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Chapter 23 of 30 10 min read

एक माँ का सच

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

महीना भर गुज़र चुका था, फ़ाइल पर वो आख़िरी दस्तख़त सूख चुके थे, और अदालत की दीवार पर एक नई तारीख़ चमक रही थी, अगले हफ़्ते से मुक़दमे की सुनवाई। पुणे के एक शांत मोहल्ले में सुष्मा मलपानी हर सुबह की तरह उसी कमरे का दरवाज़ा खोलतीं, जो अब भी वैसा ही था जैसा केयूर छोड़ गया था।

खिड़की के पास वही ट्रेकिंग के जूते जोड़े में रखे थे, फीते बँधे, मानो अभी कोई उन्हें पहनकर निकल जाएगा। दीवार पर टँगा वो जन्मदिन वाला बैनर अब भी उतरा नहीं था, रंग हल्के पड़ गए थे पर अक्षर अभी भी साफ़ पढ़े जा सकते थे, "जन्मदिन मुबारक़ केयूर।"

बाहर गली में दो-तीन न्यूज़ चैनलों की गाड़ियाँ पिछले हफ़्ते से डेरा डाले हुए थीं, हर बार कैमरा उठाकर पूछते, "मैडम, मुक़दमे को लेकर क्या उम्मीद है?" सुष्मा अब खिड़की का पर्दा हटाने से पहले दो बार सोचती थीं।

"आज फिर धूप अच्छी है बेटा।" "तेरी वो नीली जैकेट धूप में सुखा दूँ, बरसात का मौसम है, फफूंद लग जाएगी।"

दरवाज़े पर नरेश मलपानी चुपचाप खड़े थे, हाथ में अदालत से आया वो काग़ज़ जिस पर मुक़दमे की तारीख़ छपी थी। वो कुछ महीनों में बूढ़े हो गए थे, जैसे हर हफ़्ता उनकी उम्र से एक साल चुरा ले जाता हो।

उन्होंने वो काग़ज़ चुपचाप मेज़ पर रख दिया, बिना कुछ कहे, क्योंकि इस घर में अब कुछ भी कहने से पहले सुष्मा की आँखों में झाँकना पड़ता था। सुष्मा ने काग़ज़ उठाया, एक बार पढ़ा, फिर उसे सीने से लगा लिया जैसे वो केयूर की कोई आख़िरी चिट्ठी हो।

नरेश की उँगलियाँ अब हल्की सी काँपती थीं, डॉक्टर ने पिछले महीने ही ब्लड प्रेशर की दवा बढ़ाई थी, पर वो हर सुबह फिर भी अख़बार में केयूर का नाम ढूँढते, जैसे कोई पुरानी आदत छूटती ही नहीं। सुष्मा ने ये सब चुपचाप देखा और उनके कंधे पर हाथ रख दिया।

"सुनवाई शुरू होने वाली है नरेश।" "अब मैं हर तारीख़ पर बैठूँगी, चाहे जितना वक़्त लगे। मेरे बेटे को इंसाफ़ चाहिए, और मैं उसकी आवाज़ बनकर वहाँ बैठूँगी।"

उसी लम्हे, बैनर की उन उतरती स्याही की तरह, सुष्मा की आँखों के आगे एक पुरानी सुबह उतर आई, तब जब केयूर हँसता था, जब घर में हँसी की कोई कमी नहीं थी। याद का वो दरवाज़ा खुल गया जो पिछले महीनों से बंद रखा गया था।

रोज़ की तरह सुबह का चाय का दूसरा कप अब भी बनता था, आदत से, फिर वैसे ही ठंडा होकर मेज़ पर रह जाता। घर में केयूर की ग़ैर-मौजूदगी अब एक चीज़ नहीं रही, एक आदत बन गई थी, हर कोने में बसी हुई।

"आज उसकी वो पुरानी डायरी निकालूँगी नरेश, जिसमें उसने पिया के लिए लिखा था। शायद अदालत को भी दिखानी पड़े, ये दिखाने के लिए कि मेरा बेटा कैसा था।"

वो डायरी अलमारी की सबसे ऊपर की दराज़ में रखी थी, चमड़े की जिल्द अब हल्की सी फटी हुई, पन्ने केयूर की अपनी लिखावट से भरे हुए। सुष्मा ने उसे छुआ तक नहीं था, बस पता था कि वो वहीं है, महफ़ूज़।

फिर वक़्त पीछे मुड़ गया, कोई डेढ़ साल पहले, पुणे के एक रविवार की दोपहर, जब केयूर मलपानी की हँसी अभी इस घर की सबसे बड़ी आवाज़ हुआ करती थी। टेरेस पर धूप थी, और केयूर पिया के लिए उसकी पसंदीदा मिठाई का डिब्बा लेकर आया था, बिना किसी मौक़े के, बस यूँ ही।

"देख पिया, वो वाली मिठाई की दुकान बंद होने वाली थी, तो मैंने पूरी क़तार में खड़े होकर तेरे लिए ये आख़िरी डिब्बा ले लिया।" "अब बता, आज किस बात पर नाराज़ है मुझसे?"

