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अध्याय 29 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

दोषी क़रार

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

कठघरे की ठंडी लकड़ी थामे पिया और चिराग खड़े थे, और कमरा नंबर छह में इतनी गहरी ख़ामोशी थी कि छत के पंखे की घरघराहट भी अब चीख़ जैसी लगने लगी थी। जज ने सामने रखी मोटी फ़ाइल का पहला पन्ना पलटा, चश्मा उँगली से ठीक किया, और सिर उठाकर एक बार पूरे कमरे को देखा।

जज ने धीमे स्वर में पूछा, "अभियोजन और बचाव, दोनों पक्ष तैयार हैं?" गैलरी में एक सुई गिरने की आवाज़ भी अब सुनी जा सकती थी।

"अभियोजन तैयार है, योर ऑनर।"

बचाव की मेज़ से सिर्फ़ एक हल्की-सी हामी आई, और जज ने फ़ाइल पर नज़र गड़ाकर, नापे-तुले शब्दों में अपना फ़ैसला पढ़ना शुरू किया।

"ये अदालत," उसकी आवाज़ पत्थर पर पानी की तरह ठहर-ठहरकर गिर रही थी, "राज्य बनाम पिया मित्तल एवं चिराग भाटिया के मुक़दमे में अपना निर्णय सुनाती है। इस अदालत के सामने एक ही सवाल है, क्या केयूर मलपानी की मौत एक ट्रेकिंग हादसा थी... या एक सोची-समझी साज़िश।"

कठघरे में पिया की नज़र फ़र्श पर गड़ी थी, और चिराग सीधा खड़ा था, ठोड़ी हल्की-सी उठी हुई, जैसे आज भी उसे यक़ीन हो कि काग़ज़ पर उसकी अलीबाई उसे बचा ले जाएगी।

गैलरी की पिछली क़तार में वैशाली बैठी थी, हाथ गोद में इतने कसकर जुड़े कि उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं। महीनों की हर उनींदी रात, हर ताना, हर बंद दरवाज़ा, सब आज उस एक कुर्सी पर बैठे आदमी की आवाज़ में सिमट आया था।

"अभियोजन ने इस अदालत के सामने परिस्थितिजन्य सबूतों की एक ज़ंजीर रखी है," जज ने कहा, "और ये अदालत उस ज़ंजीर की हर एक कड़ी को अलग से परखेगी, फिर पूरी माला को एक साथ।"

"पहली कड़ी," जज ने पढ़ा, "जाँच अधिकारी ने घटना की सुबह खाई के किनारे एक तीसरे व्यक्ति के ताज़ा जूतों के निशान दर्ज किए। जबकि अभियुक्त पिया मित्तल की अपनी गवाही कहती है कि पहाड़ पर केवल वो और मृतक मौजूद थे। ये पहली दरार थी, और यहीं से सच रिसना शुरू हुआ।"

वैशाली की आँखों के सामने वो पहली भोर तैर गई, लोहागढ़ की धुंध, विंचू काटा बुर्ज, और किनारे की गीली मिट्टी पर वो दो अजनबी निशान, जिन्हें उस दिन बाक़ी सब ने अनदेखा कर दिया था।

"दूसरी और तीसरी कड़ी," आवाज़ आगे बढ़ी, "अभियुक्त की बताई समय-रेखा में एक पूरा घंटा ग़ायब है, और उसी घंटे में लोहागढ़ के मलावली टावर पर दो छुपे हुए बरनर नंबर सक्रिय पाए गए, एक पिया के नाम पर, एक चिराग के नाम पर, दोनों एक ही आधे घंटे में, ठीक उसी टावर पर, जहाँ अभियुक्तों के अनुसार उनमें से कोई मौजूद ही नहीं था।"

"चौथी कड़ी," जज ने काग़ज़ पलटा, "भाजे गाँव के पास एक पुलिया से बरामद वो काली हुडी, जिस पर अभियुक्त चिराग भाटिया के पसीने का डीएनए और मृतक केयूर मलपानी के बाल, दोनों एक साथ मौजूद थे। फ़ोरेंसिक कहती है, ये दोनों आदमी उस सुबह उतने ही क़रीब थे, जितने दो अजनबी कभी नहीं होते।"

कमरे में हवा भारी होती जा रही थी। जज ने अगला पन्ना उठाया, और उसकी आवाज़ एक पायदान और नीची, और गहरी हो गई।

"पाँचवीं कड़ी, और शायद सबसे भारी," जज ने कहा, "साइबर फ़ोरेंसिक द्वारा मिटाई गई अवस्था से वापस निकाली गई वो चैट, जिनमें बार-बार एक ही कोड दोहराया गया, समुद्र... पंछी... ट्रेक वाला दिन।"

