Chapter 22 of 30 10 min read
कड़ी दर कड़ी
वैशाली अमेय को सुरक्षा और भरोसा देकर दुबारा खड़ा करती है, फिर वृंदा आप्टे के साथ मिलकर रिकवर की चैट, टावर डंप, हुडी के डीएनए, पुतले के प्रयोग, सीसीटीवी और अमेय की गवाही की पूरी ज़ंजीर एक चार्जशीट में बाँध देती है। गावडे उसी फ़ाइल पर उसके आख़िरी दस्तख़त देखते हैं जिसे बंद करने का हुक्म कभी उन्होंने ख़ुद दिया था, और अदालत हत्या तथा साज़िश के आरोप तय कर मुक़दमे की शुरुआत का ऐलान कर देती है।
अमेय की टूटती हुई आवाज़ अभी वैशाली के कानों में गूँज ही रही थी, जब उसने गाड़ी की चाबी उठाई और रात के उसी वक़्त सीधा उसके फ़्लैट की तरफ़ निकल पड़ी। गावडे ने पीछे से आवाज़ दी, "मैं भी चलता हूँ," पर वैशाली ने सिर हिलाकर मना कर दिया, "अकेली जाऊँगी सर, वो अभी और डर जाएगा अगर वर्दी की भीड़ देखेगा।"
पंद्रह मिनट में वो उसकी बिल्डिंग के बाहर थी। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हर मंज़िल पर एक बत्ती बुझी मिली, जैसे पूरी इमारत ही साँस रोके बैठी हो। दरवाज़े की चेन खुलने से पहले भीतर टीवी की परछाइयाँ हिलती दिखीं।
"अमेय, दरवाज़ा खोलो।" "मैं वैशाली कदम, अकेली आई हूँ, कोई वर्दी नहीं, कोई कैमरा नहीं।"
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। अमेय का चेहरा पीला पड़ा था, आँखों के नीचे नींद ना आने के काले घेरे, हाथ में अब भी वही फ़ोन जकड़ा हुआ जिस पर धमकियाँ आई थीं।
"आज रात से एक सिपाही तुम्हारी बिल्डिंग के नीचे रहेगा, और कल तक तुम्हारा नंबर बदलवा दिया जाएगा।" "तुम्हारी माँ के घर के बाहर भी पुलिस पहुँच चुकी है, अमेय। जिसने धमकी दी, वो डरा हुआ है, तुमसे नहीं, उस सच से जो तुम्हारे पास है।"
"मैडम, मैं चिराग को बचपन से जानता हूँ।" "अब हर रात सोचता हूँ, अगर मैं उस रात उसे रोक पाता, तो शायद केयूर आज ज़िंदा होता।"
"तुम उस रात कुछ नहीं कर पाए, अमेय, ये सच है, और वो बोझ अकेला तुम्हारा नहीं है।" "पर आज तुम्हारे पास मौक़ा है। तुम्हारी एक गवाही एक माँ को उसके बेटे की मौत का जवाब देगी। सुष्मा जी हर सुबह मंदिर जाकर यही दुआ माँगती हैं कि सच सामने आए।"
"मैडम... मैं डरा हुआ हूँ, पर झूठा नहीं हूँ।" "मैं गवाही दूँगा। बस मेरे परिवार को कुछ मत होने दीजिएगा।"
उसी वक़्त अमेय के फ़ोन पर उसकी माँ का मैसेज चमका, "बेटा, तेरे घर के बाहर पुलिस क्यों खड़ी है, सब ठीक तो है?" अमेय की आँखें भर आईं, उसने बस इतना लिखा, "माँ, सब ठीक हो जाएगा, बस थोड़े दिन धीरज रखना।"
"तुम्हारी माँ को कुछ नहीं बताना पड़ेगा, अमेय, जब तक ज़रूरी न हो।" "हम दोनों घरों की हिफ़ाज़त करेंगे, ये मेरी ज़िम्मेदारी है।"
