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अध्याय 13 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

जो दोस्त जानता था

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया, और वैशाली अंदर आई, फ़ाइल सीने से लगाए। चिराग की मुस्कान, जो देहली पर एक सेकंड को ठहरी थी, अब फिर अपनी पुरानी जगह पर लौट आई।

"अरे मैडम कदम, फिर बुलावा?" "क्या बात है, कोई नया सवाल रह गया था?"

वैशाली बिना कुछ कहे मेज़ के पार बैठ गई, फ़ाइल खोली, और एक काग़ज़ धीरे से उसकी तरफ़ सरका दिया। कोई भूमिका नहीं, कोई चेतावनी नहीं, सिर्फ़ काग़ज़ की सरसराहट।

"ये क्या है?"

चिराग की नज़रें काग़ज़ पर टिक गईं, फिर धीरे-धीरे ऊपर उठीं, वैशाली की आँखों तक।

"फ़ोरेंसिक रिपोर्ट।" "भाजे की एक पुलिया के नीचे मिली काली हुडी, और उस पर दो चीज़ें... तुम्हारे पसीने का डीएनए, और केयूर मलपानी के बाल के रेशे।"

एक पल के लिए, सिर्फ़ एक पल के लिए, चिराग की आँखों में कुछ चमका। डर नहीं, बल्कि डर को छुपाने की हड़बड़ी।

हमने वो पल देखा था, जब उसने वो हुडी पुलिया के नीचे धकेली थी। अब वही पल उसके सामने, काग़ज़ पर लिखा हुआ था।

"हुडी?" "मैडम, आधा पुणे काली हुडी पहनता है, ठंड में, बाइक पर, धूल से बचने को।" "ये कोई सबूत नहीं है, ये सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक़ है।"

"इत्तेफ़ाक़ बोलते हैं, पर हेडफ़ोन का सीरियल नंबर नहीं बोलता।" "वो हेडफ़ोन तुम्हारे ही कार्ड से ख़रीदा गया था, ट्रेक से ठीक तीन हफ़्ते पहले।"

चिराग की उँगलियाँ मेज़ पर एक सेकंड को रुक गईं। सिर्फ़ एक सेकंड, पर वैशाली ने वो देख लिया।

"और सिर्फ़ हेडफ़ोन नहीं, चिराग।" "हमने वो मैसेज भी पढ़ा है, जो तुमने रेकी वाली रात लिखा था, बुर्ज के पीछे की सात सीढ़ियों का, आठवीं टूटी हुई का।" "वो जगह किसी नक़्शे में दर्ज नहीं, सिर्फ़ वही जान सकता है जो ख़ुद वहाँ खड़ा हुआ हो।"

"मैडम, वो तो पिया के साथ मज़ाक़ में की गई बातें थीं, हम प्रेमी लोग अजीब भाषा में बात करते हैं।" "इसका मतलब ये नहीं कि मैं वहाँ गया था।"

पर उसकी आवाज़ में अब वो पहली वाली सफ़ाई नहीं थी। एक हल्की सी लड़खड़ाहट, इतनी बारीक कि सिर्फ़ महीनों से उसे परखती आँख ही पकड़ पाती।

"मैडम, मैं अपने वकील के बग़ैर एक शब्द और नहीं बोलूँगा।" "आप मुझे डरा नहीं सकतीं। मेरा वकील आधे घंटे में यहाँ होगा।"

"बुलाओ अपने वकील को।" "मुझे कोई जल्दी नहीं, चिराग। मुझे पूरा यक़ीन है, कड़ी दर कड़ी, हम वहाँ पहुँच ही जाएँगे।"

चिराग पीछे झुक गया, बाँहें मोड़ीं, चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान चढ़ाने की कोशिश की। पर इस बार वो मुस्कान थोड़ी देर से आई, और थोड़ी जल्दी टूट गई।

