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अध्याय 10 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

समुद्र शांत है

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

दस मिनट, ठीक दस मिनट में रुतुजा की गाड़ी की हेडलाइट्स लोनावला रूरल थाने के अहाते में मुड़ीं। वो लैपटॉप का बैग सीने से चिपकाए तेज़ क़दमों से भीतर आई, और सीधा वैशाली की मेज़ के सामने वाली कुर्सी खींच ली।

"दरवाज़ा बंद कर दीजिए, मैडम। जो मैं दिखाने आई हूँ, वो अभी इस कमरे से बाहर नहीं जाना चाहिए।"

वैशाली ने उठकर दरवाज़ा बंद किया, परदा खींचा, और मेज़ की लैंप जला दी। रुतुजा ने लैपटॉप खोला, एक एन्क्रिप्टेड फ़ोल्डर का पासवर्ड टाइप किया, और स्क्रीन वैशाली की तरफ़ घुमा दी।

"सात दिन, बिट-बाय-बिट, मैडम। फ़ैक्ट्री रीसेट ने ऊपरी परत मिटाई थी, पर अनअलोकेटेड स्पेस में चैट डेटाबेस के टुकड़े बचे रह गए थे। मैंने उन्हें एक-एक करके जोड़ा।"

"ये दोनों बरनर के बीच की पूरी बातचीत है। पिया और चिराग। महीनों की, सैकड़ों मैसेज। पर पढ़ने में... आप ख़ुद देखिए।"

"ये तो... दो प्रेमियों की बातें लगती हैं, रुतुजा। 'समुद्र', 'पंछी', इमोजी, दिल के निशान। इसमें ऐसा क्या है जिसके लिए तुमने मुझे बैठकर सुनने को कहा?"

"पहली बार पढ़िए, तो ये सिर्फ़ इश्क़ है, मैडम। 'समुद्र', एक-दूसरे का प्यारा नाम।, साथ में लहर का इमोजी, बस एक इमोजी। 'पंछी', कोई मज़ाक। 'ट्रेक वाला दिन', घूमने का कोई प्लान।"

"'गुड मॉर्निंग, मेरे समुद्र, आज तुझे बहुत मिस किया।' 'पंछी आज फिर मुझे मंदिर घुमा लाया, बेचारा।' रुतुजा, ये तो सच में रोज़मर्रा की बातें लगती हैं। हँसी, नाराज़गी, मान-मनौव्वल, दिल के इमोजी। इनमें से किसी को अदालत में रखूँ तो लोग हँसेंगे।"

"यही तो इनकी चालाकी है, मैडम। इन्होंने असली मैसेज को सैकड़ों झूठे, प्यार भरे मैसेज के बीच छुपा दिया। कोई ऊपर-ऊपर देखे, तो उसे सिर्फ़ दो आशिक़ दिखेंगे। पर जो सही सवाल लेकर पढ़े, उसे इन्हीं बातों के बीच गड़ा हुआ ज़हर मिल जाएगा।"

"अब दूसरी बार पढ़िए, ये जानते हुए कि केयूर किस दिन, किस वक़्त, किस जगह गिरा। वही लफ़्ज़ अपना चेहरा बदल देते हैं।"

वैशाली ने स्क्रॉल किया, और हर मैसेज दो बार पढ़ा, एक बार किसी अनजान की तरह, एक बार अफ़सर की तरह। पहली नज़र में फूल, दूसरी नज़र में ख़ंजर। और हमें, जो सच पहले से जानते थे, वो लफ़्ज़ पहले ही पन्ने से चीख़ रहे थे।

"'समुद्र शांत करना ज़रूरी है, वरना हम कभी किनारे नहीं लगेंगे।' रुतुजा, 'समुद्र' कोई नाम नहीं है। ये कोई रुकावट है, कोई इंसान।"

"और 'पंछी', मैडम? यहाँ एक मैसेज है, 'पंछी को उसके पहाड़ बहुत पसंद हैं।' केयूर को पहाड़ पसंद थे। ये पूरा शहर जानता है।"

"तो 'पंछी' केयूर है। और 'ट्रेक वाला दिन'..."

वैशाली का वाक्य अधूरा रह गया। खिड़की के बाहर लोनावला के घाटों पर अँधेरा उतर आया था, पर कमरे के भीतर, स्क्रीन की नीली रौशनी में, एक और ही अँधेरा फैल रहा था।

कुछ हफ़्ते पीछे। दो अलग-अलग कमरे, दो छुपे हुए बरनर फ़ोन, और उनके बीच रात के अँधेरे में तैरते वो मैसेज, जो अब लैब की स्क्रीन पर टुकड़ों में लौट आए थे। पिया अपने कमरे में, चिराग अपने फ़्लैट में, और बीच में एक योजना, जिसे वो प्यारे नामों में लपेट रहे थे।

'समुद्र' कभी सिर्फ़ उन दोनों का नाम था, एक-दूसरे के लिए, हँसी-मज़ाक में रखा हुआ। अब वही नाम एक और चीज़ के लिए इस्तेमाल हो रहा था, और दोनों जानते थे किसके लिए।

