Chapter 9 of 30 10 min read
मिटे हुए निशान
दोनों बरनर फ़ोन ज़ब्त होते हैं, पर उनका सारा डेटा मिटा दिया गया है, चैट, कॉल, तस्वीरें, सब साफ़। वैशाली फ़ोन साइबर फ़ोरेंसिक लैब भेजती है, जहाँ रुतुजा कहती है, 'मिटाया गया है, पर पूरी तरह गया नहीं, मुझे एक हफ़्ता दो।' उधर चिराग का वकील खानविलकर थाने आकर धमकाता है कि पुलिस बेगुनाहों को परेशान कर रही है। फ़्लैशबैक में पिया और चिराग तय करते हैं कि सब कुछ ऐसे मिटा देंगे कि कोई कड़ी न बचे। वर्तमान में रुतुजा वैशाली को फ़ोन करती है, 'मैडम, एक चीज़ मिली है, पर आप बैठकर सुनना।'
जो मिटाया गया था, वही अब सबसे ज़्यादा बोलने वाला था, यही तय हो चुका था। उसी शाम वैशाली ने काग़ज़ी काम शुरू कर दिया, दोनों बरनर फ़ोन ज़ब्त करने का औपचारिक आदेश, पंचनामे के साथ, दो गवाहों की मौजूदगी में।
"दोनों फ़ोन आज ही ज़ब्त होंगे, रुतुजा। पिया का बरनर उसके घर से, और चिराग का, उस डिवाइस का, जिसका आईएमईआई हमने मिलाया था।"
"मैडम, दोनों के लिए अलग-अलग सर्च वॉरंट चाहिए होंगे, दो गवाहों के दस्तख़त, और ज़ब्ती का पूरा पंचनामा मौक़े पर ही तैयार करना होगा। एक भी काग़ज़ी चूक अदालत में पूरे सबूत को कमज़ोर कर सकती है।"
"तो कोई चूक नहीं होगी। हर काग़ज़ पर दस्तख़त, हर सील पर मुहर, आज रात तक सब पूरा।"
दो अलग-अलग टीमें, दो अलग-अलग घरों में पहुँचीं, वही सुबह। पिया ने बिना कोई सवाल किए फ़ोन थमा दिया, चेहरा पत्थर जैसा शांत। चिराग ने पहले वकील का नाम लिया, फिर आख़िर हार मानकर फ़ोन आगे बढ़ा दिया।
दोनों जगह पंचनामा बना, फ़ोन एक-एक करके साफ़ पॉलिथीन के लिफ़ाफ़ों में सील किए गए, हर लिफ़ाफ़े पर तारीख़, वक़्त, और गवाहों के दस्तख़त। पिया की माँ दरवाज़े पर खड़ी बस इतना बुदबुदाती रही, 'मेरी बेटी ने कुछ नहीं किया,' जबकि पिया चुपचाप अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखती रही।
शाम तक दोनों फ़ोन साइबर फ़ोरेंसिक लैब की मेज़ पर सील बंद लिफ़ाफ़ों में पहुँच चुके थे। रुतुजा ने दस्ताने पहने, सील खोली, और पहली बार दोनों डिवाइस को बूट किया।
"मैडम... ये... ये दोनों फ़ोन बिल्कुल ख़ाली हैं। न कोई चैट, न कोई कॉल लॉग, न एक भी तस्वीर। जैसे इन्हें अभी-अभी डिब्बे से निकाला गया हो।"
"ख़ाली मतलब? डिलीट किया गया है, या फिर..."
