Chapter 4 of 30 10 min read
हुडी वाला आदमी
वैशाली मलावली-भाजे के दुकानदारों से पूछताछ करती है और उसे उस हुडी वाले अजनबी का हुलिया और सही वक़्त मिल जाता है, जो केयूर के गिरने के ठीक वक़्त और जगह से मेल खाता है। उसे यक़ीन हो जाता है कि उस भोर बुर्ज पर एक तीसरा इंसान भी मौजूद था, जिसका ज़िक्र पिया ने कभी नहीं किया।
गीली मिट्टी में धँसे उन मोटरसाइकिल टायरों की तस्वीर अभी वैशाली के फ़ोन में गीली भी नहीं सूखी थी, कि उसकी जीप पहले ही मलावली स्टेशन की तरफ़ उतर रही थी। मॉनसून की धुंध में लिपटे सह्याद्री के घाट, हवा में गीली मिट्टी और चाय की भाप की गंध। तीसरा सुराग़ मिल चुका था। अब बस एक नाम चाहिए था, एक चेहरा।
मलावली-भाजे की वो पतली, धुँधली सड़क, जहाँ हर सुबह ट्रेकरों की गाड़ियाँ आकर रुकती हैं। चाय की टपरियाँ, वड़ा-पाव के ठेले, सिगरेट की दुकानें, हर एक जगह वैशाली रुकी। हाथ में केयूर के फ़ोन से निकाली एक धुंधली परछाईं की तस्वीर, बस इतनी सी पहचान: काली हुडी, कानों में हेडफ़ोन, मोटरसाइकिल।
पहली टपरी। "नहीं मैडम, ऐसा कोई नहीं आया।" दूसरी दुकान। "सुबह-सुबह तो बहुत भीड़ रहती है, याद नहीं।" तीसरा ठेला, एक कंधा उचकाकर मना कर दिया गया। हर एक 'नहीं' के साथ वैशाली की घड़ी की सुइयाँ थोड़ी और तेज़ भागने लगीं।
एक साइकिल-रिपेयर की दुकान पर एक नींद में डूबा लड़का ज़रूर कुछ बुदबुदाया, "एक बाइक की तेज़ आवाज़ तो सुनी थी साहब, बहुत सुबह-सुबह, पर आँख नहीं खुली मेरी, मुँह ढँककर सोता रहा।" एक कान ने सुना था, एक आँख ने नहीं देखा था। वैशाली को फिर आगे बढ़ना पड़ा।
और फिर, भाजे गाँव के आख़िरी मोड़ पर, एक छोटी सी टपरी, टिन की छत, बेंच पर बैठे दो बूढ़े, चूल्हे पर खदकती चाय। दुकान का मालिक, एक दुबला-पतला, पचास पार का आदमी, कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था।
"नमस्ते। सब-इंस्पेक्टर वैशाली कदम, लोनावला रूरल से। इस भोर, सवा चार से सवा छह के बीच, कोई मोटरसाइकिल पर, काली हुडी पहने, कानों में हेडफ़ोन लगाए यहाँ से गुज़रा था? ज़रा याद कीजिए।"
दुकानदार ने अख़बार नीचे रखा। कुछ पल आँखें सिकोड़े रहा, जैसे धुंध में से कोई तस्वीर खींच रहा हो। फिर धीरे से सिर हिलाया, हाँ में।
"हाँ मैडम, याद है। एक भाईसाहब आया था, अकेला। काली हुडी, हूड ऊपर चढ़ाई हुई, कानों में वो बड़े वाले हेडफ़ोन। न चाय पी, न कुछ खाया, न किसी से एक बोल बोला। बस बाइक साइड में लगाई, पहाड़ की तरफ़ देखा, और पैदल पगडंडी पर चढ़ गया।"
"वक़्त? ठीक कितने बजे?"
