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Chapter 30 of 30

असली मालकिन

गुमनाम मालकिन by Avni Oberoi

सबसे पहले लौटी आवाज़ नहीं, एक बोझ, गरम और भारी, अद्विका की पीठ पर। कानों में एक लंबी सीटी बज रही थी, जैसे उस धमाके ने दुनिया की सारी आवाज़ें चूस ली हों। फिर धुएँ की तीखी बू के साथ दुनिया लौटी, और उसे एहसास हुआ, वो ज़िंदा है।

अद्विका ने खाँसते हुए सिर उठाया और समझी कि वो बोझ क्या था। रेयांश। वो उसके ऊपर औंधा पड़ा था, पीठ उस गिरते आसमान की ओर किए, कंधे से ख़ून बह रहा था। 'रेयांश?' ... उसकी आवाज़ काँच सी टूटी। 'आँखें खोलो, मेरी तरफ़ देखो... रेयांश!'

झूमर की वो लोहे की भारी बाँह, जो सीधे अद्विका पर गिरनी थी, रेयांश ने अपने कंधे पर ले ली थी। अद्विका पर बस कुछ खरोंचें थीं। बाक़ी सब उसने अपने ऊपर ले लिया था।

अद्विका घुटनों के बल गिरी और अपनी दोनों हथेलियाँ उसके ज़ख़्म पर दबा दीं। 'तुमने अपना साम्राज्य दिया, अपनी कुर्सी दी, अब अपनी जान भी? मैंने ये कभी नहीं माँगा था। आँखें खोलो, ये तुम्हारी मालकिन का हुक्म है!'

रेयांश की पलकें खुलीं, और उसे देख कर एक कमज़ोर हँसी तैर गई। 'हुक्म?' ... वो फुसफुसाया, होंठों पर वही तिरछी मुस्कान। 'पूरे साल तुमने मेरा एक हुक्म नहीं माना, और आज मैं मान लूँ? ... नहीं मरूँगा। तुम्हारा जवाब अभी बाक़ी है।'

तभी आग की एक लपट पास की लकड़ी को चाट कर ऊपर उठी। सीढ़ी के किनारे एक और परछाईं पड़ी थी, मल्विका। अद्विका की उस आख़िरी छलाँग ने उसे झूमर की सीधी मार से धकेल दिया था, पर वो मलबे में फँसी थी, और आग उसकी ओर बढ़ रही थी।

अद्विका एक पल ठिठकी, फिर घिसटती हुई उसकी ओर बढ़ी। 'मल्विका! हाथ दे मुझे। मैं तुझे यहाँ मरने के लिए नहीं छोड़ूँगी। तेरे ख़ानदान ने कमज़ोर को आग में झोंका, पर मैं नहीं झोंकूँगी। हाथ दे, अभी!'

मल्विका ने अपना ख़ून सना चेहरा उठाया, और उन आँखों में अब कोई बर्फ़ नहीं थी, कोई साज़िश नहीं। उसने कुछ नहीं कहा, बस काँपते हाथ से अद्विका की उँगलियाँ थाम लीं, और बरसों की वो जंग ख़ामोशी से हार गई।

तभी धुएँ को चीरता हुआ बंसी अंदर घुसा, पीछे शारदा ताई और दो नौकर। 'मालकिन! कहा था ना, बंसी अपनी मालकिन को नहीं छोड़ेगा! सब बाहर हैं, सोनू बाबा सलामत हैं, बस आप तीनों बचे थे! जल्दी, ये पिछला रास्ता अभी खुला है!'

