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अध्याय 3 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

फ़ाइल बंद करो

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

"इसे गिराया गया है।" ... डॉक्टर मोरे के वो चार शब्द ससून के गलियारों से निकलकर पूरे रास्ते वैशाली कदम के साथ लौटे। एक्सप्रेसवे के घाट उतरते हुए, हर मोड़ पर, वही चार शब्द उसके भीतर हथौड़े की तरह बजते रहे।

अब उसके पास सिर्फ़ एक शक नहीं था। उसके पास तीस साल के एक तजुर्बेकार सर्जन की राय थी, कि केयूर मलपानी की मौत हादसा नहीं थी। पर वैशाली जानती थी, थाने की सीढ़ियाँ चढ़ते ही ये सच सबसे पहले किस दीवार से टकराने वाला है।

लोनावला रूरल थाना। दोपहर की सुस्त, बोझिल धूप। और सीनियर इंस्पेक्टर सूर्यकांत गावडे के केबिन का वो शीशे वाला दरवाज़ा, जिसके पार वैशाली को पहले ही तलब कर लिया गया था।

"आओ कदम, बैठो। सुना है तुम आज सुबह-सुबह ससून तक हो आईं? पोस्टमॉर्टम कक्ष में? किसकी इजाज़त से, कदम? केस तो कल ही बंद हो चुका था।"

"सर, बंद नहीं हुआ था। मैंने सिर्फ़ शरीर एक बार अपनी आँखों से देखना चाहा था। और सर... जो मैंने वहाँ देखा, वो इस 'हादसे' वाली कहानी को पूरी तरह पलट देता है।"

"क्या पलट देता है, कदम? क्या देखा तुमने वहाँ?"

"डॉक्टर मोरे की राय, सर। केयूर की कलाई पर किसी मज़बूत मर्द की पकड़ का ताज़ा निशान। और दोनों हथेलियों में बचाव के गहरे ज़ख़्म, नाख़ून जड़ से उखड़े हुए। सर, वो लड़का आख़िरी साँस तक लड़ा है। किसी ने उसे धकेला है।"

"मोरे... एक पोस्टमॉर्टम सर्जन की 'राय', कदम। सिर्फ़ राय। और पंचनामे में क्या लिखा है? हादसा। मौक़े की इकलौती गवाह क्या कहती है? हादसा। पूरे बुर्ज पर वो लड़का और उसकी मंगेतर, बस दो लोग थे। किसी ने कोई धक्का देखा? नहीं।"

"पर सर, वो पकड़ का निशान, वो ज़ख़्म..."

"निशान गिरते वक़्त भी आ सकते हैं, कदम। चट्टानें हैं, झाड़ियाँ हैं, सौ फुट की सीधी खाई है। अदालत में एक होशियार वकील इस 'राय' के परखच्चे उड़ा देगा। तुम्हारे पास एक भी गवाह नहीं, एक भी।"

वैशाली चुप रही। वो जानती थी, गावडे बुरे आदमी नहीं थे। बस थके हुए थे। पैंतीस साल की नौकरी ने उन्हें सिखा दिया था कि तूफ़ान से भिड़ने से बेहतर है, वक़्त रहते सिर झुका लेना।

"कदम, सुन मेरी बात। ये बड़े बिल्डर का इकलौता बेटा है। ऊपर से लगातार फ़ोन आ रहे हैं, डीएसपी ऑफ़िस से, नेताओं के आदमियों से। मीडिया की गाड़ियाँ थाने के बाहर खड़ी हैं। ऐसे में अगर हमने 'क़त्ल' का शोर मचाया और साबित न कर पाए... तो तेरी और मेरी, दोनों की वर्दी उतर जाएगी।"

"इसलिए मेरी मान। फ़ाइल पर 'आकस्मिक मृत्यु' लिख, नीचे दस्तख़त कर, और घर जा। ये लोनावला रूरल है, कदम। यहाँ पहाड़ों से लोग गिरते हैं। यहाँ साज़िशें नहीं रची जातीं।"

गावडे ने बंद फ़ाइल वैशाली की तरफ़ सरका दी। वैशाली ने उसे उठाया, और एक पल उस ख़ाली दस्तख़त वाली लाइन को देखा। फिर धीरे से फ़ाइल वापस मेज़ पर रख दी। बिना दस्तख़त किए।

"सर, आप ठीक कहते हैं। सबूत के बिना मैं इस पर 'क़त्ल' नहीं लिखूँगी। पर जब तक मेरा ज़मीर मुतमइन न हो जाए, मैं इस पर 'हादसा' भी नहीं लिखूँगी। मुझे बस दो दिन दे दीजिए, सर। सिर्फ़ दो दिन। उसके बाद जो आप कहेंगे, वही लिखूँगी।"

गावडे ने एक लंबी, थकी हुई साँस छोड़ी। हाँ भी नहीं कही, ना भी नहीं। बस नज़रें फेर लीं। और वैशाली के लिए, इसी ख़ामोशी में उसके दो दिन छुपे थे।

