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Chapter 16 of 30 11 min read

रिमांड की जंग

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

दो रातों की अलग-अलग सलाखों के बाद, तीसरी सुबह पिया और चिराग को साथ-साथ, पर हथकड़ियों में जकड़ा, मावळ तालुका की अदालत में लाया गया। बाहर मीडिया की भीड़ इतनी थी कि पुलिस को गेट के आगे बैरिकेड लगानी पड़ी।

कैमरों की क़तार में हर चैनल का माइक, हर रिपोर्टर एक ही सवाल दोहराता, "क्या बिल्डर के बेटे का क़त्ल हुआ था?" अंदर, गलियारे में सिपाहियों की क़तार ने बड़ी मुश्किल से भीड़ को रास्ता दिया।

अंदर, लकड़ी की पुरानी बेंचों वाली अदालत में वैशाली सबसे आगे की क़तार में बैठी थी, अपने महीनों के काम को आज पहली बार एक जज के सामने, काग़ज़ों की शक्ल में तौला जाता देख रही थी।

दो क़तार पीछे सुष्मा और नरेश बैठे थे, केयूर की माँ-बाप, पहली बार अपने बेटे के क़ातिलों को इतने क़रीब से देख रहे थे। सुष्मा की मुट्ठी में एक पुराना रूमाल था, जिसे वो लगातार, बिना जाने, मरोड़ती रहीं।

कठघरे में पिया और चिराग महीनों बाद पहली बार एक ही कमरे में थे, पर दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ एक बार भी नज़र नहीं उठाई। वो सवाल जो वैशाली ने उस रात दो अलग-अलग हवालातों में पढ़ा था, अब उसी कमरे में, एक अनकही दूरी की तरह खड़ा था।

बचाव पक्ष की तरफ़ से खानविलकर उठ खड़े हुए, कोट की बाँहें ठीक करते हुए, उस आत्मविश्वास के साथ जो सिर्फ़ महँगी फ़ीस ही दे सकती है।

"योर ऑनर, पूरा अभियोग सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ों की एक कड़ी है।" "कोई गवाह नहीं जिसने मेरे मुवक्किल को धक्का देते देखा हो। एक फ़ोन का किसी टावर पर पिंग करना कोई जुर्म नहीं है, योर ऑनर।"

वैशाली की मुट्ठियाँ गोद में कस गईं, पर उसने ख़ुद को याद दिलाया, आज उसकी बारी बोलने की नहीं, सुनने की थी।

"एक बरनर सिम, एक कोडेड चैट, एक पुरानी हुडी, ये सब कल्पना की उड़ान है।" "मुक़दमा शुरू होने से पहले ही मेरे मुवक्किलों को मीडिया के कठघरे में खड़ा कर दिया गया है, योर ऑनर, ये अन्याय है।"

सरकारी वकील वृंदा आप्टे खड़ी हुईं, चालीस पार की उम्र, चश्मे के पीछे से नज़रें उतनी ही तेज़ जितनी उनकी आवाज़ नपी-तुली।

"योर ऑनर, बचाव पक्ष जिसे 'इत्तेफ़ाक़' कहते हैं, मैं उसे एक ज़ंजीर कहती हूँ, और हर कड़ी अपनी जगह पर है।" "एक दूसरा फ़ोन, जो मृतक की मंगेतर के नाम पर छुपाकर चलाया गया, ठीक उस मिनट लोहागढ़ के मलावली टावर पर पिंग करता है जिस मिनट पीड़ित गिरा।"

"वो नंबर एक बरनर सिम निकला, नक़द ख़रीदा गया, फ़र्ज़ी पते पर। दूसरा बरनर, आरोपी चिराग भाटिया के नाम, उसी टावर पर, उसी आधे घंटे में।" "और भाजे गाँव के पास मिली एक काली हुडी में दोनों आरोपियों के जैविक निशान इतने क़रीब मिले, जितने अजनबी कभी नहीं होते।"