शारदा ने रेयांश का एक हाथ अपने कंधे पर लिया, बंसी ने दूसरा। फिर उसकी नज़र मल्विका पर पड़ी, चेहरा एक पल सख़्त हुआ, फिर नरम पड़ गया। 'इसे भी उठाओ। मेरी मालकिन का हुक्म है, तो ये भी बचेगी। आज इस महल से कोई लाश नहीं निकलेगी।'

और फिर वो सब, ख़ून और कालिख में लिथड़े, उन्हीं काँच के दरवाज़ों से बाहर निकले, जहाँ से एक साल पहले एक बेगुनाह लड़की को फेंका गया था। पीछे राठौर ग्रैंड जल रहा था, पर ख़ाली, हर साँस सलामत, और आसमान के किनारे एक स्लेटी सुबह फूट रही थी। मल्विका का जलता ताबूत किसी को नहीं निगल पाया।

कुछ घंटे बाद, अद्विका पोर्टिको के एक सूखे कोने में एक कंबल में लिपटे रेयांश के पास बैठी थी। ज़ख़्म गहरा था पर जानलेवा नहीं, डॉक्टर कह गया था वो पूरी तरह बच जाएगा। अद्विका पल भर को भी उसका हाथ नहीं छोड़ रही थी।

रेयांश ने आँखें खोलीं, उस स्लेटी होती सुबह को देखता रहा, फिर एक ठंडी, थकी हँसी हँसा। 'तो हो गया। तुम्हारा साम्राज्य बच गया, मालकिन, सब तुम्हारा। और मैं फिर वही हूँ, जिसके पास अब कुछ नहीं। तुम्हारा एक और बचाया हुआ नौकर, तुम्हारे ही कंबल में लिपटा।'

अद्विका ने अपने गले से वो पुराना लॉकेट उतार कर उसकी हथेली में रख दिया। 'खोल कर देख इसे। इसमें मेरे बाप का चेहरा है, अर्नव राठौर, वही छोटे मालिक जिसे इस घराने ने घमंड में घर से निकाला, सिर्फ़ इसलिए कि उसने ग़रीबों की बस्ती पर बुलडोज़र चलाने से मना कर दिया था।'

रेयांश ने वो लॉकेट खोला, और उसमें एक चेहरा था जिसकी आँखें हूबहू अद्विका जैसी थीं। 'मेरे बाप को इस घर ने ऊँचा-नीचा बना कर तोड़ा, रेयांश। मैं वही ग़लती दोबारा नहीं करूँगी।' 'मुझे तुम्हारा एहसान नहीं चाहिए, न मैं तुम पर करूँगी। न मालिक, न नौकर, न पाला हुआ आदमी। मुझे एक बराबर का इंसान चाहिए, जो मेरे बाप का अधूरा काम मेरे साथ पूरा करे। ये मेरा जवाब है। अब मुझे तुम्हारा सुनना है।'

रेयांश ने बहुत देर उस लड़की को देखा, जिसने उसका सब छीन कर उसे पहली बार सब कुछ दिया था। 'दुनिया को लगा मैंने सब खो दिया। पर मैंने वो ताज नहीं खोया, अद्विका, मैंने तुम्हें पाया। मैं पाला हुआ आदमी बन कर नहीं, तुम्हारे बराबर खड़ा हो कर ये महल दोबारा बनाऊँगा। ये रहा मेरा जवाब, एक साल देर से। हाँ।'

कुछ दिन बाद, तहख़ाने के उसी कमरे में जहाँ से ये सारी लड़ाई शुरू हुई थी, बूढ़ा वकील विश्वनाथ एक मोटी फ़ाइल ले कर पहुँचा। उसके चेहरे पर वही पुरानी थकान थी, पर आँखों में पहली बार एक चैन।

'सब ख़त्म हो गया, बेटी।' 'जयदेव हिरासत में है, ज़बरदस्ती, जालसाज़ी और आगज़नी, तीनों की रिकॉर्डिंग जज के सामने है। तेरा वो पुराना ग़द्दार कुणाल सरकारी गवाह बन गया, लूट का पन्ना-पन्ना उगल रहा है। मल्विका अस्पताल के बिस्तर से गिरफ़्तार हुई। साल पूरा है, वसीयत ज़िंदा है, और अद्विका राठौर इस पूरी चेन की इकलौती मालकिन है।'

