Chapter 28 of 30 10 min read
फ़ैसले से पहले
वैशाली की क़ीमत सामने आती है और गावडे झिझकते हुए माफ़ी माँगते हैं, हवालात में पिया-चिराग का इश्क़ इल्ज़ामों में बदल जाता है, और फ़ैसले वाली सुबह जज फ़ाइल खोलकर अभियुक्तों को खड़े होने का हुक्म देता है।
सत्रह तारीख़ की तरफ़ हर दिन एक घंटे जितना लंबा हो गया था। लोनावला से पुणे तक, थाने से हवालात तक, पूरा शहर एक ही तारीख़ के इंतज़ार में साँस रोके बैठा था।
मावळ थाने में वैशाली की मेज़ पर काम वैसे ही चलता रहा, चोरी, झगड़े, गुमशुदगी, पर हर फ़ाइल के नीचे अब एक अनकहा नाम दबा रहता, केयूर मलपानी। कुछ साथी अफ़सर आज भी पीठ पीछे कहते, 'बड़े घर वालों को फँसाने चली है, देखते हैं कब तक टिकती है।'
महीनों की भागदौड़ ने वैशाली की आँखों के नीचे स्थायी काले घेरे छोड़ दिए थे, और उसकी वर्दी पर अब एक थकान चिपकी रहती जो छुट्टी से नहीं धुलती। पर हर सुबह वो उसी मेज़ पर वापस आ बैठती, जैसे ये उसकी अपनी ज़िद हो।
थाने के कैंटीन के टीवी पर एक चैनल बहस चला रहा था, कोई एंकर चिल्ला रहा था, "क्या एक सब-इंस्पेक्टर को इतने बड़े बिल्डर परिवार के ख़िलाफ़ जाने की इजाज़त होनी चाहिए?" वैशाली ने बिना देखे टीवी के पास से गुज़रते हुए आवाज़ धीमी करवा दी।
उसी शाम रुतुजा का एक मैसेज आया, सिर्फ़ इतना, "मैडम, बस कुछ ही दिन बचे हैं, हिम्मत मत हारना।" वैशाली ने जवाब में सिर्फ़ एक छोटा सा 'ठीक है' लिखा, पर फ़ोन को एक पल ज़्यादा देर तक पकड़े रही।
उसकी माँ का फ़ोन भी लगभग हर दूसरे दिन आता, "बेटी, कब तक ये केस तुझे खाता रहेगा, अपनी भी सोच," और वैशाली हर बार वही जवाब देती, "बस थोड़ा और माँ, फिर सब ठीक हो जाएगा।"
एक शाम गावडे ने अपने केबिन से आवाज़ लगाई, आवाज़ में वो पुरानी सख़्ती नहीं थी, कुछ और था, कुछ भारी।
"कदम... ज़रा अंदर आना, दो मिनट।"
वैशाली ने दरवाज़े पर दस्तक दी, थोड़ी हैरान, थोड़ी सतर्क, ये आवाज़ उसने गावडे की महीनों में पहली बार सुनी थी।
"बैठो कदम। मैं... मैं तुमसे कुछ कहना चाहता था, बहुत दिनों से टाल रहा था।"
"बोलिए साहब, सब ठीक तो है?"
"याद है वो पहला दिन, जब मैंने तुम्हें कहा था फ़ाइल बंद कर दो, बड़े बिल्डर का बेटा है, हादसा है, शोर मत मचाओ?"
"याद है साहब।"
"मैं ग़लत था कदम। तुमने वो फ़ाइल खुली रखी, अपनी नौकरी दाँव पर लगाकर, अपनी नींद, अपना घर, सब दाँव पर लगाकर। माफ़ करना।"
कमरे में एक पल के लिए सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रह गई, वैशाली को समझ नहीं आया इतने महीनों बाद इसका क्या जवाब दे।
"तुम्हारे तबादले वाली फ़ाइल, जो ऊपर से आई थी, मैंने वो रुकवा दी है। कम से कम इतना तो कर ही सकता था।"
"शुक्रिया साहब... पर ये मैंने केयूर के लिए किया था, ख़ुद के लिए नहीं।"
"जानता हूँ कदम। इसीलिए तो कह रहा हूँ, तुम मेरी टीम की सबसे अच्छी अफ़सर हो, और मुझे ये पहले कहना चाहिए था।"
"चाय पिओगी? बहुत दिन हो गए साथ बैठे।"
"साहब, इतने महीनों में पहली बार पूछा है आपने। ला दीजिए, कड़क वाली।"
गावडे हल्के से मुस्कुराए, और वो हँसी, बहुत महीनों बाद, उस केबिन में पहली बार असली लगी।
वैशाली केबिन से निकली, आँखों में एक हल्की नमी, पर चेहरे पर वही पुराना सख़्त, थका हुआ भाव, जैसे तारीफ़ भी उसे रुकने नहीं दे सकती थी।
उसी हफ़्ते, पुणे की हवालात में, वकीलों की इजाज़त से पिया और चिराग को आख़िरी बार आमने-सामने बिठाया गया, एक सिपाही की निगरानी में, बीच में एक लोहे की जाली।
महीनों की चुप्पी के बाद ये पहली मुलाक़ात थी, और दोनों के बीच अब वो पुराना इश्क़ नहीं, सिर्फ़ एक थकी हुई, ज़हरीली ख़ामोशी बची थी।
"अगर तूने वो रात फ़ोन ना किया होता चिराग, कुछ नहीं होता... हम बस दूर हो जाते, वक़्त के साथ।"
"मैंने फ़ोन किया था क्योंकि तू ख़ुद रो रही थी पिया, 'काश ये सब अपने आप ख़त्म हो जाए,' याद है तूने क्या कहा था?"