दरवाज़ा बंद होते ही चिराग की मुस्कान पूरी तरह उतर गई। उसने मेज़ के नीचे अपनी मुट्ठी भींच ली, और एक लंबी, काँपती हुई साँस ली, जो उसने ख़ुद से भी छुपाई।

वैशाली उठी, फ़ाइल बंद की, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई। उसे पता था, आज इस कमरे में जीत नहीं मिलेगी, पर हार भी नहीं हुई थी।

बाहर गलियारे में वैशाली एक पल को रुकी, हाथों में फ़ाइल दबाए। चिराग की अलीबाई काग़ज़ पर अब भी साफ़ थी, वकील आधे घंटे में आ जाएगा, और असली इम्तिहान अदालत में होगा, आज नहीं।

उसे पता था, सीधी टक्कर से चिराग नहीं टूटेगा। कोई भी चालाक आदमी अपने दम पर नहीं टूटता, वो टूटता है तब, जब उसके इर्द-गिर्द खड़े लोग डगमगाने लगें।

उसे गावडे की पुरानी बात याद आई, जो उन्होंने चिराग को पहली बार थाने बुलाने से पहले कही थी, "सबूत के बिना अमीर लड़के को छूना तुम्हारी नौकरी ले लेगा।" आज सबूत हाथ में था, फिर भी चिराग की दीवार नहीं गिरी। तो शायद रास्ता उस दीवार में सेंध लगाने का नहीं, उसके बग़ल में खड़े कमज़ोर आदमी को ढूँढने का था।

"एक चालाक आदमी अकेले नहीं टूटता।" "पर एक डरा हुआ दोस्त... वो टूट जाता है।"

चिराग की पुरानी कॉल हिस्ट्री में एक नाम अब तक हाशिये पर पड़ा था, बरनर से पहले के महीनों में उसके सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले नंबरों की फ़ेहरिस्त में बार-बार आता एक नाम। अमेय गोखले, कॉलेज का पुराना दोस्त।

शादी की तारीख़ तय होने से पहले के महीनों में, आधी रात के फ़ोन, कभी दो मिनट, कभी बीस। और तारीख़ तय होते ही वो कॉल अचानक बहुत कम हो गए थे, जैसे कोई एक-दूसरे से बचने लगा हो।

रुतुजा ने साइबर सेल के ज़रिए अमेय गोखले के नंबर पर अदालत से इजाज़त लेकर कॉल डिटेल रिकॉर्ड मँगवाया, क़ानूनी तरीक़े से, हर काग़ज़ पर दस्तख़त के साथ, ताकि बाद में कोई जिरह इस सबूत को कमज़ोर न कर सके।

ऊपर से दबाव अब भी वैसा ही था, गावडे हर दूसरे दिन पूछते, "कदम, कुछ ठोस मिला या नहीं?" पर आज पहली बार वैशाली के पास जवाब था, "मिल रहा है सर, ज़रा सब्र रखिए।"

वैशाली ने फ़ाइल में एक नया नाम जोड़ा, "अमेय गोखले, चिराग का कॉलेज का दोस्त, पूछताछ ज़रूरी।"

दो दिन बाद, पुणे के एक छोटे से आईटी दफ़्तर के बाहर, वैशाली और एक कॉन्स्टेबल अमेय गोखले का इंतज़ार कर रहे थे। वो बाहर निकला तो उसका चेहरा पहले ही सफ़ेद पड़ चुका था, पुलिस की वर्दी देखकर नहीं, बल्कि जैसे वो हफ़्तों से किसी दस्तक का इंतज़ार कर रहा हो।

थाने के छोटे से कमरे में अमेय कुर्सी के किनारे पर बैठा था, हाथ आपस में जकड़े, नज़रें मेज़ पर, कभी दरवाज़े पर, कभी वैशाली की आँखों से बचती हुईं।

