Chapter 30 of 30 11 min read
केयूर का पहाड़
अगली सुबह अदालत पिया और चिराग को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है और अमेय की भूमिका माफ़ी के गवाह के तौर पर दर्ज होती है। सुष्मा वैशाली को केयूर की आवाज़ कहती है, कुछ महीने बाद वो और नरेश लोहागढ़ चढ़कर बुर्ज पर बेटे के नाम का एक दीया रख पहाड़ उससे वापस छीन लेते हैं, और थाने में वैशाली की मेज़ पर एक और हादसे की नई फ़ाइल आ गिरती है जिसे वो चुपचाप खोल लेती है।
अगली सुबह शिवाजीनगर अदालत एक बार फिर खचाखच भरी थी, पर आज कल जैसा शोर नहीं था। कल जो साबित होना था, हो चुका था, आज सिर्फ़ उसकी क़ीमत तय होनी बाक़ी थी।
वैशाली आज भी सबसे पहले पहुँची थी, गैलरी की उसी पिछली क़तार में, जहाँ से उसने पूरा मुक़दमा देखा था। सुष्मा और नरेश उसके पास आ बैठे, और इस बार सुष्मा की गोद में बेटे की तस्वीर के साथ-साथ एक छोटी-सी पोटली भी थी, जिसे उसने पूरे वक़्त सीने से लगाए रखा।
भारी सुरक्षा के बीच पिया और चिराग को कठघरे तक लाया गया, दोनों के चेहरे रात भर की नींद से महरूम, दोनों के बीच अब सिर्फ़ अजनबियों जैसी एक दूरी। कल का वो शब्द, दोषी, अब भी हवा में लटका था, और आज उसी एक शब्द को एक तादाद, एक सज़ा मिलनी थी।
जज नियत समय पर अंदर आया, कुर्सी पर बैठा, और सज़ा पर दोनों पक्षों की छोटी बहस सुनी। अभियोजन ने कहा ये एक ठंडे दिमाग़ से रची गई, भरोसे के क़त्ल की साज़िश थी, और बचाव ने रहम की गुहार लगाई, अभियुक्तों की कम उम्र और आगे की पूरी ज़िंदगी का हवाला देकर।
जज ने काग़ज़ एक तरफ़ रखे, और बिना किसी नाटकीयता के, धीमे स्वर में कहा, "इस अदालत के सामने एक अठाईस साल के नौजवान की मौत है, जो अपने ही जन्मदिन की सुबह, अपने सबसे भरोसेमंद लोगों के हाथों मारा गया। कोई सज़ा उसे लौटा नहीं सकती। पर क़ानून का काम बदला लेना नहीं, ये याद दिलाना है कि एक इंसान की जान की एक क़ीमत होती है।"
"बचाव ने उम्र और भविष्य के नाम पर रहम माँगा है," जज ने आगे कहा, "पर इस अदालत को वो भविष्य भी याद है जो केयूर मलपानी का कभी नहीं होगा, वो हर जन्मदिन जो अब हर साल एक बरसी बनकर लौटेगा। रहम वहाँ होता है जहाँ कोई भूल हो, पर यहाँ एक ठंडी, नापी-तुली साज़िश थी।"
जज ने एक पल रुककर फ़ाइल के हाशिये पर दर्ज एक बात पढ़ी, "इस अदालत को ये भी दर्ज करना चाहिए कि इस पूरे मुक़दमे की बुनियाद जाँच अधिकारी की उस ज़िद पर टिकी है, जिसने ऊपर के दबाव के बावजूद एक हादसे की फ़ाइल पर दस्तख़त करने से इनकार किया।" गैलरी में बैठी वैशाली ने नज़रें नीची कर लीं, ये तारीफ़ झेलना उसे कभी नहीं आया।
"भारतीय दंड संहिता की धारा तीन सौ दो और धारा एक सौ बीस बी के अंतर्गत दोषी पाए गए," जज ने कहा, "अभियुक्त पिया मित्तल और चिराग भाटिया को ये अदालत आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है।"
