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Chapter 21 of 30 11 min read

केस डगमगाया

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

महीने गुज़र चुके थे। लोहागढ़ की उस धुंध भरी सुबह और पुतले के उस प्रयोग के बाद, केस अब सिर्फ़ फ़ाइलों में नहीं, टीवी स्टूडियो की रौशनी में भी लड़ा जाने लगा था। पुणे के हर न्यूज़ चैनल की स्क्रीन पर उस शाम एक ही तस्वीर बार-बार चल रही थी, आँसुओं में डूबी पिया मित्तल, कैमरों से मुँह छुपाती हुई, अपने वकील के कंधे का सहारा लिए।

एक एंकर बहस में चीख़ रहा था, "क्या एक सदमे में डूबी मंगेतर को पुलिस बार-बार पूछताछ के नाम पर तोड़ रही है?" स्क्रीन के नीचे पट्टी दौड़ रही थी, "लोहागढ़ केस, इंसाफ़ या प्रताड़ना?", मानो पूछने वाला ये भूल ही गया हो कि उसी पहाड़ की खाई में एक जवान लड़का पड़ा मिला था, और उसकी माँ अब भी उसका कमरा वैसे ही सँभाले बैठी है।

"मेरे मुवक्किल एक शोकाकुल परिवार का हिस्सा हैं, जिन्हें बार-बार, बिना ठोस सबूत के, थाने बुलाया जा रहा है।" "ये पूरी जाँच एक ऐसे नतीजे पर टिकी है जो पहले से ही तय कर लिया गया था, और हम अदालत में यही साबित करेंगे।"

अगली सुबह एक बड़े बिल्डर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता ने भी वही सुर पकड़ लिया, "एक सम्मानित परिवार को बेवजह बदनाम किया जा रहा है," और शहर के दो अख़बारों ने वही लाइन अगले दिन सुर्खी बना दी। लोहागढ़ की उस भोर की सच्चाई अब हेडलाइनों की भीड़ में कहीं दबती जा रही थी, जैसे किसी ने जान-बूझकर शोर बढ़ा दिया हो ताकि असल सवाल सुनाई ही न दे।

"कदम, ये देखो।" "आज सुबह तीन अख़बारों में यही छपा है, 'निर्दोष मंगेतर पर पुलिस का शिकंजा।' और ऊपर से फिर फ़ोन आने लगे हैं।"

"अख़बार गुरुत्वाकर्षण नहीं बदल सकते, सर।" "पुतला तीन बार एक ही जगह जाकर रुका था। पिया की 'मंगेतर' वाली छवि टीवी पर भले बिक जाए, अदालत में नहीं चलेगी।"

"मुझे पता है, कदम। पर ऊपर बैठे लोग टीवी देखते हैं, क़ानून की किताब नहीं।" "कमिश्नर साहब का दफ़्तर दो बार पूछ चुका है कि हमारे पास 'पक्का' सबूत है या नहीं, और अगले हफ़्ते मेरी उनसे सीधी मीटिंग बुलाई गई है।"

"मीटिंग किस बारे में है, सर? क्या मेरे तबादले की बात भी उठेगी?"

"वो नाम अभी नहीं लिया गया, कदम, पर हवा में वही घूम रहा है।" "हमें अदालत में जल्दी और मज़बूती से खड़ा होना होगा, वरना ये दबाव तुम्हें और इस फ़ाइल को, दोनों को निगल जाएगा।"

"सुष्मा जी हर सुबह मंदिर जाकर बस एक ही दुआ माँगती हैं, सर, कि इंसाफ़ मिले।" "मैं उस दुआ को टीवी के शोर से या अपने तबादले के डर से हारने नहीं दूँगी।"

"मैं तुम्हारी हिम्मत की क़दर करता हूँ, कदम, पर आज अदालत में सँभलकर रहना।" "खानविलकर ने पहले ही कह दिया है कि आज वो पुतले वाले प्रयोग की धज्जियाँ उड़ाएगा।"