अदालत में एक हल्की सरगोशी दौड़ गई। खानविलकर ने तुरंत जवाबी वार किया, पर उसकी आवाज़ में एक पल को हल्की सी दरार सुनाई दी।

"ये तो सिर्फ़ दो पुराने दोस्तों की बातचीत है, योर ऑनर, कोडेड नहीं, बस निजी है।" "हर जोड़े की अपनी भाषा होती है, इसे साज़िश कहना ज़्यादती है।"

"'निजी भाषा' में कोई अपने प्रेमी को मरवाने की तारीख़ तय नहीं करता, वकील साहब।" "रिकवर हुई चैट में लिखा है, 'ट्रेक वाला दिन,' और उसी दिन एक आदमी मर गया। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं, नक़्शा है।"

"और वो चैट, योर ऑनर, फ़ोन तो फ़ैक्ट्री रीसेट मिले थे। जो डेटा मिटाया गया, उसे 'रिकवर' करना, क्या ये अदालत में उतना ही पुख़्ता माना जाएगा जितना असली रिकॉर्ड?" "साइबर लैब की तकनीक पर भी सवाल उठता है, योर ऑनर।"

"पुणे साइबर सेल की रिपोर्ट अदालत-मान्य प्रक्रिया से बनी है, वकील साहब, हर क़दम दर्ज है।" "और अगर आरोपी बेगुनाह थे, तो सवाल ये है, फ़ोन मिटाया किसने, और मिटाने से एक निर्दोष आदमी को क्या डर था?"

खानविलकर एक पल को रुके, फिर विषय बदल दिया, जैसे कोई अनुभवी वकील जानता हो कि हर सवाल पर लड़ना नहीं, कुछ सवाल बस टाल देने होते हैं।

"बुनियादी बात ये है, योर ऑनर, कि कोई इंसान, कोई एक गवाह, मौक़े पर मौजूद नहीं था। जो कुछ है, सब बाद का जोड़-तोड़ है।" "मेरे मुवक्किलों को सिर्फ़ शक के आधार पर हिरासत में रखना न्याय के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है।"

"और ये भी दर्ज हो, योर ऑनर, कि जाँच अफ़सर को महीनों पहले ही फ़ाइल बंद करने का आदेश मिल चुका था। शायद अब वो सिर्फ़ अपनी ज़िद साबित करने में लगी हैं, इंसाफ़ में नहीं।"

वैशाली की पीठ अकड़ गई, पर उसने अपनी जगह से हिलने का लालच रोक लिया। अदालत में जवाब देने का हक़ आज सिर्फ़ वृंदा का था।

"जाँच अफ़सर की 'ज़िद' ही आज इस अदालत में एक शव, दो बरनर फ़ोन, एक हुडी और एक कोडेड चैट लेकर आई है, वकील साहब।" "अगर यही ज़िद न होती, तो योर ऑनर के सामने आज सिर्फ़ एक बंद 'ट्रेकिंग हादसा' फ़ाइल होती।"

कमरे में एक पल के लिए ख़ामोशी छा गई। खानविलकर ने काग़ज़ों में सिर झुका लिया, हार मानते हुए नहीं, बस अगली चाल सोचते हुए।

जज ने अपनी क़लम मेज़ पर टिकाई, और दोनों वकीलों से पूछा कि क्या फ़ोरेंसिक रिपोर्ट में उस सुबह की टाइमलाइन का ब्यौरा दर्ज है। वृंदा ने बिना झिझक हामी भरी।

और यहीं, अदालत की उसी बहस के बीच, हमारा फ़्लैशबैक आख़िरकार उस पहली सुबह से जा मिलता है, जिससे ये पूरी कहानी शुरू हुई थी। लोहागढ़ किला, विंचू काटा बुर्ज, भोर का धुँधलका।

इतनी सुबह क़िले पर कोई और ट्रेकर नहीं था, सिर्फ़ हवा की सीटी और नीचे घाटी से उठती धुंध। मानसून का मौसम उतर रहा था, हवा में मिट्टी और गीली घास की गंध थी। केयूर मलपानी अपने जन्मदिन की उस सुबह हँस रहा था, जैसे दुनिया में कोई फ़िक्र ही न हो।

