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Chapter 24 of 30 10 min read

अदालत में समुद्र

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

"माननीय, अभियोजन आज अदालत के सामने वो सबूत रखेगा जो एक 'हादसे' की कहानी को हमेशा के लिए तोड़ देगा," वृंदा आप्टे की आवाज़ शिवाजीनगर अदालत के कमरा नंबर छह में गूँजी, ठीक उसी वक़्त जब जज ने बेंच संभाली। गैलरी खचाखच भरी थी, वैशाली पिछली क़तार में बैठी, हाथ मुट्ठी में भिंचे।

कठघरे में पिया और चिराग बग़ल-बग़ल खड़े थे, पर बीच का फ़ासला साफ़ झलकता था, जैसे महीनों की क़ैद ने उनका पुराना भरोसा भी तोड़ दिया हो। खानविलकर अपनी फ़ाइलें सजाते हुए एक हल्की मुस्कान लिए बैठा था, आत्मविश्वास से भरा हुआ।

वृंदा ने एक मोटी फ़ाइल खोली, जिसमें रुतुजा की रिकवर की हुई हर चैट प्रिंट होकर हाइलाइट किए कोड शब्दों के साथ लगी थी। उसने पहला पन्ना उठाया और धीमी, स्पष्ट आवाज़ में अदालत के सामने पढ़ना शुरू किया।

"माननीय, बीस मार्च की रात पिया मित्तल के बरनर नंबर से चिराग भाटिया के बरनर नंबर पर एक मैसेज गया था, 'समुद्र लगभग तैयार है, बस ट्रेक वाला दिन तय करना है।'" "अभियोजन का कहना है कि माननीय, यहाँ 'समुद्र' प्रेम नहीं, एक योजना का कोड नाम है।"

अदालत में हर सिर एक साथ ऊपर उठा, पत्रकारों की क़लमें रुक गईं। जज ने चश्मा ठीक किया और वृंदा को इशारा किया कि आगे बढ़े।

"और यहाँ, माननीय, केयूर मलपानी के गिरने के ठीक एक घंटे बाद भेजा गया मैसेज, 'समुद्र शांत हो गया, अब हम आज़ाद हैं।'" "हम अदालत से कहते हैं कि 'समुद्र' शांत होना यानी केयूर मलपानी की मौत, और 'आज़ाद' होना यानी उस शादी से आज़ादी जो पिया मित्तल कभी नहीं चाहती थी।"

कठघरे में पिया की आँखें नीचे झुक गईं, उँगलियाँ काँपती हुई एक-दूसरे में उलझ गईं। चिराग का चेहरा हिला भी नहीं, पर उसकी जबड़े की हड्डी सख़्त हो गई।

"'पंछी उड़ गया' का इस्तेमाल भी उसी दिन, उसी घंटे में हुआ। अभियोजन का कहना है कि ये एक प्यारी सी भाषा नहीं, एक अपराध की रिपोर्टिंग है, कोड में लिखी हुई।"

"और माननीय, यही तीनों कोड, 'समुद्र,' 'पंछी उड़ गया,' और 'ट्रेक वाला दिन,' पिछले तीन महीनों की चैट में बार-बार, हमेशा एक साथ, हमेशा एक ही घटना के आसपास इस्तेमाल हुए हैं।"

अदालत के पिछले हिस्से में दो स्केच आर्टिस्ट तेज़ी से पिया और चिराग के चेहरे उतार रहे थे, कल के अख़बारों के लिए। यह मुक़दमा अब सिर्फ़ शिवाजीनगर की अदालत का नहीं, पूरे शहर की सुबह की चाय पर चर्चा का विषय बन चुका था।

जज ने हर हाइलाइट किए पन्ने को पलटते हुए देखा, कोई सत्रह अलग-अलग तारीख़ों की बातचीत, हर एक तारीख़ के आगे एक असली घटना का हवाला। कमरे में इंतज़ार भारी हो चला था, जैसे हर कोई जानना चाहता हो कि इतने सबूत के बाद बचाव पक्ष क्या कहेगा।

गैलरी में बैठी वैशाली की नज़र जज के चेहरे पर टिकी थी, हर एक शब्द पर उसकी भौंहें हल्की सी हिल रही थीं। उसे पता था कि यही वो पल है जिसके लिए उसने महीनों जूझा था, कोड को अदालत के सामने खोलना।

खानविलकर धीरे से खड़ा हुआ, अपनी काली गाउन ठीक करते हुए, चेहरे पर वही भरोसेमंद मुस्कान। उसने वृंदा की फ़ाइल की तरफ़ इशारा करते हुए बोलना शुरू किया।