"पौने पाँच... नहीं मैडम, ठीक पौने पाँच बजे होंगे। मैं सुबह की पहली चाय की देगची चढ़ा ही रहा था, तभी उसकी बाइक की आवाज़ आई थी।"
पौने पाँच बजे। ... वैशाली की नस में जैसे बिजली दौड़ गई। पिया और केयूर पाँच बजे के आसपास बुर्ज पर पहुँचे थे। यानी ये हुडी वाला आदमी, उनसे बस मिनटों पीछे, उसी सुनसान पहाड़ पर चढ़ रहा था।
"और वापस? कब लौटा वो?"
"वापस? मुझे नहीं दिखा मैडम, वापस जाते हुए। शायद दूसरी तरफ़ से उतर गया होगा। हम लोग तो अपने काम में लग गए थे।"
दूसरी तरफ़ से। वैशाली को बुर्ज के पिछवाड़े वाली वो छुपी पगडंडी याद आ गई, जिसकी गीली मिट्टी में उसे कल ही टायरों के निशान मिले थे। एक ही आदमी, एक ही बाइक, दो सिरों से जुड़ती एक ही कहानी।
दो जूतों के निशान, बुर्ज के किनारे पर। एक ग़ायब घंटा, पिया की गवाही में। और अब एक तीसरा सुराग़, बुर्ज के पिछवाड़े की गीली मिट्टी में धँसे टायर। तीन अलग-अलग दिन की खोज, एक ही सुबह की तरफ़ इशारा कर रही थीं।
"उसका चेहरा देखा आपने? हुडी के नीचे, कुछ भी?"
"नहीं मैडम, हूड ऐसे चढ़ी थी कि बस ठुड्डी दिखी, और... हाँ, एक बात है। जब वो बाइक साइड स्टैंड पर लगा रहा था, तब उसकी बाइक का साइलेंसर बहुत तेज़ आवाज़ करता था। मॉडिफ़ाइड जैसा।"
"बाइक का रंग? कोई नंबर प्लेट, कुछ भी याद है?"
"रंग... काला था शायद, या गहरा नीला, ठीक से नहीं देखा मैडम। पर नंबर प्लेट पर धूल जमी थी, जैसे कई दिन से साफ़ ना हुई हो। बस आख़िरी अंक याद है, सात।"
सात। एक अधूरा नंबर, एक धुंधला रंग। पर वैशाली के लिए ये टुकड़े भी सोने के बराबर थे। मॉडिफ़ाइड साइलेंसर। काली हुडी। हेडफ़ोन। पौने पाँच बजे का वक़्त। उसने अपनी डायरी में एक-एक कर हर टुकड़ा लिख डाला। एक अनजान चेहरा, अब धीरे-धीरे एक हुलिया बनने लगा था।
इस हुलिए का नाम वैशाली को अभी नहीं पता था। पर हमें पता था। और उस नाम की कहानी, उसी दोपहर शुरू हुई थी, जब पिया मित्तल की सगाई की अंगूठी अभी उँगली पर नई-नई थी, और उसका दिल, एक सुनसान कैफ़े की तरफ़ भागा जा रहा था।
पुणे के बाहरी इलाक़े का एक छोटा, अंधेरे कोने वाला कैफ़े, जहाँ कोई जान-पहचान वाला कभी नहीं आता। कोने की मेज़ पर, धूप के चश्मे और दुपट्टे में आधा छुपा एक चेहरा, पिया। सामने की कुर्सी अभी ख़ाली थी।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी। काली शर्ट, हाथ में बाइक की चाबी घुमाता, चिराग भाटिया भीतर आया। उसकी नज़र सीधी पिया की मेज़ पर गई, जैसे इस भीड़ में भी वो उसे बंद आँखों से ढूँढ सकता हो।
"कितनी देर लगा दी। सोचा शायद आज भी नहीं आएगी।"
"घर से निकलना आसान नहीं है अब, चिराग। शादी की तारीख़ के बाद तो और नहीं। माँ हर वक़्त पूछती है, कहाँ जा रही है, किससे मिल रही है।"
