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अध्याय 11 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

कोड तोड़ना

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

अगली सुबह, सूरज अभी पूरी तरह ऊपर भी नहीं आया था कि वैशाली फिर उसी मेज़ पर बैठी थी, वही लैपटॉप, वही चैट, वही सौ चौदह मैसेज सामने खुले हुए। कल रात की वो लाइन, 'समुद्र शांत हो गया, अब हम आज़ाद हैं', अब भी उसकी आँखों में जल रही थी।

"मैडम, मैं भी रात भर सोई नहीं।" रुतुजा ने अपना बैग टेबल पर रखा और एक प्रिंटआउट निकाला, जिस पर हर कोड शब्द अलग-अलग रंग में हाइलाइट किया हुआ था। "मैंने सोचा, अगर अदालत में शायरी नहीं चलेगी, तो हमें इसका अनुवाद चाहिए। एक-एक शब्द का।"

"बिल्कुल यही करना है, रुतुजा।" "खानविलकर कल कहेगा, ये तो प्रेमियों की भाषा है। हमें साबित करना है कि ये भाषा नहीं, एक नक़्शा है।" उसने व्हाइटबोर्ड की तरफ़ इशारा किया, जहाँ रात को ही तीन कॉलम बना दिए थे, कोड शब्द, मुमकिन मतलब, सबूत।

पहले कॉलम में 'समुद्र' लिखा था। दूसरे में, वैशाली की लिखावट में, एक शब्द, 'रुकावट', वो इंसान जो उनके बीच खड़ा था। केयूर।

"और तीसरा कॉलम, मैडम, वही जो हमें अदालत में चाहिए।" "हर बार जब 'समुद्र' शब्द आया, अगले तीन-चार दिन में बरनर सिम का रिचार्ज हुआ, या मलावली टावर पर मोटरसाइकिल की कोई हरकत दर्ज हुई।"

"मतलब 'समुद्र' सिर्फ़ एक नाम नहीं था, रुतुजा।" "हर बार जब ये लफ़्ज़ आया, असल दुनिया में कुछ हिला।"

हम, जो सच जानते थे, इसे 'योजना' कह सकते थे। वैशाली अभी भी इसे सिर्फ़ एक शब्द जोड़ने की कोशिश कर रही थी, संदेह से यक़ीन तक की वो धीमी, थकाऊ चढ़ाई।

"दूसरा कोड, मैडम, वही लहर का इमोजी।" "हर जगह इस्तेमाल हुआ है जहाँ कोई काम पूरा हुआ बताया गया है, रिचार्ज हो गया, हुडी मिल गई, बाइक ठीक हो गई... और आख़िर में, केयूर के गिरने के बाद।"

"तो लहर का इमोजी माने 'काम हो गया'।" "और 'पंछी उड़ गया', रुतुजा?"

"वो हमने कल ही जोड़ा था, मैडम। पंछी माने केयूर। उड़ गया माने... गिर गया। मर गया।"

"और तीसरा कोड, मैडम, 'ट्रेक वाला दिन'।" "ये तीन बार आया है, हर बार अलग-अलग तारीख़ों के क़रीब, जैसे कोई तारीख़ तय करके फिर बदल रहा हो।"

"मतलब योजना एक बार टली भी थी?" "पहली बार कोई और तारीख़ तय हुई थी, फिर कैंसिल?"

"हाँ मैडम। पहली तारीख़ पर बारिश का पूर्वानुमान था, दूसरी पर पार्क में स्कूली बच्चों का ग्रुप बुक था। आख़िरी तारीख़, केयूर का जन्मदिन, सबसे साफ़ थी, न बारिश, न भीड़।"

यानी जन्मदिन कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था। वो दिन योजना में फ़िट हुआ, योजना उस दिन के लिए नहीं बनी थी।

कमरे में एक पल के लिए कोई नहीं बोला। तीन शब्द, इतने प्यारे, इतने मासूम, अब एक क़त्ल की भाषा बन चुके थे। समुद्र, लहर, पंछी। एक रुकावट, एक इशारा, एक मौत।

"ये टेबल अच्छी है, रुतुजा।" "पर एक जज के लिए काफ़ी नहीं। कोई भी वकील कहेगा, ये सिर्फ़ हमारी थ्योरी है, कोई भी लफ़्ज़ का कोई भी मतलब निकाल सकता है।" "हमें कुछ ऐसा चाहिए जो सिर्फ़ हमारी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि जगह से बंधा हो।"

रुतुजा ने लैपटॉप पर फिर से स्क्रॉल किया, उस आख़िरी बैच की तरफ़ जो उसने रात को सबसे बाद में जोड़ी थी, ट्रेक से दस दिन पहले के मैसेज।

"मैडम, ये देखिए।" "यहाँ एक मैसेज है, बहुत लंबा, बहुत तफ़सील से भरा। मुझे कल रात समझ नहीं आया था, आज सुबह समझ आया।"

"पढ़ो।"

"'बुर्ज के ठीक पीछे एक टूटी सीढ़ी है। सात सीढ़ियाँ हैं, आठवीं टूटी हुई है, वहाँ से पैर मत रखना। उसके बाद रेलिंग नहीं है, बस सीधा उतार है, नीचे तक।'"

