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अध्याय 20 / 30 पढ़ने में 11 मिनट

वज़न वाला पुतला

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

भोर से पहले का अँधेरा अभी घाट की सड़क पर पसरा था, जब तीन गाड़ियों की हेडलाइटें मलावली के मोड़ से ऊपर की तरफ़ मुड़ीं। लोहागढ़ की चढ़ाई पर उस सुबह एक अजीब क़ाफ़िला था, पुलिस, फ़ोरेंसिक टीम, और चार आदमियों के कंधों पर एक ढका हुआ बोझ, जो देखने में इंसान जैसा था, पर इंसान नहीं था।

उस पुतले का वज़न ठीक अठहत्तर किलो रखा गया था, वही जो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में केयूर का दर्ज था, और उसकी लंबाई भी उतनी ही, इंच दर इंच। रेत की थैलियाँ शरीर की तरह बाँटी गई थीं, सिर, धड़, टाँगें, ताकि गिरते वक़्त उसका बर्ताव किसी जीते-जागते आदमी जैसा ही हो। वैशाली की डायरी में लिखी वो लाइन अब पहाड़ के सामने आ खड़ी थी, पहाड़ ख़ुद बताएगा, वो सिर्फ़ गिरा, या गिराया गया।

पुतले के भीतर लोहे का एक हल्का ढाँचा था, जोड़ों पर मुड़ने वाला, ताकि गिरते वक़्त हाथ-पैर किसी असली शरीर की तरह लहराएँ, अकड़े हुए न रहें। फ़ोरेंसिक विभाग ने उसे बनाने में हफ़्ते भर लगाए थे, हर थैली को तौलकर, हर जोड़ को केयूर की लंबाई के हिसाब से बिठाकर।

"शरीर का बर्ताव सिर्फ़ वज़न से तय नहीं होता, कदम जी, इस बात से भी होता है कि वो वज़न कैसे बँटा है। अगर ये पुतला एक ठोस बोरी होता, तो वो लुढ़कता। पर इंसान लुढ़कता नहीं, वो गिरता है, उसके अंग अलग-अलग हरकत करते हैं। इसीलिए हमने इसे इंसान जैसा बनाया है, वरना ये पूरा प्रयोग अदालत में एक मज़ाक बन जाता।"

"डॉक्टर साहब, मौसम विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक़ उस भोर हवा की रफ़्तार यही थी, यही नमी, यही धुंध। हमने वक़्त भी वही चुना है, सवा छह के आसपास। मैं चाहती हूँ कि पहाड़ को कोई बहाना न मिले।"

"बहुत अच्छा किया, कदम जी। भौतिकी बहानों पर नहीं चलती, आँकड़ों पर चलती है। आज हम सिर्फ़ एक सवाल पूछेंगे, अगर कोई इंसान इस किनारे से सिर्फ़ फिसले, बिना किसी धक्के के, तो उसका शरीर जाकर कहाँ गिरेगा। न ज़्यादा, न कम, बस यही।"

"पुरातत्व और वन विभाग की इजाज़त कल रात ही आई, कदम। मैंने अपनी पूरी इज़्ज़त इस एक प्रयोग पर लगा दी है। अगर आज ये पुतला हमें कुछ नहीं बताता, तो कल अख़बारों में हमारा तमाशा बनेगा।"

बुर्ज पर तीन जगह कैमरे लगाए गए थे, एक किनारे के ठीक सामने, एक बग़ल से, और एक नीचे शेल्फ़ की तरफ़, ताकि पुतले का हर गिरना हर कोण से रिकॉर्ड हो जाए। वैशाली जानती थी कि अदालत में सिर्फ़ नतीजा नहीं, उस नतीजे तक पहुँचने का हर क़दम भी दिखाना होगा।

किनारे पर पहुँचकर सब एक पल को ठिठक गए। नीचे विंचू काटा बुर्ज की सीधी ढलान थी, फिर पहली चट्टानी शेल्फ़, और उसके बहुत आगे, धुंध में डूबी वो गहरी खाई जहाँ महीनों पहले केयूर का शरीर मिला था। सुबह की पहली रौशनी अभी घाटों के ऊपर काँप रही थी, ठीक वैसी ही, जैसी उस भोर रही होगी।