चिराग की उँगलियाँ मेज़ पर धीरे-धीरे थपथपाईं, वो आवाज़ जो पिया अब नींद में भी पहचानने लगी थी, बेसब्री की आवाज़। फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और पिया की काँपती उँगलियों को कसकर पकड़ लिया।
"हम भाग जाएँगे पिया। बस थोड़ा और सब्र। तेरी सगाई की अंगूठी सिर्फ़ एक धातु का टुकड़ा है, इसका कोई मतलब नहीं, जब तक तू मेरी है। और तू मेरी है। हमेशा से।"
"पर केयूर... वो इतना अच्छा है चिराग। उसकी कोई ग़लती नहीं है इसमें। मुझे कभी-कभी लगता है, मैं ही ग़लत हूँ, इतना बड़ा झूठ जी रही हूँ।"
"याद है चिराग, कॉलेज के आख़िरी साल में तुमने कहा था, 'समुद्र' हमारा है, कोई और छू भी नहीं सकता उसे। अब वही समुद्र मुझे डुबो रहा है।"
"समुद्र तूफ़ान में भी अपना ही रहता है पिया। बस लहरें शांत होने दे। मैं जानता हूँ शांत कैसे करनी हैं।"
उस वाक्य के भीतर पिया को सिर्फ़ एक दिलासा सुनाई दिया। हमें, कुछ महीने आगे का एक कोड मैसेज सुनाई दिया। "समुद्र शांत हो गया है।"
"ग़लत? ग़लत तो तेरे बाप ने किया, तुझे बेच दिया एक टावरों वाले घर को। मैं तुझसे झूठ नहीं बोल रहा पिया, मैं तुझे वो ज़िंदगी दे रहा हूँ जो तू चाहती थी। बस थोड़ा और वक़्त।"
चिराग की नज़र पिया की उँगली में चमकती सगाई की अंगूठी पर अटक गई। एक पल को उसके चेहरे पर वो जलन साफ़ उभर आई, जिसे वो हमेशा मुस्कुराहट के पीछे छुपाता था।
"वो तुझे हाथ लगाता है? रात को फ़ोन करता है, तेरा हाल पूछता है? बता पिया, कैसा लगता है उसका छूना?"
"चिराग, प्लीज़... ये सब मत पूछो। मुझे बहुत बुरा लगता है ख़ुद से, इतना बुरा कि कभी-कभी साँस लेना भी भारी लगता है।"
"सॉरी... मुझसे बर्दाश्त नहीं होता, बस इसलिए पूछ लिया। जल्दी ही ये सब ख़त्म हो जाएगा, पिया। मेरा वादा है।"
"थोड़ा और सब्र।" ... चिराग ये शब्द कई महीनों से दोहरा रहा था। और हर बार जब पिया को यक़ीन होने लगता कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा, चिराग की आँखों में वो ठंडा, हिसाबी सन्नाटा थोड़ा और गहरा होता जाता।
उसी शाम, शहर के दूसरे छोर पर, केयूर मलपानी बाज़ार में घूम रहा था, पिया की पसंद की चूड़ियाँ ढूँढते हुए, चेहरे पर वो भोला, बेफ़िक्र मुस्कान लिए जो सिर्फ़ सच्चे प्यार में मिलती है। उसे नहीं पता था कि जिस लड़की के लिए वो चूड़ियाँ चुन रहा था, उसका दिल शहर के दूसरे कोने में, किसी और के हाथ में गिरवी बैठा था।
"अभी दो दिन पहले मैं लोहागढ़ गया था पिया, अकेले। बस यूँही, हवा खाने। बहुत सुनसान जगह है वो, ख़ास तौर पर पिछली तरफ़, बुर्ज के पीछे। कोई नहीं जाता वहाँ।"
"तुम वहाँ अकेले क्यों गए, चिराग? क्या सोच रहे हो तुम?"