कमरे में हवा जैसे रुक गई। ये कोई प्रेम पत्र नहीं था। ये किसी जगह का नक़्शा था, नाप-तौल के साथ।

"ये कोई आम मैसेज नहीं है, रुतुजा।" "कोई अपनी मंगेतर को, या अपनी प्रेमिका को, सीढ़ियाँ गिनकर नहीं बताता। ये किसी ने रेकी करके लिखा है।"

"और टाइमस्टैंप देखिए, मैडम।" "ये मैसेज ट्रेक से ठीक दस दिन पहले भेजा गया, सुबह साढ़े छह बजे।" "सूरज निकलने के वक़्त। किसी सैलानी के आने से पहले।"

दस दिन पीछे चलते हैं। लोहागढ़ की उसी पहाड़ी पर, पर इस बार भीड़ नहीं, कोई ट्रेकर्स का ग्रुप नहीं, सिर्फ़ एक अकेला साया, काली हुडी में लिपटा, कानों में हेडफ़ोन।

मानसून के आख़िरी छोर की उस सुबह, घाटी से उठता कोहरा अभी बुर्ज की दीवारों को छू रहा था। नीचे मलावली की बत्तियाँ धुंध में झिलमिला रही थीं, बेख़बर, और ठंडी हवा में हुडी की डोरी बार-बार उसके चेहरे पर आ रही थी।

चिराग सुबह साढ़े चार बजे अपनी बाइक बुर्ज से दूर, पेड़ों के पीछे छुपाकर, पैदल ऊपर चढ़ रहा था। कोई चाय की दुकान नहीं, कोई सेल्फ़ी नहीं, बस एक आदमी, अपने ही क़दमों की गिनती करता हुआ।

"एक... दो... तीन..." "...सात। यहीं है।"

उसने जेब से एक छोटी टॉर्च निकाली और बुर्ज के पिछवाड़े की सीढ़ियों पर रौशनी डाली। सातवीं सीढ़ी तक पैर मज़बूत था। आठवीं पर उसका पैर हल्का सा डगमगाया।

"..." "पूरा सीधा उतार है यहाँ से।"

एक पल के लिए उसका हाथ काँपा, पास की चट्टान को कसकर पकड़ लिया, दिल की धड़कन कानों में बजने लगी। ये डर था, या अपने ही इरादे का वज़न, कहना मुश्किल था। पर वो पल भर था। अगले ही पल उसने साँस भरी और वापस अपने काम पर लौट आया।

उसने मोबाइल की टॉर्च से नीचे खाई में झाँका, दूरी का अंदाज़ा लगाया, फिर पीछे हट आया। कोई पछतावा नहीं दिखा उसके चेहरे पर, सिर्फ़ हिसाब। एक ठंडा, मापा हुआ हिसाब।

"एक बार, दो बार..." "सिग्नल पूरा है यहाँ से भी। ठीक है।"

उसने अपने फ़ोन की स्क्रीन पर नेटवर्क की पूरी पट्टियाँ देखीं और मन ही मन एक और बात नोट कर ली। यहाँ से मलावली टावर तक सिग्नल पूरा जाता है, कोई ब्लाइंड स्पॉट नहीं। एक हत्यारा भी चाहता है कि उसका पैग़ाम ठीक वक़्त पर पहुँचे।

"सात सीढ़ियाँ, आठवीं टूटी है, उसके बाद रेलिंग नहीं। सीधा उतार, कोई रुकावट नहीं।"

और हमें पता था वो मैसेज किसके लिए लिखा जा रहा था। एक ऐसी जगह का ब्यौरा, जिस पर दस दिन बाद एक नौजवान अपने ही जन्मदिन की सुबह खड़ा होगा, भरोसे से भरा, बेख़बर।

उस सुबह लौटते वक़्त चिराग ने अपनी बाइक स्टार्ट की, हेडफ़ोन उतारे, और एक गहरी साँस ली, जैसे किसी परीक्षा से निकला हो। कोई ग़ुस्सा नहीं, कोई हड़बड़ी नहीं। सिर्फ़ अगले क़दम की तैयारी।

लैब में वापस, वर्तमान में, वैशाली उस मैसेज को बार-बार पढ़ रही थी। 'सात सीढ़ियाँ, आठवीं टूटी।'

"रुतुजा, ये डिटेल किसी आम आदमी को कैसे पता होगी?" "कोई सैलानी वहाँ जाता भी नहीं, बुर्ज के पिछवाड़े कोई रास्ता ऊपर से दिखता भी नहीं।"

"यही तो मैं सोच रही थी, मैडम।" "अगर ये जगह हर किसी को पता होती, तो ये कोई सबूत नहीं, बस इत्तेफ़ाक़ होता। पर अगर ये जगह सिर्फ़ उसे पता थी जो वहाँ ख़ुद गया हो..."

"तो चेक करो।" "गूगल पर, ट्रेकिंग ब्लॉग पर, यूट्यूब पर, हर जगह। क्या कोई लिखता है इस टूटी सीढ़ी के बारे में?"