तीन दिन बाद शिवाजीनगर की अदालत के कमरा नंबर छह में सुनवाई शुरू हुई। बाहर के गलियारे में मीडिया कैमरों की भीड़ थी, और भीतर पहली बार वैशाली को अपनी ही गवाहों की क़तार पर शक़ होने लगा। बचाव पक्ष ने आज पहली बार पुतले वाले प्रयोग पर सीधा वार किया।

"माननीय, ये तथाकथित 'वैज्ञानिक प्रयोग' कुछ और नहीं, थाने के भीतर रचा गया एक नाटक है।" "रेत की बोरियाँ, लोहे का ढाँचा, और तीन बार का तमाशा, इसे विज्ञान कहा जा रहा है? अगर कोई ठेकेदार अपने मज़दूरों से यही करवाए, तो कोई इसे अदालत में सबूत नहीं मानेगा।"

"और माननीय, ये पूरा प्रयोग ख़ुद जाँच अधिकारी की मौजूदगी में हुआ, जो पहले से यक़ीन कर चुकी थीं कि ये हत्या है।" "क्या ये नतीजा पहले से तय नहीं था?"

गैलरी में बैठी वैशाली की मुट्ठियाँ कस गईं, पर वो चुप रही, ये लड़ाई अभी वृंदा आप्टे की थी। वृंदा ने खड़े होकर जवाब दिया कि तीनों कैमरों की टाइमस्टैंप वाली रिकॉर्डिंग, मौसम विभाग की स्वतंत्र रिपोर्ट, और नाप की हर पर्ची अदालत में पहले ही दाख़िल है, किसी एक अफ़सर की मर्ज़ी पर नहीं टिकी।

जज ने कुछ देर चुपचाप दोनों दलीलें सुनीं, फिर काग़ज़ पर कुछ नोट किया, उसका चेहरा किसी फ़ैसले की तरफ़ नहीं, सिर्फ़ एक सवाल की तरफ़ झुका हुआ लग रहा था।

बचाव पक्ष का अगला निशाना मलावली का वही ढाबेवाला था, जिसने महीनों पहले हुडी वाले अजनबी का हुलिया बताया था। खानविलकर ने उसे कठघरे में घेरना शुरू किया।

"तुमने पुलिस को पहले साढ़े पाँच बजे का वक़्त बताया, फिर पूछताछ में पौने छह कहा, और आज यहाँ सवा छह बोल रहे हो।" "सच में तुम्हें कुछ याद है, या पुलिस ने जो सिखाया, वही रटकर आए हो?"

गवाह हकलाया, अपने ही पुराने बयानों में उलझ गया, और उसकी आवाज़ काँपने लगी। अदालत में एक हल्की फुसफुसाहट फैल गई, और एक पल के लिए वो अपना ही हुलिया वाला बयान भूल बैठा, मानो हफ़्तों की तनी हुई नसें अभी टूट जाएँगी।

ये गवाह हुडी वाले शख़्स की पहचान की पहली कड़ी था, और अब वो कड़ी सबकी नज़रों के सामने डगमगा रही थी। वैशाली जानती थी कि एक कमज़ोर कड़ी पूरी ज़ंजीर पर शक़ खड़ा कर सकती है, भले बाक़ी कड़ियाँ मज़बूत हों, और अगर आज यही गवाह टूटा तो कल कोई और भी टूट सकता है।

कठघरे से थोड़ी दूर, आरोपियों की बेंच पर बैठी पिया ने पहली बार होंठों पर एक हल्की, ठंडी मुस्कुराहट दबाई, इतनी हल्की कि सिर्फ़ वैशाली की तजुर्बेकार नज़र ही उसे पकड़ पाई। चिराग की आँखें फ़र्श पर टिकी रहीं, जैसे उसे पहले से ही यक़ीन हो कि आज की चाल काम कर जाएगी।

