Chapter 19 of 30 10 min read
घाट की सड़क
वैशाली रुतुजा के साथ मलावली-लोनावला की हर सीसीटीवी खंगालती है और एक पेट्रोल पंप के कैमरे में उस हुडी वाले को बाइक पर पकड़ लेती है, जिसकी अधूरी नंबर प्लेट चिराग की बाइक से मेल खाती है। गावडे अब पूरी तरह उसके साथ खड़े हैं, और वैशाली जज की माँगी "सीधी" फ़िज़िकल साबिती के लिए लोहागढ़ पर वज़न वाले पुतले का प्रयोग करने का फ़ैसला कर लेती है।
वो परछाईं अभी भी स्क्रीन पर जमी हुई थी, जब वैशाली ने रुतुजा का नंबर डायल किया, आधी रात के थाने में सिर्फ़ पंखे की गूँज और उसकी अपनी बेचैन साँसें। फ़ोन दूसरी घंटी पर उठ गया।
"मैडम, इतनी रात को..." "क्या हुआ? आवाज़ से लग रहा है कुछ मिल गया।"
"केयूर की आख़िरी सेल्फ़ी में एक परछाईं है, रुतुजा। हुडी, हेडफ़ोन, बुर्ज की टूटी सीढ़ी के पास खड़ा।" "अब मुझे सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं चाहिए। मुझे उस आदमी को सड़क पर, बाइक पर, चलते हुए चाहिए।"
"हुलिया वही है जो भाजे के ढाबे वाले ने बताया था, मैडम, काली हुडी, हेडफ़ोन।" "पर एक फ़ोटो अकेले अदालत में नहीं टिकेगी, हमें उसे किसी हिलती हुई तस्वीर से जोड़ना होगा, कोई ऐसी जगह जहाँ वो चला हो।"
लोनावला से लोहागढ़ तक जाने के तीन ही रास्ते थे, एक्सप्रेसवे का एग्ज़िट, घाट की पुरानी सड़क, और मलावली स्टेशन का कच्चा मोड़। हर रास्ते पर कहीं न कहीं एक कैमरा ज़रूर लगा होता है, टोल पर, पेट्रोल पंप पर, किसी दुकान की चौखट पर।
"मैं सुबह होते ही हर टोल और हर पंप को नोटिस भेजती हूँ, मैडम।" "जितनी फ़ुटेज बच सकती है, बचा लेते हैं, कुछ जगह तो हफ़्ते भर में ओवरराइट हो जाती है।"
"तो अभी शुरू करो, सुबह का इंतज़ार मत करो।" "जज ने सीधा सबूत माँगा है, रुतुजा। ये तस्वीर सबूत का इशारा है, सबूत नहीं। मुझे उस बाइक की शक्ल चाहिए, उसकी नंबर प्लेट चाहिए।"
सुबह होते ही वैशाली गावडे के दफ़्तर पहुँची, हाथ में एक फ़ाइल जिसमें निजी पेट्रोल पंपों और टोल कंपनियों को भेजे जाने वाले नोटिस का मसौदा था, सीआरपीसी की वो धारा जो बिना जिसे पंप मालिक फ़ुटेज देने से मना कर सकते थे।
"इतने सारे नोटिस, कदम? हर एक पर मेरा दस्तख़त चाहिए होगा।" "मीडिया अभी भी घूम रही है इस केस के इर्द-गिर्द। कुछ पक्का मिलेगा इसमें, या फिर वही, समय की बर्बादी?"