"मेरा वादा है, अमेय।" "कल सुबह थाने आना, हम तुम्हारे बयान को अदालत के लिए और मज़बूत बनाएँगे, हर तारीख़, हर वक़्त, सब दुबारा एक साथ जोड़ेंगे।"
बाहर निकलते हुए वैशाली ने सिपाही को उसकी ड्यूटी समझाई, फिर सीढ़ियाँ उतरते हुए घड़ी देखी, रात के तीन बज चुके थे। उसे पता था कि आज की रात की नींद अब सिर्फ़ दो घंटे की बचेगी, और सुबह फिर वृंदा आप्टे के दफ़्तर में बैठना था।
अगले दिनों में वैशाली सरकारी वकील वृंदा आप्टे के दफ़्तर में हर उस काग़ज़ के साथ बैठी रही जो महीनों में जमा हुआ था। मेज़ पर फ़ाइलों के ढेर थे, चैट के प्रिंटआउट, टावर डंप की शीटें, डीएनए रिपोर्ट, पुतले के प्रयोग की तस्वीरें, सब एक साथ फैले हुए।
"चलो एक-एक कड़ी गिनते हैं, कदम, ताकि अदालत में एक भी कड़ी छूटे नहीं।" "पहली कड़ी, रुतुजा की रिकवर की हुई चैट, 'समुद्र' वाला कोड, जो पहले मासूम लगा था।"
"दूसरी कड़ी, टावर डंप। दोनों बरनर फ़ोन एक ही टावर पर, एक ही आधे घंटे में, ठीक उस वक़्त जब पिया क़सम खा रही थी कि वो अकेले थे।"
"तीसरी, पुलिया के नीचे मिली काली हुडी, उस पर चिराग का डीएनए, और केयूर के बाल के रेशे। इंसानी क़रीबी का सबूत, इनकार की कोई गुंजाइश नहीं।"
"चौथी, घाट रोड की सीसीटीवी, नंबर प्लेट का वो आधा हिस्सा जो चिराग की अपनी बाइक से मेल खाया, ठीक केयूर के गिरने से सत्रह मिनट पहले।"
"पाँचवीं, और सबसे भारी, पुतले का प्रयोग।" "डॉक्टर मोरे ख़ुद अदालत में गुरुत्वाकर्षण की गवाही दोहराएँगे, हलफ़ के साथ, कि छह मीटर और उनतीस मीटर के बीच का फ़र्क़ सिर्फ़ एक धक्के से आता है।"
"और छठी कड़ी, अमेय गोखले, जो डर के बावजूद सरकारी गवाह बनने को तैयार है, और अब पुलिस सुरक्षा में है।"
"छह कड़ियाँ, कदम। खानविलकर एक-एक करके इन्हें अलग-अलग तोड़ने की कोशिश करेगा, अभी अदालत में हमने देखा भी है।" "पर जब ये सब एक साथ बाँधी जाती हैं, तो ज़ंजीर टूटती नहीं। ये मेरा काम है, और मैं इसे टूटने नहीं दूँगी।"
दोनों ने रात के बारह बजे तक हर तारीख़ को दुबारा मिलाया, हर गवाह के बयान को हर दूसरे गवाह के बयान से जोड़ा, ताकि खानविलकर को कहीं एक इंच भी विरोधाभास न मिले। वृंदा ने एक बड़ा सफ़ेद चार्ट निकाला और उस पर हर कड़ी को एक तीर से अगली कड़ी से जोड़ना शुरू किया।
"देखो, कदम, अब ये सिर्फ़ काग़ज़ों का ढेर नहीं रहा।" "ये एक कहानी है, जो ख़ुद अपने आप को साबित करती है, हर कड़ी दूसरी को थामे हुए।"
अगले हफ़्तों में चार्जशीट के पन्ने दर पन्ने भरते गए, हर तारीख़, हर नंबर, हर गवाह का बयान, वृंदा और वैशाली की स्याही से एक-एक करके सिला गया। रात को दफ़्तर की बत्ती बुझती, तो सुबह फिर वहीं से शुरुआत होती, चाय के ठंडे कप और थकी आँखों के बीच।