जज ने माथे पर बल डालकर कहा कि गवाह के बयानों में विरोधाभास "गंभीर" है, और अभियोजन को अगली सुनवाई तक इसे स्पष्ट करना होगा, वरना बचाव पक्ष की अंतरिम राहत की अर्ज़ी पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। अगली तारीख़ दो हफ़्ते बाद की तय हुई।

अदालत के बाहर सीढ़ियों पर खड़े होकर खानविलकर ने कैमरों के सामने कहा कि "सच जल्दी ही सामने आएगा, और वो पुलिस की कहानी से बिल्कुल अलग होगा।" गावडे ने वैशाली की तरफ़ देखा, दोनों जानते थे कि आज केस थोड़ा डगमगाया है, और दो हफ़्ते बहुत कम वक़्त था इसे फिर से सीधा खड़ा करने के लिए।

उस रात घर लौटते हुए वैशाली ने गाड़ी सड़क किनारे रोक दी, बस दो मिनट के लिए आँखें बंद कीं। दस महीने की जंग में उसने कभी हार नहीं मानी थी, पर आज पहली बार उसे लगा कि सच होने भर से इंसाफ़ नहीं मिलता, उसे अदालत में बचाना भी पड़ता है, हर हफ़्ते, हर गवाह के साथ।

रास्ते में ही सुष्मा का फ़ोन आया, थरथराती आवाज़ में उन्होंने बस इतना पूछा कि टीवी पर जो कहा जा रहा है, क्या वो सच है। वैशाली ने कहा, "नहीं मौसी, वो सिर्फ़ शोर है, असली लड़ाई अदालत में है, और मैं वहाँ हूँ," फिर फ़ोन रखकर उसने ख़ुद से वही वादा दोहराया जो महीनों से उसकी रीढ़ बना हुआ था।

उसी हफ़्ते, पुणे के एक किराए के फ़्लैट में, अमेय गोखले रात को अकेला बैठा टीवी पर वही ख़बर देख रहा था, "लोहागढ़ केस में गवाह की गवाही में दरार।" उसके हाथ काँप रहे थे, चाय का कप बिना छुए ठंडा हो चुका था।

तभी उसका फ़ोन बज उठा, एक अनजान नंबर से।

"हैलो... कौन?"

दूसरी तरफ़ से एक भारी, बदली हुई आवाज़ आई, "गोखले साहब, अभी वक़्त है पीछे हटने का। कोर्ट में जो बोलना है, भूल जाओ, वरना भूलने लायक़ कुछ और भी हो सकता है।" और लाइन कट गई।

अमेय देर तक फ़ोन हाथ में लिए बैठा रहा, माथे पर पसीने की एक बूँद टिकी रह गई, और खिड़की के परदे को दो बार जाकर जाँचा कि कहीं कोई बाहर तो नहीं।

अगली रात एक बाइक उसकी गली में तीन बार चक्कर लगाकर गुज़री, हेलमेट लगाए, नंबर प्लेट पर कीचड़ पुता हुआ। अमेय ने बत्ती बुझा दी और दरवाज़े की चेन दुबारा जाँची।

और एक सुबह दरवाज़े के नीचे से खिसकाई गई एक पर्ची मिली, हाथ से लिखी, बस पाँच शब्दों की, "जो बोलता है, वो टिकता नहीं।" अमेय ने वो पर्ची जला दी, मानो जलाकर वो डर भी मिट जाएगा।

उसके दफ़्तर के बाहर भी एक शाम वही अनजान बाइक खड़ी मिली, कोई उतरा नहीं, बस हेलमेट का शीशा उसकी तरफ़ मुड़ा रहा जब तक अमेय अंदर नहीं चला गया। बाद में उसे पता चला कि मलावली के उस ढाबेवाले को भी दो गुमनाम कॉल आ चुके थे, और यही ख़बर उसकी नींद की आख़िरी उम्मीद भी छीन ले गई।

