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अध्याय 8 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

टावर का जाल

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

एक घंटे का वो ख़ाली स्तम्भ, काग़ज़ पर सिर्फ़ एक ग़ैर-हाज़िरी नहीं था। वो एक चेतावनी थी, कि काग़ज़ पर टिकी कोई भी अलीबाई अब वैशाली के लिए काफ़ी नहीं। उसी रात उसने तय कर लिया, अब किसी दफ़्तर की मुहर या किसी मैनेजर के बयान पर नहीं, अब सीधे उस पहाड़ से बात होगी, जिसने उस भोर हर एक फ़ोन की धड़कन गिनी थी।

"रुतुजा... मुझे लोहागढ़-मलावली इलाक़े के हर टावर का पूरा डंप चाहिए, उस भोर का, पौने छह से पौने सात तक। हर नंबर, चाहे वो ट्रेकर हो, दुकानदार हो, या कोई और, कोई छूटे नहीं।"

"मैडम, ये कोई एक फ़ोन का सीडीआर नहीं है, ये पूरे टावर का लोड होगा, सैकड़ों नंबर, शायद हज़ार भी। नोडल अफ़सर को औपचारिक रिक्वेस्ट भेजनी होगी, कोर्ट का सहारा भी लगेगा, कुछ दिन लगेंगे।"

"दिन लगें तो लगें, रुतुजा। एक बार वो डंप हाथ में आ गया तो कोई अलीबाई, कोई मुस्कान इसे झुठला नहीं पाएगी।"

"मैडम, एक बात और... गावडे सर को पता चलेगा कि हम एक अमीर घर के लड़के के इर्द-गिर्द पूरे टावर का डेटा खँगाल रहे हैं। वो सवाल पूछेंगे।"

"पूछें तो पूछें... मैं फ़ाइल किसी की मुस्कान की वजह से बंद नहीं करूँगी, रुतुजा, चाहे ऊपर से कितना भी दबाव आए।"

उसी हफ़्ते एक औपचारिक चिट्ठी टेलीकॉम नोडल अफ़सर के पास गई, अदालत की मुहर के साथ, और साइबर सेल की फ़ाइल में एक नया केस नंबर जुड़ गया। इंतज़ार के वो दिन धीरे-धीरे बीते, हर सुबह वैशाली अपनी मेज़ पर वही एक सवाल लेकर बैठती, आज आया क्या।

टेलीकॉम दफ़्तर से पहले कोई जवाब नहीं आया, फिर एक अधूरी फ़ाइल आई, फिर एक ग़लत तारीख़ की। रुतुजा ने तीन बार फ़ोन करके, एक बार डीसीपी के दफ़्तर से चिट्ठी दुबारा भिजवाकर आख़िरकार पूरा डेटा निकलवाया।

छठे दिन दोपहर, साइबर सेल के दफ़्तर में एक मोटी हार्ड ड्राइव और उसके साथ एक स्प्रेडशीट पहुँची, हज़ारों पंक्तियों की, हर एक में एक नंबर, एक वक़्त, एक टावर का नाम। रुतुजा ने स्क्रीन खोली और वैशाली को अपने पास बुलाया।

"मैडम, देखिए... सिर्फ़ पौने छह से पौने सात के बीच, इस एक टावर पर, चार सौ बासठ अलग-अलग नंबर पिंग हुए हैं। ट्रेकर, लोकल दुकानदार, बस का ड्राइवर, सब मिलाकर।"

"तो हम बाक़ी सबको छाँट देंगे। जिन्हें हम पहले ही जान चुके हैं, ढाबे वाला, रीचार्ज दुकान वाला, बाक़ी ट्रेकर जिनके बयान ले लिए गए, वो सब हटा दो।"

घंटों की मेहनत में एक-एक नंबर की पहचान होती गई, पुराने बयानों से मिलाया गया, स्थानीय दुकानदारों की सूची से जोड़ा गया। चार सौ बासठ की सूची धीरे-धीरे घटती गई, चार सौ, तीन सौ, फिर सिर्फ़ इक्कीस अनजान नंबर बचे।

"पिया का वो बरनर नंबर, वो इसमें है?"

"हाँ मैडम, वही है। ठीक सवा छह बजे, यही टावर, यही सेक्टर, जैसा हमने पहले भी निकाला था।"

ये कोई नई खोज नहीं थी, सिर्फ़ पुरानी बात की पुष्टि। पर वैशाली की नज़र स्क्रीन पर बाक़ी बीस अनजान नंबरों पर अटकी रही, जैसे उनमें से कोई एक अभी बोलने को बेताब हो।

"मैडम, रुकिए... इस नंबर को देखिए। यही टावर, यही सेक्टर, वक़्त... सवा छह से बीस मिनट बाद, यानी छह बजकर पैंतीस मिनट पर।"

"पैंतीस मिनट पर... ठीक तब जब केयूर गिर चुका था, और पिया मदद के लिए चीख़ रही थी। ये नंबर कौन है?"