"पूरे महीने मैं इस किनारे को सिर्फ़ फ़ाइलों की तस्वीरों में देखती रही, डॉक्टर साहब। आज यहाँ खड़े होकर पहली बार समझ आ रहा है, कि उस सुबह केयूर ने आख़िरी बार जो देखा होगा, वो यही धुंध, यही उगता सूरज, यही ढलान थी।"

"इसी जगह से, इसी किनारे से। डॉक्टर साहब, जब आप तैयार हों।"

"हम इसे फेंकेंगे नहीं, कदम जी, ये याद रहे। फिसलना धक्का नहीं होता। हम इसे सिर्फ़ किनारे से छोड़ देंगे, जैसे किसी का पैर फिसल जाए और वो अपने ही वज़न से नीचे चला जाए। कोई ताक़त नहीं, कोई ज़ोर नहीं, सिर्फ़ गुरुत्वाकर्षण।"

फ़ोरेंसिक टीम के दो आदमियों ने पुतले को किनारे पर रखा, उसके पैर ढलान की तरफ़, ठीक वैसे जैसे कोई सेल्फ़ी लेते हुए बेख़याली में पीछे क़दम रखे। डॉक्टर मोरे ने हाथ उठाया, गिनती शुरू की, और फिर हाथ नीचे गिरा दिया।

"तीन... दो... एक... छोड़ो।"

पुतला किनारे से लुढ़का, एक पल हवा में झूला, फिर ढलान से टकराता, फिसलता नीचे गया, और पहली चट्टानी शेल्फ़ पर आकर रुक गया। एक भारी, बेजान आवाज़, और फिर ख़ामोशी। किनारे पर खड़े हर इंसान की साँस थम गई।

"वो... वो तो यहीं रुक गया। किनारे से कितनी दूर है ये, डॉक्टर?"

"टीम नीचे नाप रही है। ...किनारे से पाँच मीटर अस्सी सेंटीमीटर आगे, और लगभग बारह मीटर नीचे। पहली शेल्फ़ पर, बिल्कुल जैसा एक फिसले हुए शरीर से उम्मीद की जाती है।"

"एक बार काफ़ी नहीं, डॉक्टर साहब। खानविलकर अदालत में कहेगा, ये इत्तेफ़ाक़ था। हमें इसे दोहराना होगा, जब तक नतीजा एक जैसा न आए।"

"बिल्कुल सही सोच, कदम जी। एक बार इत्तेफ़ाक़ हो सकता है, तीन बार सच होता है। पुतला ऊपर लाओ। दुबारा।"

हर बार पुतले को नीचे से रस्सियों के सहारे ऊपर खींचना आसान नहीं था, रेत का वो बोझ हर चढ़ाई पर और भारी लगता, हथेलियों पर रस्सी के निशान उभर आते। पर किसी ने शिकायत नहीं की, सब जानते थे कि आज जो नापा जा रहा है, वो सिर्फ़ मीटर नहीं, एक ज़िंदगी और एक झूठ के बीच की दूरी है।

पुतला दुबारा उसी किनारे से छोड़ा गया, फिर तीसरी बार। हर बार वो ढलान से टकराता, फिसलता, और उसी पहली शेल्फ़ के आसपास आकर रुक जाता, कभी पाँच मीटर साठ, कभी छह मीटर, एक मीटर के दायरे में, हर बार।

"दुबारा वहीं, फिर वहीं। मुझे लगा था हर बार थोड़ा आगे-पीछे होगा, पर ये तो हर बार लगभग एक ही जगह आकर रुक जाता है।"

"यही तो भौतिकी की ख़ूबसूरती है, गावडे साहब। एक ही वज़न, एक ही ऊँचाई, एक ही ढलान, नतीजा हमेशा एक ही दायरे में। जो चीज़ हर बार दोहराई जा सके, वही अदालत में सच मानी जाती है।"

