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Chapter 5 of 30 10 min read

दूसरा फ़ोन

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

उस रात लोनावला रूरल थाने की पीली बत्ती के नीचे वैशाली अकेली बैठी थी, और उसके कानों में अभी भी अपने ही शब्द गूँज रहे थे... "पिया, तुमने मुझसे एक इंसान छुपाया है।" पर आज वैशाली पहाड़ से शुरू नहीं कर रही थी, न उस हुडी वाले आदमी से। आज उसकी नज़र मेज़ पर पड़े एक सबूत के लिफ़ाफ़े पर टिकी थी।

एक पारदर्शी प्लास्टिक बैग, और उसके भीतर पिया मित्तल का बरामद किया हुआ मोबाइल फ़ोन। मौक़े पर मिला था, ज़ब्त हुआ था, प्राथमिक जाँच से लौट आया था, और उस पर एक ही पर्ची चिपकी थी... "कुछ आपत्तिजनक नहीं मिला।"

"कुछ आपत्तिजनक नहीं... एक सगाई-शुदा लड़की का फ़ोन, और इतना साफ़, जैसे अभी दुकान से ख़रीदकर लाया हो।"

वैशाली अँगूठे से स्क्रीन दर स्क्रीन उतरती गई। गैलरी में सिर्फ़ चंद तस्वीरें, वो भी घर की, त्योहारों की, केयूर के साथ की। चैट में सिर्फ़ माँ, दर्ज़ी, और केयूर। न कोई पुराना मैसेज, न कोई मिटाए जाने का धुंधला निशान, न कोई एक भी बात जो छुपाने लायक़ हो।

"मंगेतर मर गया, और फ़ोन में एक भी आँसू नहीं? एक भी लड़ाई नहीं, एक भी राज़ नहीं, एक भी बेकार बात नहीं? इतनी साफ़ ज़िंदगी किसी की नहीं होती।"

और यहीं, इसी लफ़्ज़ पर, वैशाली रुक गई। "साफ़"। वो लोहागढ़ की भोर वाले साफ़ आँसू, वो शब्द-दर-शब्द रटी हुई साफ़ गवाही, और अब ये हद से ज़्यादा साफ़ फ़ोन। हमें पता था कि ये सफ़ाई इत्तेफ़ाक़ नहीं थी। वैशाली को अभी सिर्फ़ शक था।

"जो फ़ोन के अंदर नहीं है, वो फ़ोन के बाहर होगा।"

उसने दराज़ से कॉल डिटेल रिकॉर्ड की वो लंबी, छपी हुई शीट निकाली, जो कंपनी से मँगवाई थी। उँगली एक-एक लाइन पर नीचे उतरती गई... घर, माँ, केयूर, दर्ज़ी, फिर से केयूर। और फिर, बीच-बीच में, एक नंबर जो किसी नाम से नहीं जुड़ा था।

"एक ही नंबर, बार-बार। देर रात... सुबह चार बजे... फिर देर रात। कोई नाम नहीं, कोई पहचान नहीं। जिस वक़्त सारा शहर सोता है, उसी वक़्त पिया इस नंबर पर जागती थी।"

वैशाली ने उस बेनाम नंबर को लाल पेन से घेर लिया, बार-बार, जब तक कागज़ पर एक गहरा निशान न बन गया। फ़ोन के भीतर कुछ नहीं था। पर फ़ोन के बाहर, इस एक नंबर में, शायद सब कुछ था। इसे पढ़ने के लिए उसे थाने की सरहद पार करनी थी।

अगली सुबह पुणे, शिवाजीनगर के पास साइबर सेल का दफ़्तर। ठंडे कमरे में क़तार से लगे कंप्यूटर, तारों का जाल, और स्क्रीनों की नीली रोशनी। यहाँ वैशाली की मुलाक़ात हुई रुतुजा साळुंके से, तीस पार की एक तेज़-तर्रार साइबर विश्लेषक, जिसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर किसी और ही रफ़्तार से चलती थीं।

"या, कदम मैडम, बैठा. लोनावला से पूरे पुणे तक आयीं, तो मामला हलका तर नाही असणार. दाखवा, काय आणलंय तुम्ही?"

"एक 'हादसे' की फ़ाइल, रुतुजा जी, जिसे ऊपर वाले बंद कराना चाहते हैं। ये लड़की का फ़ोन है... और मुझे इस पर यक़ीन नहीं। बहुत साफ़ है। और इस पूरी शीट में, बस ये एक बेनाम नंबर मुझे रात को सोने नहीं दे रहा।"

"हं... फ़ोन तो सचमुच बहुत साफ़ है मैडम. इतना साफ़ कि यही शक की बात है. आम इंसान का फ़ोन कभी इतना सुथरा नहीं होता, बेकार फ़ोटो, अधूरे मैसेज, कुछ ना कुछ कचरा तो रहता ही है. ये फ़ोन किसी ने सोच-समझकर धोया है. सफ़ाई भी एक निशान है, मैडम."