"मैंने कभी नहीं कहा उसे मार दो! मैंने बस... मैं बस थक गई थी, थक गई थी शादी से, घर से, सबसे।"
"तूने कुछ मत कहा हो, पर तूने कभी मना भी नहीं किया पिया। एक बार भी नहीं कहा, रुक जा, ऐसा मत कर।"
पिया की आँखों में आँसू और ग़ुस्सा एक साथ उतर आए, हाथ जाली पर कस गए, जैसे वो चिराग तक पहुँचना चाहती हो और साथ ही उससे भाग भी जाना चाहती हो।
"सब तेरी वजह से हुआ चिराग। तूने मुझे इस दलदल में खींचा, 'हम भाग जाएँगे' कहकर, फिर 'एक और रास्ता है' कहकर।"
"मैं खींचा? तूने कहा था हम भाग जाएँगे पिया, मैंने बस वो रास्ता ढूँढा जो तू माँग रही थी, बस मैंने उसे आसान बना दिया।"
"और अमेय? उसे तूने क्यों घसीटा इसमें? वो बेचारा आज भी काँपता है अदालत में, तेरी वजह से।"
"अमेय कमज़ोर निकला, बस इतनी सी बात है। दोस्त वही होता है जो चुप रहना जानता हो, वो नहीं जानता था।"
पिया एक क़दम पीछे हट गई, जैसे इस एक वाक्य में उसने आख़िरकार वो आदमी पूरी तरह देख लिया हो जिसे वो कभी प्यार करती थी।
"तू सच में कभी किसी से प्यार नहीं करता चिराग, ना केयूर से, ना मुझसे, ना अमेय से... सिर्फ़ ख़ुद से।"
पिया की उँगली अनायास उस जगह पर गई जहाँ कभी केयूर की लाई अंगूठी हुआ करती थी, अब वहाँ सिर्फ़ हवालात की मोटी, सस्ती अंगूठी जैसा एक निशान बाक़ी था। उसने जल्दी से हाथ नीचे खींच लिया, जैसे ख़ुद अपनी याद से शर्मिंदा हो।
सिपाही ने घड़ी की तरफ़ इशारा किया, वक़्त ख़त्म हो रहा था, और दोनों की आवाज़ें एक साथ तेज़ हो गईं, जैसे बचा हुआ हर सेकंड इल्ज़ामों में ख़र्च करना हो।
"काश मैंने तुझसे कभी मुलाक़ात ना की होती चिराग... काश मैं वो शादी ही कर लेती जो मुझे पसंद नहीं थी।"
"बहुत देर हो चुकी है पिया... अब पीछे कोई रास्ता नहीं बचा, बस एक तारीख़ बची है, सत्रह तारीख़।"
सिपाहियों ने दोनों को अलग-अलग दिशाओं में वापस ले जाना शुरू किया, ना पिया ने पीछे मुड़कर देखा, ना चिराग ने, प्यार का आख़िरी धागा भी अब कट चुका था।
उसी हफ़्ते, पुणे के एक छोटे से मोहल्ले के मंदिर में, सुष्मा शाम की आरती के बाद अकेली बैठी रहती, हाथ में केयूर की वही तस्वीर, जो अब कुछ किनारों से मुड़ चुकी थी।
उसने आँखें बंद कर लीं और मन ही मन सिर्फ़ इतना माँगा, कि सत्रह तारीख़ को दुनिया आख़िरकार जान ले कि उसके बेटे ने क्या खोया, और क्यों।
बग़ल में बैठी एक बुज़ुर्ग औरत ने सुष्मा को पहचान लिया, अख़बारों से, और बिना कुछ पूछे बस उसका हाथ थाम लिया, एक पल के लिए, फिर छोड़ दिया। सुष्मा ने धन्यवाद में सिर हिलाया, आँखें अब भी नम।
घर पर, केयूर का कमरा आज भी वैसा ही सजा था जैसा उसके जाने के दिन था, बिस्तर पर तह किए कपड़े, मेज़ पर वही घड़ी जो अब भी सही वक़्त बताती थी, जैसे कोई अभी लौटकर आने वाला हो।
नरेश थोड़ी दूर खड़े, चुपचाप दिया जलाते, कुछ नहीं कहते, बस अपनी पत्नी की परछाईं के पास रहते, जैसे शब्दों से ज़्यादा वो साथ का सहारा दे रहे हों।