उसी दौरान रुतुजा साळुंके ने तीनों कैमरों की रिकॉर्डिंग, नाप की हर पर्ची, और मौसम विभाग की रिपोर्ट को सील बंद फ़ाइल में बदल दिया, ताकि खानविलकर को एक भी ढीली कड़ी न मिले। वैशाली ने वो सील ख़ुद जाकर सरकारी वकील के दफ़्तर में जमा की।
"दस महीने पहले जब मैंने इस फ़ाइल पर दस्तख़त करने से इनकार किया था, तब मेरे पास सिर्फ़ दो जूतों के निशान थे, वृंदा जी।" "आज हमारे पास छह कड़ियाँ हैं, हर एक दूसरी से बँधी हुई।"
"यही फ़र्क़ है एक अच्छी अफ़सर और एक थकी हुई फ़ाइल में, कदम।" "तुमने वो दो निशान नज़रअंदाज़ नहीं किए, और आज पूरा शहर उसका नतीजा देखेगा।"
एक रात, जब दफ़्तर लगभग ख़ाली था, गावडे वैशाली की मेज़ पर आकर खड़े हो गए, हाथ में वही पुरानी फ़ाइल थी, जिसका काग़ज़ अब पीला पड़ चुका था।
"कदम, ये वही फ़ाइल है।" "जिस पर मैंने तुमसे दस्तख़त करके इसे बंद करने को कहा था, महीनों पहले, उसी दिन जब तुमने पहली बार इनकार किया था। आज उस पर तुम्हारे दस्तख़त होने वाले हैं।"
"हाँ सर।" "पर इस बार दस्तख़त बंद करने के नहीं, खोलने के हैं।"
वैशाली ने पेन उठाया, आख़िरी पन्ने पर अपना नाम लिखा, और महीनों की एक ज़िद, एक पहाड़, एक माँ की दुआ, सब उस एक दस्तख़त में सिमट गए। गावडे ने वो पल चुपचाप देखा, जैसे कोई पुरानी ग़लती आख़िरकार सुधर रही हो।
"मुझे माफ़ करना, कदम। मैंने तुम्हें रोकने की कोशिश की थी।" "अच्छा हुआ तुमने नहीं सुनी।"
"आप बस अपने ऊपर के दबाव में थे, सर।" "आज आप मेरे साथ खड़े हैं, यही काफ़ी है।"
"पंद्रह साल की नौकरी में मैंने बहुत फ़ाइलें बंद होते देखी हैं, कदम।" "पर ये पहली फ़ाइल है जो बंद होने की जगह एक मुक़दमे में बदल रही है, और मुझे इसका हिस्सा होने पर फ़ख़्र है।"
अगली सुबह सुष्मा थाने आईं, वैशाली के हाथों को अपने हाथों में लेकर बस इतना कहा कि रात को अब उन्हें नींद आने लगी है। गावडे ने पहली बार उस माँ के सामने सिर झुकाया, बिना कुछ कहे।
अगली सुबह शिवाजीनगर की अदालत में चार्जशीट औपचारिक रूप से दाख़िल हुई, पिया मित्तल और चिराग भाटिया के ख़िलाफ़ हत्या और आपराधिक साज़िश के आरोप के साथ। कमरा नंबर छह फिर खचाखच भरा था, कैमरे बाहर, गवाह भीतर।
"माननीय, अभियोजन के पास परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की एक पूरी, अटूट ज़ंजीर है, जो दोनों अभियुक्तों को इस हत्या से सीधे जोड़ती है।" "रिकवर की गई चैट, टावर डंप, हुडी का डीएनए, सीसीटीवी, वज़न वाले पुतले का वैज्ञानिक प्रयोग, और एक चश्मदीद जो सरकारी गवाह बनने को तैयार है।"
"हम अनुरोध करते हैं, माननीय, कि आरोप तय किए जाएँ और मुक़दमे की सुनवाई शुरू हो, ताकि एक जवान लड़के की मौत का हिसाब खुली अदालत में लिया जा सके।"
