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Chapter 18 of 30 10 min read

जन्मदिन का तोहफ़ा

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

मावळ थाने के छोटे से कमरे में वैशाली ने एक पूरी दीवार साफ़ कर दी थी, कॉर्क बोर्ड पर पिनें, धागे, और काग़ज़ की पर्चियाँ, केक की दुकान की रसीद, गुब्बारे वाले का बिल, गिफ़्ट शॉप का बिल, सब मिनट-दर-मिनट, एक क़तार में। जन्मदिन की सुबह अब एक जश्न नहीं थी, एक टाइमलाइन थी।

हर पर्ची पर एक समय लिखा था, सुबह पाँच बजकर सैंतालीस मिनट, केक की दुकान का बिल भुगतान, छह बजकर दो मिनट, आख़िरी बार केयूर का फ़ोन घर के वाई-फ़ाई से जुड़ा। एक-एक मिनट, एक क़ैदी की तरह क़तार में खड़ा।

एक दरार काफ़ी थी, कल कमरा एक और कमरा दो के बीच जो टूटा था, उसने वैशाली को सिखाया था, हर छोटी बात मायने रखती है। अब वो केयूर की उस आख़िरी सुबह के हर घंटे को नए सिरे से खोद रही थी, केक से लेकर आख़िरी क़दम तक।

सुबह ही रुतुजा की फ़ोरेंसिक टीम ने फ़ोन गैलरी का आख़िरी बैकअप वापस भेजा था, हर तस्वीर, हर टाइमस्टैंप, ठीक उसी क्रम में जैसे वो खींची गई थीं। वैशाली ने तय किया था, आज वो हर तस्वीर को उतनी ही देर देखेगी जितनी देर केयूर ने उसे खींचने में लगाई थी।

दीवार के सबसे नीचे कोने में, लाल पेन से एक सवाल लिखा था, जो अब उसका मंत्र बन चुका था, "अगर सिर्फ़ फिसलन थी, तो हर मिनट का हिसाब इतना साफ़ क्यों नहीं बैठता?"

दरवाज़े पर धीमी सी दस्तक हुई। सुष्मा खड़ी थीं, हाथ में एक पुराना कपड़े का थैला लिए, आँखें सूजी हुई पर आज किसी और वजह से, जैसे वो कोई भारी चीज़ उठाकर लाई हों जो उनसे उठाई नहीं जा रही थी।

"आइए, सुष्मा जी। बैठिए।" "चाय मँगवाऊँ आपके लिए?"

"नहीं बेटी, बस दो मिनट का काम है।" "हम केयूर का बैग आख़िरकार खोल पाए, इतने महीने... हिम्मत ही नहीं हुई थी।"

"ये सही वक़्त था, सुष्मा जी। जल्दी नहीं थी।" "नरेश जी नहीं आए आज?"

"वो बाहर गाड़ी में बैठे हैं, बेटी। अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।" "थाने की दीवारें उन्हें केयूर की याद दिलाती हैं, हर बार।"

सुष्मा ने थैले से एक छोटा, मख़मली डिब्बा निकाला, और एक पुराना फ़ोन, जिसकी स्क्रीन पर एक दरार थी। दोनों चीज़ें उनके हाथों में इतनी हल्की लग रही थीं, फिर भी उनके कंधे उनके बोझ से झुके हुए थे।

"ये अंगूठी है, बेटी। सील बंद, कभी खुली नहीं।" "और इसमें एक वॉइस नोट है, जो उसने मुझे उस सुबह भेजा था, निकलने से ठीक पहले। मैंने उसे... मैंने उसे कभी सुनने की हिम्मत नहीं जुटाई।"

वैशाली के हाथ एक पल को रुक गए। ये सबूत था, पर पहले, ये एक माँ का दिल था, जो आज पहली बार उस आवाज़ को सुनने के लिए तैयार हुआ था।

"आप चाहें तो मैं अकेले सुन लूँ, सुष्मा जी।" "आपको सुनना ज़रूरी नहीं।"