"माननीय, मुझे अभियोजन के नाटकीय अनुवाद पर हैरानी है।" "दो प्रेमी, जो सालों से चोरी-छिपे मिल रहे थे, अपनी बातचीत के लिए प्यारे उपनाम बनाएँ, ये तो दुनिया भर के प्रेमी करते हैं।"

"'समुद्र' का मतलब शादी से आज़ादी भी हो सकता है, कोई बुरा सपना, कोई पुराना झगड़ा, या बस दो जवान दिलों की निजी भाषा।" "इसमें हत्या कहाँ लिखी है माननीय? कोई शब्द नहीं, कोई नाम नहीं, कोई तारीख़ का सीधा ज़िक्र नहीं।"

गैलरी में बैठे पिया के पिता विनोद एक पल के लिए राहत से सीधे हुए, जैसे खानविलकर की दलील ने उनके सीने का कुछ बोझ हल्का कर दिया हो। सुष्मा और नरेश की क़तार से बस एक ख़ामोश, सख़्त नज़र उस तरफ़ गई।

जज ने वृंदा की फ़ाइल से नज़र उठाई और खानविलकर की तरफ़ देखा, माथे पर एक हल्की सिलवट उभर आई। वैशाली ने वो सिलवट देखी, और उसका दिल एक धड़कन के लिए रुक गया।

"माननीय, ये कोड अकेला नहीं खड़ा। ये टावर डेटा से जुड़ता है, हुडी के डीएनए से जुड़ता है, और एक चश्मदीद की गवाही से जुड़ता है जो सरकारी गवाह बन चुका है।" "अकेले कोड को नकारना आसान है माननीय, पूरी ज़ंजीर को नकारना नामुमकिन।"

"पर आज हम सिर्फ़ कोड की बात कर रहे हैं वृंदा जी, और आज तक इस अदालत में सिर्फ़ प्यार भरे शब्दों से किसी को हत्या का दोषी नहीं ठहराया गया।" "माननीय, अभियोजन भावनाओं का सहारा ले रहा है, सबूत का नहीं।"

"प्यार भरे शब्द अपराध को छुपाने के लिए भी इस्तेमाल होते हैं, वकील साहब, और यही अभियोजन साबित करेगा।"

अदालत में सरगोशियाँ शुरू हो गईं, पत्रकारों की पेन तेज़ी से चलने लगीं। गैलरी में वैशाली ने अपनी मुट्ठियाँ और कस लीं, जैसे वो ख़ुद उस कोड की ज़ंजीर को अपने हाथों से थामे रखना चाहती हो।

उसे याद आया कि कितनी रातें उसने रुतुजा के साथ बैठकर हर कोड शब्द को घटनाओं से मिलाया था, और आज वो सब मेहनत एक वकील की चतुर दलील के आगे डगमगाती दिख रही थी। उसने ख़ुद से कहा... अभी घबराने का वक़्त नहीं।

उसे सुष्मा की वो आवाज़ याद आई, हफ़्ते भर पहले अदालत के उसी गलियारे में कही गई, "तुम मत रुकना बेटी, तुम्हीं मेरे केयूर की आवाज़ हो।" उस एक वाक्य ने उसकी रीढ़ को फिर से सीधा कर दिया।

उसने जेब में रखा फ़ोन निकाला और रुतुजा को एक छोटा मैसेज टाइप किया, "तैयार रहना, अगली सुनवाई में तुम्हारी गवाही ही असली मोड़ होगी।" जवाब आया सिर्फ़ एक शब्द, "तैयार हूँ मैडम।"

जज ने दोनों वकीलों को हाथ के इशारे से रोका और वृंदा की तरफ़ देखा। "क्या अभियोजन के पास कोड के अलावा कोई सीधा सबूत है जो साबित करे कि इन शब्दों का मतलब वही है जो आप बता रही हैं?"

"माननीय, कोड शब्दों का सीधा अनुवाद हम इसी हफ़्ते साइबर विशेषज्ञ रुतुजा साळुंके की गवाही से अदालत के सामने रखेंगे, हर शब्द को समय, तारीख़ और घटना से जोड़कर।" "आज हम सिर्फ़ पहली कड़ी दिखा रहे हैं, पूरी ज़ंजीर अभी आनी बाक़ी है।"

"यानी माननीय, आज अभियोजन के पास सिर्फ़ अनुमान है, सबूत नहीं।" "मेरा निवेदन है कि जब तक ठोस सबूत पेश नहीं होता, अदालत इन 'अनुवादों' को गंभीरता से न ले।"

वृंदा का चेहरा शांत रहा, पर उसकी आँखों में एक चमक थी, जैसे वो जानती हो कि असली लड़ाई अभी शुरू ही हुई है। उसने जज की तरफ़ देखते हुए एक आख़िरी बात जोड़ी।