"फ़ैक्ट्री रीसेट, मैडम। दोनों डिवाइस पर, गिरफ़्तारी की ख़बर फैलने के ठीक दो दिन बाद। किसी ने बहुत सोच-समझकर, बहुत सफ़ाई से, हर निशान मिटाया है।"
दो दिन। ठीक उतने ही दिन जितने चिराग को थाने बुलाने के नोटिस और उसके सामने पेश होने के बीच बीते थे। किसी को पता चल गया था कि जाल कस रहा है।
"और मैडम, दोनों रीसेट लगभग एक ही घंटे में हुए, रात के पौने ग्यारह बजे के आसपास। यानी ये किसी घबराए हुए अकेले इंसान का काम नहीं, दोनों ने मिलकर, एक ही रात, एक ही वक़्त पर, अपने-अपने फ़ोन साफ़ किए।"
"मतलब किसी ने दोनों को चेताया था। या फिर दोनों ने पहले से ही तय कर रखा था कि अगर पुलिस क़रीब आई, तो क्या करना है।"
"तो अब हमारे हाथ में क्या बचा, रुतुजा? दो ख़ाली डिब्बे और एक टावर का नक़्शा?"
महीनों की मेहनत, टावर का डंप, बरनर का सुराग़, आईएमईआई का मेल, सब कुछ एक साथ बेकार लगने लगा। वैशाली की मेज़ पर वो पुरानी थकान लौट आई, जो 'फ़ाइल बंद करो' के हुक्म के साथ आती थी।
"मैडम, रुकिए। फ़ैक्ट्री रीसेट डेटा मिटाता है, पर पूरी तरह मिटाता नहीं। फ़्लैश मेमोरी में, अनअलोकेटेड स्पेस में, अक्सर टुकड़े बचे रह जाते हैं, जब तक कोई नया डेटा ऊपर लिखा न जाए।"
"तो तुम कह रही हो, कुछ बचा हो सकता है?"
"मिटाया गया है, मैडम, पर पूरी तरह गया नहीं। मुझे बस एक हफ़्ता दो, बिट-बाय-बिट इमेज निकालने के लिए, लैब की पूरी क्षमता के साथ।"
"एक हफ़्ता तुम्हारा। जो भी लगे, मैं गावडे साहब से बात कर लूँगी।"
"मैडम, एक बात कहूँ? जब मैंने दोनों फ़ोन ख़ाली देखे, तो एक पल को लगा जैसे महीनों की मेहनत बर्बाद हो गई। पर फिर सोचा, जिसने इतनी सफ़ाई से मिटाया है, वो डर गया था। और डरा हुआ आदमी जल्दबाज़ी में कुछ न कुछ छोड़ ही जाता है।"
"यही उम्मीद है, रुतुजा। जाओ, लग जाओ काम पर।"
उसी शाम, लोनावला रूरल थाने के बाहर एक सफ़ेद सेडान आकर रुकी, महँगी, चमचमाती, ड्राइवर समेत। भीतर आया एक अच्छे सूट में लिपटा आदमी, पचास के आसपास, आत्मविश्वास से भरी चाल के साथ, हाथ में एक चमड़े का बैग।
एडवोकेट खानविलकर, पुणे की अदालतों का एक जाना-पहचाना नाम, चिराग भाटिया के परिवार का रखा हुआ वकील। वो सीधा वैशाली की मेज़ तक चला आया, बिना इजाज़त माँगे, जैसे थाना उसकी अपनी अदालत हो।
"सब-इंस्पेक्टर कदम, है ना? मैं एडवोकेट खानविलकर, चिराग भाटिया की तरफ़ से। मुझे बताइए, एक बेगुनाह लड़के का फ़ोन ज़ब्त करने के पीछे आपके पास क्या सबूत है?"
"वकील साहब, ये जाँच का हिस्सा है। आपको केस डायरी की कॉपी नियम के मुताबिक़ मिल जाएगी।"
"नियम-क़ानून की बात मत सिखाइए मुझे, मैडम। एक टावर का डेटा, एक धुंधली सीसीटीवी, इससे किसी को हत्या का आरोपी नहीं बनाया जा सकता। मेरे मुवक्किल को बार-बार परेशान किया गया, ये हाई कोर्ट में हैरेसमेंट पिटीशन बनता है।"
वैशाली ने ध्यान दिया, खानविलकर ने एक बार भी 'बेगुनाह' के अलावा कोई और लफ़्ज़ इस्तेमाल नहीं किया, न 'दोस्त', न 'सगाई', जैसे हर वाक्य पहले से लिखकर रटा गया हो। बचाव की भाषा भी, सफ़ाई से बुनी हुई, बिल्कुल पिया और चिराग के जवाबों जैसी।
"वैसे भी, मैडम, आप किस बात पर अड़ी हैं? कोई गवाह है जिसने धक्का देते देखा हो? नहीं न? तो फिर ये सारा तमाशा किसलिए?"