"सर, हर छूटा हुआ कैमरा एक दिन और है जो हमारे हाथ से निकल रहा है।" "आप दस्तख़त कर दें, बाक़ी मैं सँभाल लूँगी।"
गावडे ने एक लंबी साँस ली, पेन उठाया, और बिना पूरा मसौदा पढ़े हर पन्ने पर दस्तख़त करते गए, जैसे किसी बहस में हारना जानते हुए भी सामने वाले की ज़िद के आगे झुक रहे हों।
"ठीक है। पर जल्दी करो, कदम। ऊपर वाले हमेशा तक धीरज नहीं रखेंगे।" "जाओ।"
उसी दोपहर मावळ थाने की एक जीप उन तीनों रास्तों पर निकल पड़ी, हर पंप, हर टोल बूथ, हर दुकान से एक ही सवाल लेकर, उस भोर की रिकॉर्डिंग बची है क्या।
कुछ जगह जवाब था नहीं, कैमरा ख़राब था, कुछ जगह डेटा हफ़्ते भर पहले ही मिट चुका था। एक टोल बूथ का मैनेजर बोला, सिस्टम पिछले महीने अपग्रेड हुआ, पुराना सब डिलीट। तीन दिन में सत्रह जगहों से इनकार आया, और हर इनकार के साथ वैशाली की उम्मीद थोड़ी और पतली होती गई।
"अठारहवीं जगह बाक़ी है, रुतुजा। मलावली का वो पुराना पेट्रोल पंप, हाईवे से हटकर।" "वहाँ का मालिक बूढ़ा है, पर उसका सिस्टम पुराना, धीमा... और अक्सर पुरानी चीज़ें सबसे लंबा टिकती हैं।"
साइबर सेल के छोटे से कमरे में रुतुजा की स्क्रीन पर उस पंप की तीस दिन पुरानी रिकॉर्डिंग लोड हुई, दानेदार, काली-सफ़ेद, टाइमस्टैंप की एक धुंधली लकीर कोने में टिमटिमाती हुई।
"पाँच बजे से शुरू करती हूँ, मैडम, केक की दुकान के बिल से एक घंटा पहले।" "अगर कोई अकेला बाइक पर उस तरफ़ गया, तो यहीं दिखेगा।"
मिनट रेंगते रहे, स्क्रीन पर सिर्फ़ ट्रकों की धीमी क़तार, एक साइकिल वाला, एक कुत्ता सड़क पार करता हुआ। फिर, छह बजकर आठ मिनट पर, फ़्रेम में कुछ हिला।
"मैडम... रुकिए।" "वो देखिए, कोने से। एक बाइक, अकेला सवार, काली हुडी।"
फ़्रेम धुंधली थी, फ़ुल फ़ेस नहीं, पर जैकेट का कट, कंधों का झुकाव, बाइक का ढाँचा, सब कुछ उसी हुलिये से मेल खाता था जो भाजे के ढाबे वाले ने महीनों पहले बयान किया था।
"टाइमस्टैंप ज़ूम करो।" "छह बजकर आठ मिनट, लोहागढ़ की तरफ़ जाता हुआ... केयूर के गिरने से ठीक सत्रह मिनट पहले।"
"ये वक़्त बिल्कुल फ़िट बैठता है, मैडम। पैदल चढ़ाई में बीस मिनट लगते हैं इस पॉइंट से बुर्ज तक।" "अगर ये वही आदमी है, तो वो ठीक वक़्त पर, ठीक जगह था।"
अगले दिन रुतुजा फ़्रेम को लैब में ले गई, हर पिक्सेल को साफ़ करने, हर धुंधलेपन को थोड़ा और तराशने, नंबर प्लेट के उस आधे हिस्से को उभारने जो कीचड़ और दूरी ने छुपा रखा था।
"एम एच बारह... फिर तीन अंक धुंधले... फिर एक अक्षर, शायद बी, शायद ई..." "पूरा नहीं मिलेगा, मैडम, पर आधा भी काफ़ी है अगर मैच मिल जाए।"
उसने वो आधा नंबर, बाइक का मॉडल और रंग, आरटीओ के डेटाबेस में डाला, सैकड़ों मिलती-जुलती गाड़ियाँ स्क्रीन पर उतर आईं, एक-एक करके छाँटी जाती हुईं।
"धीरे-धीरे करो, रुतुजा। जल्दबाज़ी में ग़लत नाम पकड़ लिया तो पूरा केस उलटा पड़ जाएगा।" "हमारे पास एक ही मौक़ा है, सही निशाना चुनने का।"
"रंग, मॉडल, आधा नंबर, इलाक़ा... सूची अभी भी लंबी है।" "...रुकिए। मैडम, ये देखिए।"
"क्या मिला?" "बोलो, रुतुजा।"
"एक रजिस्ट्रेशन है, पुणे के पते पर, बाप के नाम पर, पर इस्तेमाल बेटे का दर्ज है।" "मॉडल भी वही, रंग भी वही, और नंबर के जो अंक साफ़ हैं, वो सब मैच करते हैं। ये चिराग भाटिया की बाइक है, मैडम।"
"सिर्फ़ बाइक काफ़ी नहीं, रुतुजा। टावर डंप निकालो, उसी नंबर की, उसी दिन की, और देखो क्या वो टाइमस्टैंप मलावली टावर के डेटा से भी मिलता है।" "दो अलग सबूत, एक ही सच बोलें, तभी अदालत में टिकेगा।"
"मैडम, याद है वो पहला टावर डंप जो हमने महीनों पहले निकाला था, चिराग का बरनर उसी आधे घंटे में उसी टावर पर था।" "अब ये सीसीटीवी उसी आधे घंटे में उसी सड़क पर उसी बाइक को दिखाती है। दोनों एक-दूसरे को थामे खड़े हैं।"
रुतुजा ने दोनों टाइमलाइन को स्क्रीन पर बगल-बगल खोला, एक टावर पिंग की, एक सीसीटीवी फ़्रेम की, और दोनों की सुइयाँ ठीक उसी सत्रह मिनट के खाँचे पर आकर मिल गईं।
कमरे में एक पल को कोई नहीं बोला। महीनों की चैट, कोड, बरनर फ़ोन, डीएनए, सबके बाद, अब एक सीधी, साफ़ तस्वीर थी, चिराग भाटिया की अपनी बाइक, उसी सुबह, उसी सड़क पर, उसी पहाड़ की तरफ़।
वैशाली को सुष्मा का चेहरा याद आया, वो वादा जो उसने कुछ दिन पहले ही ख़ुद किया था, ये तोहफ़ा जो केयूर पिया को कभी नहीं दे पाया, मैं उसे इंसाफ़ की शक्ल में दिलवाऊँगी। ये फ़्रेम उस वादे की तरफ़ एक और मज़बूत क़दम था।
"उसने कहा था, वो पुणे में था उस दिन।" "अब हमारे पास वो फ़्रेम है जो उसका वो झूठ हमेशा के लिए तोड़ देगा।"
उसी शाम गावडे ख़ुद साइबर सेल के कमरे में आ पहुँचे, वो आदमी जिसने महीनों पहले वैशाली को फ़ाइल बंद करने का हुक्म दिया था, अब उस स्क्रीन के सामने झुका खड़ा था।
"दुबारा चलाओ।" "वो टाइमस्टैंप वाला हिस्सा।"
रुतुजा ने फ़्रेम फिर चलाई, बाइक, हुडी, टाइमस्टैंप, फिर वो रुका हुआ फ़्रेम जिस पर नंबर प्लेट का आधा हिस्सा साफ़ चमक रहा था।
"पंद्रह साल की नौकरी में, कदम, मैंने बहुत केस देखे जो कहानी से टूटते हैं।" "ये पहला है जो सड़क के एक कैमरे से टूटा।"
"मैंने आपसे कभी झूठ नहीं कहा था, सर।" "बस वक़्त माँगा था।"
"हाँ। और मैंने ग़लत वक़्त पर ग़लत सलाह दी थी।" "ये लड़की केस जीत जाएगी। लिख लो, कोई भी।"
रुतुजा ने एक नज़र वैशाली की तरफ़ देखी, आँखों में हल्की सी मुस्कान, वो लम्हा जो महीनों की थकान के बीच किसी तोहफ़े जैसा लगा।
पर वैशाली की मुस्कान ज़्यादा देर नहीं टिकी। उसने जज की वो चेतावनी याद की, अदालत में गूँजी वो लाइन, सीधा सबूत लाओ, वरना केस टिकेगा नहीं।
"सर, ये फ़्रेम बहुत बड़ा है, पर अकेला काफ़ी नहीं।" "खानविलकर अदालत में कहेगा, बाइक वहाँ थी, इसका मतलब चिराग ने धक्का दिया, ये साबित नहीं होता।"
"तो अब क्या चाहिए तुम्हें, कदम?" "डीएनए है, कोड है, फ़ोन है, बाइक है। और कितना सबूत माँगेगी अदालत?"