"और सरकारी गवाह अमेय गोखले," जज ने आगे कहा, "जिसने इस अदालत के सामने पूरा और सच्चा बयान दिया, उसे दी गई माफ़ी इस रिकॉर्ड में एक चेतावनी और एक प्रायश्चित, दोनों की तरह दर्ज हो, कि चुप रहना भी एक जुर्म था, और सच कहना ही उसका एकमात्र प्रायश्चित।"
जज ने आख़िरी बार हथौड़ी उठाई और धीरे से मारी, और उस एक आवाज़ के साथ महीनों चला वो मुक़दमा हमेशा के लिए बंद हो गया। कमरे में एक लंबी साँस छूटी, जैसे पूरी अदालत ने एक साथ कोई भारी बोझ नीचे रख दिया हो।
सज़ा सुनते ही पिया और चिराग को अलग-अलग रास्तों से बाहर ले जाया गया, अलग-अलग गाड़ियों में, अलग-अलग जेलों की तरफ़। जो कभी एक-दूसरे के लिए सब कुछ छोड़ देने की क़समें खाते थे, आज उनके बीच सिर्फ़ लोहे की सलाख़ें और सालों की एक लंबी, ख़ामोश सज़ा बची थी।
चिराग का चेहरा पत्थर था, न कोई पछतावा, न कोई माफ़ी, बस एक ठंडी, ख़ाली नज़र। पिया एक बार पीछे मुड़ी, गैलरी में सुष्मा को ढूँढा, पर सुष्मा की नज़र पहले ही झुक चुकी थी, और वो एक मौक़ा, वो एक आख़िरी नज़र, हमेशा के लिए निकल गई।
वैशाली दरवाज़े के पास खड़ी सब देखती रही, न कोई जीत की मुस्कान, न कोई तसल्ली, बस एक गहरी, थकी हुई शांति, जैसे कोई बहुत भारी बोझ आख़िरकार उसके कंधे से उतर गया हो।
अदालत की उन्हीं सीढ़ियों पर, जिन पर वैशाली महीनों से चढ़ती-उतरती रही थी, आज दोपहर की धूप कुछ नरम थी। भीड़ छँट रही थी, कैमरे समेटे जा रहे थे, और सुष्मा नरेश का हाथ थामे धीरे-धीरे बाहर आईं।
दूर एक कोने में विनोद और सुनिता मित्तल, पिया के माँ-बाप, सिर झुकाए चुपचाप निकल गए, बिना किसी से नज़र मिलाए। उनकी बेटी ज़िंदा थी, पर आज वो भी, अपने ही तरीक़े से, एक औलाद हार आए थे, और ये हार किसी अदालत में दर्ज नहीं होती।
सीढ़ियों के एक किनारे रुतुजा भी खड़ी थी, हाथ में वही लैपटॉप बैग जिससे उसने मिटी हुई चैट वापस खींची थी। उसने दूर से वैशाली की तरफ़ देखा, कुछ कहा नहीं, बस एक हल्की, थकी हुई मुस्कान दे दी, महीनों की उस साझी लड़ाई की एक ख़ामोश रसीद।
"बेटी वैशाली... याद है मैंने तुझसे कहा था, तुम मत रुकना, तुम्हीं मेरे केयूर की आवाज़ हो? आज मेरे बेटे को उसकी आवाज़ मिल गई... और वो आवाज़ तू थी।"
"माँ जी... मैंने तो बस अपना फ़र्ज़ निभाया। असली हिम्मत तो आपने दिखाई, जो इतने महीने टूटे बिना खड़ी रहीं।"
"नहीं बेटी। जिस दिन सबने फ़ाइल बंद करने को कहा था, उस दिन तूने अकेले ना कहा था। वो एक ना अगर ना होती, तो मेरा केयूर आज भी सिर्फ़ एक हादसा होता, एक नाम, एक बंद फ़ाइल।"