"तीनों बार, एक ही दायरे में। ये कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है, कदम जी। यही भौतिकी है। अठहत्तर किलो का शरीर, इस ऊँचाई से, बिना किसी ताक़त के फिसलकर, इससे आगे नहीं जा सकता। ये पहाड़ की हद है।"

"पाँच से छह मीटर। पर केयूर वहाँ नहीं मिला था, डॉक्टर साहब। केयूर बहुत आगे मिला था।"

और इसी किनारे पर, ठीक इसी जगह, वो भोर उतरी थी। केयूर हँसते हुए फ़ोन उठाए खड़ा था, अपने जन्मदिन की पहली रौशनी को क़ैद करता, पीछे मुड़कर किसी को पुकारता, और उसका भरोसा उस सुबह की धुंध जितना ही खुला और साफ़ था।

किसी ने उसे किनारे के थोड़ा और क़रीब बुलाया, एक और अच्छी तस्वीर के लिए। सूरज उभरा, धुंध सुनहरी हुई, और फ़्रेम के किनारे पर एक परछाईं आ खड़ी हुई, हुडी में, ख़ामोश। ...और यहीं परदा गिर जाता है। उस किनारे पर आगे जो हुआ, वो अब तक किसी की आँख ने नहीं देखा, न पिया की गवाही में, न किसी गवाह के बयान में, सिवाय उन तीन लोगों के जो वहाँ थे। पर पहाड़ वहाँ था, और पहाड़ झूठ नहीं बोलता।

वैशाली छँटती धुंध में उस जगह की तरफ़ बढ़ी जहाँ महीनों पहले केयूर का शरीर मिला था। फ़ोरेंसिक टीम ने वहाँ पहले से एक निशान गाड़ रखा था, पहली शेल्फ़ से बहुत आगे, एक चट्टानी उभार के भी उस पार, खाई के भीतर।

"पोस्टमॉर्टम और पंचनामा, दोनों में जगह दर्ज है, कदम जी। केयूर का शरीर किनारे से लगभग उनतीस मीटर आगे मिला था, और जहाँ ये पुतला हर बार रुका, उस पहली शेल्फ़ से पूरे बाईस मीटर और परे।"

"बाईस मीटर आगे। जहाँ पुतला बार-बार रुका, वहाँ से बाईस मीटर और आगे। कोई शरीर अपने आप, सिर्फ़ फिसलकर, इतनी दूर कैसे जा सकता है, डॉक्टर साहब?"

"डॉक्टर, बचाव वाला वकील अदालत में कहेगा कि उस दिन हवा तेज़ थी, हवा ने शरीर को आगे धकेल दिया। इसका क्या जवाब है हमारे पास?"

"मौसम विभाग की रिपोर्ट कहती है, गावडे साहब, कि उस भोर हवा की रफ़्तार बमुश्किल आठ किलोमीटर प्रति घंटा थी, एक हल्की-सी बयार। अठहत्तर किलो के शरीर को बाईस मीटर आगे उड़ा ले जाने के लिए तूफ़ान चाहिए, बयार नहीं। और आज भी हमने वही हवा चुनी, फिर भी पुतला छह मीटर पर ही रुका।"

"सच ये है, कदम जी, कि गुरुत्वाकर्षण आपको नीचे गिराता है, आगे नहीं उछालता। इतनी दूर पहुँचने के लिए शरीर को किनारा छोड़ते ही एक तेज़ आगे की रफ़्तार चाहिए, कई मीटर प्रति सेकंड। और वो रफ़्तार फिसलने से नहीं आती।"

"सोचिए, अगर आप एक पत्थर सीधे नीचे गिराएँ, तो वो आपके पैरों के पास ही गिरता है। पर अगर आप उसी पत्थर को ज़ोर से आगे उछालें, तो वो दूर जाकर गिरता है। फ़र्क़ पत्थर में नहीं, उस ताक़त में है जो उसे आगे भेजती है। और वो ताक़त, कदम जी, न हवा थी, न फिसलन, वो किसी के हाथ थे।"

"यानी उस किनारे पर कोई और था, जिसने केयूर को पूरी ताक़त से आगे धकेला। ये लड़खड़ाना नहीं था, डॉक्टर साहब। ये एक फ़ैसला था, किसी के हाथों का लिया हुआ फ़ैसला।"