"कुछ नहीं। बस तेरे साथ किसी दिन जाना चाहता हूँ, बस हम दोनों। भूल जा ये सब। हम भाग जाएँगे पिया। बहुत जल्द।"
पिया को नहीं पता था कि चिराग की वो 'हवा खाने' वाली शाम, दरअसल एक रेकी थी। एक ऐसी रेकी, जिसका नक़्शा उसकी अपनी सगाई की तारीख़ पर टिका था, और उसका अपना जन्मदिन का तोहफ़ा उसी नक़्शे का हिस्सा बनने वाला था।
शाम के धुंधलके में वैशाली अपनी जीप में लौटी, दुकानदार का हुलिया अब उसकी डायरी में काले अक्षरों में दर्ज था। थाने पहुँचकर उसने अपनी मेज़ पर वो पुराना नक़्शा फैलाया, लोहागढ़ की पूरी चढ़ाई, वो सामने वाली पगडंडी, और वो छुपी हुई पिछली पगडंडी।
उसने मेज़ पर तीन तस्वीरें बिछाईं, पिया का पैदल-रास्ते वाला बयान, दुकानदार का बताया हुलिया, और पिछवाड़े की गीली मिट्टी में धँसे वो टायरों के निशान। तीनों को साथ रखते ही, एक ही सच्चाई साफ़ उभर आई, जैसे धुंध छँट रही हो।
"पौने पाँच बजे चढ़ना शुरू करता है... इतना धीरे कि सवा पाँच तक भी बुर्ज तक ना पहुँचे, तो ये उतना ही वक़्त है जितना पिया और केयूर का पूरा एक 'ग़ायब घंटा' था। कल का ग़ायब घंटा... और आज का ये हुडी वाला आदमी... एक ही घंटे में हैं।"
उसने घड़ी की सुइयों की तरह हर टुकड़ा एक साथ रखा। पिया और केयूर, सवा चार बजे मलावली से चले, पाँच बजे बुर्ज पर पहुँचे। और ठीक पौने पाँच बजे, इसी वक़्त, एक हुडी वाला आदमी, अकेला, पिछली पगडंडी से चढ़ना शुरू करता है।
"पौने पाँच से पाँच के बीच... मतलब ये आदमी उनसे सिर्फ़ दस-पंद्रह मिनट पीछे, उसी पहाड़ पर, उसी बुर्ज की तरफ़ चढ़ रहा था। और सवा छह बजे, जब केयूर गिरा, ये आदमी कहाँ था? क्या वो उतर चुका था? या... वो वहीं था?"
गावडे के दिए वो दो दिन, अब सिर्फ़ एक दिन बचे थे। एक हुलिया, एक अधूरा नंबर, एक वक़्त का सटीक मेल, पर अभी तक कोई नाम नहीं। फिर भी वैशाली जानती थी, हुलिया एक बार मिल जाए तो नाम बहुत दूर नहीं होता।
जवाब वैशाली के पास अभी नहीं था। पर एक चीज़ अब शक नहीं रही, यक़ीन बन चुकी थी। पिया मित्तल की गवाही में सिर्फ़ दो लोग थे, वो और केयूर। और अब वैशाली के पास वजह थी यक़ीन करने की, कि उस भोर, उसी पहाड़ पर, उसी वक़्त, एक तीसरा इंसान भी मौजूद था।
एक तीसरा इंसान, जिसका ज़िक्र पिया ने कभी, एक बार भी नहीं किया था। वैशाली ने डायरी बंद की, और खिड़की से बाहर, लोहागढ़ की धुंधली परछाईं की तरफ़ देखा।
बाहर, पहली मॉनसूनी बूंदें खिड़की के शीशे पर टपकने लगीं, धीरे-धीरे, जैसे कोई घड़ी टिक-टिक कर रही हो।
"पिया... तुमने मुझसे एक इंसान छुपाया है। और अब मैं उसे ढूँढकर रहूँगी।"
Comments
No comments yet. Be the first to share your thoughts.