Chapter 12 of 30 10 min read
काली हुडी
भाजे गाँव के पास एक पुलिया के नीचे मिली काली हुडी में चिराग का पसीने का डीएनए और केयूर के बाल के रेशे दोनों मिलते हैं, डॉक्टर मोरे पुष्टि करते हैं कि दोनों आदमी उस सुबह जितने क़रीब थे उतने अजनबी कभी नहीं होते। फ़्लैशबैक में चिराग हुडी और हेडफ़ोन पहनकर, चेहराविहीन, लोनावला पहुँचता है, और वर्तमान में डीएनए रिपोर्ट लेकर वैशाली ख़ुद बेख़बर चिराग के सामने पूछताछ कमरे की देहली पर आ खड़ी होती है।
टूटी सीढ़ी वाली खोज हफ़्ते भर के लिए एक नई मुहिम में बदल गई। वैशाली ने मलावली-भाजे इलाक़े की हर पुलिया, हर नाला, हर सूखी झाड़ी तलाशने का हुक्म दिया, उस पूरे रास्ते पर जहाँ से चिराग रेकी करके लौटा था।
दो कॉन्स्टेबल हर रोज़ सुबह निकलते, हाथ में लंबी लाठियाँ, झाड़ियों को खंगालते, नालों में झाँकते। पाँच दिन ख़ाली हाथ लौटे, छठे दिन एक ढाबेवाले ने बताया कि पुलिया के पास कभी-कभी बच्चे खेलते हुए अजीब चीज़ें निकाल लाते हैं।
सातवें दिन, भाजे गाँव के पास एक पुरानी पुलिया के नीचे, एक हवलदार को कीचड़ में आधा-दबा एक काला पॉलिथीन बैग मिला। बैग के अंदर एक काली हुडी थी, और उसके साथ टूटे हुए हेडफ़ोन, तार बीच से कटे हुए।
वैशाली ख़ुद मौक़े पर पहुँची, दस्ताने चढ़ाए, और बैग को बिना छुए, सबूत की तरह उठवाया। उसकी आँखों में महीनों की मेहनत और एक अजीब सी शांति दोनों थीं।
"भाजे के ढाबे वाले ने यही बताया था, याद है?" "काली हुडी, कानों में हेडफ़ोन, न चाय, न बात, बस पहाड़ की तरफ़ चला गया।" "अब वो हुडी हमारे हाथ में है।"
बैग सीधे पुणे की फ़ोरेंसिक लैब भेजा गया, सील बंद, हर हाथ का रिकॉर्ड काग़ज़ पर, ताकि कोई वकील बाद में चेन-ऑफ़-कस्टडी पर सवाल न उठा सके। डॉक्टर मोरे ने, पोस्टमार्टम के हफ़्तों बाद, एक बार फिर अपने दस्ताने पहने। इस बार लाश नहीं, एक कपड़ा उनकी मेज़ पर था।
तीन दिन बाद वैशाली और रुतुजा लैब में डॉक्टर मोरे के सामने बैठी थीं, रिपोर्ट की फ़ाइल उनके हाथ में।
"मैडम कदम, ये हुडी बहुत काम की निकली।" "कॉलर के अंदर, गर्दन के पास, पसीने के निशान से डीएनए मिला है। ताज़ा, साफ़, बिना किसी दूषण के।"
"किसका डीएनए, डॉक्टर?"
"चिराग भाटिया का।" "उसके ख़ून के नमूने से मैच सौ फ़ीसदी है, एक अरब में एक का इत्तेफ़ाक़ भी नहीं।" "पर एक और चीज़ मिली है, मैडम, जो शायद इससे भी ज़्यादा अहम है।"
"क्या, डॉक्टर?"
"हुडी की ज़िप के पास, वेलक्रो में उलझे दो बाल के रेशे।" "मैंने उन्हें केयूर मलपानी के पोस्टमार्टम सैंपल से मिलाया।" "मैच हो गए।"
"और बालों की जड़ भी सलामत मिली, मैडम, इसलिए सिर्फ़ अंदाज़ा नहीं, पूरी न्यूक्लियर डीएनए प्रोफ़ाइल बनी।" "ये कोई धुँधला मैच नहीं है।"
"मतलब कोई शक की गुंजाइश नहीं बचती?"