"और ये नंबर? इसका मालिक कौन है, ये पता चल सकता है?"

"थांबा... सिम का रिकॉर्ड निकालती हूँ. हर सिम किसी न किसी पहचान-पत्र से जुड़ा होता है, आधार, कोई कागज़. अरे... ये तो अजीब बात है मैडम."

रुतुजा की उँगलियाँ पल भर के लिए रुकीं। स्क्रीन पर एक नाम उभरा, और वो नाम बेनाम नहीं था। वैशाली आगे झुक आई, साँस जैसे कमरे में कहीं अटक गई।

"ये नंबर किसी बाहरी आदमी का नहीं है मैडम. ये सिम भी पिया मित्तल के ही नाम पर है. यानी लड़की के पास एक नहीं, दो फ़ोन चालू थे. एक वो, जो आपने मुझे दिया... और एक दूसरा, जो किसी को दिखाया ही नहीं गया."

"दूसरा फ़ोन... एक छुपा हुआ फ़ोन। यानी जो साफ़ फ़ोन उसने पुलिस को सौंपा, वो सिर्फ़ दिखावे का था। असली बातें कहीं और होती थीं।"

"बरोबर. अलग नंबर, अलग हैंडसेट, अलग IMEI. महीनों से चालू था, रोज़ इस्तेमाल होता था. और फिर अचानक... एक ही दिन, हमेशा के लिए बंद. उसके बाद वो सिम कभी किसी टावर पर ज़िंदा नहीं हुआ. जैसे उसका काम ख़त्म हो गया हो."

जो फ़ोन पिया ने रोते हुए पुलिस को सौंपा था, वो सिर्फ़ एक मुखौटा था, ठीक उसके आँसुओं की तरह साफ़, ठीक उसकी गवाही की तरह रटा हुआ। और असली कहानी, महीनों तक, एक तकिये के नीचे साँस लेती रही थी। हमने वो कहानी देखी थी। अब उसकी परछाईं वैशाली की स्क्रीन पर उभर रही थी।

कुछ महीने पीछे। पुणे का मित्तल घर, आधी रात, और हर कमरे में नींद की भारी ख़ामोशी। सगाई हो चुकी थी, शादी की तारीख़ भी अब कैलेंडर पर लाल घेरे में क़ैद हो चुकी थी। पिया अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रही, जब तक घर की आख़िरी बत्ती न बुझ गई।

फिर, अँधेरे में, उसका हाथ तकिये के नीचे सरका। वहाँ, चादर की तह में छुपा, एक दूसरा फ़ोन था। छोटा, सस्ता, जिसकी स्क्रीन की रोशनी उसने सबसे कम कर रखी थी, ताकि अँधेरे में भी वो किसी की आँख में न चुभे।

"घर वाले नहीं मानेंगे, चिराग... शादी की तारीख़ पक्की हो गई है। अगले महीने की सत्रह। पापा ने कार्ड भी छपने भेज दिए हैं। अब... अब मेरे हाथ में कुछ नहीं बचा।"

स्क्रीन एक पल को अँधेरी हुई, फिर उधर से जवाब की नीली रोशनी उसके चेहरे पर तैर गई। शब्द छोटे थे, पर उनकी छाया लंबी। "तो फिर हमें कोई दूसरा रास्ता सोचना होगा। तारीख़ें बदली जा सकती हैं, पिया। लोग भी।"

"दूसरा रास्ता? कैसा रास्ता, चिराग? मुझे डर लगता है जब तुम ऐसे बात करते हो। हम भाग जाएँगे, बस यही तय हुआ था न... और कुछ नहीं।"

पिया को उस "दूसरे रास्ते" में सिर्फ़ भागने का ख़्वाब सुनाई देता था। हमें, उसी तकिये के नीचे छुपे इसी फ़ोन का एक और भविष्य सुनाई देता था, वो सुबह, जब यही नंबर एक पहाड़ी टावर पर, एक चीख़ के ठीक वक़्त, ज़िंदा होगा।

"तुम्हें याद है न, हम इसे 'समुद्र' कहते थे... हमारा अपना समंदर। पर अब हर रात लगता है, मैं उसी समंदर में डूब रही हूँ, और किनारा कहीं दिखता ही नहीं।"

पैग़ाम भेजकर पिया एक-एक अक्षर मिटाती गई, बड़ी एहतियात से, जैसे मिटाने से बात कभी हुई ही न हो। उसने फ़ोन वापस तकिये के नीचे सरका दिया और आँखें मूँद लीं, इस झूठे इत्मीनान के साथ कि उसका राज़ महफ़ूज़ है। उसे नहीं पता था कि मिटाई गई बात भी कहीं न कहीं साँस लेती रहती है, और टावर कभी नहीं भूलते।

