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अध्याय 25 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

फ़ोरेंसिक की गवाही

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

दस दिन बाद शिवाजीनगर अदालत का कमरा नंबर छह फिर उसी घड़ी पर लौटा, जज के बेंच संभालते ही पूरे कमरे में एक भारी ख़ामोशी उतर आई। कठघरे के पास आज एक नया गवाह खड़ा था, हाथ में एक पतली नीली फ़ाइल, चेहरे पर हल्की घबराहट के नीचे एक ठोस, टिकाऊ भरोसा।

गैलरी की पिछली क़तार में वैशाली फिर वहीं बैठी थी, जहाँ वो हर सुनवाई में बैठती थी, हाथों में वही पुरानी नोटबुक। उसके ठीक बग़ल की सीट आज ख़ाली थी, वो सीट जो अगले हफ़्ते अमेय गोखले की होने वाली थी।

"माननीय, अभियोजन आज साइबर फ़ोरेंसिक विशेषज्ञ रुतुजा साळुंके को बुलाना चाहेगा, जिन्होंने इस केस में मिटाया गया डेटा रिकवर किया था।" "उसके बाद डॉक्टर मोरे की गवाही होगी, और अगली सुनवाई में चश्मदीद गवाह अमेय गोखले पेश होंगे।"

रुतुजा ने कठघरे में खड़े होकर शपथ ली, आवाज़ काँपी नहीं, बल्कि हर लफ़्ज़ पर हल्का ज़ोर था, जैसे महीनों की मेहनत को आख़िरकार बोलने का मौक़ा मिला हो।

"गवाह अपना नाम, पद और इस केस में अपनी भूमिका अदालत को बताएँ।"

"माननीय, मैं रुतुजा साळुंके, पुणे साइबर सेल में सहायक फ़ोरेंसिक विश्लेषक हूँ। इस केस में मुझे दो बरनर फ़ोन सौंपे गए थे, दोनों फ़ैक्ट्री रीसेट किए हुए, यानी ऊपर से पूरी तरह ख़ाली।"

"एक फ़ैक्ट्री रीसेट किया हुआ फ़ोन कैसे बोल सकता है माननीय की अदालत के सामने? ज़रा समझाइए।"

"माननीय, फ़ोन की मेमोरी चिप पर डेटा मिटाने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि उस जगह को 'ख़ाली' का निशान लगा दिया जाता है, डेटा असल में वहीं पड़ा रहता है जब तक कोई नई फ़ाइल उसके ऊपर न लिखी जाए।" "हमने चिप को सीधे बोर्ड से उतारकर, बिट-दर-बिट एक कॉपी निकाली, और उन 'ख़ाली' निशान वाले हिस्सों में छुपे असली संदेश ढूँढ निकाले।"

"क्या आप अदालत को इसी तरीक़े से रिकवर किया कोई एक मैसेज बताएँगी?"

"जी माननीय। इसी तरीक़े से हमने वो मैसेज निकाला था, 'समुद्र शांत हो गया, अब हम आज़ाद हैं,' भेजा गया केयूर मलपानी के गिरने के ठीक एक घंटे बाद। यह डिलीट फ़ोल्डर में नहीं था माननीय, वो पहले ही मिटाया जा चुका था, यह उस ख़ाली किए गए मेमोरी सेक्टर में दबा पड़ा था जिसे कोई फ़ोन कभी दिखाता नहीं।"

जज ने आगे झुककर चश्मा ठीक किया, पहली बार उसकी क़लम रुतुजा के हर शब्द पर रुक-रुककर काग़ज़ पर चल रही थी। खानविलकर की मुस्कान थोड़ी सख़्त हो गई थी।

"और इन रिकवर किए मैसेजों की तारीख़ और वक़्त, क्या वो सिर्फ़ फ़ोन का दावा है, या किसी और सबूत से मिलता है?"