वैशाली ने सुष्मा का काँपता हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उसे अपनी वो पहली भोर याद आई, जब उसने खाई के किनारे उन दो अजनबी जूतों के निशान देखे थे, और उसी पल लिया वो अकेला फ़ैसला, कि जो सबको हादसा दिख रहा है, वो उसे नहीं दिखेगा।
तभी गावडे पास आए, वर्दी में, चेहरे पर वही पुरानी सख़्ती, पर आँखों में आज कुछ और था। उन्होंने सुष्मा और नरेश के सामने हल्के से सिर झुकाया, फिर वैशाली की तरफ़ देखा।
"कदम, तुमने आज सिर्फ़ एक केस नहीं जीता। तुमने हम सबको याद दिला दिया कि ये वर्दी आख़िर किसलिए है। अब चलो, थाने में तुम्हारी मेज़ पर काम जमा हो रहा है, बड़ी अफ़सर।"
नरेश, जो पूरे मुक़दमे में मुश्किल से बोले थे, आज वैशाली के पास आकर सिर्फ़ इतना कह पाए, "बेटा, हमने अपना बेटा खोया... पर आज पहली बार लगा, वो यूँ ही नहीं गया।" उनकी आवाज़ बीच में ही टूट गई, और उन्होंने बस वैशाली के कंधे पर एक पल के लिए हाथ रख दिया।
उसी शाम अमेय गोखले अदालत की पिछली सीढ़ियों से चुपचाप निकला, अकेला, बिना किसी कैमरे के। उसका डर अब भी उसके साथ था, और शायद बरसों रहेगा, पर उसके कंधों से एक बोझ उतर चुका था। उसने ठान लिया था कि जिस शहर में वो कभी किसी से नज़रें नहीं मिला पाता था, अब वहीं रहकर, धीरे-धीरे, एक साफ़ ज़िंदगी दुबारा खड़ी करेगा।
और फिर कुछ महीने बीत गए। मानसून की एक साफ़, ठंडी सुबह, लोहागढ़ किले की वही चढ़ाई थी, वही भीगे पत्थर, वही धुंध, पर आज उन पर कोई जाँच नहीं, कोई फ़ाइल नहीं चढ़ रही थी।
सुष्मा और नरेश धीरे-धीरे, एक-एक क़दम नापते हुए ऊपर चढ़े, बेटे की उम्र से भी बड़ी उस चढ़ाई को उसी की याद के सहारे पार करते हुए। थोड़ी दूर पीछे, बिना वर्दी के, सादे कपड़ों में, वैशाली भी चुपचाप उनके साथ चल रही थी, आज एक अफ़सर की तरह नहीं, घर के एक अपने की तरह।
रास्ते में सुष्मा हर उस मोड़ पर एक पल ठहर जातीं, जहाँ कभी उनका बेटा बचपन में उनका हाथ थामकर चला होगा। उन्हें याद आया, वो हमेशा कहता था, माँ, एक दिन तुम्हें ये पहाड़ दिखाऊँगा, और आज वो अपने बेटे के उसी अधूरे वादे को ख़ुद पूरा करने चढ़ रही थीं।
विंचू काटा बुर्ज पर, ठीक उसी किनारे के पास जहाँ से केयूर गिरा था, सुष्मा घुटनों के बल बैठ गईं। उन्होंने पोटली खोली, उसमें से एक छोटा-सा मिट्टी का दीया निकाला, आँचल की ओट में उसे जलाया, हवा से बचाकर, और उसे उस पत्थर पर रख दिया, जो कभी उनके बेटे की आख़िरी ज़मीन बना था।
"देख केयूर, ये तेरा पहाड़ है। इसे उन लोगों ने तुझसे छीनना चाहा था, पर आज तेरी माँ इसे तुझे वापस लौटा रही है। अब जब भी कोई यहाँ आएगा, इस दीये को देखेगा, और तुझे याद करेगा, उस हँसते हुए लड़के को, उस हादसे को नहीं।"
बुर्ज पर कुछ और ट्रेकर भी थे, नौजवान, हँसते हुए, सेल्फ़ी लेते हुए, बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी केयूर लिया करता था। सुष्मा ने उन्हें देखा, और पहली बार उस जगह पर उन्हें डर नहीं, एक अजीब-सी तसल्ली महसूस हुई, कि ज़िंदगी यहाँ फिर लौट आई थी।