कमरे में मौजूद हर आदमी को अंदाज़ा था कि आज की सुनवाई सिर्फ़ काग़ज़ी नहीं होगी, दस महीने की जाँच का पूरा वज़न आज जज की एक ही टिप्पणी पर टिका था। बाहर गलियारे में मीडिया की भीड़ ऐसे इकट्ठा थी जैसे कोई फ़ैसला अभी आ जाएगा।
खानविलकर खड़ा हुआ, हर कड़ी को अलग-अलग ग़लत ठहराने की कोशिश की, कहा कि परिस्थितिजन्य सबूत कभी पूरी कहानी नहीं होते और अकेले चैट या डीएनए से हत्या साबित नहीं होती। उसने अमेय की गवाही को भी "डर में दिया गया बयान" कहकर ख़ारिज करने की कोशिश की, पर जज की नज़र काग़ज़ों पर टिकी रही, हर कड़ी को दुबारा पढ़ते हुए।
गैलरी में सुष्मा और नरेश चुपचाप बैठे थे, वैशाली की नज़र एक बार उनकी तरफ़ गई, फिर वापस जज की मेज़ पर टिक गई। अमेय भी पीछे की क़तार में बैठा था, पहली बार बिना डरे, सीधी पीठ के साथ, उसके साथ बैठा सिपाही अब उसकी परछाईं जैसा हो चुका था।
जज के सामने रखी फ़ाइल में अब सिर्फ़ शक़ नहीं, तारीख़-दर-तारीख़ एक पूरी टाइमलाइन थी, बरनर सिम की ख़रीद से लेकर पुतले के तीसरे प्रयोग तक, हर पन्ने पर वृंदा और वैशाली के दस्तख़त। कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ थी, और काग़ज़ों के पलटने की सरसराहट।
देर तक दोनों पक्षों को सुनने के बाद जज ने फ़ाइल बंद की, चश्मा उतारा, और कुछ पल के लिए अदालत में एक पूरी ख़ामोशी उतर आई।
जज ने कहा कि प्रथम दृष्टया मामला हत्या और आपराधिक साज़िश दोनों का बनता है, और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ज़ंजीर आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है।
कठघरे में पिया का चेहरा पहली बार पूरी तरह सफ़ेद पड़ गया, चिराग ने अपनी बेंच की रेलिंग को इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उसकी उँगलियाँ सफ़ेद हो गईं। दोनों को समझ आ गया था कि अब सिर्फ़ पूछताछ नहीं, एक पूरा मुक़दमा उनके सामने खड़ा है।
"आरोप तय किए जाते हैं," जज ने कहा, "पिया मित्तल और चिराग भाटिया के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा तीन सौ बत्तीस और एक सौ बीस-बी के तहत।" "मुक़दमे की सुनवाई अगले महीने से शुरू होगी।"
गावडे उसके बग़ल में आकर खड़े हो गए, हाथ पीठ पीछे बाँधे। "अब असली लड़ाई शुरू होगी, कदम," उन्होंने कहा, "खानविलकर हर कड़ी को अलग-अलग तोड़ने की पूरी कोशिश करेगा, महीनों तक।" वैशाली ने बस इतना कहा, "तोड़ने दीजिए, सर। कड़ी दर कड़ी, हम भी उतने ही तैयार हैं।"
अदालत के गलियारे में खड़ी वैशाली ने वो फ़ाइल आख़िरी बार अपने हाथ में तौली, जो कभी बंद करने का हुक्म था। आज वो फ़ाइल एक मुक़दमे में बदल चुकी थी, और लोहागढ़ की उस भोर का सच अब किसी थाने की मेज़ पर नहीं, शिवाजीनगर की अदालत के कठघरे में तय होने जा रहा था।
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