अमेय गोखले, अट्ठाईस साल का, एक आईटी कंपनी में सॉफ़्टवेयर टेस्टर, अगले महीने अपनी सगाई की तैयारी में था। एक मामूली, ईमानदार ज़िंदगी, जो अचानक एक पुराने दोस्त के राज़ के बोझ तले दब गई थी।

"अमेय, घबराओ मत।" "मुझे बस कुछ सवालों के जवाब चाहिए, कॉलेज के दिनों के बारे में, तुम्हारी और चिराग की दोस्ती के बारे में।"

"म... मैडम, मुझे कुछ नहीं पता।" "चिराग और मैं तो बस दोस्त हैं, कॉलेज से। बस इतना ही।"

उसकी आवाज़ में वो कंपन था जो झूठ नहीं, डर बोलता है। या शायद दोनों।

"सिर्फ़ दोस्त?" "तो मुझे बताओ, शादी की तारीख़ तय होने से एक महीना पहले, तुम दोनों के बीच आधी रात को बीस-बीस मिनट की कॉल्स क्यों चलती थीं?"

वैशाली ने फ़ोन कंपनी से मिला काग़ज़ मेज़ पर रखा, तारीख़ों और वक़्त की एक लंबी फ़ेहरिस्त। अमेय की नज़रें उस काग़ज़ पर अटक गईं।

"वो... वो बस, ऐसे ही, दोस्ताना बातें थीं मैडम। कॉलेज के दिनों की, पुरानी यादें।"

"बीस मिनट की, आधी रात को, हर तीसरे दिन?" "अमेय, पुरानी यादें इतनी बार ताज़ा नहीं होतीं, जब तक कोई भारी बात मन पर न हो।"

अमेय ने अपने हाथ और कसकर भींच लिए, जैसे उन्हें रोकना चाहता हो, काँपने से।

"मैडम, मैं... मैं बस एक दोस्त था। मैंने कुछ नहीं किया।"

"अमेय, मैं तुम्हें चोर नहीं, गवाह मानती हूँ।" "पर गवाह भी तब तक बेकार है, जब तक वो सच बोलना शुरू न करे।"

"मैडम, मैं डरता हूँ..." "चिराग को ग़ुस्सा आया तो..."

वो अपनी ही बात बीच में काट गया, जैसे बहुत कुछ कह देने से पहले ख़ुद को रोक लिया हो।

"चिराग अभी हिरासत में नहीं है, पर जल्द होगा।" "और जब वो होगा, तब सिर्फ़ वही आवाज़ मायने रखेगी, जिसने सच बोलने की हिम्मत की हो।" "मैंने ये नहीं कहा कि तुमने कुछ किया, अमेय। मैंने पूछा है, तुमने क्या सुना।"

कुछ महीने पीछे चलते हैं। शादी की तारीख़ तय होने से हफ़्ते भर पहले, पुणे के एक छोटे से बार में, चिराग और अमेय एक कोने की मेज़ पर बैठे थे, आधे खाली गिलास, गाने की धीमी आवाज़।

दोनों दस साल पुराने दोस्त थे, एक ही कॉलेज के हॉस्टल के कमरे साझा कर चुके, एक-दूसरे की हर कमज़ोरी जानते हुए। यही पुरानी दोस्ती अब अमेय के गले की सबसे भारी ज़ंजीर बनने वाली थी।

चिराग देर तक चुप बैठा रहा, गिलास घुमाता हुआ, फिर अचानक बोल पड़ा, आधा ख़ुद से, आधा अमेय से।

"यार अमेय... अगर वो आज़ाद हो जाए ना..." "बस एक हादसा। इतना ही काफ़ी है।"

शब्द हवा में लटक गए, इतने हल्के कि मज़ाक लग सकते थे, इतने भारी कि मज़ाक नहीं थे।

"यार, ऐसी बातें मत कर... नशा चढ़ गया है तुझे।"

चिराग कुछ नहीं बोला, बस मुस्कुराया और गिलास ख़त्म कर दिया। अमेय ने वो लम्हा भुला देने की कोशिश की, दिल के किसी कोने में दबा दिया, जैसे न सुना हो।