केयूर का वो आख़िरी ट्रेक एक चीख़ और एक भयानक ख़ामोशी पर ख़त्म हुआ था। पर उसकी माँ का ये ट्रेक, ये आख़िरी चढ़ाई, एक दीये की मद्धम लौ और एक गहरी, ठहरी हुई शांति पर आकर रुकी, जैसे पहाड़ ने आख़िरकार अपना सबसे प्यारा बेटा माँ को वापस लौटा दिया हो।
वैशाली को याद आया, ये सब एक आख़िरी ट्रेक से ही तो शुरू हुआ था, एक ऐसी सुबह की चढ़ाई जो एक नौजवान की आख़िरी साबित हुई। और आज, उसी पहाड़ पर, एक माँ की चढ़ाई ने उस आख़िरी शब्द को एक नया मतलब दे दिया था, एक अंत नहीं, बल्कि एक ठहरी हुई, दुखभरी शांति।
वैशाली थोड़ी दूर खड़ी, सामने फैले सह्याद्रि के घाटों को देखती रही, जहाँ धुंध धीरे-धीरे छँट रही थी। उसने एक गहरी साँस ली, और कई महीनों में पहली बार, उसका सीना पूरा भरकर खुला।
उसी हफ़्ते, मावळ थाने में एक आम-सी दोपहर थी। पंखा उसी पुरानी रफ़्तार से घूम रहा था, चाय उसी लोहे के कप में आई, और वैशाली अपनी उसी पुरानी मेज़ पर बैठी फ़ाइलें निपटा रही थी।
मेज़ पर वही पुरानी नामपट्टी थी, सब-इंस्पेक्टर वैशाली कदम, किनारे से थोड़ी घिसी हुई। दीवार पर टँगे कैलेंडर पर सत्रह तारीख़ अब भी एक गोल घेरे में थी, पर उसके आगे की तारीख़ें फिर से ख़ाली, फिर से किसी नए इंतज़ार में।
कुछ नहीं बदला था, और सब कुछ बदल गया था। वही चोरी की रिपोर्ट, वही गुमशुदगी के परचे, पर अब जब कोई थाने में वैशाली से मिलता, तो उसकी आवाज़ में एक और ही इज़्ज़त होती, उस अफ़सर के लिए जो झुकी नहीं थी।
तभी एक हवलदार आया और एक पतली, नई फ़ाइल उसकी मेज़ पर रख गया। ऊपर लिखा था, घाट रोड के पास एक गाड़ी खाई में गिरी, चालक की मौत, और नीचे, उसी जानी-पहचानी लिखावट में एक शब्द, हादसा।
"कदम, वो नई फ़ाइल... ऊपर से कह रहे हैं सीधा-सादा हादसा है, बंद कर देना। पर मुझे लगा, एक बार तुम्हें दिखा दूँ। फिर तुम जानो।"
वैशाली ने चाय का कप एक तरफ़ रखा, फ़ाइल अपनी तरफ़ खींची, और उसका पहला पन्ना खोल लिया। गावडे उसे देखकर हल्के से मुस्कुराए, और बिना कुछ और कहे आगे बढ़ गए, क्योंकि दोनों जानते थे, ये फ़ाइल अब यूँ ही बंद नहीं होगी।
"देखते हैं... सच में हादसा है, या कोई और केयूर।"
नीचे लोनावला के घाटों पर एक और सुबह उतर रही थी, वैसी ही धुंध, वैसे ही पहाड़, जो हर रोज़ किसी न किसी सच को अपने सीने में छुपाए रहते हैं। और उन घाटों के ऊपर एक बात हमेशा के लिए ठहरी रह गई... कुछ फ़ाइलें बंद नहीं होतीं, जब तक कोई उन्हें खुला रखने की ज़िद न कर ले।
यह कहानी सत्य घटनाओं पर आधारित नाट्य रूपांतरण थी। पात्रों के नाम, संवाद एवं कई घटनाएँ काल्पनिक हैं।
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