"माननीय, हर रिकवर हुए मैसेज पर एक हैश वैल्यू होती है, एक डिजिटल फ़िंगरप्रिंट, जो झूठा नहीं बनाया जा सकता। हमने हर मैसेज का वक़्त मोबाइल टावर के डंप से मिलाया, और हर बार टाइमस्टैंप और टावर पिंग एक ही मिनट पर आकर खड़े हो गए।" "यह इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकता माननीय, यह एक ज़ंजीर है।"

"इस पूरी रिकवरी प्रक्रिया में कितना वक़्त लगा आपको?"

"पूरे सात दिन माननीय, दिन-रात, क्योंकि हर मिटाया हुआ सेक्टर अपने आप में एक पहेली था। पर हर घंटा उस वक़्त की भरपाई करता गया जो एक परिवार ने इंसाफ़ के इंतज़ार में गँवाया।"

वृंदा अपनी सीट पर बैठ गई, और खानविलकर धीरे से खड़ा हुआ, अपनी नोटबुक में कुछ जाँचते हुए।

"गवाह महोदया, ये फ़ोन आपके पास पहुँचने से पहले कितने हाथों से गुज़रे? क्या आप गारंटी दे सकती हैं कि रास्ते में किसी ने कुछ बदला नहीं?"

"वकील साहब, हर फ़ोन ज़ब्ती के वक़्त सील बैग में सीलबंद हुआ, हर हाथ बदलने पर दस्तख़त और मुहर दर्ज हुई। मेरे लैब में पहुँचने से पहले सील टूटी ही नहीं थी, ये पूरा रिकॉर्ड फ़ाइल में मौजूद है।"

"और आप ख़ुद पुलिस विभाग के लिए काम करती हैं, तो क्या ये मुमकिन नहीं कि आपने अपने नतीजे पुलिस की थ्योरी के हिसाब से 'ढाल' दिए हों?"

"वकील साहब, हैश वैल्यू झूठ नहीं बोलती, वो गणित है, राय नहीं। अगर आपकी अपनी लैब इसे दुबारा जाँचना चाहे, हर चिप, हर हैश आज भी सुरक्षित रखा हुआ है।" खानविलकर की क़लम एक पल के लिए रुक गई, फिर उसने सिर हिलाकर बैठने का इशारा किया।

"और क्या यह मुमकिन नहीं कि कोई तीसरा इंसान ये फ़ोन इस्तेमाल कर रहा हो, पिया या चिराग नहीं?"

"मुमकिन तो बहुत कुछ है वकील साहब, पर दोनों बरनर सिम रिचार्ज दुकान के सीसीटीवी में इन्हीं दोनों के हाथ में देखे गए, और दोनों नंबर उन्हीं की मौजूदा जगहों से, महीनों तक, हर बार, उसी टावर पर पिंग करते रहे। यह इत्तेफ़ाक़ की हद पार कर चुका है माननीय।"

रुतुजा कठघरे से उतरी, और अगला नाम पुकारा गया, डॉक्टर मोरे, सफ़ेद कोट की जगह आज सादे कपड़ों में, एक मोटी मेडिकल फ़ाइल हाथ में।

"डॉक्टर साहब, केयूर मलपानी की कलाई पर मिले नीले निशान के बारे में अदालत को बताइए।"

"माननीय, कलाई की हड्डी के ठीक ऊपर एक गहरा नीला निशान था, चार उँगलियों की शक्ल का, एक मज़बूत, वयस्क पुरुष की पकड़ जैसा। यह निशान मौत से पहले, जब दिल अभी धड़क रहा था, तभी बना था।" "अगर आदमी ख़ुद फिसलकर किसी डाल या पत्थर को पकड़ता, तो निशान उँगलियों का नहीं, खरोंच का होता। यह पकड़ किसी और हाथ की थी।"

"क्या ये निशान गिरने के दौरान या उसके बाद बना हो सकता है डॉक्टर साहब?"