"एक मिनट दीजिए मैडम... मैं इसे उस बरनर के डेटाबेस से मिलाती हूँ जो हमने रीचार्ज दुकान से ट्रेस किया था।"

स्क्रीन पर दो कॉलम खुले, एक तरफ़ वो नंबर जो अभी-अभी मिला था, दूसरी तरफ़ वो नंबर जिसका सिरा रीचार्ज दुकान के मालिक की उँगली से एक चेहरे तक, और एक नाम तक पहुँचा था। रुतुजा ने दोनों को बराबर रखा।

"मैडम... दोनों एक ही नंबर हैं। ठीक वही बरनर, जो चिराग भाटिया के पास खोजा गया था।"

"तो अब सिर्फ़ पिया का फ़ोन नहीं, चिराग का बरनर भी उसी भोर, उसी पहाड़ पर, उसी आधे घंटे में मौजूद था।"

"पर रुतुजा, एक सिम किसी और के नाम भी हो सकती है, कोई इस्तेमाल कर सकता है। अदालत में बचाव पक्ष यही कहेगा।"

"मैडम, सिम नहीं, डिवाइस। आईएमईआई नंबर से मैच हुआ है, वही हैंडसेट, जो रीचार्ज दुकान के सीसीटीवी में चिराग के हाथ में दिखा था। सिम बदल भी दे तो फ़ोन वही रहता है।"

ये फ़र्क़ छोटा नहीं था। एक नंबर किसी और के नाम पर हो सकता है, पर एक डिवाइस, अपनी अनोखी पहचान के साथ, हाथ नहीं बदलता, कम से कम इतनी आसानी से नहीं।

कुछ हफ़्ते पहले तक ये सिर्फ़ एक दुकानदार की याद्दाश्त पर टिका शक था। अब ये टावर के डेटा में दर्ज, बदला न जा सकने वाला एक तथ्य बन चुका था, दो बरनर, एक टावर, एक ही आधा घंटा।

रुतुजा ने सेक्टर डेटा को और गहराई से खँगाला, सिर्फ़ ये नहीं कि दोनों नंबर वहाँ थे, बल्कि किस दिशा से आए और किस दिशा गए। दोनों बरनर पौने छह से पहले उसी सेक्टर में दाख़िल हुए, जो मलावली की तरफ़ से लोहागढ़ की चढ़ाई की दिशा है।

"मैडम, देखिए इनका पैटर्न... दोनों नंबर लगभग साथ-साथ आए, कुछ मिनटों के फ़र्क़ से, और साढ़े सात बजे तक दोनों उसी सेक्टर से निकल गए, पुणे की दिशा में।"

रुतुजा की आँखों के नीचे तीन रातों की जागी हुई थकान झलक रही थी, पर उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर रुकी नहीं। वैशाली ने एक पल को हाथ उसके कंधे पर रखा।

"तुमने बहुत मेहनत की है, रुतुजा। जब ये केस अदालत पहुँचेगा, ये तुम्हारी मेहनत ही होगी जो हर लफ़्ज़ को खड़ा रखेगी।"

"मैडम, केयूर की माँ का चेहरा याद आ जाता है तो थकान भूल जाती है। बस सच बाहर आ जाए।"

"एक मिनट रुतुजा... अगर चिराग पौने छह बजे इस पहाड़ पर था, तो वो साढ़े आठ बजे पुणे के दफ़्तर में स्वाइप कैसे कर सकता है?"

"मैडम, लोहागढ़ से पुणे बाइक पर बमुश्किल पौने दो घंटे का रास्ता है, ख़ास तौर पर सुबह-सुबह जब घाट सुनसान हो। वक़्त जुड़ता है, बिल्कुल मुमकिन है।"

एक-एक करके घड़ी की सुइयाँ अपनी जगह बैठती गईं, पौने छह बजे पहाड़ पर, साढ़े आठ बजे दफ़्तर में, और उसी दफ़्तर की स्वाइप शीट में साढ़े दस से साढ़े ग्यारह का वो घंटा, जिसका जवाब अब भी बाक़ी था। एक झूठी कहानी में हर सुराख़ एक और सुराख़ की तरफ़ इशारा करने लगा था।

"मतलब दोनों साथ आए, साथ रुके, और साथ निकले। और पिया की गवाही में लिखा है, 'हम दोनों बिल्कुल अकेले थे।'"

हमें पता था कि पिया ने झूठ बोला था, पहले दिन से। पर अब वो झूठ सिर्फ़ हमारा जाना हुआ राज़ नहीं रहा, वो एक टावर की मशीन में, बिना किसी एहसान के, अपने आप दर्ज हो चुका था।

कुछ हफ़्ते पीछे। लोनावला के बाहर, एक्सप्रेसवे से हटकर, एक सुनसान ढाबे जैसा कैफ़े, जहाँ शाम की भीड़ कभी नहीं पहुँचती। बाहर हल्की बूँदाबाँदी शुरू हो चुकी थी, टिन की छत पर एक धीमी थाप, और भीतर सिर्फ़ एक बल्ब की पीली रोशनी। पिया और चिराग एक कोने की मेज़ पर बैठे थे, दो कप ठंडी होती चाय के बीच।