साइबर सेल के उस ठंडे कमरे में, स्क्रीन की नीली रोशनी अब वैशाली के चेहरे पर पड़ रही थी। उसके सामने वही दूसरा नंबर था, बरसों बाद अचानक खुली एक बंद खिड़की की तरह। और अब उसे सिर्फ़ एक सवाल का जवाब चाहिए था।

"रुतुजा जी, ये दूसरा फ़ोन... उस भोर कहाँ था? मुझे उस दिन की, सवा चार से सवा छह के बीच की, हर टावर लोकेशन चाहिए। जहाँ-जहाँ ये नंबर पिंग हुआ, सब।"

"काढते... निकालती हूँ. सेल टावर डेटा, उस तारीख़ का, इसी नंबर का. अगर फ़ोन उस सुबह चालू था, तो जिस भी टावर की रेंज में गया होगा, उसका निशान यहाँ मिलेगा. फ़ोन झूठ नहीं बोलता मैडम, सिर्फ़ उसका मालिक बोलता है."

स्क्रीन पर एक घूमता हुआ पहिया, फिर लाइन दर लाइन उभरते टाइमस्टैंप और टावर के कोड। वैशाली की आँखें उन उगते नंबरों पर जमी थीं। हर सेकंड जैसे किसी पहाड़ी ढलान पर लुढ़कता एक पत्थर था।

"पुणे... पुणे... एक्सप्रेसवे... और फिर लोनावला के आगे. मैडम, ये नंबर उस सुबह पुणे से निकलकर लोहागढ़ के इलाक़े तक पहुँचा है. और यहाँ, आख़िरी पिंग... मलावली टावर."

"मलावली टावर? जो लोहागढ़ की चढ़ाई का सबसे पास वाला टावर है? वक़्त बताइए, रुतुजा जी। आख़िरी पिंग का ठीक-ठीक वक़्त।"

"सकाळी... सुबह के छह बजकर पंद्रह मिनट. सवा छह. उसके बाद ये नंबर फिर कभी किसी टावर पर ज़िंदा नहीं हुआ, मैडम. वहीं, उसी मिनट पर, ये फ़ोन हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया."

सवा छह बजे। ... ठीक वही मिनट जिस मिनट केयूर मलपानी एक चीख़ के साथ लोहागढ़ की खाई में गिरा था। और ये नंबर किसी अजनबी का नहीं था, किसी हुडी वाले आदमी का भी नहीं। ये पिया मित्तल का अपना छुपा हुआ फ़ोन था, उसी पहाड़ पर, उसी लम्हे में, ज़िंदा।

"पिया की गवाही कहती है... वो और केयूर, उस बुर्ज पर बिल्कुल अकेले थे। कोई फ़ोन नहीं, कोई सिग्नल नहीं, कोई तीसरा नहीं। और उसी की उँगलियों का ये दूसरा फ़ोन, ठीक उसी मिनट, उसी पहाड़ के टावर पर धड़क रहा था।"

और इसी एक पिंग ने वैशाली की मेज़ की हर पुरानी परत को पलटकर रख दिया। भोर के वो साफ़ आँसू, वो रटी हुई गवाही, पिया की टाइमलाइन का वो ग़ायब घंटा, बुर्ज के पीछे वो हुडी वाला आदमी... अब तक ये सब अलग-अलग टुकड़े थे। इस एक टाइमस्टैंप ने उन सबको एक ही धागे में पिरो दिया।

"और मैडम, एक बात और. इतने महीनों से रोज़ चलने वाला फ़ोन, ठीक इसी मिनट के बाद, एकदम बंद. जैसे किसी ने तय कर रखा हो कि इसका काम बस यहीं तक है. जैसे... लहर आकर शांत हो गई हो."

"एक फ़ोन जो उस पहाड़ पर होना ही नहीं चाहिए था... और जो ठीक उसी मिनट मर गया, जिस मिनट केयूर मरा। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं है, रुतुजा जी। ये गवाही है।"

स्क्रीन पर वो एक लाइन जगमगा रही थी, नीली, ठंडी, अडिग। एक नंबर जो पिया के मुँह से कभी नहीं निकला। एक टावर जिसका ज़िक्र किसी गवाही में नहीं था। और एक वक़्त, सवा छह बजे, जिसे पिया मित्तल ने बार-बार कहा था कि वहाँ सिर्फ़ दो लोग थे, वो... और केयूर।

पर अब उसी पहाड़ की छाती पर, उसी लम्हे में, एक तीसरी धड़कन दर्ज हो चुकी थी। और वो धड़कन किसी अजनबी की नहीं, ख़ुद पिया के छुपाए हुए फ़ोन की थी। पिया की गवाही, अब पिया के अपने ही फ़ोन के ख़िलाफ़ खड़ी थी।

"तुम कहती रहीं कि तुम अकेली थीं, पिया... पर तुम्हारा अपना फ़ोन कुछ और गवाही दे रहा है। और अब मुझे उसे साबित करने के लिए, सिर्फ़ ये पता करना है कि उस दूसरे फ़ोन की दूसरी तरफ़, कौन था।"

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