"नहीं। मुझे सुनना है।" "वो आवाज़ मेरी है, बेटी। मुझे उससे डरना नहीं चाहिए।"

वैशाली ने फ़ोन का स्पीकर दबाया। एक हल्की सी क्रैकल, फिर हवा की सीटी की आवाज़, और उसके पीछे, केयूर की आवाज़, हँसती हुई, ज़िंदा, बेफ़िक्र।

"माँ, मैसेज सुनना जब उठो। हम अभी लोहागढ़ की चढ़ाई शुरू कर रहे हैं, हवा बहुत अच्छी है आज।" "पिया को पहाड़ बहुत पसंद हैं, इसलिए मैं उसे सबसे ख़ूबसूरत सुबह दिखाने ले जा रहा हूँ, अपने जन्मदिन के तोहफ़े की तरह।"

"नाश्ते के बाद कॉल करूँगा, तुम्हारे लिए फ़ोटो भी लाऊँगा ढेर सारी।" "लव यू माँ, चिंता मत करना।"

रिकॉर्डिंग वहीं ख़त्म हो गई। कमरे में एक लंबी, भारी ख़ामोशी उतर आई। "अपने जन्मदिन के तोहफ़े की तरह," उसने कहा था, बेख़बर कि वो सुबह ख़ुद उसका आख़िरी तोहफ़ा बनने वाली थी।

"वो हमेशा ऐसा ही था, बेटी। दूसरों को ख़ुश करने में लगा रहता था, ख़ुद की फ़िक्र कभी नहीं की।" "उसने कहा, जन्मदिन का तोहफ़ा। और वो दिन उसकी बरसी बन गया।"

"जब वो छोटा था, हर साल अपने जन्मदिन पर मुझे ही तोहफ़ा देता था। कहता था, माँ, तूने मुझे जन्म दिया, तोहफ़ा तो तुझे मिलना चाहिए।" "वो कभी नहीं बदला, बेटी।"

कमरे में देर तक कोई कुछ नहीं बोला, बस पंखे की आवाज़ और सुष्मा की धीमी सिसकियाँ, जिन्हें वो हर कुछ सेकंड में रोकने की कोशिश करतीं, फिर हार जातीं।

"सुष्मा जी, मैं आपसे एक बात कहती हूँ।" "ये तोहफ़ा जो उसने पिया को कभी नहीं दे पाया, मैं उसे इंसाफ़ की शक्ल में दिलवाऊँगी। ये मेरा वादा है।"

वैशाली ने सुष्मा का हाथ थाम लिया, एक पल के लिए अफ़सर नहीं, बस एक इंसान, जो किसी माँ के दर्द के सामने चुप रहना जानती थी।

"ये अंगूठी... आपको पता है ये किसके लिए थी?" "रसीद में लिखा है, ऑर्डर पिया के नाप का था।"

"हाँ बेटी। वो कहता था, जन्मदिन पर मैं ही उसे तोहफ़ा दूँगा, कोई और सगाई की अंगूठी नहीं, अपनी तरफ़ से एक वादे वाली अंगूठी।" "और एक ख़त भी लिखा था, हाथ से। मुझे नहीं पता वो कहाँ है।"

यहीं, इस एक लफ़्ज़ पर, वादे वाली अंगूठी, हमारा फ़्लैशबैक उस रात में लौट जाता है, जन्मदिन की सुबह से बस कुछ घंटे पहले, केयूर के कमरे में।

मेज़ पर एक छोटा मख़मली डिब्बा खुला पड़ा था, और उसके बग़ल में काग़ज़ का एक पन्ना, आधा लिखा, स्याही की कुछ जगहों पर धब्बे, जैसे किसी ने बार-बार लिखकर मिटाया हो, फिर से लिखा हो।

खिड़की के बाहर मानसून की आख़िरी बूँदें रुक चुकी थीं, हवा में गीली मिट्टी की वो गंध थी जो कल सुबह लोहागढ़ की चढ़ाई में भी उसका साथ देने वाली थी। केयूर ने घड़ी देखी, आधी रात पार हो चुकी थी, और वो अब भी लिख रहा था।

