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अध्याय 14 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

गवाह बन गया

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

बाहर पुणे की शाम पूरी तरह ढल चुकी थी, पर उस छोटे से कमरे में वक़्त जैसे उस एक वाक्य पर आकर ठहर गया था। अमेय गोखले की कुर्सी अब दीवार से जा लगी थी, और वैशाली की आँखें एक पल को भी उसके चेहरे से नहीं हटी थीं।

"रोका था, अमेय?" "एक आदमी दूसरे को तभी रोकता है... जब उसे पता हो कि सामने वाला कुछ करने वाला है।" "तुम्हें पता था। कब से पता था?"

"मैडम, मैं..." "मैं महीनों से ठीक से सो नहीं पाया हूँ। हर रात वही एक बात, वही एक सुबह मेरी आँखों के सामने घूमती है।"

अट्ठाईस साल का अमेय, जो अगले महीने अपनी सगाई की तैयारी कर रहा था, अब हर दरवाज़े की दस्तक पर चौंक उठता था। उसकी अपनी ख़ुशियाँ, अपने सपने, सब एक पुराने दोस्त के उस एक राज़ के नीचे दबे पड़े थे, जिसे उसने कभी अपना कहा ही नहीं था।

उसने अपने दोनों हाथ चेहरे पर रख लिए, और एक लंबी, थरथराती साँस ली। जैसे कोई बाँध, जो महीनों से एक अकेली उँगली के सहारे टिका था, आख़िर दरक रहा हो।

"अमेय, मेरी तरफ़ देखो।" "जो बोझ तुम महीनों से ढो रहे हो, वो आज इसी कमरे में उतर सकता है। पर सिर्फ़ तभी, जब तुम पूरा सच बोलो, आधा नहीं।"

"और अगर मैंने सच बोल दिया, तो?" "मैं भी तो इसमें फँस जाऊँगा। मैंने किसी को नहीं बताया, मैडम। मैं जानता था, और चुप रहा।"

वो अपने ही इल्ज़ाम के किनारे पर आकर रुक गया। वैशाली जानती थी, यही वो पल था जहाँ से या तो वो पूरी तरह खुल जाता, या हमेशा के लिए बंद हो जाता।

"अमेय, ध्यान से सुनो।" "क़ानून में एक रास्ता होता है, सरकारी गवाह का। जो शख़्स जुर्म करता नहीं, पर जुर्म को जानता है, अगर वो अदालत के सामने पूरा और सच्चा बयान दे... तो क़ानून उसे मुजरिम नहीं, गवाह मानता है।"

"गवाह..."

"हाँ। पर इसकी एक क़ीमत है। आधा सच नहीं चलेगा।" "जो जानते हो, पूरा बताना होगा, और एक दिन कठघरे में खड़े होकर, चिराग की आँखों में देखकर दोहराना होगा।" "बोलो, क्या तुम ये कर सकते हो?"

अमेय ने आँसू पोंछे, और पहली बार उस शाम उसने सीधे वैशाली की आँखों में देखा। एक डरा हुआ आदमी, जो शायद पहली बार डर के पार कुछ और ढूँढ रहा था।

"तुमने अभी कहा, तुमने उसे रोका था।" "तो शुरू वहीं से करो, अमेय। कब पहली बार तुम्हें लगा कि ये सिर्फ़ बातें नहीं हैं?"

"जब उसने पिया की शादी पक्की होने की ख़बर सुनी, मैडम।" "उस रात वो आधी रात को मेरे कमरे पर आया। उसकी आँखें अलग थीं, ख़ाली सी।" "मैंने पहली बार डर महसूस किया... अपने ही सबसे पुराने दोस्त से।"

उसने एक पल रुककर वैशाली की तरफ़ देखा, जैसे इजाज़त माँग रहा हो, कि क्या वो सच में ये सब कह सकता है। वैशाली ने बस हल्के से सिर हिलाया, चलो, कहो।

"वो एक 'हादसे' की बात करता था, मैडम। बहुत पहले से।" "मैं समझता रहा कि ग़ुस्से की बात है, नशे की बात है।" "पर वो ग़ुस्सा नहीं था।"

"शादी की तारीख़ पक्की होने के बाद वो बिल्कुल बदल गया था। पहले कहता था, 'हम भाग जाएँगे, पिया को लेकर कहीं दूर।'" "पर एक दिन उसने कहा... 'भागने से कुछ नहीं होगा। एक और रास्ता है।'"

और यहीं, इस एक वाक्य में, वो पूरी कहानी छुपी थी जो हम पहले से जानते थे। 'एक और रास्ता।' ... अमेय के लिए वो अभी भी एक धुँधला डर था। हमारे लिए वो एक पूरी साज़िश का नाम था।