'पर देवनारायण साहब की एक आख़िरी चीज़ बाक़ी है।' विश्वनाथ ने फ़ाइल के नीचे से एक पीला पड़ चुका लिफ़ाफ़ा निकाला। 'ये उन्होंने कहा था तभी खोलूँ जब वो अपना नाम भी वापस ले ले, और अपना दिल भी। दोनों आज पूरे हैं। सुनोगी?' ... और उसने काँपते हाथों से पढ़ना शुरू किया।

'मेरी गुड़िया।' ... विश्वनाथ की आवाज़ में अब देवनारायण का बूढ़ा दर्द उतर आया। 'जब तू ये पढ़ेगी, मैं नहीं रहूँगा। मैंने ज़िंदगी में एक चीज़ बनाई, ये महल, और एक तोड़ी, अपना बेटा। अर्नव ने एक बस्ती के लिए मेरा ताज ठुकराया, और मैंने घमंड में उसे निकाल दिया। मरते वक़्त समझा, उस दिन कमज़ोर वो नहीं, मैं था। ये साम्राज्य इनाम नहीं, एक बाप की टूटी माफ़ी है।'

'और आख़िर में उन्होंने एक हिदायत लिखी है।' विश्वनाथ का गला भर आया था। 'उस दीवार पर, जहाँ बानी देवनारायण की तस्वीर लगी है, अब उसके ठीक बराबर अर्नव राठौर की तस्वीर भी लगेगी, वो बेटा जिसने ताज से ऊपर अपना ज़मीर चुना। और बूढ़ा मरते दम तक अपनी पोती को इसी एक नाम से ढूँढता रहा। गुड़िया।'

अद्विका के हाथ अपने आप उस लॉकेट पर चले गए, और बरसों का जमा एक बाँध टूट पड़ा। 'गुड़िया।' ... उसने वो लफ़्ज़ फुसफुसा कर चखा, जैसे कोई भूली लोरी हो। 'ज़िंदगी भर मैं समझती रही कि मैं किसी की नहीं, एक अनाथ, एक गुमनाम। और वो बूढ़ा मरते दम तक मुझे इसी नाम से पुकारता रहा। मैं गुमनाम नहीं थी, बस खोई हुई थी।'

शारदा ताई, जो दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थी, आगे बढ़ी और अद्विका का सिर अपने सीने से लगा लिया। 'मैंने छोटे मालिक अर्नव को अपनी गोद में खिलाया है, बेटी। उसी घमंड ने बाप-बेटे को अलग किया और चालीस साल इस घर को अंदर से खाया। आज वो ज़ख़्म भर गया। मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है, गुड़िया।'

हफ़्ते बीते, और अद्विका राठौर ने मालकिन की अपनी पहली ताक़त किसी दावत पर नहीं, अपने लोगों पर ख़र्च की। 'हर नौकर की जो पगार बरसों से काटी जाती रही, वो अब ब्याज समेत लौटेगी।' अद्विका उसी लंबी मेज़ के सिरे पर खड़ी थी, जहाँ वो कभी सिर झुकाए पानी पिलाती थी। 'और वो ग़रीबों की बस्ती, जिसके लिए मेरे बाप ने घर खोया, उस पर अब बुलडोज़र नहीं, हम उन्हीं लोगों के लिए पक्के घर बनाएँगे। जो साम्राज्य दादा ने ईंटों से बनाया, वो अब इंसानों के काम आएगा।'

और उसी बोर्डरूम में, नई इस्त्री की वर्दी में, बंसी सीना फुलाए खड़ा था, पर आँखें अब भी हैरानी से फैली। 'मालकिन, आपने मुझे हेड स्टीवर्ड बना दिया? मुझे? अरे मैं तो बस बातें बनाना जानता हूँ! पर चिंता मत करना, जैसे आग से आपको बचाया, वैसे पूरे स्टाफ़ को सँभालूँगा। कहा था ना, बंसी किस मिट्टी का बना है!'