"पिया, मुझे पता है शादी की सारी बातें, सारा दबाव, तुम्हें थका देता है।" "इसलिए ये अंगूठी सगाई की नहीं है। ये सिर्फ़ इतना कहती है, मैं यहाँ हूँ, हमेशा, चाहे कुछ भी हो।"

वो अपने ही लफ़्ज़ों पर हल्का सा हँसा, फिर लिखना जारी रखा, हर पंक्ति में वही भरोसा जो सिर्फ़ वही आदमी रख सकता है जिसने कभी शक की भाषा सीखी ही न हो।

"...और अगर तुम कभी डरो, तो याद रखना, हम दोनों मिलकर हर पहाड़ चढ़ लेंगे। मैं वादा करता हूँ, पिया।" "जन्मदिन मेरा है, पर तोहफ़ा मैं तुम्हें दे रहा हूँ, हमेशा की तरह।"

"माँ को बताऊँगा जब हम वापस आएँगे, वो बहुत ख़ुश होगी।" "पिया को नई शुरुआत चाहिए, और मैं उसे वो दूँगा, चाहे कितना भी वक़्त लगे।"

और हम, दर्शक, जानते थे कि वो शब्द, "हम दोनों मिलकर," उस सुबह पहले से कहीं ज़्यादा खोखले थे, क्योंकि पिया अब "हम" में विश्वास नहीं रखती थी, वो "एक और रास्ते" में विश्वास रखती थी।

केयूर ने ख़त को मोड़ा, एक लिफ़ाफ़े में रखा, ऊपर सिर्फ़ इतना लिखा, "पिया के लिए," और डिब्बे के साथ अपने बैग की सबसे भीतरी जेब में रख दिया, जहाँ किसी की नज़र न पड़े, जब तक वो ख़ुद न दिखाए।

मेज़ पर एक पुरानी सगाई की तस्वीर रखी थी, पिया का चेहरा उसमें मुस्कुराता नहीं था, बस झुका हुआ था। केयूर ने वो तस्वीर उठाई, हल्के से मुस्कुराया, और सोचा, कल के बाद ये मुस्कान असली होगी।

"कल सुबह, बुर्ज पर, सूरज निकलते ही।" "वहीं दूँगा उसे, जहाँ सिर्फ़ हम दोनों होंगे, कोई शोर नहीं, कोई परिवार नहीं, बस हम।"

उसे नहीं पता था कि "कोई शोर नहीं, कोई परिवार नहीं, बस हम" वाली वो जगह पहले से ही एक तीसरे इंसान के लिए चुनी जा चुकी थी, ठीक उसी ख़ामोशी की वजह से।

यहीं फ़्लैशबैक वापस थाने के उसी कमरे में लौट आता है, जहाँ सुष्मा अपने आँसू पोंछते हुए बैठी थीं, और वैशाली के हाथ में अब एक अनखुला ख़त था, आख़िरकार बैग की उसी भीतरी जेब से मिला हुआ।

"सुष्मा जी, ये ख़त अब सबूत का हिस्सा बनेगा, मुझे इसे खोलना होगा, दस्तानों के साथ, फ़ोटो लेकर।" "पर उसके बाद, आप सबसे पहले इसे पढ़ेंगी, वादा है।"

"ठीक है, बेटी। जैसा तुम कहो।" "वो हमेशा ऐसा ही था, हर चीज़ में एक वादा छुपाकर रखता था।"

वैशाली ने ख़त को सावधानी से एक सबूत लिफ़ाफ़े में रखा, टैग लगाया, तारीख़ लिखी। कुछ मिनट बाद सुष्मा उठ खड़ी हुईं, थैला समेटते हुए, आँखों में अब भी नमी, पर कंधों पर पहले से थोड़ा कम बोझ।

"शुक्रिया, बेटी, इस सब के लिए बैठने के लिए।" "मैं जानती हूँ, तुम्हारे पास और भी काम होगा।"