"अदालत के मापदंड से भी ऊपर, मैडम।" "ये रिपोर्ट किसी जिरह में नहीं टूटेगी।"
कमरे में एक भारी ख़ामोशी उतर आई। हम जानते थे ये दोनों उस सुबह कितने क़रीब थे। अब विज्ञान भी वही बात कह रहा था।
"मतलब... चिराग की हुडी पर केयूर के बाल?" "डॉक्टर, ये कैसे मुमकिन है, अगर वो दोनों कभी मिले ही नहीं?"
"मुमकिन नहीं है, मैडम।" "दो अजनबी आदमी, जिनकी कभी मुलाक़ात न हुई हो, उनके शरीर के रेशे एक-दूसरे के कपड़ों पर नहीं आते।" "ये सिर्फ़ पास खड़े होने से नहीं होता। ये उतना क़रीब होने से होता है, जितना... एक हाथापाई में, या एक धक्के में होता है।"
डॉक्टर मोरे के शब्द कमरे में देर तक तैरते रहे। इतने क़रीब जितने अजनबी कभी नहीं होते।
"और हेडफ़ोन, रुतुजा?" "वो टूटे हुए तार, उनका क्या?"
"मैडम, हेडफ़ोन के अंदर एक सीरियल नंबर था, आधा घिसा हुआ, पर पढ़ने लायक़।" "मैंने कंपनी से रिकॉर्ड मँगवाया।" "ये मॉडल पुणे के सिर्फ़ एक शोरूम में बिका है, पिछले साल, कुल तीन पीस।"
"तीन में से एक?"
"एक ग्राहक ने कार्ड से पेमेंट किया था, मैडम।" "वही कार्ड, जिससे बरनर सिम का पहला रिचार्ज हुआ था। नाम, चिराग भाटिया।"
"और तारीख़ भी मिलती है, मैडम। ये ख़रीद ट्रेक से ठीक तीन हफ़्ते पहले हुई थी।" "ठीक उसी दौर में जब बरनर सिम का रिचार्ज पैटर्न अचानक तेज़ हो गया था।"
"यानी हेडफ़ोन भी उसी योजना का हिस्सा था, शुरू से।" "इश्क़ का तोहफ़ा नहीं, एक औज़ार।"
एक और कड़ी, एक ही आदमी की तरफ़ इशारा करती। डीएनए, बाल के रेशे, हेडफ़ोन का सीरियल नंबर, कार्ड की एक ही ट्रेल, सब एक ही नाम पर आकर रुक रहे थे।
वारदात से एक रात पहले चलते हैं। पुणे के एक सुनसान फ़्लैट में, चिराग ने अलमारी से वही काली हुडी निकाली, इस्त्री की हुई, तैयार, जैसे किसी ख़ास दिन के लिए रखी गई हो।
उसने हुडी पहनी, हेडफ़ोन गले में लटकाए, और आईने में ख़ुद को देखा। आईने में अब चिराग भाटिया नहीं था, एक हुड में लिपटा साया था, चेहराविहीन, अनदेखा।
जाने से पहले उसने तीन बार अपनी बाइक की चाबी जेब में टटोली, हालाँकि वो हर बार वहीं मिली। एक नन्हा-सा, बेवजह डर, जिसे वो ख़ुद भी नाम नहीं दे पा रहा था।
रात के अंधेरे में उसने बाइक निकाली और एक्सप्रेसवे की तरफ़ मोड़ दी। टोल नाके पर हेलमेट नीचे खींचा, हुडी का हुड और ऊपर चढ़ाया। किसी कैमरे ने उसका चेहरा नहीं देखा, सिर्फ़ एक जैकेट, एक बाइक, एक धुँधली नंबर प्लेट।
लोनावला पहुँचकर उसने बाइक एक पुरानी टपरी के पीछे खड़ी की, दस मिनट रुका, हेडफ़ोन में गाना नहीं बजा, सिर्फ़ ख़ामोशी सुनता रहा। कोई इंसान वहाँ से गुज़रा भी होता, तो सिर्फ़ एक हुडी वाला अजनबी देखता, कुछ और नहीं।