उस रात लोनावला के घाटों पर धुंध उतरी, पुणे की गलियों में अख़बार वाले अगली सुबह की सुर्ख़ियाँ छापने की तैयारी में जुटे, और शिवाजीनगर अदालत का चौकीदार गेट पर एक नया, बड़ा ताला लगाकर सोया।
और फिर, वो सुबह आ ही गई। शिवाजीनगर अदालत के बाहर भोर से ही भीड़ जमा होने लगी थी, कैमरे, माइक, वैन, और अंदर जाने की जगह ना मिलने पर सड़क पर खड़े लोग।
वैशाली सबसे पहले पहुँची, वर्दी में, नोटबुक हाथ में, और गेट के बाहर एक पल रुककर उसने वो सीढ़ियाँ देखीं जिन पर वो महीनों से चढ़ती-उतरती रही थी।
गावडे भी आज वर्दी में आए, हमेशा की तरह सख़्त चेहरा लिए, पर वैशाली के पास से गुज़रते हुए उन्होंने सिर्फ़ एक छोटा सा सिर हिलाया, जो किसी भी लफ़्ज़ से ज़्यादा कह गया।
"जो भी हो कदम, तुमने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया। बाक़ी अब अदालत के हाथ में है।"
दूर एक कोने में विनोद और सुनिता मित्तल भी चुपचाप आ बैठे, अपनी बेटी की तरफ़ से शर्मिंदा, अपने ही रिश्तेदारों की नज़रों से बचते हुए, अलग-थलग, जैसे पूरा मोहल्ला अब उनसे भी दूरी बना चुका हो।
सुष्मा और नरेश गैलरी की उसी पुरानी क़तार में आ बैठे, सुष्मा की गोद में आज भी वही तस्वीर, हाथ हल्के से काँपते हुए।
भारी सुरक्षा के बीच पिया और चिराग को अलग-अलग रास्तों से कठघरे तक लाया गया, दोनों के चेहरे पत्थर जैसे, बीती रात की वो कड़वाहट अब भी हवा में तैर रही थी।
अचानक कमरा नंबर छह में एक हरकत दौड़ गई, चपरासी की आवाज़ गूँजी, "अदालत खड़ी हो," और हर कुर्सी की खरखराहट के साथ पूरा कमरा एक साथ खड़ा हो गया।
जज धीमे, नापे-तुले क़दमों से अंदर आया, अपनी कुर्सी तक पहुँचा, और एक पल के लिए पूरे कमरे पर नज़र घुमाई, गैलरी, वकील, कठघरा, सब।
अदालत के लिपिक ने रोज़नामचा पुकारा, वृंदा और खानविलकर दोनों खड़े होकर हाज़िरी दर्ज करवाई, दोनों के चेहरे आज किसी भी दिन से ज़्यादा सपाट, जैसे दोनों ने अपनी-अपनी भावनाओं को बाहर छोड़ आए हों।
कमरे में हर आवाज़ अपने आप धीमी पड़ती गई, बाहर गलियारे की भीड़ की गुनगुनाहट भी शीशे के पार अटक कर रह गई, जैसे इमारत ख़ुद भी साँस रोके खड़ी हो।
वैशाली की साँस एक पल के लिए अटक गई, महीनों की मेहनत, हर सबूत, हर रात की नींद, सब उस एक कुर्सी पर बैठे आदमी के हाथ में सिमट आया था।
जज ने सामने रखी मोटी फ़ाइल खोली, काग़ज़ों को एक बार धीरे से पलटा, फिर ऊपर देखा। वैशाली के मन में एक साथ लोहागढ़ की वो पहली सुबह, वो जूतों के निशान, वो पुतला, और अमेय की काँपती आवाज़, सब एक साथ कौंध गए।
"अभियुक्त खड़े हों," जज की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई। पिया और चिराग धीरे-धीरे अपनी जगह से उठे, कठघरे की लकड़ी थामे, और पूरी अदालत ने एक साथ साँस रोक ली, क्योंकि आज, आख़िरकार, फ़ैसला शुरू होने वाला था।
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