"आप जब चाहें आइए, सुष्मा जी।" "और वो ख़त, जैसे ही औपचारिकता पूरी होगी, सबसे पहले आपके हाथ में होगा।"

दरवाज़ा बंद हुआ। वैशाली कुछ देर उसी कुर्सी पर बैठी रही, वो मख़मली डिब्बा अभी भी मेज़ पर, बंद, अनखुला, एक वादा जो कभी पूरा नहीं हो पाया।

फिर उसने अपना लैपटॉप खोला, वही पुराना काम, जो हिरासत के इन चौदह दिनों में उसकी दिनचर्या बन चुका था, केयूर के फ़ोन से रिकवर हुई गैलरी को एक-एक करके फिर से खंगालना।

सैकड़ों तस्वीरें, केक काटता केयूर, गुब्बारे लगाती पिया, गाड़ी में हँसते दोनों, और फिर, आख़िरी फ़ोल्डर में, वो आख़िरी तस्वीरें, लोहागढ़ की चढ़ाई की, धुंध में डूबी हुई।

"आख़िरी सेल्फ़ी..." "पिया ने कहा था, सिर्फ़ रौशनी के लिए। चलो देखते हैं, रौशनी में और क्या था।"

उसने तस्वीर को स्क्रीन पर बड़ा किया, पूरी, फिर उसका एक कोना ज़ूम करके, फिर उससे भी छोटा एक कोना, वैसे ही जैसे रुतुजा ने उसे सिखाया था, हर पिक्सेल को शक की नज़र से देखो।

तस्वीर में केयूर हँस रहा था, पीछे धुंध, नीचे घाटी, ऊपर सूरज की पहली धुंधली किरण। पिया का हाथ फ़्रेम के किनारे में, फ़ोन थामे हुए। सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था जैसा उसकी गवाही में लिखा था।

पर पीछे, बुर्ज की टूटी सीढ़ी के पास, धुंध के एक मोटे झुरमुट के ठीक नीचे, कुछ था, एक धब्बा जो पत्थर नहीं था, जो धुंध नहीं था।

"...ये क्या है।" "ज़ूम करो... और ज़ूम करो।"

पिक्सेल-दर-पिक्सेल, धुंधली, फटी हुई, पर साफ़ होती हुई एक शक्ल उभरी, एक झुका हुआ सिर, कंधों का एक हुड, कानों में कुछ काला, बिल्कुल वैसा ही जैसा भाजे के ढाबे वाले ने बताया था।

वैशाली ने अपनी पुरानी नोटबुक निकाली, वो पन्ना जिस पर उसने महीनों पहले ढाबे वाले का बयान लिखा था, काली हुडी, हेडफ़ोन, अकेला आदमी। शब्द-दर-शब्द, वो तस्वीर से मेल खाता था।

"शायद ये सिर्फ़ धुंध का धब्बा है..." "नहीं। धुंध इतनी सीधी नहीं खड़ी होती। ये कोई खड़ा है।"

उसने फ़ोन उठाया, रुतुजा का नंबर डायल करने के लिए, फिर एक पल को रुक गई, स्क्रीन पर उस परछाईं को आख़िरी बार घूरते हुए, जैसे उसे यक़ीन दिलाना हो कि ये सच में वहाँ है, कोई भ्रम नहीं।

वैशाली की उँगलियाँ स्क्रीन पर ठहर गईं। महीनों से उसके पास एक फ़ोन, एक कोड, एक डीएनए, एक बयान था, पर आज पहली बार उसके सामने एक तस्वीर थी, केयूर के अपने कैमरे से खींची, जिसमें उसकी अपनी मौत का साया, उसकी पीठ के पीछे, सेल्फ़ी की रौशनी में, हमेशा के लिए क़ैद हो गया था।

कमरे में सिर्फ़ लैपटॉप के पंखे की आवाज़ थी, और स्क्रीन पर वो धुंधली, काली परछाईं, जो अब जज की माँगी हुई "सीधे सबूत" की तरफ़ पहला, सबसे ठोस क़दम बन चुकी थी।

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