"तो जितनी बार हमने उस पुतले को छोड़ा... वो कभी उस जगह तक पहुँचा ही नहीं जहाँ लड़का मिला था। एक बार भी नहीं।"

"एक बार भी नहीं, गावडे साहब। और पहुँच सकता भी नहीं था। ये पहाड़ का, वज़न का, और गुरुत्वाकर्षण का हिसाब है, इसमें कोई शक़ की गुंजाइश नहीं।"

एक पल को वैशाली की नज़र उस दूर के निशान पर ठहरी, और उसे वो वादा याद आया जो उसने ख़ुद से किया था, कि केयूर की उस आख़िरी ख़ामोशी को वो एक आवाज़ देगी। आज ये पहाड़ ख़ुद वो आवाज़ बन रहा था, उनतीस मीटर की उस बेरहम दूरी में।

किनारे पर एक ठंडी ख़ामोशी उतर आई। धुंध धीरे-धीरे छँट रही थी, और नीचे वो दो निशान अब साफ़ दिख रहे थे, एक जहाँ पुतला हर बार आकर रुका, और एक बहुत, बहुत आगे, जहाँ एक जीता-जागता नौजवान अपने ही जन्मदिन की सुबह मिला था।

"डॉक्टर साहब, मुझे ये अदालत में चाहिए, आपके अपने शब्दों में। आज इस पहाड़ ने जो कहा, उसे साफ़-साफ़ कहिए।"

"मैं अदालत में हलफ़ के साथ कहूँगा, कदम जी। जो आदमी इस किनारे से फिसलता है, वो यहीं गिरता है, पहली शेल्फ़ पर, छह मीटर के भीतर। जो आदमी उनतीस मीटर आगे, खाई के भीतर गिरता है, वो फिसला नहीं था। उसे ज़ोर लगाकर आगे धकेला गया था। केयूर मलपानी की मौत एक हादसा हो ही नहीं सकती।"

"पंद्रह साल में मैंने बहुत लाशें देखीं, कदम। पर आज पहली बार एक ख़ाली पहाड़ ने मेरे सामने खड़े होकर गवाही दी है।"

"ये हादसा नहीं था, सर। ये कभी हादसा था ही नहीं। और अब हमारे हाथ में सिर्फ़ शक़ नहीं, सिर्फ़ चैट नहीं, सिर्फ़ बाइक नहीं, बल्कि ख़ुद गुरुत्वाकर्षण की गवाही है।"

"वो फ़ाइल, कदम, जिस पर मैंने तुमसे दस्तख़त करके उसे बंद करने को कहा था। आज उसी फ़ाइल ने पहाड़ पर आकर मुझे ग़लत साबित कर दिया।"

"रुतुजा को कहूँगी कि तीनों कैमरों की रिकॉर्डिंग, नाप की हर पर्ची, और मौसम विभाग की रिपोर्ट, सब एक साथ सील कर दे। खानविलकर एक भी ढीली कड़ी ढूँढेगा, और हमें उसे एक भी नहीं देनी।"

उस भोर लोहागढ़ के उस किनारे पर, महीनों की फ़ाइल में लिखा वो एक शब्द, हादसा, चुपचाप दम तोड़ गया। रेत के एक पुतले ने वो कह दिया था जो कोई गवाह नहीं कह सका था, कि इंसान अपने वज़न से इतनी दूर अपने आप नहीं गिरता, उसे इतनी दूर पहुँचाया जाता है।

वैशाली ने नीचे उन दो निशानों को आख़िरी बार देखा, और उसे पता था कि अब असली लड़ाई पहाड़ पर नहीं, अदालत में लड़ी जाएगी, जहाँ खानविलकर इसी प्रयोग को सिर्फ़ एक नाटक कहकर तोड़ने की पूरी कोशिश करेगा। पर आज, इस छँटती धुंध में, एक बात हमेशा के लिए तय हो चुकी थी, केयूर गिरा नहीं था। केयूर गिराया गया था।

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