पिया ने डिब्बा हाथ में लिया पर उसकी नज़रें उसके फ़ोन की तरफ़ बार-बार जा रही थीं, जैसे कहीं और उसका मन अटका हो। उसने बस इतना कहा, "कुछ नहीं," और मुस्कुरा दी, एक मुस्कान जो होंठों तक ही रुक गई।

"बस थकी हूँ केयूर, शादी की तैयारियों में सिर घूम रहा है... इतने रिश्तेदार, इतनी रस्में।"

"तो चल, अगले हफ़्ते बस हम दोनों कहीं निकल चलते हैं, कोई रिश्तेदार नहीं, कोई रस्म नहीं।" "तेरे जन्मदिन पर तो पहाड़ों पर ले ही जाऊँगा, याद है ना वादा?"

दर्शक जानते हैं कि ये वादा किस पहाड़ पर, किस सुबह पूरा होगा, पर केयूर की आँखों में उस वक़्त सिर्फ़ भरोसा था, कोई शक नहीं, कोई डर नहीं। उसने पिया के माथे को चूमा और कहा कि वो दुनिया की सबसे ख़ुशक़िस्मत जगह पर खड़ा है।

"और सुन, इस बार जन्मदिन पर लोहागढ़ चलते हैं, वहाँ से लोनावला के घाट का नज़ारा तुझे पसंद आएगा।" "बस तू और मैं, कोई शोर नहीं, सिर्फ़ पहाड़ और सुबह की धूप।"

उसने ये बात इतनी सहजता से कही, जैसे वो सिर्फ़ एक तोहफ़े का ऐलान कर रहा हो, बेख़बर कि यही पहाड़, यही सुबह, उसकी आख़िरी सुबह बन जाएगी। पिया ने बस सिर हिला दिया, कुछ नहीं बोली।

"तू जैसी भी रहे पिया, नाराज़, थकी, चुप... मुझे बस तेरा साथ चाहिए। बाक़ी सब अपने आप ठीक हो जाएगा।"

पिया ने कुछ नहीं कहा, बस उसके कंधे पर सिर रख दिया, जबकि उसका दूसरा फ़ोन, वो छुपा हुआ फ़ोन, जेब में हल्का सा कंपन कर रहा था। उसने वो कंपन महसूस किया, और चेहरे पर वही रटी हुई शांति ओढ़ ली।

बाहर धूप ढल रही थी, और केयूर की मिठाई का डिब्बा टेबल पर अधखुला पड़ा था, ठीक वैसे ही जैसे उसका भरोसा, पूरा खुला, बेख़बर। सुष्मा की आँखों के आगे वो याद धुँधली पड़ने लगी, और कमरे की सचाई वापस लौट आई।

हफ़्ते भर बाद, मुक़दमे की पहली औपचारिक पेशी की सुबह, शिवाजीनगर अदालत परिसर के बाहर वैशाली कदम भीड़ को चीरते हुए अंदर जाने का रास्ता बना रही थी। कैमरों की चमक, वकीलों की भीड़, और एक तरफ़ पुलिस की वैन से पिया मित्तल को नीचे उतारा जा रहा था, चेहरा दुपट्टे से आधा ढका हुआ।

पत्रकार माइक बढ़ाकर चिल्ला रहे थे, "पिया जी, क्या आप अब भी बेगुनाह होने का दावा करती हैं?" पर पुलिस उसे घेरे हुए तेज़ी से आगे बढ़ा रही थी, जवाब देने का कोई मौक़ा नहीं। खानविलकर उसके पीछे-पीछे चल रहा था, चेहरे पर एक बना हुआ इत्मीनान।

ठीक उसी वक़्त, दूसरी तरफ़ से सुष्मा और नरेश मलपानी अदालत की सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे। दोनों रास्ते अचानक एक ही जगह पर आ मिले, और पूरे गलियारे में एक पल के लिए सन्नाटा उतर आया।

पिया ने नज़रें नीची कर लीं, वही पुराना, रटा हुआ सोग का मुखौटा चेहरे पर सजाने की कोशिश की। पर सुष्मा की आँखें उससे नहीं हटीं, दो क़दम आगे बढ़ीं, पुलिस की रोक-टोक के बावजूद।