चौथे दिन एक कॉल में आवाज़ ने पहली बार उसके घर का पता ले लिया, "नागपुर वाली गली, नंबर बारह, है ना? तुम्हारी माँ वहीं रहती हैं?" सवाल का जवाब माँगा भी नहीं गया, बस पूछा गया था ताकि अमेय को याद रहे कि उसकी हर बात, हर पता, उन्हें मालूम है।

अमेय के भीतर दो आवाज़ें लड़ रही थीं, एक जो चिराग से बचपन की दोस्ती याद दिलाती, और दूसरी जो पूछती, अगर वो चुप रहा तो केयूर की माँ का क्या होगा। हर रात वो नींद के बजाय इसी सवाल के साथ जागता, और अब उसमें अपनी माँ की सलामती का डर भी जुड़ गया था।

चौथी रात, तेज़ बारिश की एक बौछार के बीच, अमेय ने वैशाली का नंबर स्क्रीन पर देखा, उँगली काँपती रही, फिर आख़िर दबा ही दी।

दूसरी तरफ़ थाने के दफ़्तर में देर रात तक बत्ती जल रही थी, वैशाली और गावडे अगली सुनवाई के काग़ज़ात पर झुके हुए थे, तभी मेज़ पर रखा फ़ोन काँप उठा।

"हैलो, कदम बोल रही हूँ।"

"मैडम... मैं अमेय बोल रहा हूँ।" "मुझे... मुझे डर लग रहा है। पिछले चार दिन से कोई मुझे फ़ोन करता है, मेरी गली में एक बाइक चक्कर काटती रहती है, और आज उन्होंने मेरा घर का पता भी बोल दिया।"

"अमेय, आराम से बताओ। किसने क्या कहा, कोई नाम, कोई नंबर?"

गावडे ने काग़ज़ रख दिए और वैशाली के चेहरे को पढ़ने लगे, हाथ से उन्हें फ़ोन नज़दीक लाने का इशारा किया।

"आवाज़ बदली हुई थी मैडम, नंबर भी हर बार अलग। बस एक ही बात दोहराते रहे, कोर्ट में जो बोलना है भूल जाओ, वरना भूलने लायक़ कुछ और भी हो सकता है। और आज उन्होंने मेरी माँ का ज़िक्र किया।"

"पूछो उसे, आज दफ़्तर के बाहर वो बाइक फिर आई थी क्या, और वो ढाबेवाले को भी फ़ोन आया है क्या।"

"आई थी मैडम, आज शाम भी। और हाँ, वो ढाबेवाले भाई ने भी बताया कि उसे भी कॉल आए हैं।" "मैं... मैं अकेला नहीं संभाल पा रहा, मैडम।"

"अमेय, सुनो मेरी बात। मैं अभी तुम्हारी बिल्डिंग के बाहर पुलिस भिजवा रही हूँ, तुम्हारी माँ के घर के बाहर भी, और ढाबेवाले भाई के लिए भी।" "तुम्हें कुछ नहीं होगा, बस तुम हिम्मत मत हारना।"

"मैडम, मुझे डर लग रहा है..." "मैं... मैं अब गवाही नहीं दे पाऊँगा।"

गावडे खिड़की के क़रीब खड़े होकर बाहर के अँधेरे को देखते रहे, उनकी अपनी आवाज़ भी अब उतनी सख़्त नहीं रह गई थी जितनी महीनों पहले फ़ाइल बंद करने का हुक्म देते वक़्त थी। "कदम, अगर ये गवाह हाथ से निकल गया..." उन्होंने वाक्य पूरा नहीं किया, ज़रूरत भी नहीं थी।

लाइन कट गई, और वैशाली फ़ोन हाथ में लिए, अँधेरे दफ़्तर में गावडे के सामने अकेली खड़ी रह गई। महीनों की मेहनत, रिकवर की हुई चैट, टावर का डंप, हुडी का डीएनए, पुतले की वो गवाही, सब एक ऐसे आदमी की हिम्मत पर टिका था जो अभी-अभी टूट चुका था।

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