"पिया, देखो तो, ये नज़ारा। मैं तुम्हें हर साल यहीं लाऊँगा, वादा है।" "आज के बाद ये जगह हमेशा हमारी जन्मदिन वाली जगह रहेगी।"

"और अगले साल हमारी शादी की पहली सालगिरह भी क़रीब होगी, सोचो, हम हर बार यहीं आया करेंगे।" "तुम्हें ठंड तो नहीं लग रही? मेरी जैकेट ओढ़ लो।"

"नाश्ते के बाद माँ को फ़ोन करूँगा, वो कल से पूछ रही है कि केक कैसा रहा।" "वो हमेशा कहती है, तू पहाड़ों का बादशाह है, कभी नहीं गिरेगा।"

उसकी आवाज़ में वो भरोसा था जो सिर्फ़ वही आदमी रख सकता है जिसने कभी धोखे की भाषा सीखी ही न हो। वो नहीं जानता था कि ये जगह उसकी आख़िरी जगह बनने वाली है।

पिया ने जैकेट ले तो ली, पर उसके अंदर एक और ठंड थी जिसे कोई कपड़ा नहीं ढाँप सकता था। कुछ हफ़्तों पहले तक वो सिर्फ़ एक डरी हुई मंगेतर थी, अब वो एक योजना का हिस्सा बन चुकी थी, और दोनों के बीच का फ़ासला हर दिन थोड़ा और मिटता जा रहा था।

"एक आख़िरी फ़ोटो, केयूर। बस एक, किनारे से, वहाँ रौशनी सबसे अच्छी है।" "फिर हम नाश्ता करेंगे, वादा।"

उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कँपकँपी थी, जिसे सिर्फ़ एक बहुत क़रीब से सुनने वाला कान पकड़ पाता। केयूर का कान वो नहीं था, उसका कान सिर्फ़ भरोसे की भाषा जानता था।

और हम, दर्शक, जानते थे कि वो रौशनी नहीं, वो दूरी थी जो पिया माँग रही थी। किनारे के उस बिंदु तक, जहाँ रेलिंग नहीं, जहाँ गवाह नहीं, जहाँ सिर्फ़ एक ढलान और एक गहरी खाई थी।

केयूर बिना एक पल सोचे किनारे की तरफ़ बढ़ा, अपना फ़ोन पिया की तरफ़ थमाते हुए। "तुम लो, तुम्हारे हाथ मेरे से ज़्यादा स्थिर हैं।"

उसी पल, बुर्ज के पिछवाड़े की टूटी सीढ़ी से, एक साया हिला। काली हुडी, कानों में हेडफ़ोन, चेहरा झुका हुआ, चिराग भाटिया कई घंटों से वहाँ, चुपचाप, दुबका बैठा था, रात के अँधेरे में ही ऊपर चढ़कर, केयूर और पिया के पहुँचने से पहले।

वो एक लफ़्ज़ नहीं बोला। उसकी पूरी मौजूदगी सिर्फ़ एक इशारे की तरह थी, धुंध में एक हिलता हुआ अँधेरा, जो धीरे-धीरे, बिना आवाज़ के, कंकरीली ज़मीन पर पत्थरों को बचाते हुए, उस किनारे की तरफ़ खिसक रहा था।

उसके जूतों के नीचे एक कंकड़ सरका, बहुत हल्की सी आवाज़, जो हवा की सीटी में लगभग खो गई। पिया के कान ने उसे पकड़ लिया, पर उसकी आँखें फ़ोन की स्क्रीन से नहीं हटीं।

"...मुस्कुराओ, केयूर।"

उसकी उँगली एक पल को फ़ोन की स्क्रीन पर ठिठक गई, बस एक पल, जो शायद उसके अंदर बचे आख़िरी ज़मीर का आख़िरी सिक्का था। फिर वो पल भी गुज़र गया।