"इन्हीं में एक संदेश," आवाज़ एक पल रुकी, फिर पढ़ी, "केयूर मलपानी के गिरने के ठीक एक घंटे बाद भेजा गया, समुद्र शांत हो गया, अब हम आज़ाद हैं। बचाव कहता है ये दो प्रेमियों की निजी भाषा है। पर ये अदालत पूछती है, कौन-सा प्यार अपने आज़ाद होने का जश्न किसी की मौत के ठीक एक घंटे बाद मनाता है।"

"बचाव पक्ष का ये तर्क कि कोड शब्द महज़ मासूम इश्क़ थे," जज ने कहा, "इस अदालत को स्वीकार नहीं, क्योंकि इन्हीं चैट में बुर्ज के पिछवाड़े की उस टूटी, बंद सीढ़ी का बारीक ब्यौरा है, जिसे केवल वही जान सकता था जो उस जगह ख़ुद खड़ा हुआ हो।"

"छठी कड़ी, भौतिकी," जज की उँगली एक चार्ट पर टिकी। "पुलिस ने मृतक के ठीक वज़न का पुतला उसी बुर्ज से बार-बार गिराया, और वो हर बार सिर्फ़ छह मीटर दूर, ढलान की पहली चट्टान पर आ रुका। पर केयूर मलपानी का शरीर उससे बाईस मीटर और आगे, खाई के भीतर मिला। इतनी दूरी सिर्फ़ फिसलने से तय नहीं होती, इसके लिए एक ज़ोरदार धक्का चाहिए।"

"पोस्टमॉर्टम सर्जन की गवाही इसकी पुष्टि करती है," जज ने आगे पढ़ा, "कलाई पर किसी मज़बूत हाथ की पकड़ का नीला निशान, और हथेलियों पर जान बचाने की आख़िरी जद्दोजहद के ख़रोंच। ये किसी अपने आप गिरते इंसान के निशान नहीं, किसी खींचे और धकेले गए इंसान के निशान हैं।"

"बचाव ने अभियुक्त पिया मित्तल को एक सदमे में डूबी बेबस मंगेतर के रूप में पेश किया," जज ने कहा, "पर वही मंगेतर, जिसके छुपे फ़ोन ने उसी टावर पर उसी मिनट पिंग किया जिस मिनट उसका होने वाला पति गिरा, और जिसने मौत के एक घंटे बाद आज़ादी का जश्न मनाया, इस अदालत की नज़र में सदमे में डूबी नहीं, इस साज़िश में बराबर की शरीक है।"

"और सातवीं कड़ी," जज ने कहा, "वो दोस्त जो सब जानता था। सरकारी गवाह अमेय गोखले ने इसी कठघरे में खड़े होकर, अपने डर को क़बूल करते हुए, वो सच कहा जिसे इस अदालत ने विश्वसनीय पाया, कि जन्मदिन का वो ट्रेक जान-बूझकर चुना गया था, और ये हादसा नहीं, हादसा बनाया जाना था।"

"अलग-अलग रखकर हर एक कड़ी को शक से देखा जा सकता है," जज ने फ़ाइल का वो हिस्सा बंद करने से पहले कहा, "पर जब जूतों के निशान, ग़ायब घंटा, टावर डंप, हुडी का डीएनए, रिकवर की गई चैट, पुतले की भौतिकी, और एक गवाह का बयान, सब एक ही दिशा में इशारा करें, तो वो इत्तिफ़ाक़ नहीं रह जाता। वो सच बन जाता है।"

जज ने चश्मा उतारा, एक पल आँखें मलीं, और फिर वो वाक्य कहा जिसके लिए पूरा शहर महीनों से साँस रोके बैठा था।

"ये अदालत पाती है कि पिया मित्तल और चिराग भाटिया ने मिलकर, एक सोची-समझी साज़िश के तहत, केयूर मलपानी की हत्या की। भारतीय दंड संहिता की धारा तीन सौ दो, और धारा एक सौ बीस बी के अंतर्गत, ये अदालत दोनों अभियुक्तों को दोषी क़रार देती है।"

दोषी। वो एक शब्द कमरा नंबर छह की दीवारों से टकराकर लौटा, और गैलरी में एक लहर दौड़ गई, किसी ने साँस छोड़ी, किसी ने मुँह पर हाथ रख लिया, कोई काग़ज़ पर तेज़ी से लिखने लगा।

और फिर एक आवाज़, जो महीनों से एक माँ के सीने में बंद थी, बाहर फूट पड़ी। सुष्मा घुटनों के बल गैलरी की बेंच के सहारे झुक गई, केयूर की तस्वीर सीने से चिपकाए, और उसका रोना राहत और ग़म, दोनों से एक साथ भरा हुआ था।

