाम के पीछे लगा दिए हैं। जो भी वो वारिस है, मैं उस तक जयदेव से पहले पहुँचूँगा।"

और अद्विका वहीं, ट्रे हाथ में थामे, एक पल को पत्थर हो गई। क्योंकि अब उसका अपना जाल पूरी क्रूर शक्ल में उसके सामने खड़ा था। ... अगर उसने अपना नाम बताया, तो वसीयत की शर्त उसी पल टूट जाएगी, और सब कुछ जयदेव का। और अगर वो गुमनाम रहते हुए पकड़ी गई, तो इन्हीं गिद्धों के हाथ। ... नाम बताना एक मौत थी, और गुमनाम पकड़ा जाना, उससे भी बड़ी।

"मिल जाएगा आपको वो वारिस, सर।" ... अद्विका ने ट्रे उठाते हुए, बहुत धीमे से कहा, और उसके होंठों पर एक ऐसी परछाईं थी जो मुस्कान भी नहीं थी। "जिस दिन उसे ख़ुद सामने आना होगा, वो आ जाएगा। एक पल पहले नहीं, एक पल बाद नहीं।" ... और वो ख़ाली प्याला उठा कर, अपनी वर्दी में, फिर से एक मामूली परछाईं बन कर, दरवाज़े से बाहर निकल गई।

और उस दिन के बाद राठौर ग्रैंड की दीवारों के पीछे एक अजीब शिकार शुरू हुआ। दो अलग-अलग जासूस, दो अलग मालिकों के, एक ही परछाईं को ढूँढ रहे थे, रेयांश के आदमी, और जयदेव के। ... और उस लड़की को इसकी ख़बर तक न थी कि उसकी अपनी पुरानी तस्वीर की तरफ़ दो जालों के धागे एक साथ रेंगते चले आ रहे थे।

कुछ रातों बाद, ऊपर उसी आलीशान सुइट में, जयदेव के जासूस का पहला सुराग़ आ पहुँचा। एक पतली फ़ाइल, कुछ पीले पड़े काग़ज़, और उनके बीच दबी एक बहुत पुरानी तस्वीर। ... मल्विका ने वो फ़ाइल अपने पिता के सामने मेज़ पर खोली।

"आपके वकील सही कहते थे, पापा।" ... मल्विका ने काग़ज़ पढ़ते हुए कहा, आवाज़ में एक तेज़ चमक। "चाचाजी अपने आख़िरी महीनों में चुपके से किसी को ढूँढ रहे थे। उन्होंने अपना एक ख़ास आदमी लगा रखा था। ... और उस आदमी की हर पड़ताल घूम-फिर कर एक ही पुराने नाम पर लौट आती है।" ... उसने सिर उठाया। "अर्नव राठौर। ... आपका अपना भतीजा। वो बेटा जिसे चाचाजी ने अपने ही हाथों घर से निकाल दिया था।"

जयदेव का चेहरा एक पल के लिए पत्थर हो गया। "अर्नव।" ... उसने वो नाम ऐसे कहा जैसे ज़बान पर कोई कड़वी चीज़ रख दी हो। "मेरे भाई का वो घमंडी बेटा। जिसने ख़ानदान की शान पर एक बावर्ची की बेटी को चुना, ग़ुरबत में जिया, और गुमनामी में मर गया।" ... "मैं तो समझता था वो शाख़ जड़ से सूख चुकी। उसका इस दुनिया में कोई नाम-ओ-निशान बाक़ी नहीं।"

पर वो सुराग़ कह रहा था कि एक निशान बाक़ी था। ... मल्विका ने फ़ाइल में से वो पीली पड़ चुकी तस्वीर निकाल कर जयदेव के हाथ में रख दी। ... उसमें एक नौजवान था, आँखों में वही ज़िद जो कभी देवनारायण की अपनी हुआ करती थी। उसकी गोद में एक नन्ही सी बच्ची। और उसके पास खड़ी एक औरत, जिसके गले में एक छोटा सा लॉकेट चमक रहा था। ... वही लॉकेट, जो आज इसी महल में, एक नौकरानी की वर्दी के अंदर, उसके दिल के ठीक ऊपर छुपा हुआ था।

मल्विका की उँगली उस तस्वीर में उस नन्ही बच्ची के चेहरे पर आ कर रुक गई। "एक बच्ची थी, पापा।" ... उसकी आवाज़ धीमी, पर तेज़ धार वाली हो गई। "अर्नव की बेटी। ... अगर ये बच्ची आज भी कहीं ज़िंदा है, तो चाचाजी की उस सील बंद वसीयत का वारिस, कोई और नहीं, यही है।"

जयदेव ने वो तस्वीर रौशनी के बिल्कुल क़रीब उठाई, और उसकी बूढ़ी, पथराई आँखें उस नन्हे चेहरे पर देर तक गड़ी रहीं, बहुत देर तक। ... फिर उसने धीरे से, बहुत ठंडी आवाज़ में कहा। "इतने बरस से मैं एक भूत से लड़ रहा था। ... और आज मुझे पता चला कि उस भूत का एक चेहरा है।"

उसने वो तस्वीर मल्विका की तरफ़ बढ़ाई, पर उसकी नज़र अब भी उस बच्ची पर जमी थी। "इस बच्ची को ढूँढो।" ... "चाहे ये दुनिया के किसी भी कोने में हो, इसे ढूँढ निकालो। ... ये ज़िंदा है, मल्विका। और जब तक ये ज़िंदा है, ये महल मेरा नहीं।"

और उस आलीशान सुइट में वो पीली, पुरानी तस्वीर किसी नंगी तलवार की तरह रौशनी में चमक उठी। ... सिर्फ़ सुनने वाला जानता था कि जिस नन्ही बच्ची को ढूँढने का हुक्म अभी-अभी इस कमरे में सुनाया गया, वो कोई गुमनाम भूत नहीं थी। ... वो इसी महल की तीन मंज़िल नीचे, एक नौकरानी की वर्दी में सो रही थी, और कल सुबह फिर उसी रेयांश की कॉफ़ी में चीनी घोलेगी। ... और आज, पहली बार, गिद्धों को उसके ज़िंदा होने की ख़बर लग चुकी थी।

Comments

Sign in to join the conversation.

No comments yet. Be the first to share your thoughts.