"नहीं माननीय। चोट के आस-पास की त्वचा में ख़ून का जमाव साफ़ दिखाता है कि दिल तब भी धड़क रहा था। यह निशान गिरने से पहले, गिरने के मिनटों के भीतर बना था, जब केयूर मलपानी अभी ज़िंदा और सचेत था।"

गैलरी में सुष्मा की आँखें बंद हो गईं, नरेश ने उनका हाथ थाम लिया। अगली क़तार में पिया की नज़र मेज़ पर टिकी रही, हिली नहीं।

"और हथेलियों पर मिले खरोंच?"

"दोनों हथेलियों में गहरे खरोंच थे, नाखूनों के नीचे मिट्टी और ख़ुद की त्वचा के रेशे। माननीय, यह हाथ किसी चीज़ को, या किसी को, आख़िरी पल तक जकड़े रहने की कोशिश के निशान हैं। यह आदमी लड़ा, चुपचाप गिरा नहीं।"

"और बाएँ बाज़ू पर मिले तीन खरोंचों के बारे में क्या कहेंगे?"

"बाएँ बाज़ू पर तीन समानांतर खरोंच थे, गहराई में एक जैसे, जैसे किसी ने ख़ुद को छुड़ाने की कोशिश में किसी मज़बूत पकड़ से बाज़ू खींचा हो। यह चोट अकेले गिरने में कभी नहीं बनती माननीय।"

वृंदा ने डॉक्टर मोरे की तरफ़ देखा और अगला सवाल पूछा, वही सवाल जिसकी तैयारी में हफ़्तों गए थे।

"डॉक्टर साहब, आपने ख़ुद उस पुतले वाले प्रयोग की निगरानी की थी। अदालत को उसका नतीजा बताइए, और अगर इजाज़त हो तो उसकी रिकॉर्डिंग अदालत में दिखाई जाए।"

"जी माननीय। मैं ख़ुद लोहागढ़ की उसी बुर्ज पर मौजूद था। रिकॉर्डिंग ख़ुद बोलेगी।"

अदालत के एक कोने में लगी स्क्रीन पर वीडियो चलने लगा, भोर की धुंध, वही बुर्ज, वही किनारा। केयूर के ठीक वज़न का पुतला बार-बार किनारे से फिसलाया गया, हर बार वो सिर्फ़ छह मीटर दूर पहली चट्टान पर जाकर रुक गया।

स्क्रीन पर अगला फ़्रेम आया, खाई के नक़्शे पर एक लाल निशान, जहाँ केयूर का असली शरीर मिला था, पुतले की जगह से पूरे बाईस मीटर आगे, गहराई में। कमरे में इतनी ख़ामोशी थी कि पंखे की आवाज़ भी तेज़ लगने लगी।

वीडियो में एक ड्रोन शॉट भी था, ऊपर से खिंचा हुआ, जिसमें साफ़ दिखता था कि पुतले और असली शव की जगह के बीच सिर्फ़ चट्टान नहीं, एक साफ़, नापा हुआ खुला फ़ासला था, कोई पेड़ नहीं, कोई मोड़ नहीं जो किसी गिरते शरीर को आगे धकेल सके।

सुष्मा ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया। पत्रकारों की क़लमें रुक गईं। जज की नज़र स्क्रीन पर जमी रही, कई पल तक हिली नहीं।

"माननीय, ये एक नाटक है, प्रयोगशाला का मंचन, असली घटना नहीं। पहाड़ पर हवा, मिट्टी, पैर रखने का तरीक़ा, हर बार अलग हो सकता है।" "एक पुतला भौतिकी दिखा सकता है, इंसाफ़ नहीं।"

"माननीय, यह प्रयोग एक बार नहीं, ग्यारह बार दोहराया गया, हर बार वही मौसम, वही जगह, वही वज़न, और हर बार नतीजा एक जैसा। अगर ये नाटक है, तो प्रकृति ने ग्यारह बार एक ही स्क्रिप्ट दोहराई है।"