"जाँच पूरी होने दीजिए, वकील साहब। जो सामने आएगा, वो अदालत में सामने आएगा, आपके सामने नहीं।"
"आपका हक़ है, वकील साहब। जो सही लगे कीजिए। हमारी जाँच अपनी रफ़्तार से चलेगी।"
"बहुत अच्छे, मैडम। बस याद रखिएगा, बड़े घरों के ख़िलाफ़ बिना पक्के सबूत के खड़े होना, करियर के लिए महँगा पड़ता है। मिलते हैं अदालत में।"
खानविलकर उतनी ही शान से निकल गया जितनी शान से आया था। वैशाली जानती थी, ये आदमी सिर्फ़ आज की धमकी नहीं था, ये आने वाले हर पेशी का, हर जिरह का, एक स्थायी प्रतिद्वंद्वी था।
उस रात, गावडे साहब को भी ख़बर मिल गई कि बड़े वकील की गाड़ी थाने के बाहर खड़ी देखी गई थी। फ़ोन पर उनकी आवाज़ में डर से ज़्यादा थकान थी, 'कदम, अब पीछे मत हटना, चाहे जो हो जाए,' और लाइन कट गई।
कुछ दिन पीछे। चिराग को थाने से नोटिस मिलने की रात, पुणे में उसके फ़्लैट की बालकनी पर, शहर की बत्तियाँ नीचे टिमटिमा रही थीं। पिया चुपके से वहाँ पहुँची थी, दुपट्टे में चेहरा छुपाए।
"पुलिस ने मुझे बुलाया है, पिया। कुछ सवाल, कुछ काग़ज़। अगर उन्होंने फ़ोन माँगे, तो हमारे बीच का हर लफ़्ज़ उन तक पहुँच जाएगा।"
"तो अब क्या करें? मैं डर रही हूँ, चिराग।"
"डरो मत, सुनो। शादी से पहले ही समुद्र शांत कर देंगे। दोनों फ़ोन साफ़, बिल्कुल कोरे, कोई कड़ी नहीं बचनी चाहिए, कुछ भी नहीं।"
"पर वो डायरी वाली रातें... वो सब मैसेज... वो हमारा था, चिराग।"
"वो अब सबूत है, पिया, यादें नहीं। जो मिटाना है, उसमें दिल मत लगाओ। आज रात, दोनों फ़ोन रीसेट होंगे, हमेशा के लिए।"
"अगर पुलिस ने पहले ही सब पढ़ लिया हो तो? अगर बहुत देर हो चुकी हो तो?"