शुरू में ये सचमुच एक मज़ाक था। किसी पुरानी शाम, चिराग ने पिया को 'मेरा समुद्र' कहा था, गहरा, बेचैन, कभी न थमने वाला। पिया उस रात हँस दी थी। पर जैसे-जैसे 'हम भाग जाएँगे' का रास्ता बंद होता गया, वही प्यारा नाम धीरे-धीरे एक और चीज़ का नाम बनता गया, उस काम का, जिसका असली नाम वो अपनी ज़ुबान पर नहीं ला सकते थे।

"समुद्र अभी भी बीच में खड़ा है, पिया। जब तक वो नहीं हटता, तेरा-मेरा कोई किनारा नहीं। 'भाग जाएँगे' से कुछ नहीं होगा, वो हमें ढूँढ ही लेंगे। एक और रास्ता है।"

"मुझे डर लगता है, चिराग। पर... हाँ। पंछी को उसके पहाड़ बहुत पसंद हैं। उसके जन्मदिन पर, ऊपर, कोई शक नहीं करेगा।"

"सुन ध्यान से। उस दिन सुबह पाँच बजे निकलना, ताकि ऊपर भीड़ न हो। मैं अलग रास्ते से आऊँगा, बुर्ज के पिछवाड़े वाली पगडंडी से, हुडी और हेडफ़ोन में। तू बस उसे विंचू काटा के किनारे तक ले आना, बाक़ी सब अपने आप हो जाएगा।"

"और अगर कोई देख ले? अगर वो चीख़े, अगर वो लड़े? चिराग, मैं ये सब कैसे कर पाऊँगी..."

"कोई नहीं देखेगा, भोर में वहाँ ऊपर कोई नहीं होता। और तुझे कुछ नहीं करना, बस उसका हाथ थामे रखना, आख़िरी सेल्फ़ी के बहाने। एक पल, पिया, बस एक पल की बात है, और फिर हमेशा की आज़ादी।"

और हमें पता था वो 'पंछी' कौन था। वही नौजवान, जो उन्हीं दिनों अपनी माँ को फ़ोन पर बता रहा था कि वो पिया को सबसे ख़ूबसूरत सुबह दिखाने पहाड़ ले जा रहा है। उसकी हत्या की तारीख़, उसके अपने जन्मदिन पर, इमोजी के साथ तय हो रही थी।

"उसे किनारे तक तू ले जाना, सेल्फ़ी के बहाने। बाक़ी मुझ पर छोड़ दे, हुडी में मुझे कोई नहीं पहचानेगा।, साथ में लहर का इमोजी जब भेजूँ, समझ जाना, समुद्र शांत हो गया।"

"और उसके बाद सच में सब ठीक हो जाएगा? चिराग, वो मुझसे कितना प्यार करता है... कभी-कभी मुझे..."

"प्यार? उसका वही प्यार तो तेरी जंज़ीर है, पिया। जिस दिन समुद्र शांत होगा, उसी दिन तू आज़ाद होगी। बस उस दिन तक, उसके सामने मुस्कुराती रहना।"

कोई ऊँची आवाज़ नहीं, कोई गुस्सा नहीं। बस दो लोग, फ़ोन की नीली रौशनी में, एक पूरी ज़िंदगी को इमोजी और प्यारे नामों में लपेटकर मिटाने की योजना बुनते हुए। यही इस कहानी का सबसे ठंडा हिस्सा था, कि क़त्ल की भाषा इतनी प्यारी हो सकती थी।

लैब की स्क्रीन पर वापस, वर्तमान में, वैशाली ने अपनी नोटबुक निकाली और हर कोड शब्द के सामने एक तारीख़, एक वक़्त लिखना शुरू किया। रुतुजा उसके कंधे के पास खड़ी, एक-एक मैसेज पढ़ती रही।

"देखो रुतुजा... हर बार जब 'समुद्र' का ज़िक्र आता है, उसके अगले ही हफ़्ते कोई न कोई हरकत होती है। रेकी, बरनर का रिचार्ज, बाइक। ये इश्क़ की बकवास नहीं है, ये एक टाइमलाइन है।"

"और ये देखिए, मैडम। 'समुद्र' शब्द के बाद हर बार एक, साथ में लहर का इमोजी का इंतज़ार होता है। एक जगह लिखा है, 'जब, साथ में लहर का इमोजी आए, तभी समझना पूरा हुआ।' ये सिर्फ़ एक इमोजी नहीं था, ये एक इशारा था, काम पूरा होने का।"

"और वो, साथ में लहर का इमोजी आया भी, रुतुजा। उस सुबह, केयूर के गिरने के बाद। एक इमोजी, जिसका मतलब था, एक इंसान की साँसें रुक गईं।"

"और यहाँ, मैडम, ट्रेक से तीन दिन पहले। 'ट्रेक वाला दिन पक्का। मौसम साफ़ रहेगा।' मौसम... या रास्ता साफ़?"

"दोनों। इन्होंने हर लफ़्ज़ को दो मतलब दिए, ताकि कोई पढ़े तो प्यार दिखे, और ये पढ़ें तो नक़्शा।"

रुतुजा एक पल रुकी। उसने वो आख़िरी टुकड़ा खोला, जो उसने सबसे बाद में जोड़ा था, वही जिसने उसे कुर्सी पर पीछे धकेल दिया था। उसने वैशाली की तरफ़ देखा, फिर स्क्रीन की तरफ़।

"मैडम, ये सबसे आख़िरी बरामद मैसेज है। इसका टाइमस्टैंप देखिए। उस सुबह... सवा सात बजे।"

"सवा सात... केयूर सवा छह बजे गिरा था। ठीक एक घंटे बाद।"

रुतुजा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस स्क्रीन पर वो एक लाइन बड़ी कर दी, जो एक बरनर से दूसरे बरनर को भेजी गई थी, केयूर की मौत के ठीक एक घंटे बाद, उसी पहाड़ की तलहटी से।

"'समुद्र शांत हो गया... अब हम आज़ाद हैं।'"

कमरे में एक भयानक ख़ामोशी उतर आई। वो शब्द, जो कभी दो प्रेमियों का प्यारा नाम थे, अब एक क़बूलनामा बन चुके थे। 'समुद्र शांत हो गया,' यानी केयूर मर चुका है। 'अब हम आज़ाद हैं,' यानी काम पूरा।

"एक घंटा, रुतुजा। उसने अपने मंगेतर को खाई में गिरते देखा, और एक घंटे बाद... 'अब हम आज़ाद हैं।' ये आँसू नहीं थे। ये इंतज़ार था।"

"मैंने ये लाइन सैकड़ों बार पढ़ी, मैडम, और हर बार मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ये लोग हँस रहे थे, इमोजी भेज रहे थे, उस सुबह के बाद।"

वैशाली उठकर खिड़की तक गई, फिर लौट आई। उसने वो पूरी चैट एक बार फिर, शुरू से आख़िर तक पढ़ी, और अब हर 'समुद्र', हर 'पंछी', हर छोटा-सा इमोजी उसे एक तमाचे की तरह लग रहा था। प्यार की भाषा में लिखी गई एक क़त्ल की डायरी।

"कुल एक सौ चौदह मैसेज बरामद हुए हैं, मैडम, टुकड़ों में जुड़कर। इनमें से नौ में 'समुद्र' आया है, चार में 'पंछी', और तीन में 'ट्रेक वाला दिन'। बाक़ी सब बस इसलिए है, ताकि ये नौ मासूम लगें।"

"एक सौ चौदह झूठ, ताकि नौ सच छुप जाएँ। पर अब वो नौ मेरे पास हैं, रुतुजा।"

वैशाली को सुष्मा का चेहरा याद आया, वो लाइन, 'मेरा बेटा पहाड़ों का बादशाह था।' वो नौजवान, भरोसे से भरा, अपनी ही मौत को जन्मदिन का तोहफ़ा समझकर पहाड़ चढ़ा था। और उसकी मौत की ख़बर, इमोजी में लिपटी, सिर्फ़ एक घंटे में एक फ़ोन से दूसरे फ़ोन तक सफ़र कर चुकी थी।

"रुतुजा, ये इक़बालिया बयान है। दो लोगों ने अपने ही हाथ से, लिखकर, अपने जुर्म का इक़रार किया है।"

"पर मैडम... अदालत में? खानविलकर खड़ा होकर कहेगा, ये तो दो प्रेमियों की शायरी है। 'समुद्र', 'आज़ादी', ये तो इश्क़ के इस्तेआरे हैं। कहाँ लिखा है, 'हमने केयूर को मारा'?"

और यही वो दीवार थी। वैशाली के हाथ में एक क़बूलनामा था, पर काग़ज़ पर वो सिर्फ़ प्यार की भाषा थी। हम, जो सच जानते थे, हर लफ़्ज़ का असली मतलब पढ़ सकते थे, पर क़ानून इशारों पर नहीं चलता। वो सबूत माँगता है, जो इन प्यारे नामों को क़त्ल से बाँध दे।

"तो अब हमें इनकी अपनी भाषा को इन्हीं के ख़िलाफ़ मोड़ना होगा। हर कोड को एक तारीख़ से, एक जगह से, एक हरकत से बाँधेंगे। जब तक हर लफ़्ज़ पत्थर की तरह ठोस न हो जाए।"

उस रात वैशाली देर तक उस एक लाइन को देखती रही, 'समुद्र शांत हो गया, अब हम आज़ाद हैं।' उसके हाथ में एक हत्यारे की आवाज़ थी, साफ़, बेशर्म, अपने ही जुर्म का इक़रार करती हुई। पर वो जानती थी, इस इक़बालिया बयान को अदालत में सच साबित करने की लड़ाई अभी शुरू भी नहीं हुई थी। समुद्र शांत नहीं हुआ था। वो अभी उठने वाला था।

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