उस मौत के हर सवाल की जड़ पिया मित्तल थी। और जिस पिया के आँसुओं पर वैशाली को शक था, उसकी कहानी बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। उस भोर से कई महीने पीछे। एक ऐसी शाम, जिसे दुनिया एक ख़ुशी का जश्न कहती थी।

पुणे का एक आलीशान बंगला, सगाई की रौशनी में नहाया हुआ। फूलों की महक, रिश्तेदारों की भीड़, शहनाई की गूँज। और बीचोंबीच, एक सोने के फ़्रेम में सजी पिया। बाहर से एक शहज़ादी। और भीतर से... एक क़ैदी।

"अरे वाह, क्या जोड़ी है! देखिए, मलपानी साहब का इकलौता बेटा, केयूर। पूरे पुणे में उनके बनाए हुए टावर खड़े हैं। और मेरी पिया, उस घर की लक्ष्मी बनकर जाएगी। भई, क़िस्मत हो तो ऐसी।"

विनोद मित्तल की छाती फूली नहीं समा रही थी। बरसों की स्टेटस की भूख, आज इस एक रिश्ते से मिटने वाली थी। बेटी की आँखों में क्या तैर रहा है, ये देखने की फ़ुर्सत उन्हें नहीं थी।

"पिया, बेटा, ये मुँह क्यों लटका है? अरे, ज़रा मुस्कुरा। फ़ोटोग्राफ़र कब से इंतज़ार कर रहा है। पूरा समाज देख रहा है तुझे आज।"

"पापा, मुझे... मुझे बस थोड़ा और वक़्त चाहिए था। इतनी जल्दी सब कुछ..."

"वक़्त? किस बात का वक़्त, पिया? लड़का सोने जैसा है। घर, पैसा, इज़्ज़त, संस्कार, सब कुछ है उसमें। लोग तरसते हैं ऐसे रिश्ते के लिए, और तू नख़रे कर रही है। देख बेटा, शादी के बाद सब अपने आप ठीक हो जाता है। प्यार अपने आप हो जाता है।"

प्यार अपने आप हो जाता है। ... विनोद को नहीं पता था कि उनकी बेटी का दिल पहले ही किसी और के नाम लिखा जा चुका है। और वो 'कोई और' आज इस भीड़ में कहीं नहीं था। फिर भी पिया की आँखें बार-बार दरवाज़े की तरफ़ उसी को ढूँढ रही थीं।

"चल अब, देर मत कर। अंगूठी पहना उसे। केयूर बेटा कब से हाथ बढ़ाए खड़ा है।"

पिया ने काँपते हाथों से अंगूठी उठाई। सामने केयूर खड़ा था, आँखों में एक भोला, भरोसे से भरा प्यार लिए, हाथ आगे बढ़ाए। वो इतनी सच्चाई से मुस्कुरा रहा था कि पिया की रूह एक पल को थरथरा गई। उसे नहीं पता था कि जिस लड़की को वो अपनी पूरी दुनिया बनाने चला है, उसका मन कहीं और, किसी और के पास गिरवी पड़ा है।

अंगूठी केयूर की उँगली में सरकी। तालियाँ गूँजीं, फूल बरसे, कैमरों की चमक तेज़ हो गई। और पिया के होंठों पर वो पहली, सधी हुई, झूठी मुस्कान उभरी। वही मुस्कान, जिसे महीनों बाद वैशाली कदम एक पल में रुक जाते आँसू में पहचानने वाली थी।

तभी, पिया के दुपट्टे के नीचे, कमर से बँधा एक दूसरा फ़ोन धीरे से थरथराया। शहनाई और तालियों के शोर में, उस थरथराहट को किसी ने नहीं सुना। सिवाय पिया के।

एक चुराई हुई नज़र स्क्रीन पर पड़ी। एक ही लाइन चमक रही थी। "तू सिर्फ़ मेरी है, पिया। ये अंगूठी कुछ नहीं बदलती।" भेजने वाले का नाम सेव नहीं था। बस एक नीला निशान था। ... एक लहर। समुद्र।

पिया ने फ़ोन वापस छुपा लिया, और कैमरे की तरफ़ मुड़कर और चौड़ा मुस्कुरा दी। उस रात, सगाई की उस रौशनी में, एक शादी की बुनियाद पड़ी। और उसी के साथ, बहुत चुपके से, एक और चीज़ की भी। ... एक साज़िश की।

अगली भोर। गावडे की दी हुई ख़ामोशी अभी ताज़ा थी, और वैशाली दुबारा लोहागढ़ की तराई में खड़ी थी। अकेली। वर्दी में नहीं, एक ट्रेकर की तरह। एक हाथ में स्टॉपवॉच, और ज़हन में पिया का दिया हुआ बयान।

पिया की गवाही साफ़ थी। वो और केयूर सुबह सवा चार बजे मलावली स्टेशन पहुँचे, और अँधेरे में ही किले की चढ़ाई शुरू कर दी, ताकि सूरज उगने से पहले बुर्ज पर पहुँच जाएँ। और सवा छह बजे, विंचू काटा बुर्ज पर वो 'हादसा' हुआ। पूरे दो घंटे। पिया की पूरी कहानी इन्हीं दो घंटों में बंद थी।