रुतुजा ने लैपटॉप पर सर्च शुरू किया, 'लोहागढ़ बुर्ज पिछवाड़े सीढ़ी', 'लोहागढ़ हिडन पाथ', हर मुमकिन शब्द के साथ। मिनटों तक स्क्रीन पर सिर्फ़ आम ट्रेकिंग ब्लॉग आते रहे, विंचू काटा की सेल्फ़ी, खाने-पीने की जगहें, कोई ज़िक्र नहीं उस पिछवाड़े रास्ते का।

"मैडम... कुछ नहीं मिल रहा।" "कोई ब्लॉग नहीं, कोई वीडियो नहीं। ये रास्ता किसी सार्वजनिक जानकारी में नहीं है।"

वैशाली ने अपना फ़ोन उठाया और पुरातत्व विभाग के लोहागढ़ रेंज ऑफ़िसर को कॉल लगाया, वही अफ़सर जो किले की देखभाल करता था। दो मिनट की बात ने सब कुछ बदल दिया।

"क्या मतलब बंद है?" "कब से?" "...आठ महीने से पिछवाड़े की सीढ़ी ख़तरनाक घोषित करके बंद कर दी गई है, कोई साइनबोर्ड नहीं, सिर्फ़ एक रस्सी बाँधी गई है। ठीक है, शुक्रिया।"

उसने फ़ोन रखा और रुतुजा की तरफ़ देखा, उसकी आँखों में एक ठंडी, ठोस बात जगमगा रही थी। "आठ महीने से बंद, कोई साइनबोर्ड नहीं, कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं। सिर्फ़ एक रस्सी।"

"मैडम, एक बात और चेक करनी चाहिए।" "अगर रास्ता आठ महीने से बंद है, तो रेंज ऑफ़िसर के पास कोई एंट्री लॉग भी होगा, किसने-किसने परमिशन माँगी थी उधर जाने की।"

"पूछो, अभी।"

दूसरी कॉल पर रेंज ऑफ़िसर ने रजिस्टर खोलकर बताया, पिछले आठ महीनों में सिर्फ़ दो मेंटेनेंस विज़िट दर्ज थीं, दोनों बरसात से पहले, दोनों में महकमे के अपने आदमी। कोई तीसरा नाम, कोई परमिशन, कोई विज़िटर लॉग में नहीं था।

"तो जिसने भी वो मैसेज लिखा..." "उसने रस्सी लांघकर, ख़ुद वहाँ जाकर, सीढ़ियाँ गिनी थीं।"

"कोई प्रेमी अपनी छुट्टी में यूँ ही रस्सी लांघकर ख़तरनाक, बंद रास्ते पर नहीं चढ़ता, रुतुजा।" "कोई ये सिर्फ़ एक वजह से करता है।"

रेकी। वो लफ़्ज़ जो पुलिस की भाषा में एक जुर्म से पहले का पहला क़दम होता है। और अब हमारे सामने काग़ज़ पर, एक कोड शब्द के पीछे, ठीक वही क़दम खड़ा था।

"रुतुजा, इस मैसेज का टाइमस्टैंप, आठवीं सीढ़ी के टूटे होने की तस्दीक़, और चिराग के बरनर की तस्दीक़, तीनों को जोड़ो।" "अगर ये तीनों एक साथ अदालत में रखे जाएँ, तो ये अब इश्क़ की भाषा नहीं रहेगी।"

"ये रेकी की रिपोर्ट बन जाएगी, मैडम।" "एक हत्यारे की अपने ही हाथ से लिखी रेकी रिपोर्ट।"

वैशाली ने व्हाइटबोर्ड पर तीसरे कॉलम में एक नई लाइन जोड़ी, 'सीढ़ी नंबर आठ, रेलिंग नहीं, सार्वजनिक जानकारी नहीं, सिर्फ़ रेंज ऑफ़िसर की पुष्टि।' उसके हाथ काँप रहे थे, पर इस बार डर से नहीं।

एक पल के लिए उसे सुष्मा की आवाज़ याद आई, 'मेरा बेटा पहाड़ों का बादशाह था, वो कभी नहीं गिरता।' अब पहली बार वो पहाड़ ख़ुद वैशाली से बात कर रहा था, एक टूटी सीढ़ी और एक रस्सी की ज़ुबान में।

"रुतुजा..." "ये पहला धागा है जो 'समुद्र' और 'पंछी' को कहानी से निकालकर, उसी पहाड़ पर, उसी बुर्ज के पीछे बाँध देता है।" "अब ये सिर्फ़ कोड नहीं, एक मौक़ा-ए-वारदात है।"

बाहर लोनावला के घाटों पर सुबह की धूप उतर चुकी थी, पर वैशाली की मेज़ पर अब भी अंधेरे के टुकड़े बिखरे थे, एक सीढ़ी, एक रस्सी, एक कोड। पहली बार, प्यार की भाषा और जुर्म की जगह, एक ही लाइन में मिल गए थे। समुद्र अब सिर्फ़ एक नाम नहीं रहा। वो एक पता बन चुका था।

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