कुछ हफ़्ते पीछे चलते हैं। लोनावला से दूर, पुणे के एक सुनसान फ़्लैट में, परदे खिंचे हुए, एक अकेली लैंप की मद्धम रौशनी। पिया और चिराग आमने-सामने बैठे थे, और उनके बीच मेज़ पर एक फ़ोन पड़ा था, जिसकी स्क्रीन पर लोहागढ़ किले का नक़्शा खुला हुआ था।

"चिराग, ये पागलपन है। हम भाग क्यों नहीं जाते? दूर, जहाँ कोई हमें पहचाने भी न।"

"और उम्र भर छुपते फिरें? तेरा बाप हर थाने, हर रिश्तेदार को हमारे पीछे लगा देगा।" "भागने वाले पकड़े जाते हैं, पिया। और जो पीछे बचा रहेगा, वो हमेशा हमारे और हमारी आज़ादी के बीच खड़ा रहेगा।"

"तुम्हारा मतलब है... केयूर।"

उसने वो नाम इतने धीरे से लिया, जैसे ज़ोर से कहने पर वो सच हो जाएगा। पर सच तो पहले ही उस कमरे में बैठ चुका था, उन दोनों के बीच, किसी तीसरे इंसान की तरह।

"उसका जन्मदिन आ रहा है।" "तू उसे ट्रेक पर ले चल, लोहागढ़। वो तेरी हर बात मानता है। भोर का सुनसान बुर्ज, कोई गवाह नहीं।" "तू उसे बस किनारे तक ले जाना। बाक़ी... बाक़ी मैं देख लूँगा।"

"और अगर कोई देख ले? अगर कुछ ग़लत हो जाए?"

"कुछ ग़लत नहीं होगा। सब 'हादसा' लगेगा।" "एक लड़का, अपने ही जन्मदिन पर, ट्रेकिंग करते हुए फिसल गया। कौन शक करेगा?" "पुलिस फ़ाइल बंद कर देगी, और हम... हम आज़ाद।"

'हम आज़ाद।' ... वैशाली की मेज़ पर महीनों बाद पहुँचने वाला वो मैसेज, 'समुद्र शांत हो गया, अब हम आज़ाद हैं,' अभी बहुत दूर था। पर उसकी बुनियाद यहीं, इसी अँधेरे कमरे में रखी जा रही थी।

"और वो... वो मुझ पर इतना भरोसा करता है।"

"और सुन... अब से इस पूरे किस्से का एक ही नाम होगा। 'समुद्र।'" "जो हमारा प्यारा-सा मज़ाक़ था, वही अब हमारी ढाल बनेगा। कोई पढ़ भी ले, तो सिर्फ़ दो प्रेमियों की बातें समझेगा।"

"समुद्र..." "और जिस दिन ये सब ख़त्म होगा, हम कहेंगे... समुद्र शांत हो गया।"

और इस तरह एक प्यार भरा कोड, चुपके से, एक क़त्ल का नक़्शा बन गया। वही 'समुद्र', जो महीनों बाद वैशाली की मेज़ पर एक क़बूलनामे की तरह आकर गिरेगा, जब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

"उसी भरोसे को हमारा हथियार बनने दे, पिया।" "जिस दिन वो तेरा हाथ थामकर उस पहाड़ पर चढ़ेगा, उसी दिन तय हो जाएगा कि हमारी बाक़ी ज़िंदगी किसकी होगी।"

और इस तरह, 'हम भाग जाएँगे' का वो अधूरा, डरा हुआ ख़्वाब... पूरी तरह 'एक और रास्ता है' में बदल गया। एक प्रेम कहानी, जो शायद कभी सच्चा प्रेम थी ही नहीं, अब एक नक़्शे में, एक तारीख़ में, एक जन्मदिन में सिमट गई थी।

उसी रात, थाने में, वैशाली अपनी मेज़ पर अमेय के बयान के पन्ने फैलाए बैठी थी। तभी गलियारे में क़दमों की जानी-पहचानी आहट हुई, और गावडे उसकी मेज़ के पास आकर रुक गए।

यही वो आदमी था जिसने महीनों पहले उसे हुक्म दिया था, 'फ़ाइल बंद करो और घर जाओ।' आज पहली बार वो गुज़रते हुए नहीं रुके थे, बल्कि रुकने के लिए रुके थे।

"कदम, ये अमेय गोखले वाला बयान..." "पूरा पढ़ा मैंने। दो बार।"

"जी सर।"

"बरनर, टावर का डंप, हुडी का डीएनए, रिकवर की हुई चैट... और अब ये लड़का, जो कहता है कि उसे पहले से पता था।" "ये सब एक साथ रखो, तो..."