"चलो केयूर... आज तेरे ही रास्ते पर, तेरी ही रफ़्तार से चलते हैं। देखते हैं, ये दो घंटे सच बोलते हैं या झूठ।"

वैशाली ने स्टॉपवॉच का बटन दबाया और चढ़ाई शुरू कर दी। एक तेज़, कसी हुई चाल, ठीक वैसी जैसी एक तंदुरुस्त नौजवान की होती है। पत्थर की सीढ़ियाँ, गणेश दरवाज़ा, हनुमान दरवाज़ा, और फिर वो चौड़ा पठार।

मलावली से विंचू काटा बुर्ज तक, बिना कहीं रुके, वैशाली को लगे पूरे चालीस मिनट। और एक आम जोड़े की रफ़्तार से, बीच-बीच में रुकते, फ़ोटो खींचते, साँस लेते, ये आराम से पचास मिनट का रास्ता था। इससे ज़्यादा एक पल का नहीं।

"सवा चार बजे मलावली से चले... एक आम रफ़्तार से पचास मिनट की चढ़ाई... मतलब वो दोनों पाँच बजे के आसपास बुर्ज पर पहुँच गए होंगे। और हादसा हुआ सवा छह बजे। ... तो ये बीच का पूरा एक घंटा? ऊपर, इस सुनसान बुर्ज पर, अँधेरे और ठंड में, वो पूरा एक घंटा किया क्या?"

एक घंटा। ... पिया के बयान में जिसका कोई ज़िक्र ही नहीं था। वो कहती थी, वो पहुँचे, सेल्फ़ी लेने लगे, और अचानक केयूर का पैर फिसल गया। जैसे सब कुछ चंद मिनटों में निपट गया हो। पर पहाड़ का हिसाब कुछ और ही कह रहा था।

एक पूरा घंटा, जो किसी की गवाही में मौजूद ही नहीं था। वैशाली की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। वो ख़ाली एक घंटा किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा था। ... या किसी के आने का।

वो ग़ायब एक घंटा वैशाली के भीतर एक काँटे की तरह चुभ गया। अगर पिया और केयूर सामने वाली सीधी पगडंडी से आए थे, तो उस एक घंटे में इस सुनसान बुर्ज तक और कौन पहुँच सकता था? और किस रास्ते से?

वैशाली ने बुर्ज के सामने वाली जानी-पहचानी पगडंडी छोड़ दी। और उस तरफ़ बढ़ी, जिधर आम ट्रेकर कभी नहीं जाते। बुर्ज के ऐन पिछवाड़े, झाड़ियों और नुकीली चट्टानों के पीछे।

और वहाँ, घनी झाड़ियों की ओट में, उसे वो मिला जिसका उसे शक था। एक दूसरी पगडंडी। पतली, टेढ़ी-मेढ़ी, पहाड़ के पिछले ढलान से चुपचाप ऊपर चढ़ती हुई। एक ऐसा रास्ता, जिससे कोई किसी की नज़र में आए बिना, सीधे बुर्ज के पीछे तक पहुँच सकता था।

मॉनसून की पहली बौछारों ने मिट्टी को गीला और नरम कर रखा था। वैशाली उस पिछली पगडंडी पर धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी, हर एक क़दम पर ज़मीन को किसी किताब की तरह पढ़ती हुई।

और फिर, अचानक, वो ठिठक गई। पगडंडी के एक मोड़ पर, गीली मिट्टी में कुछ उभरा हुआ था। इतना साफ़, इतना ताज़ा, कि वैशाली की साँस एक पल को थम गई।

"ये... ये तो..."

वैशाली घुटनों के बल बैठ गई। गीली मिट्टी में दो गहरी, समानांतर लकीरें धँसी थीं। कोई जूते का निशान नहीं। कोई पैदल चलने का निशान नहीं। ये किसी मोटरसाइकिल के टायर के निशान थे। बिल्कुल ताज़े। उसी सुबह के।

एक मोटरसाइकिल। ... इस छुपी हुई पिछली पगडंडी पर। ठीक उसी भोर। जबकि पिया की गवाही क़सम खाकर कहती थी, वो और केयूर पैदल आए थे, और पूरे किले पर वो सिर्फ़ दो लोग थे।

वैशाली को नहीं पता था कि ये बाइक किसकी थी। पर हम जानते थे। वो काली हुडी। कानों में लगे वो हेडफ़ोन। वो चेहराविहीन परछाईं, जो चीड़ के पेड़ों के पीछे से उस भोर में इसी पगडंडी से ऊपर आई थी।

वैशाली ने काँपते हाथों से फ़ोन निकाला और उन निशानों की तस्वीरें खींचीं। दो जूतों के निशान के बाद, अब ये तीसरा सुराग़। उस सुनसान पहाड़ की गीली मिट्टी में जमे वो टायर एक ही बात चीख़-चीख़कर कह रहे थे। ... कि उस भोर, उस बुर्ज पर, पिया और केयूर अकेले नहीं थे। एक तीसरा भी था। और वो... पैदल नहीं आया था।

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