एक पल के लिए उसकी उँगलियाँ फ़ोन पर रुकीं, पिया का नाम स्क्रीन पर। उसने मैसेज नहीं भेजा। बस फ़ोन जेब में रख लिया, जैसे कोई आख़िरी नरमी भी पीछे छोड़नी हो।
फिर उसने हेडफ़ोन के तार जेब में समेटे और अँधेरे में उस पगडंडी की तरफ़ चल दिया जो उसने दस दिन पहले ख़ुद नापी थी। कोई हिचक नहीं, कोई मुड़कर देखना नहीं। सिर्फ़ एक साया, अंधेरे में घुलता हुआ।
और हमें पता था वो कहाँ जा रहा था। उस बुर्ज के पीछे, जहाँ सात सीढ़ियाँ थीं, आठवीं टूटी हुई, और उसके बाद सिर्फ़ एक सीधा उतार।
काम पूरा होने के घंटों बाद, अंधेरा अभी पूरी तरह छँटा नहीं था, चिराग मलावली-भाजे की सुनसान सड़क पर एक पुरानी पुलिया के पास बाइक रोककर उतरा। उसने हुडी उतारी, हेडफ़ोन के तार बीच से मरोड़कर तोड़े, दोनों एक काले पॉलिथीन बैग में ठूँसे।
कोई शब्द नहीं, कोई फुसफुसाहट भी नहीं, सिर्फ़ हाथों की फुर्ती। उसने बैग को पुलिया के नीचे कीचड़ में धकेल दिया और बाइक स्टार्ट कर दी। वो ग़लत नहीं था, कोई नहीं देखेगा, सात दिन तक। पर मिट्टी और वक़्त भी गवाह बन जाते हैं, अगर कोई ढूँढने की ज़िद कर ले।
लैब में वापस, वर्तमान में, वैशाली ने रिपोर्ट की आख़िरी लाइन पढ़ी और फ़ाइल बंद की। उसके हाथ अब नहीं काँप रहे थे।
"डॉक्टर मोरे, एक बात साफ़ करो मेरे लिए।" "अगर ये हुडी और ये डीएनए अदालत में रखे जाएँ, तो चिराग की वो अलीबाई का क्या होगा, 'मैं उस दिन पुणे में था, कभी लोहागढ़ गया ही नहीं'?"
"फिर वो अलीबाई झूठ साबित होगी, मैडम।" "विज्ञान झूठ नहीं बोलता। ये कपड़ा कहता है, वो आदमी उस सुबह, उस पहाड़ पर, केयूर मलपानी के इतना क़रीब था जितना कोई अजनबी कभी नहीं होता।"
इतने क़रीब जितने अजनबी कभी नहीं होते। डॉक्टर मोरे ने वो लाइन दोबारा कही, इस बार वैशाली के लिए नहीं, रिकॉर्ड के लिए।
"मैडम, अब जोड़कर देखिए।" "रेकी वाला मैसेज, सात सीढ़ियों की गिनती, बंद रास्ता। फिर हेडफ़ोन की ख़रीद, चिराग के कार्ड से। अब डीएनए, केयूर के बाल, उसी हुडी पर।"
"एक-एक कड़ी अपनी जगह बैठ रही है, रुतुजा।" "अब ये सिर्फ़ कोड और शक नहीं है। ये एक आदमी है, एक हुडी में, एक पहाड़ पर, एक मौत के वक़्त।"
वैशाली ने अपनी फ़ाइल में तीन काग़ज़ जोड़े, डीएनए रिपोर्ट, हेडफ़ोन का ख़रीद रिकॉर्ड, और सीढ़ियों वाला मैसेज। तीनों मिलकर वो चीज़ बन गए जिसकी उसे महीनों से तलाश थी।
"गावडे सर से कहो, आज दोपहर चिराग भाटिया को थाने बुलाया जाए।" "'रूटीन फ़ॉलो-अप' के नाम पर। मैं ख़ुद बात करूँगी।"
"मैडम, अगर उसे शक हो गया कि हमारे पास डीएनए है..."