"डॉक्टर मोरे ने एक बार कहा था, सर, कि केयूर का शरीर उस जगह से बहुत आगे गिरा था जहाँ एक साधारण फिसलन उसे ले जा सकती थी।" "मुझे ये सिर्फ़ कहना नहीं, दिखाना है। आँखों के सामने।"
गावडे और रुतुजा दोनों ने वैशाली की तरफ़ देखा, वो जानते थे उसकी आवाज़ के उस लहज़े का मतलब क्या होता है, एक फ़ैसला जो पहले ही हो चुका था।
"हम लोहागढ़ पर दुबारा जाएँगे। केयूर के ठीक वज़न का एक पुतला बनवाएँगे, ठीक उसी जगह से, ठीक उसी दिशा में गिराएँगे।" "अगर वो पुतला उस खाई तक नहीं पहुँचता जहाँ केयूर का शरीर मिला था, तो अदालत को अपना सीधा सबूत मिल जाएगा।"
"ये महँगा होगा, काग़ज़ी काम भी बहुत, ऊपर से मंज़ूरी लेनी पड़ेगी।" "पर तुमने अब तक जो किया है उसके बाद... मैं ख़ुद वो मंज़ूरी दिलवाऊँगा, कदम।"
"मैं फ़ोरेंसिक टीम से पुतले का वज़न और नाप तैयार करवाती हूँ, मैडम। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में केयूर की लंबाई और वज़न दोनों दर्ज हैं।" "डॉक्टर मोरे को भी साथ बुलाना होगा, वहीं मौक़े पर।"
"लोहागढ़ किला संरक्षित इमारत है, कदम। वन विभाग और पुरातत्व वालों से भी इजाज़त लेनी पड़ेगी, सिर्फ़ मेरी मंज़ूरी काफ़ी नहीं।" "पर मैं ख़ुद वो काग़ज़ात आज ही भिजवाता हूँ, इतना वादा है।"
"शुक्रिया, सर।" "रुतुजा, हमें उसी वक़्त की रौशनी चाहिए होगी, ठीक भोर के वक़्त, ठीक वैसी ही धुंध जैसी उस सुबह थी। तभी तुलना सही मानी जाएगी।"
"मैं मौसम विभाग से उस दिन की रिपोर्ट भी निकलवाती हूँ, मैडम, हवा की रफ़्तार, नमी, सब कुछ।" "अगर हम ये प्रयोग करते हैं, तो एक भी कोर कच्ची नहीं रहनी चाहिए, वरना खानविलकर उसी में से छेद ढूँढ लेगा।"
कमरे में एक ख़ामोशी उतर आई, तीन लोग, एक स्क्रीन पर जमा फ़्रेम, और एक फ़ैसला जो अब किसी हुक्म का नहीं, किसी शक़ का भी नहीं, बल्कि गुरुत्वाकर्षण के एक सीधे, बेरहम सवाल का इंतज़ार करने वाला था।
वैशाली ने अपनी डायरी में एक आख़िरी लाइन लिखी, उस रात की तारीख़ के नीचे, "पहाड़ ख़ुद बताएगा, वो सिर्फ़ गिरा, या गिराया गया।" फिर उसने पेन बंद किया, और खिड़की के बाहर घाट की सड़क पर उतरता अँधेरा देखने लगी।
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