वो एक पल रुके, जैसे वो बात कहनी हो जो एक सीनियर अफ़सर के लिए आसान नहीं थी। एक अफ़सर, जिसने अपनी पूरी नौकरी 'मामला ठंडा रखो' के उसूल पर काटी थी।

"तो ये हादसा नहीं था।"

चार शब्द। पर उन चार शब्दों में महीनों की वो अकेली लड़ाई थी जो वैशाली ताने सहते हुए, फ़ाइल खुली रखने की ज़िद में लड़ती आई थी।

"नहीं था, सर।" "ये पहले दिन से एक साज़िश थी। अब बस उसे अदालत में साबित करना बाक़ी है।"

"तो इस गवाह को सँभालो, कदम। पूरी हिफ़ाज़त से।" "जिस दिन ये कठघरे में खड़ा होगा, दूसरी तरफ़ के लोग इसे तोड़ने की हर कोशिश करेंगे।" "इसका बयान ही तुम्हारा सबसे मज़बूत सबूत है... और सबसे कमज़ोर भी।"

वैशाली जानती थी वो सच कह रहे थे। एक इकलौता गवाह, जो डर से टूट भी सकता था और मुकर भी सकता था। पर आज पहली बार, वो इस लंबी लड़ाई में अकेली नहीं थी।

"मीडिया अब भी उन्हीं के साथ है, कदम। ऊपर से दबाव और बढ़ेगा, कम नहीं होगा।" "पर अब मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ। जो चाहिए, माँग लेना, बिना झिझक के।"

वैशाली ने सिर हिलाया। गावडे मुड़े, दो क़दम चले, फिर बिना पीछे देखे ठिठक गए।

"और कदम..." "तुमने फ़ाइल बंद नहीं की। अच्छा किया।"

इतना कहकर वो चले गए, अपनी उम्र और अपने पुराने उसूलों का बोझ लिए। वैशाली कुछ पल उस ख़ाली गलियारे को देखती रही, फिर उसने अमेय के बयान का पन्ना दुबारा उठा लिया।

अगली सुबह, अमेय गोखले फिर उसी कमरे में था। पर आज उसके सामने एक मजिस्ट्रेट बैठे थे, और उसका बयान क़ानूनी तौर पर, हमेशा के लिए, काग़ज़ पर दर्ज हो रहा था।

उसने रात भर सोचा था। सुबह उसका चेहरा डरा हुआ ज़रूर था, पर उस डर के नीचे अब पहली बार एक ठहराव था।

"अमेय, आख़िरी बार पूछती हूँ। अपने पूरे होश में, बिना किसी दबाव के... तुम जो कहने जा रहे हो, क्या वो सच है?"

"हाँ, मैडम।" "मैं महीनों तक इसलिए चुप रहा क्योंकि मैं डरपोक था। पर आज बोल रहा हूँ, क्योंकि झूठा नहीं हूँ।"

मजिस्ट्रेट ने उसे शांत आवाज़ में, शुरू से बोलने को कहा, सिर्फ़ वही जो उसने अपनी आँखों और कानों से जाना हो। अमेय ने काँपते हाथों से पानी का एक घूँट लिया, और बोलना शुरू किया।

"चिराग ने कई हफ़्ते पहले कहा था कि केयूर के रहते पिया कभी उसकी नहीं होगी।" "फिर एक दिन उसने जन्मदिन के ट्रेक का ज़िक्र किया, हँसते हुए, जैसे कोई मामूली सी बात हो। पर उसकी उस हँसी में कुछ ठंडा था।"

"मैंने उससे कहा था, 'ये मत करना, यार, ख़ुदा के लिए।' उसने बस मेरी तरफ़ देखा और चुप रहा।" "वही चुप्पी, मैडम... वही उसका जवाब थी। और मैं भी, डर के मारे, चुप रह गया।"

उसने एक गहरी साँस ली, और वो वाक्य कहा जिसने उस कमरे की हवा बदल दी। वो वाक्य, जो एक 'हादसे' की फ़ाइल को हमेशा के लिए एक क़त्ल की फ़ाइल में बदलने वाला था।

"वो जन्मदिन का ट्रेक कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था, मैडम।" "वो चुना गया था, सोच-समझकर, ताकि सब कुछ स्वाभाविक लगे।" "उन्होंने इसे हादसा बनाना था, मैडम... ये क़त्ल था।"

मजिस्ट्रेट की क़लम एक पल को रुक गई। वैशाली ने मेज़ के नीचे अपनी मुट्ठी भींच ली, न जीत की ख़ुशी, न राहत, बस एक ठंडा यक़ीन कि अब ये रास्ता वापस नहीं जाता।

'ये क़त्ल था।' ... वो तीन शब्द अब सिर्फ़ हमारी जानकारी नहीं रहे थे। वो अब एक गवाह की ज़ुबान से, एक मजिस्ट्रेट के काग़ज़ पर दर्ज हो चुके थे। वैशाली की मेज़ पर अब एक 'हादसा' नहीं था, एक साज़िश थी, जिसके दो नाम थे, और एक गवाह, जो अब कभी पीछे नहीं हट सकता था।

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