केयूर ने धूप की तरफ़ मुँह किया, सूरज की पहली किरण में मुस्कुराया, भरोसे से भरा, बेख़बर। और ठीक उसी फ़्रेम में, उसकी पीठ के पीछे, वो साया अब सिर्फ़ दो क़दम दूर रह गया था।

यहीं, इस एक फ़्रेम पर, हमारी नज़र वापस अदालत में लौट आती है, जहाँ जज ने आख़िर अपना फ़ैसला काग़ज़ पर उतारना शुरू कर दिया था। उस सुबह का बाक़ी हिस्सा अभी भी अदालत के इंतज़ार में था, फ़ाइल में बंद, सबूत में तब्दील होने के लिए।

जज ने चश्मा उतारा, दोनों वकीलों की तरफ़ बारी-बारी देखा, फिर वैशाली की तरफ़, जो गैलरी में साँस रोके बैठी थी।

"अदालत मानती है कि अभियोजन के पास आगे की जाँच के लिए पर्याप्त आधार है," जज ने कहा, "इसलिए दोनों आरोपियों को चौदह दिन की पुलिस हिरासत में भेजा जाता है, नियमित मेडिकल जाँच और वक़ील से मुलाक़ात के अधिकार के साथ।"

वैशाली की साँस एक पल को रुकी, फिर धीरे से निकली। जीत नहीं थी ये, बस एक दरवाज़ा था, जो बंद होने से बच गया था। कठघरे में पिया की आँखें फ़र्श पर टिकी रहीं, चिराग की आँखें छत पर, दोनों अब भी एक-दूसरे से बचते हुए।

पर जज ने अपना चश्मा फिर पहनते हुए, फ़ैसला ख़त्म करने से पहले, सीधे वृंदा की तरफ़ देखकर एक आख़िरी बात जोड़ी, धीमी, पर बहुत साफ़ आवाज़ में।

"पर याद रखिए, वकील साहिबा," जज ने कहा, "टावर, कोड और डीएनए एक कहानी बताते हैं, सज़ा नहीं दिलाते। मुझे वो सीधा सबूत चाहिए जो अदालत में टिके, वरना पूरा मुक़दमा एक 'हादसे' की तरह ही बिखर जाएगा।"

अदालत उठ गई। बाहर बरामदे में वृंदा वैशाली के पास आकर रुकीं, दोनों की आँखों में एक ही हिसाब चल रहा था, चौदह दिन, और एक जज की चेतावनी।

"चौदह दिन मिले हैं, कदम। ये काफ़ी नहीं, पर ये कुछ तो है।" "जज सही कह रहे हैं। एक कहानी अदालत में नहीं टिकती, एक सबूत टिकता है, जो झुठलाया न जा सके।"

"मुझे पता है, मैडम।" "अब तक हमने साबित किया कि वो दोनों वहाँ थे, कि वो साज़िश रच रहे थे। अब मुझे साबित करना है कि उस पहाड़ पर, ठीक उस पल, हुआ क्या था।"

"चैट में एक बात कहती है, हुडी की डीएनए दूसरी। पर जज को चाहिए भौतिक सबूत, कदम, जो ये साबित करे कि वो सिर्फ़ फिसला नहीं।" "शरीर कहाँ मिला, कैसे मिला, ये सवाल अभी अधूरा है।"

वैशाली ने सिर हिलाया, उसके दिमाग़ में पहले से ही एक विचार उठ रहा था, अभी धुँधला, अभी सिर्फ़ एक सवाल की शक्ल में। अगर केयूर सिर्फ़ फिसला होता, तो वो कहाँ गिरता, और वो कहाँ मिला।

सामने खड़ी वृंदा ने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिलाया। चौदह दिन की गिनती अभी शुरू ही हुई थी, और वैशाली जानती थी, इस बार सिर्फ़ कोड नहीं, ख़ुद वो सुबह, मिनट-दर-मिनट, दुबारा खोदनी होगी, जब तक पहाड़ ख़ुद वो सच न उगल दे जो जज को चाहिए था।

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