"सुन लिया न बेटा... सुन लिया आज सबने... तू गिरा नहीं था मेरे लाल, तुझे... तुझे गिराया गया था।"

नरेश ने काँपते हाथों से अपनी पत्नी के कंधे थाम लिए, ख़ुद की आँखें बहती हुई, पर होंठ भिंचे हुए, जैसे बरसों का बाँधा हुआ बाँध आज एक साथ टूट रहा हो।

गैलरी में बैठे अजनबी भी चुप थे, कुछ की आँखें नम, कुछ बस उस माँ को देखते रह गए जो अपने बेटे की तस्वीर से लिपटी बिलख रही थी। बाहर गलियारे में किसी ने चिल्लाकर फ़ैसला दोहराया, और दरवाज़े की दरार से ख़बर पूरी इमारत में आग की तरह फैल गई, दोषी... दोनों दोषी।

गैलरी की पिछली क़तार में वैशाली हिली तक नहीं। बस उसकी आँखें धीरे-धीरे भर आईं, और एक बूँद, जिसे वो महीनों से रोके बैठी थी, आख़िरकार बिना इजाज़त उसके गाल पर लुढ़क गई।

"कदम... ये जीत आपकी है। इस फ़ाइल को खुला आपने रखा था, हम सब तो बहुत बाद में आए।"

वैशाली ने कुछ नहीं कहा, बस सिर हल्के से हिलाया, और उसकी नज़र गैलरी की उस क़तार पर टिक गई जहाँ एक माँ अब भी अपने बेटे की तस्वीर से लिपटी हुई थी।

कठघरे में पिया और चिराग अब भी खड़े थे, पर वो दोनों जैसे एक-दूसरे से कोसों दूर हो गए थे, बीच में सिर्फ़ एक ठंडी, बँटी हुई ख़ामोशी।

चिराग का वो पुराना आत्मविश्वास, वो मुस्कुराता हुआ ख़म, आज पहली बार पूरी तरह उतर गया था। उसने एक बार पिया की तरफ़ देखा, फिर नज़र फेर ली, जैसे अब इल्ज़ाम भी आपस में बाँटने लायक़ कुछ बचा न हो।

"मैंने कहा था न पिया... अब पीछे कोई रास्ता नहीं बचा। सिर्फ़ एक तारीख़ थी हमारे पास, और वो भी आज ख़त्म हो गई।"

पर पिया ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं। सिपाही जब उसे कठघरे से बाहर ले जाने लगे, तो उसका वो रटा हुआ ग़म, वो पत्थर का मुखौटा, आख़िरकार पूरी तरह उतर गया, और नीचे सिर्फ़ एक थका, टूटा हुआ चेहरा बचा।

जाते-जाते उसकी नज़र गैलरी में सुष्मा पर जा पड़ी, उस माँ पर, जिसके बेटे का जन्मदिन उसने उसकी बरसी बना दिया था। एक पल के लिए पिया के क़दम ठिठके, और उसने काँपते होंठों से सिर्फ़ इतना कहा।

"मुझे पता है आंटी... माफ़ी की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं आपसे माफ़ी नहीं माँग रही... बस इतना कह रही हूँ, मैं जानती हूँ, मैंने क्या किया है।"

सुष्मा ने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपने बेटे की तस्वीर को और कसकर सीने से लगा लिया, और अपनी नज़र पिया से हटाकर कहीं दूर, खिड़की के पार लोनावला के धुँधले पहाड़ों की तरफ़ टिका दी।

सिपाही पिया को ले गए, और इस बार भी उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर उसके क़दम अब पहले जैसे अकड़े हुए नहीं, टूटे हुए थे।

"हो गया केयूर... तेरी माँ से किया वो वादा, आख़िरकार पूरा हो गया।"

जाते हुए वैशाली एक पल के लिए सुष्मा की क़तार के पास ठिठकी। सुष्मा ने कुछ कहा नहीं, बस अपना काँपता हाथ उठाकर वैशाली की कलाई पर रख दिया, और उस एक ख़ामोश छुअन में महीनों का शुक्रिया और भरोसा, दोनों एक साथ उतर आए।

जज ने हथौड़ी उठाई, पर मारने से पहले एक पल रुका। "दोषसिद्धि दर्ज की जाती है। सज़ा की मात्रा पर बहस," उसने कहा, "कल सुबह होगी। तब तक दोनों दोषी न्यायिक हिरासत में रहेंगे।"

हथौड़ी की वो एक चोट पूरे कमरे में गूँज गई। दोषी तो आज तय हो गया था, पर उनकी बाक़ी पूरी ज़िंदगी की क़ीमत, वो एक आख़िरी फ़ैसला, अब भी बाक़ी था... कल की उस सुबह के लिए, जिस पर अब पूरा शहर एक बार फिर से टँगने वाला था।

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