नरेश ने पत्नी का हाथ थामने की कोशिश की, कुछ कहने को होंठ खोले, पर आवाज़ गले में ही रुक गई, और उन्होंने बस सिर झुका लिया। उनकी चुप्पी में महीनों का दर्द बोल रहा था, बिना एक शब्द के।

"बेटी..." "तूने मेरे बेटे का जन्मदिन उसकी बरसी बना दिया।"

गलियारे में मौजूद हर आदमी की साँस थम गई, वकील, पत्रकार, सिपाही, सब जैसे उस एक वाक्य के बोझ तले चुप हो गए। पिया की आँखों में एक पल के लिए वो मुखौटा पूरी तरह टूट गया, कुछ असली, कुछ टूटा हुआ, चमक उठा।

उसके होंठ काँपे, जैसे कुछ कहना चाहती हो, शायद माफ़ी, शायद सच, पर अगले ही पल उसने नज़रें ज़मीन पर गड़ा लीं और मुड़ गई। सिपाही उसे आगे ले गए, और वो पल हमेशा के लिए अधूरा रह गया।

वैशाली कुछ क़दम दूर खड़ी ये सब देख रही थी, उसकी मुट्ठी अपने आप भिंच गई। उसने महीनों तक जिस सच का पीछा किया था, वो सच आज एक माँ के एक वाक्य में सिमट आया था।

पेशी के बाद, अदालत के गलियारे के एक शांत कोने में सुष्मा एक बेंच पर बैठ गईं, थकान और राहत दोनों उनके चेहरे पर एक साथ उतर आए। वैशाली उनके पास आकर बैठ गई, बिना कुछ कहे, सिर्फ़ साथ देने के लिए।

"कदम बेटी... आज पहली बार मुझे लगा कि मैं भी कुछ कह सकती हूँ, उसके सामने खड़ी होकर।" "इतने महीने सिर्फ़ रोई थी, आज पहली बार बोली।"

"आपने जो कहा, वो अदालत के किसी काग़ज़ में दर्ज नहीं होगा सुष्मा जी, पर उस गलियारे में मौजूद हर इंसान ने सुना।" "और मैं यक़ीन से कह सकती हूँ, पिया ने भी सुना, और महसूस किया।"

दोनों कुछ देर चुप बैठी रहीं, गलियारे से गुज़रते सिपाहियों के जूतों की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई दिया। सुष्मा ने अपने बैग से केयूर की एक पुरानी तस्वीर निकाली और उसे हल्के से सहलाया।

"मुझे नहीं पता मुक़दमा कब तक चलेगा बेटी, कितनी तारीख़ें और आएँगी, कितनी बार मुझे उस लड़की का चेहरा फिर देखना पड़ेगा।" "पर मैं जानती हूँ कि मैं रुकूँगी नहीं। केयूर के लिए नहीं रुक सकती।"

"मैं भी नहीं रुकूँगी, सुष्मा जी। जब तक फ़ैसला नहीं आ जाता, हर तारीख़ पर आपके साथ खड़ी रहूँगी।"

कुछ दूरी पर नरेश खड़े यह सब देख रहे थे, आँखों में एक अजीब सी राहत, जैसे पहली बार उन्हें लगा हो कि उनकी पत्नी अकेली नहीं लड़ रही। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया, वैशाली की तरफ़, एक ख़ामोश शुक्रिया।

सुष्मा ने वैशाली के दोनों हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिए, वैसे ही जैसे कोई डूबते हुए किसी किनारे को पकड़ता है। उनकी आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत।

गलियारे की खिड़की से आती दोपहर की धूप सुष्मा के सफ़ेद बालों पर पड़ रही थी, और उनकी आवाज़ धीमी पर हर लफ़्ज़ पर अटल हो गई। उन्होंने वैशाली की आँखों में देखा, जैसे वहाँ अपने बेटे को ढूँढ रही हों।

"तुम मत रुकना बेटी।" "तुम्हीं मेरे केयूर की आवाज़ हो, अब जब वो ख़ुद बोल नहीं सकता।"

वैशाली कुछ नहीं बोल पाई, बस सिर हिला दिया, गले में एक गाँठ के साथ। चार्जशीट पर आरोप तय हो चुके थे, आज की पेशी सिर्फ़ औपचारिक थी, पर असली जिरह, कोड, सबूत, गवाह, सब अगले हफ़्ते शिवाजीनगर की उसी अदालत में शुरू होने वाला था, और उस एक वाक्य का बोझ वो उसी पल अपने कंधों पर उठा चुकी थी, हमेशा के लिए।

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