और महल की दीवारों के बाहर, अद्विका की असली दुनिया भी अपनी जगह लौट आई। सोनू अब सलामत था, उसकी पढ़ाई का ख़र्च अब कभी अद्विका की नींद नहीं छीनेगा। और जूही, जिसे पूरे साल कुछ पता ही नहीं था, जब उसने पूरा सच सुना, तो पहले मुँह खोले घूरती रही, फिर चीख़ी, 'मुझे पहले से पता था तू मालिक के चक्कर में है!', और दोनों सहेलियाँ थामे बहुत देर हँसती-रोती रहीं।

उसी शाम उस बड़ी संगमरमर की दीवार पर, जहाँ बरसों से सिर्फ़ देवनारायण की तस्वीर थी, एक दूसरी तस्वीर से परदा हटा। अर्नव राठौर, वो बेटा जिसे इस महल ने मिटा दिया था, अब अपने बाप के बराबर, उसी इज़्ज़त से मुस्कुरा रहा था। बाप-बेटे की वो दरार आज पत्थर पर भर गई।

और फिर, उसी रात, अद्विका उन्हीं बड़े काँच के दरवाज़ों के पास आ खड़ी हुई, जहाँ से एक साल पहले, ऐसी ही एक बारिश में, उसे धक्के दे कर निकाला गया था। पर आज न कोई उसका बैज नोच रहा था, न कोई उसे धूल कह रहा था। आज वहाँ बारिश में सिर्फ़ एक आदमी खड़ा था, कंधे पर पट्टी बाँधे, उसका इंतज़ार करता।

'एक साल पहले, इन्हीं दरवाज़ों पर, मैं चुप खड़ा रहा था, जब तुम्हें यहाँ से निकाला जा रहा था।' रेयांश ने बारिश में उसका हाथ थाम लिया। 'तभी सोचा था, मौक़ा मिला तो वो ग़लती यहीं सुधारूँगा। मैं तुम्हारे साम्राज्य के लिए नहीं, सिर्फ़ तुम्हारे लिए आया हूँ। दो अलग नाम, पर एक ही दिल। चलोगी मेरे साथ, बराबरी में?'

अद्विका ने उसका हाथ थामा, और पहली बार उस बारिश में खुल कर मुस्कुराई, बिना किसी मुखौटे के, बिना किसी डर के। 'मेरे दादा ने ईंट पर ईंट जोड़ी और अपना बेटा खो दिया, मेरे बाप ने ज़मीर चुना और अपना घर खो दिया। मैं दोनों का अधूरा काम पूरा करूँगी, पर अकेले नहीं, तुम्हारे साथ। न ऊपर, न नीचे। बराबर। हाँ, चलूँगी।'

तभी विश्वनाथ पीछे से आया, हाथ में एक और पुराना, सीलबंद लिफ़ाफ़ा। 'देवनारायण साहब ने सिर्फ़ अर्नव के साथ नाइंसाफ़ी नहीं की थी, बेटी। एक और नाम है, एक और हड़पी हुई ज़मीन, जिसका क़र्ज़ आज भी राठौर के सिर बाक़ी है, और उसका भी एक गुमनाम वारिस इसी शहर में कहीं है। पर वो कल की बात है। आज की ये रात सिर्फ़ तुम्हारी है।'

अद्विका ने वो लिफ़ाफ़ा बिना खोले अपने पास रख लिया, आज की रात के लिए बस अद्विका बन कर। और उन्हीं दरवाज़ों पर, उसी बारिश में जिसने एक साल पहले एक टूटी हुई लड़की को भिगोया था, अब एक मालकिन खड़ी थी, सिर ऊँचा। जिसे इस घराने ने पैरों की धूल समझा था, वो कभी गुमनाम थी ही नहीं। इस पूरे महल की, अपने नाम की, और अपनी क़िस्मत की असली मालकिन, वो हमेशा से वही थी।

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