"नहीं हुई। एक बार डेटा मिट गया, तो वो हमेशा के लिए मिट जाता है, कोई वापस नहीं ला सकता। बस आज रात, फिर हम दोनों साफ़ हैं।"
पिया का हाथ काँपा, एक सेकंड को, जब उसने अपनी उंगली रीसेट बटन के ऊपर रखी। पर चिराग की आँखों में जो सर्द यक़ीन था, वो पिया के डर से कहीं भारी पड़ गया।
उस रात, दोनों को पूरा यक़ीन था कि वो समुद्र को हमेशा के लिए शांत कर रहे हैं, कि जो मिटा दिया गया, वो कभी वापस नहीं आएगा। हमें पता था कि ये यक़ीन ग़लत था, हर मिटाया हुआ लफ़्ज़ कहीं न कहीं, किसी न किसी परछाईं में, अब भी साँस ले रहा था।
"बस कुछ दिन और, पिया। फिर कोई फ़ोन नहीं, कोई मैसेज नहीं, कोई सबूत नहीं। सिर्फ़ तुम और मैं, बाक़ी सब बह जाएगा।"
"हाँ... बस कुछ दिन और।"
पिया ने उस रात अपना फ़ोन ख़ुद अपने हाथ से रीसेट बटन तक पहुँचाया, आँखों में आँसू लिए, पर हाथ नहीं काँपा। चिराग ने अपना फ़ोन साफ़ करते हुए एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
लैब में वो हफ़्ता धीरे-धीरे बीता। रुतुजा दिन-रात एक करके बिट-बाय-बिट इमेज खँगालती रही, टूटे हुए टुकड़ों को जोड़ती, हर बाइट में कुछ ढूँढती रही जो फ़ैक्ट्री रीसेट पूरी तरह नहीं मिटा पाया था।
चौथे दिन रात, उसकी स्क्रीन पर टूटे हुए अक्षरों के टुकड़े उभरने लगे, कुछ इमोजी के अवशेष, कुछ अधूरे शब्द, किसी चैट ऐप के डेटाबेस की परछाइयाँ। रुतुजा ने हर टुकड़े को सावधानी से अलग फ़ोल्डर में सहेजा, बिना जल्दबाज़ी के, बिना किसी नतीजे पर पहुँचे बिना।
छठे दिन, उसने वही टुकड़े जोड़ने शुरू किए, एक पहेली की तरह, हर टुकड़ा अपनी जगह पर फिट होता गया। जो तस्वीर उभरी, उसने ख़ुद रुतुजा को कुर्सी पर पीछे धकेल दिया। उसने स्क्रीन को तीन बार दुबारा जाँचा, यक़ीन करने के लिए कि आँखें धोखा नहीं दे रहीं।
उसने वो फ़ाइल प्रिंट नहीं की, किसी को नहीं दिखाई, यहाँ तक कि अपने सीनियर को भी नहीं। उसने बस लैपटॉप बंद किया, गहरी साँस ली, और अपनी गाड़ी की चाबी उठाई, लोनावला रूरल थाने के लिए।
सातवें दिन शाम, वैशाली अपनी मेज़ पर बैठी एक और फ़ाइल पर हस्ताक्षर कर रही थी, तभी उसका फ़ोन बजा, रुतुजा की स्क्रीन पर चमकता नाम।
"बोलो रुतुजा, क्या हुआ?"
"मैडम... एक चीज़ मिली है। पर आप बैठकर सुनना, फ़ोन पर नहीं बताऊँगी, मैं अभी आ रही हूँ।"
"रुतुजा, इतने दिन इंतज़ार किया है, अभी तो बता दो, अच्छी ख़बर है या बुरी?"
"मैडम... दोनों। इतनी बड़ी है कि फ़ोन पर कहते हुए भी मेरा गला सूख रहा है। दस मिनट, मैं पहुँच रही हूँ।"
फ़ोन कट गया, पर रुतुजा की आवाज़ की वो थरथराहट हवा में टँगी रह गई। वैशाली ने कुर्सी पीछे खींची, मेज़ पर दोनों हाथ टिकाए, और खिड़की के बाहर लोनावला के घाटों पर उतरती शाम को देखती रही, हर पल भारी होता जा रहा था।
उसने केयूर की तस्वीर वाली फ़ाइल एक बार फिर खोल दी, जैसे इंतज़ार के उन दस मिनटों में किसी का साथ चाहिए हो। इतने हफ़्तों की मेहनत के बाद, आख़िरकार समुद्र में से कुछ निकल आया था, और वैशाली को नहीं पता था कि वो सुनने के लिए तैयार है या नहीं।
"सात दिन, रुतुजा... जो कुछ भी मिला है, उसे लेकर आओ। अब मैं बैठी हूँ, बोलो।"
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