"उसे कुछ पता नहीं चलेगा, रुतुजा।" "वो अब भी सोचता होगा कि उसकी अलीबाई पत्थर की तरह ठोस है।" "आज पहली बार, कमरे में वो नहीं, मैं ताक़तवर होकर जाऊँगी।"
उसे गावडे की वो पुरानी चेतावनी याद आई, 'बिना सबूत अमीर लड़के को छूना तुम्हारी नौकरी ले लेगा।' आज पहली बार वो सबूत काग़ज़ पर, उसके हाथ में, सील बंद लिफ़ाफ़े में था।
थाने से फ़ोन गया, एक कॉन्स्टेबल की सीधी, बेरंग आवाज़ में, "सर, बस एक रूटीन फ़ॉलो-अप है, कुछ काग़ज़ात पर दस्तख़त चाहिए।" दूसरी तरफ़ से चिराग की हँसी गूँजी, बेफ़िक्र, हल्की, जैसे किसी दोस्त का बुलावा हो।
दोपहर को, थाने के गलियारे में क़दमों की आवाज़ गूँजी। चिराग भाटिया हमेशा की तरह मुस्कुराता हुआ अंदर आया, हाथ जेब में, बेफ़िक्र।
वो इंतज़ार वाले कमरे में बैठा, हेडफ़ोन इस बार गले में नहीं, बैग में, एक नई जोड़ी, पुरानी वाली की जगह ख़रीदी हुई। उसे नहीं पता था कि पुरानी जोड़ी अभी फ़ोरेंसिक लैब की शेल्फ़ पर, एक लिफ़ाफ़े में बंद, उसका इंतज़ार कर रही थी।
और हमें पता था कि वो मुस्कुराहट कितनी खोखली थी। एक आदमी, बेख़बर, अपने ही जुर्म के सबूत से बस एक दरवाज़े की दूरी पर बैठा था।
वैशाली ने फ़ाइल उठाई, डीएनए रिपोर्ट सबसे ऊपर, और गलियारे में क़दम बढ़ाए। रुतुजा उसके पीछे, हाथ में वही हुडी, अब सबूत के लिफ़ाफ़े में सील बंद।
"रुतुजा..." "आज इस कमरे में जो जाएगा, वो सवाल पूछने नहीं जाएगा।" "वो जवाब लेकर जाएगा।"
गलियारे की खिड़कियों से शाम की तिरछी धूप अंदर आ रही थी, दीवार पर वैशाली की परछाईं लंबी होती जा रही थी, हर क़दम के साथ। उसने एक बार भी फ़ाइल नीचे नहीं की।
इंटरव्यू रूम का दरवाज़ा भीतर से खटका। अंदर, चिराग ने अपनी घड़ी देखी, फिर दरवाज़े की तरफ़, वही पुरानी, आत्मविश्वास से भरी मुस्कान चेहरे पर सजाए।
दरवाज़ा खुला। वैशाली दहलीज़ पर खड़ी थी, फ़ाइल सीने से लगाए, और उसकी आँखों में इस बार न कोई सवाल था, न कोई उलझन। सिर्फ़ एक ठंडी, आख़िरी यक़ीन।
चिराग की मुस्कान एक पल के लिए वहीं ठहर गई, कुछ अनकहा हवा में तैर गया। बाहर लोनावला के घाटों पर शाम उतर रही थी, पर उस छोटे से कमरे में, दरवाज़े की देहली पर, वक़्त जैसे रुक गया था। अब सिर्फ़ एक क़दम बाक़ी था।
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts.