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अध्याय 2 / 30 पढ़ने में 11 मिनट

साफ़ आँसू

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

उस रात लोहागढ़ का वो तीसरा निशान वैशाली कदम की आँखों से नींद छीन ले गया। ... वो करवटें बदलती रही, और अँधेरी छत पर बार-बार वही एक मंज़र उभरता रहा। एक मर्दाना बूट का निशान, गीली मिट्टी में गहरा धँसा।

फ़ोन में उसने उस निशान की दस-बारह तस्वीरें खींची थीं, हर कोण से, स्केल रखकर। पर वो अच्छी तरह जानती थी, अकेला एक जूते का निशान किसी बंद होती फ़ाइल को दुबारा नहीं खोल सकता।

ऊपर से हुक्म तो पहले ही उतर चुका था। "ट्रेकिंग हादसा", केस बंद, घर जाओ। एक निशान के ख़िलाफ़ पूरा महकमा खड़ा था। उसे एक ऐसा गवाह चाहिए था जो झूठ बोल ही न सके।

रात को ही थाने से फ़ोन आ गया था। सीनियर इंस्पेक्टर गावडे की खरखराती आवाज़। "कदम, ये बड़े बिल्डर का इकलौता बेटा है, मीडिया सिर पर चढ़ी है। हादसा है, फ़ाइल बंद करो, और आराम से घर जाओ।" वैशाली ने सिर्फ़ "जी सर" कहा था। और फ़ोन रखते ही, अपने जूते वापस पैरों में डाल लिए थे।

और ऐसा गवाह इस पूरे मामले में सिर्फ़ एक था। ... केयूर मलपानी का अपना शरीर।

अगली सुबह, अभी अँधेरा ही था जब वैशाली एक्सप्रेसवे के घाट उतरकर पुणे की तरफ़ निकल पड़ी। मंज़िल थी ससून अस्पताल, जहाँ पोस्टमॉर्टम की मेज़ पर केयूर का शरीर उसका इंतज़ार कर रहा था।

रास्ते भर उसके कानों में पिया की वो रटी हुई लाइन गूँजती रही। "हम अकेले थे, साहब। पूरे बुर्ज पर हम सिर्फ़ दो थे।" और आँखों के सामने, चट्टान की ओट में छुपा वो तीसरा निशान।

वैशाली को नहीं पता था कि वो निशान किसका है। पर हम जानते थे। एक हुडी में लिपटी परछाईं, चीड़ के पेड़ों के पीछे। एक मोटरसाइकिल। और पिया के दुपट्टे के नीचे थरथराता एक दूसरा फ़ोन, जिस पर सिर्फ़ एक शब्द चमका था। ... "समुद्र।"

ससून अस्पताल का पोस्टमॉर्टम कक्ष। फ़िनाइल और मौत की मिली-जुली, भारी बू। और ट्यूबलाइट की वो सफ़ेद, बेरहम रोशनी, जो हर चीज़ को उसके असली रूप में खोल देती है।

मेज़ के उस पार खड़े थे डॉक्टर मोरे। पचपन साल के, तीस बरस से लाशों की ख़ामोश ज़ुबान पढ़ते आए एक थके हुए पोस्टमॉर्टम सर्जन। जज़्बात उनके पास बहुत पहले चुक गए थे। अब सिर्फ़ ब्यौरे बचे थे, और सच।

"कदम, तुम लोनावला रूरल से इतनी दूर, ससून तक चली आईं? ये तो सीधा-सादा मामला दिखता है। किला, फिसलन, खाई। रिपोर्ट कल तक ख़ुद तुम्हारे थाने पहुँच जाती।"

"डॉक्टर, रिपोर्ट भेजने से पहले... मुझे शरीर एक बार अपनी आँखों से दिखा दीजिए। सिर्फ़ दस मिनट। अगर सब कुछ साफ़ निकला, तो मैं ख़ुद फ़ाइल पर दस्तख़त कर दूँगी। वादा।"

"जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। पर मैं तुम्हें पहले ही बता दूँ, कदम... मुझे भी इस शरीर पर कुछ चीज़ें मिली हैं, जो इस 'हादसे' वाली कहानी में ठीक बैठ ही नहीं रहीं।"

वैशाली की रीढ़ सीधी हो गई। तीस साल से मौत को पढ़ते आए एक सर्जन का यूँ ठिठकना, कोई मामूली बात नहीं थी।

"देखो कदम। जब कोई इंसान सौ-सवा सौ फुट गहरी खाई में गिरता है, तो चोटें एक ख़ास तरतीब में आती हैं। सिर, कंधा, पसलियाँ, कूल्हे, जहाँ-जहाँ शरीर पत्थरों से टकराता है। ये सारी गिरने वाली चोटें केयूर पर मौजूद हैं।"

"तो फिर दिक़्क़त कहाँ है, डॉक्टर?"

"दिक़्क़त ये है, कदम... कि इस शरीर पर कुछ चोटें ऐसी भी हैं, जो गिरने से पहले की हैं। और वो एक बिल्कुल अलग कहानी कह रही हैं।"

डॉक्टर मोरे ने केयूर की दाहिनी कलाई धीरे से उठाई। ट्यूबलाइट की तेज़ रोशनी में वैशाली मेज़ की तरफ़ थोड़ा और झुक गई।

"यहाँ देखो। कलाई के चारों तरफ़, ये नीला-बैंगनी घेरा। ये फिसलने से नहीं आता, कदम। ये तब आता है, जब किसी की कलाई को ... किसी दूसरे हाथ ने, पूरी ताक़त से जकड़ लिया हो।"

"पकड़ का निशान..."

"उँगलियों के निशान, बिल्कुल साफ़। चार उँगलियाँ एक तरफ़, अँगूठा दूसरी तरफ़। और निशान की गहराई और फैलाव बताते हैं कि जकड़ने वाला हाथ किसी औरत का नहीं था। ये एक मज़बूत मर्द का हाथ था।"

एक मज़बूत मर्द का हाथ। ... वैशाली के लिए ये अभी एक चेहराविहीन पहेली थी। पर हम उस हाथ को जानते थे। वो हाथ, जो एक काली हुडी की आस्तीन से निकला था।

"डॉक्टर, ये पक्का है कि निशान गिरने से पहले का है? गिरते वक़्त किसी पत्थर या टहनी से भी तो कलाई ऐसे मुड़ सकती है?"

"नहीं, कदम। चोट का रंग बता देता है वो कब लगी। ये नीलापन मौत से चंद मिनट पहले का है, जब ख़ून अभी रगों में दौड़ रहा था। गिरने के बाद बने ज़ख़्मों का रंग बिल्कुल अलग होता है। ये पकड़ ... ज़िंदा केयूर की कलाई पर पड़ी थी।"

यानी गिरने से ठीक पहले, किसी ने केयूर की कलाई ज़ोर से जकड़ी थी। उस केयूर की, जिसके साथ पिया के बयान के मुताबिक़, उस पूरे बुर्ज पर सिर्फ़ वो दोनों थे।

वैशाली को एक पल के लिए साँस लेने बाहर निकलना पड़ा। और पोस्टमॉर्टम कक्ष के दरवाज़े के बाहर, गलियारे में, एक और मंज़र उसका इंतज़ार कर रहा था।

एक ठंडी लोहे की बेंच पर एक अधेड़ औरत बैठी थी, हाथ में बेटे की एक फ़्रेम की हुई तस्वीर थामे। ... आँखें रो-रोकर सूज चुकी थीं, फिर भी आँसू थम नहीं रहे थे। ये थीं सुष्मा मलपानी। केयूर की माँ।

और वैशाली की आँखों ने एक ही पल में फ़र्क़ पकड़ लिया। कल पिया के आँसू पल भर में रुक गए थे, किसी स्विच की तरह। पर इस माँ के आँसू ... इन्हें कोई स्विच रोक ही नहीं सकता था।

"आप... आप पुलिस से हैं? बताइए न, बेटा, मेरे केयूर के साथ ये कैसे हो गया? वो... वो तो पहाड़ों का बादशाह था। पूरे सह्याद्रि का बादशाह।"

"आठ साल का था जब पहली बार सिंहगढ़ चढ़ा था, मेरा हाथ थामे। उसके बाद हर छुट्टी में पहाड़। राजगढ़, तोरणा, हरिश्चंद्रगढ़, कालसुबाई... सब चढ़े हैं उसने। मेरा बेटा फिसल कैसे सकता है, बेटा? वो कभी नहीं गिरता था। कभी नहीं।"

सुष्मा ने वो फ़्रेम की हुई तस्वीर वैशाली की तरफ़ बढ़ा दी। उसमें केयूर किसी चोटी पर खड़ा था, बाँहें फैलाए, हवा में हँसता हुआ, जैसे पूरी दुनिया उसकी मुट्ठी में हो। वैशाली ने उस हँसते चेहरे को देखा, और फिर उस बंद दरवाज़े की तरफ़, जिसके पीछे वही चेहरा अब ठंडा पड़ा था।

एक माँ का ग़म अक्सर अंधा होता है। वो अपने बच्चे को हमेशा बेदाग़, हमेशा माहिर देखती है। पर इस बार, वैशाली के कान इस बात पर खड़े हो गए। एक इतना तजुर्बेकार ट्रेकर ... ठीक उसी पहाड़ से गिरा, जिसे वो अपनी हथेली की तरह जानता था?

"माँजी... केयूर पहाड़ों का कितना माहिर था? सच बताइएगा, माँ की आँख से नहीं, जैसा था वैसा।"

"माहिर? वो तो औरों को सिखाता था, बेटा। उसके दोस्त उसे प्यार से 'माउंटेन गोट' कहते थे, पहाड़ी बकरा। जिस लोहागढ़ पर वो सैकड़ों बार चढ़ा-उतरा, उसी की एक जानी-पहचानी चट्टान पर उसका पैर फिसल गया? मेरा दिल नहीं मानता। कोई माँ ये नहीं मान सकती।"

"माँजी, आप ग़लत नहीं कह रहीं। जो इंसान बरसों से इन पहाड़ों को अपनी हथेली की तरह जानता हो, वो यूँ अचानक, एक जानी-पहचानी चट्टान पर... मेरे मन में भी ठीक यही सवाल है, माँजी।"

वैशाली चुप रही। क्योंकि उस बंद दरवाज़े के पीछे, पोस्टमॉर्टम कक्ष में, केयूर का अपना शरीर अभी-अभी ठीक यही बात कह रहा था। कि वो फिसला नहीं। कि वो गिरा नहीं।

"एक बात पूछूँ, बेटा? मेरा केयूर तो कभी अकेले ट्रेक पर नहीं जाता था। हमेशा पूरा ग्रुप, दोस्त, कोई न कोई गाइड। उस दिन सिर्फ़ वो और पिया, दो ही क्यों थे? इतने ख़तरनाक किले पर, भोर के अँधेरे में, सिर्फ़ दो?"

वैशाली ने ये सवाल संभालकर, कहीं बहुत गहरे रख लिया। एक माँ, जो अपने बेटे को इस दुनिया से बेहतर जानती थी, वो ठीक वही सवाल पूछ रही थी, जो कल रात से वैशाली के भीतर भी उठ रहा था।

"साहब, आपकी आँखों में मुझे कुछ दिख रहा है। सब कह रहे हैं हादसा, हादसा, फ़ाइल बंद करो। पर आप ... आपको भी कुछ खटक रहा है, है न? भगवान के लिए, बेटा, सच पता कीजिए। मेरे बेटे का सच।"

"माँजी... मैं आपसे एक वादा करती हूँ। जब तक इस मौत के हर सवाल का जवाब नहीं मिल जाता, ये फ़ाइल बंद नहीं होगी। किसी के कहने से नहीं। ये मेरा वादा है।"

और उस बेरहम, फ़िनाइल की बू में डूबे गलियारे में, एक टूटी हुई माँ और एक ज़िद्दी अफ़सर के बीच ... एक ख़ामोश रिश्ता जुड़ गया। एक ऐसा रिश्ता, जो आने वाले महीनों में इस पूरे केस की रीढ़ बनने वाला था।

सुष्मा को उसके पति नरेश के पास छोड़कर, वैशाली दुबारा पोस्टमॉर्टम कक्ष में लौटी। डॉक्टर मोरे अभी भी शरीर पर झुके थे। जैसे लाश उनसे धीरे-धीरे, फुसफुसाकर बात कर रही हो।

"अच्छा हुआ लौट आईं, कदम। बाहर वाली माँ के लिए तो मेरे पास सिर्फ़ अफ़सोस है। पर तुम्हारे लिए... मेरे पास इससे भी ज़्यादा कुछ है। एक और चीज़, जो सबसे ज़्यादा चुभती है।"

उन्होंने केयूर की दोनों हथेलियाँ धीरे से खोलीं। ट्यूबलाइट के नीचे उँगलियाँ हल्की-सी मुड़ी हुई थीं, जैसे अब भी किसी चीज़ को थामे हों।

"ये देखो। दोनों हथेलियों में, उँगलियों के अंदरूनी हिस्से में, गहरी ख़रोंचें। नाख़ून टूटे हुए, और उनके नीचे मिट्टी और घास फँसी हुई। जानती हो इसका क्या मतलब है, कदम?"

"उसने... किसी चीज़ को जकड़ने की कोशिश की।"

"बिल्कुल। ये बचाव के ज़ख़्म हैं, कदम। गिरते-गिरते इस लड़के ने किनारे की घास, झाड़ी, मिट्टी, जो भी हाथ आया, जान बचाने के लिए जान लगाकर पकड़ा। इतनी बुरी तरह, कि नाख़ून जड़ से उखड़ गए और हथेलियाँ छिल गईं।"

वैशाली की साँस एक पल को थम गई। जो इंसान फ़ोटो खिंचवाते हुए, बेख़बर, अचानक फिसलता है, उसे तो संभलने का एक पल भी नहीं मिलता। पर जो इंसान जानता हो कि उसे धकेला जा रहा है, वो आख़िरी साँस तक लड़ता है। हर तिनके को जकड़ता है।

"यानी वो ज़िंदा था... आख़िरी पल तक होश में। उसे पता था कि वो गिर रहा है।"

"हाँ, कदम। और यही इस मौत की सबसे तकलीफ़देह बात है। जो अचानक फिसलता है, वो एक चीख़ के साथ, बेख़बर ख़त्म हो जाता है। पर जिसे कोई सोच-समझकर धकेलता है, वो उन आख़िरी चंद पलों में सब कुछ समझ जाता है। ... कौन, और क्यों।"

"अब दोनों बातों को जोड़ो, कदम। एक तरफ़ कलाई पर किसी मज़बूत मर्द की पकड़ का ताज़ा निशान। दूसरी तरफ़ हथेलियों में जान बचाने की आख़िरी, बेचैन जद्दोजहद के ये ज़ख़्म।"

"एक बेख़बर आदमी, जो अचानक फिसलता है, वो न किसी मज़बूत हाथ से जकड़ा जाता है, न उसे बचाव के ऐसे ज़ख़्म आते हैं। ये दोनों निशान, एक ही शरीर पर, एक ही पल में, सिर्फ़ तभी आ सकते हैं ... जब वो जानता हो कि वो गिरने वाला है, और कोई उसे गिरा रहा हो।"

कमरे में एक पल के लिए सिर्फ़ ट्यूबलाइट की वो बारीक भिनभिनाहट रह गई। वैशाली को अपने ही सीने में धड़कती धड़कन साफ़ सुनाई देने लगी।

"डॉक्टर... आप साफ़-साफ़, अपने शब्दों में, क्या कहना चाहते हैं?"

डॉक्टर मोरे ने पहली बार शरीर से नज़र हटाई। अपना चश्मा उतारा, आँखें मलीं, और सीधे वैशाली कदम की आँखों में देखा। तीस साल के तजुर्बे की पूरी ठंडी सच्चाई उनकी आवाज़ में उतर आई।

"मैं ये कह रहा हूँ, कदम... कि तुम्हारी फ़ाइल पर लिखा वो एक शब्द झूठ है। ये आदमी गिरा नहीं है। ... इसे गिराया गया है।"

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