"माननीय, अभियोजन को थोड़ा धैर्य चाहिए। हर कड़ी अपनी बारी पर आएगी, फ़ोरेंसिक गवाही, डीएनए, सीसीटीवी, और वो दोस्त जो सब जानता था।" "जब सब एक साथ खड़ी होंगी, तब बचाव पक्ष के पास कहने को कुछ नहीं बचेगा।"

वैशाली ने एक लंबी साँस ली, उसे पता था कि वृंदा सही कह रही है, पर उसके भीतर एक पुराना डर भी जाग गया था, अगर जज को शुरू में ही शक हो गया, तो क्या वो शक आख़िर तक रहेगा? उसकी नज़र एक पल के लिए पिया के चेहरे पर गई, जो अब पहले से ज़्यादा सीधी खड़ी थी, जैसे खानविलकर की दलील से उसे थोड़ी हिम्मत मिली हो।

चिराग के होंठों पर एक हल्की, लगभग अदृश्य मुस्कान तैर गई, जो सिर्फ़ वैशाली की तजुर्बेकार नज़र ने पकड़ी। उसे लग रहा था जैसे आज की जीत पूरी लड़ाई की जीत हो।

जज ने कुछ पल के लिए दोनों तरफ़ की दलीलें तौलीं, कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि पंखे की घरघराहट तक साफ़ सुनाई दे रही थी। फिर उसने अपने सामने रखे काग़ज़ों पर कुछ लिखा और चश्मा उतारा।

जज ने कहा कि आज पेश किए कोड शब्द अकेले किसी को हत्या का दोषी ठहराने के लिए काफ़ी नहीं हैं, और अभियोजन को इन्हें बाक़ी सबूतों से ठोस तरीक़े से जोड़ना होगा।

"सिर्फ़ कोड शब्दों से हत्या साबित नहीं होती," जज ने कहा, चश्मा वापस पहनते हुए, "अभियोजन को इससे कहीं ज़्यादा चाहिए। अदालत अगली तारीख़ पर उठती है।"

गैलरी में एक हल्की सरगोशी दौड़ गई, खानविलकर ने संतोष से सिर हिलाया, कठघरे में चिराग की मुस्कान अब ज़रा और खुल गई। पिया ने पहली बार महीनों में सीधी नज़र से अदालत के कमरे को देखा, जैसे उम्मीद की एक हल्की किरण लौट आई हो।

"एक दिन... और केस पहले से कमज़ोर लग रहा है।" उसने वृंदा की तरफ़ देखा, जो अपनी फ़ाइलें समेट रही थी, चेहरे पर कोई घबराहट नहीं, पर वैशाली की अपनी साँसें तेज़ हो गई थीं।

वृंदा ने फ़ाइलें बंद करते हुए वैशाली की तरफ़ देखा, उसकी आँखों में हार का कोई निशान नहीं था। "ये सिर्फ़ पहला राउंड था कदम," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "असली लड़ाई अभी बाक़ी है।"

कठघरे से पिया और चिराग को अलग-अलग रास्तों से हवालात वापस ले जाया गया, चिराग ने जाते हुए एक बार वैशाली की तरफ़ देखा, आँखों में एक ठंडी, जीती हुई सी चमक। वैशाली ने वो नज़र सीधी झेली, बिना पलक झपकाए।

बाहर सीढ़ियों पर सुष्मा और नरेश उसका इंतज़ार कर रहे थे, चेहरे पर वो सवाल था जो वो पूछ नहीं पाईं। वैशाली ने बस इतना कहा, "आज का दिन आसान नहीं था, पर हम रुकेंगे नहीं," और सुष्मा ने चुपचाप सिर हिला दिया।

वैशाली गलियारे में अकेली खड़ी रह गई, चारों तरफ़ मीडिया की भीड़ छँट रही थी, पर उसके कानों में सिर्फ़ जज का वो एक वाक्य गूँज रहा था। उसने सोचा कि दस महीने की मेहनत, हर सबूत, हर कड़ी, आज एक जज की एक टिप्पणी से डगमगा गई थी।

अदालत परिसर से बाहर निकलते हुए मीडिया के कैमरे खानविलकर की तरफ़ मुड़ गए, जो अपनी जीत की तरह मुस्कुरा रहा था, जबकि वृंदा और वैशाली चुपचाप, बिना किसी बयान के, अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ गईं।

खिड़की के बाहर शिवाजीनगर की दोपहर की धूप तेज़ हो चुकी थी, पर अदालत के कमरे की वो ठंडी, अधूरी ख़ामोशी वैशाली के साथ बाहर तक चली आई। उसे समझ आ गया था कि सच जानना एक बात है, और उस सच को क़ानून की भाषा में साबित करना बिलकुल दूसरी, कहीं ज़्यादा कठिन लड़ाई।

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