"चिराग... कभी-कभी लगता है, काश ये सब अपने आप ख़त्म हो जाए। कोई फ़ैसला न लेना पड़े, कोई शादी न हो, बस... सब अपने आप सुलझ जाए।"

ये कोई मंसूबा नहीं था, सिर्फ़ एक थकी हुई लड़की की थकी हुई साँस, एक ऐसी ख़्वाहिश जो हर उलझे हुए इंसान के मुँह से कभी न कभी निकलती है। पर चिराग की आँखों में उस पल कुछ और घटा, कुछ जो पिया ने देखा ही नहीं।

"अपने आप... नहीं पिया, अपने आप कुछ नहीं होता। पर एक और रास्ता भी है।"

"मतलब? कौन सा रास्ता? तुम ऐसे क्यों देख रहे हो?"

हमें दिखा, उस एक पल में, कि चिराग की आँखों से हँसी पूरी तरह ग़ायब हो चुकी थी। पिया ने वो ख़ालीपन देखा भी, महसूस भी किया, पर उसने उसे किसी थकान का हिस्सा मान लिया, किसी और चीज़ का नहीं।

"अगर केयूर कभी रास्ते से हट जाए... मेरा मतलब है, अगर शादी टूट जाए, तो तुम्हारे घर वाले किसे दोष देंगे? बस पूछ रहा हूँ, पिया।"

"ऐसी बातें मत करो चिराग... मुझे डर लगता है जब तुम ऐसे बोलते हो।"

"कुछ नहीं... भूल जाओ, बस बोल दिया। तुम बस मुझ पर भरोसा रखो, ठीक है? हम रास्ता निकाल लेंगे, वादा है।"

"तुम हो न मेरे साथ... बस यही काफ़ी है, चिराग।"

उस शाम, 'हम भाग जाएँगे' अभी पूरी तरह टूटा नहीं था, पर उसमें एक बारीक़ दरार पड़ चुकी थी। हमें पता था, उस दरार में से ही आगे चलकर 'एक और रास्ता है' का वो जुनून रिसेगा, जिसका असली मतलब पिया को उस शाम कभी समझ नहीं आया। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी, और टिन की छत पर उसकी थाप किसी उलटी गिनती जैसी बजने लगी थी।

साइबर सेल के उसी कमरे में, स्क्रीन पर वो सेक्टर मैप अब भी जगमगा रहा था, दो लाल बिंदु, एक ही रास्ता, एक ही आधा घंटा। वैशाली देर तक उसे घूरती रही, जैसे उसमें से कोई और सच निचोड़ना चाहती हो।

"मैडम, मैं ये पूरी रिपोर्ट लिखित में तैयार कर रही हूँ, हर टाइमस्टैंप, हर सेक्टर, हर मिलान के साथ। ये सिर्फ़ शक नहीं रहेगा, ये काग़ज़ पर एक ठोस पैटर्न बनेगा।"

"लिख दो, रुतुजा। और साफ़ लिखना, कोई घुमा-फिराकर नहीं। पिया मित्तल ने कहा था वो और केयूर बिल्कुल अकेले थे। टावर कहता है, वहाँ तीसरा और चौथा दोनों मौजूद थे।"

वैशाली की मेज़ पर, स्क्रीन के ठीक बग़ल में, केयूर की वो मुस्कुराती हुई तस्वीर अब भी टिकी थी, जन्मदिन की टोपी पहने, पिया का हाथ थामे। उसने एक पल के लिए तस्वीर को देखा, फिर स्क्रीन पर लौट आई। एक आदमी, जिसने सिर्फ़ भरोसा किया था, अब एक सेक्टर मैप की दो लाल बत्तियों में सिमट गया था।

कुछ हफ़्तों पहले तक वैशाली की मेज़ पर एक 'हादसा' पड़ा था, जिसमें बस एक शक की परछाईं थी। अब उस मेज़ पर एक 'हादसा' नहीं बचा, अब वहाँ दो झूठ बोलते लोग थे, जिन्हें एक मशीन ने, बिना नफ़रत या दया के, उसी पहाड़ पर, उसी वक़्त, साथ-साथ दर्ज कर लिया था।

"मैडम, एक बात और... दोनों बरनर पर कुछ मैसेज ऐप के डेटा पैकेट भी दर्ज हैं, उसी सुबह के, पर मैसेज ख़ुद मिटाए जा चुके हैं। अगर मैं वो रिकवर कर पाई, तो शायद हमें पता चले वो एक-दूसरे को क्या कह रहे थे।"

"तो अगला काम यही है, रुतुजा। जो उन्होंने मिटाया है, वही सबसे ज़्यादा बोलेगा।"

"अब सवाल ये नहीं रहा कि कोई तीसरा वहाँ था या नहीं, रुतुजा। सवाल ये है कि जो दो लोग उस भोर साथ पहाड़ चढ़े थे, उन्होंने केयूर मलपानी के साथ ऊपर क्या किया।"

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