हफ़्तों बाद, अमेय ने चिराग से एक बार पूछने की कोशिश ज़रूर की, कैंपस के पुराने कैफ़े में, दो कप ठंडी चाय के बीच।

"यार, वो रात वाली बात... तू ठीक तो है ना?" "कुछ परेशान लग रहा है आजकल।"

चिराग ने बस कंधे उचकाए, आँखें फ़ोन की स्क्रीन पर टिकाए रखीं, "सब ठीक है यार, बस काम का प्रेशर है।" अमेय को जवाब अधूरा लगा, पर उसने ज़्यादा नहीं कुरेदा, ना उस दिन, ना उसके बाद कभी।

पर एक ख़ामोशी भी कभी-कभी एक फ़ैसला बन जाती है। अमेय ने न पुलिस को फ़ोन किया, न पिया को चेताया, न ख़ुद चिराग से दुबारा साफ़ पूछा। उसने बस चुप रहना चुना, और वो चुप्पी, बिना जाने, एक साथी बन गई।

वापस पूछताछ के कमरे में, वैशाली ने अपनी कुर्सी थोड़ी आगे खिसकाई, आवाज़ नरम पर वज़नदार।

"अमेय, केयूर मलपानी का जन्मदिन था वो दिन।" "एक जवान लड़का, जिसने किसी का कभी बुरा नहीं चाहा, एक खाई में गिर गया। और तुम मुझसे कहते हो, तुमने बस सुना, कुछ नहीं किया।"

अमेय की आँखों में आँसू भर आए, पर वो रुका रहा, जैसे किसी बाँध को हाथों से थामे हो।

"मैडम, मुझे नहीं पता था कि वो सच में... मुझे लगा वो बस ग़ुस्से में बोल रहा है। हर कोई कभी-कभी ऐसा बोलता है।"

"पर तुमने उसे रोका नहीं, ना किसी को बताया।" "क्यों, अमेय?"

कमरे में एक लंबी ख़ामोशी उतर आई। अमेय की साँस तेज़ हो गई, हाथ मेज़ पर काँपने लगे।

"ट्रेक वाली सुबह से ठीक एक रात पहले, रात के ग्यारह बजकर सत्रह मिनट पर, तुम्हारे और चिराग के बीच तैंतालीस मिनट की एक कॉल हुई थी।" "तैंतालीस मिनट, अमेय। इतनी लंबी कॉल में 'सब ठीक है यार' नहीं कहा जाता।"

"मैंने उसे रोका था मैडम..." "मैंने सच में रोका था!"

कमरे में एक दम ख़ामोशी छा गई। अमेय के अपने शब्द जैसे हवा में लटक गए, और उसका चेहरा एक झटके में सफ़ेद पड़ गया, जैसे उसे ख़ुद एहसास हुआ हो कि उसने अभी क्या कह दिया।

"रोका था?" "किससे रोका था, अमेय? और कब?"

अमेय का मुँह खुला, पर कोई आवाज़ नहीं निकली। उसकी आँखें वैशाली की आँखों से मिलीं, एक अनकही क़बूली, और फिर नीचे झुक गईं।

दरवाज़े पर एक हल्की दस्तक हुई, कॉन्स्टेबल ने अंदर आने की इजाज़त माँगी। वैशाली ने बिना पीछे देखे हाथ उठाकर उसे रोक दिया, आँखें अब भी अमेय पर टिकी, जो एक टूटे हुए आदमी की तरह अपनी कुर्सी में धँसा जा रहा था।

बाहर पुणे की शाम ढल रही थी, दफ़्तरों की बत्तियाँ जल रही थीं। पर उस छोटे से कमरे में एक शब्द ने सब कुछ बदल दिया था, और अमेय गोखले को अब पता था, वो रास्ता वापस नहीं जाता।

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