"हो सकता है केयूर मलपानी ने ख़ुद घबराहट में एक ग़लत क़दम रखा हो, या हवा के एक तेज़ झोंके ने उसे आगे धकेल दिया हो।"

"वकील साहब, हवा का झोंका किसी की कलाई पर उँगलियों की पकड़ का निशान नहीं छोड़ता, न हथेलियों में खरोंच। और छह मीटर से बाईस मीटर आगे पहुँचने के लिए सिर्फ़ फिसलन नहीं, एक निर्णायक, ज़ोरदार धक्का चाहिए। भौतिकी और मेडिकल दोनों रिपोर्ट यही कहती हैं।"

"पर माननीय, अलग-अलग दिन अलग नतीजे भी तो आ सकते थे, हर प्रयोग हमेशा एक जैसा नहीं होता।"

"हमने जान-बूझकर ग्यारह अलग-अलग दिनों पर, अलग-अलग वक़्त पर यह प्रयोग दोहराया, कभी हल्की बारिश में, कभी तेज़ हवा में। नतीजा हर बार छह मीटर के आस-पास ही रहा माननीय। विज्ञान इत्तेफ़ाक़ पर नहीं टिकता, तरीक़े पर टिकता है।"

खानविलकर की उँगलियाँ अपनी फ़ाइल पर हल्की सी काँपीं, इतनी हल्की कि शायद सिर्फ़ गैलरी की तजुर्बेकार नज़रों ने ही पकड़ी। गैलरी में एक हल्की राहत की साँस दौड़ गई।

कुछ पल की ख़ामोशी के बाद वृंदा खड़ी हुई, अपनी आख़िरी बात अदालत के सामने रखने के लिए।

"माननीय, आज अदालत ने ख़ुद देखा, फ़ोरेंसिक डेटा, चोट के निशान, और भौतिकी का प्रयोग, तीनों एक ही सच की तरफ़ इशारा करते हैं। अगली सुनवाई में चश्मदीद गवाह अमेय गोखले इस ज़ंजीर की आख़िरी कड़ी जोड़ेंगे।"

गैलरी में वैशाली ने एक गहरी साँस ली, महीनों पहले जो सवाल उसने ख़ुद से लोहागढ़ की उस बुर्ज पर पूछा था, आज वही सवाल जज की ज़ुबान पर आने वाला था।

"माननीय, बचाव पक्ष अब भी कहता है कि परिस्थितिजन्य सबूत कितना भी लंबा क्यों न हो, वो प्रत्यक्ष सबूत की जगह नहीं ले सकता।"

"परिस्थितिजन्य सबूत तभी कमज़ोर होता है वकील साहब, जब उसमें कोई कड़ी टूटती हो। यहाँ हर कड़ी दूसरी से जुड़ती है, बिना किसी दरार के।"

"माननीय, संयोग को सबूत मान लेना ख़तरनाक मिसाल होगी। अदालत को जल्दबाज़ी में कोई नतीजा नहीं निकालना चाहिए।"

जज ने दोनों वकीलों की तरफ़ देखा, फिर अपने सामने रखे नक़्शे और मेडिकल रिपोर्ट को फिर से खोला, कई पल तक कुछ नहीं बोला।

जज ने चश्मा उतारा और सीधे खानविलकर की तरफ़ देखा। "वकील साहब, मुझे एक बात समझाइए," जज ने कहा, आवाज़ में पहली बार बचाव पक्ष के लिए कोई नरमी नहीं थी, "अगर ये सिर्फ़ एक हादसा था... तो केयूर मलपानी का शरीर उस पुतले से बाईस मीटर आगे, खाई की उस गहराई में, कैसे पहुँचा?"

कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी उतरी जैसे वक़्त ख़ुद रुक गया हो। खानविलकर के होंठ हिले, पर कोई जवाब बाहर नहीं आया। गैलरी में हर नज़र उसी एक चेहरे पर टिकी रह गई, जिसके पास आज पहली बार कोई जवाब नहीं था।

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