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अध्याय 17 / 30 पढ़ने में 10 मिनट

दो कमरे, दो झूठ

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

चौदह दिन की हिरासत का पहला दिन, थाने के तंग गलियारे में दो दरवाज़े एक-दूसरे के बिल्कुल आमने-सामने खुलते थे, कमरा एक, कमरा दो, बीच में सिर्फ़ एक पतली दीवार और एक पुराना, चरमराता पंखा। वैशाली ने आज सुबह दोनों ताले जान-बूझकर अलग-अलग खुलवाए थे, महीनों पुरानी एक तरकीब आज़माने के लिए। कल तक जो मीडिया की भीड़ बाहर बैरिकेड तोड़ रही थी, आज वो चली गई थी, और भीतर बस चार दीवारों का सन्नाटा बचा था।

पिया को कमरा एक में बिठाया गया, चिराग को कमरा दो में, इतनी दूर कि आवाज़ न पहुँचे, इतने पास कि हर कोई जानता रहे दूसरा अभी भी वहीं है, दीवार के उस पार। यही तरकीब थी, हर एक को यक़ीन दिलाना कि दूसरा टूट चुका है।

बाहर मानसून की हल्की बूँदाबाँदी छत के टीन पर टपक रही थी, और भीतर दीवार पर टंगी घड़ी की सुई हर टिक के साथ याद दिला रही थी, चौदह दिन में से एक दिन अभी-अभी शुरू हुआ था। जज की चेतावनी अभी भी वैशाली के कानों में ताज़ा थी, सीधा सबूत लाओ, वरना केस टिकेगा नहीं।

गलियारे के दूसरे सिरे पर सीनियर इंस्पेक्टर गावडे शीशे की खिड़की से देख रहे थे, हाथ में चाय का ठंडा होता कप लिए, वही अफ़सर जिन्होंने कभी फ़ाइल बंद करने का हुक्म दिया था। आज वो कुछ नहीं बोले, बस देखते रहे कि वैशाली की तरकीब काम करती है या नहीं।

थाने की भाषा में इस तरकीब को 'दो कमरे, दो सच' कहा जाता है, हर मुजरिम को यक़ीन दिलाना कि दूसरा साथी टूट चुका है, जबकि हक़ीक़त में दोनों सिर्फ़ अपने-अपने डर से लड़ रहे होते हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि इस केस में दोनों तरफ़ कभी इश्क़ भी था, और इश्क़ का डर सबसे तेज़ भागता है।

वैशाली पहले कमरा एक में दाख़िल हुई, हाथ में एक पतली फ़ाइल लिए, जिसमें असल में सिर्फ़ पुराने काग़ज़ थे, कुछ नया नहीं। पर पिया के लिए वो फ़ाइल एक ख़तरे की घंटी जैसी दिखनी चाहिए थी।

"बैठो, पिया।" "चौदह दिन लंबे होते हैं, ख़ासकर जब बग़ल के कमरे में कोई तुम्हारे बारे में बोल रहा हो।"

पिया का चेहरा वही घिसा-पिटा ग़म था, आँखें नीचे, कंधे झुके, पर उसकी उँगलियाँ मेज़ के किनारे को कस कर पकड़े हुए थीं, जैसे कोई चीज़ अंदर से उसे सँभाले हुए है।

"मैंने पहले भी कहा है, मैडम... मुझे कुछ नहीं पता। हम दोनों अकेले थे। केयूर फिसला, बस।" "आप बार-बार वही सवाल क्यों पूछती हैं?"

"क्योंकि हर बार तुम्हारा जवाब शब्द-दर-शब्द वैसा ही आता है, पिया।" "सच बोलने वाला इंसान थोड़ा इधर-उधर होता है... तुम बिल्कुल स्क्रिप्ट पढ़ती हो।"

पिया की साँस एक पल को अटकी। वैशाली ने वो पल देख लिया, पर चेहरे पर कुछ ज़ाहिर नहीं किया।

वैशाली के कानों में सुष्मा की आवाज़ अब भी बजती थी, "तुम मत रुकना बेटी, तुम्हीं मेरे केयूर की आवाज़ हो।" और उसी आवाज़ के सहारे उसने अपनी अगली चाल चली, धीमी, हिसाब लगाई हुई, बेरहम नहीं, पर बिना झिझक।

"बग़ल के कमरे में चिराग बैठा है, पिया।" "और वो आज बहुत बात कर रहा है। तुम्हें नहीं लगता, अब वक़्त है कि तुम भी अपनी तरफ़ से कुछ कहो, इससे पहले कि उसकी बात ही आख़िरी सच बन जाए?"

ये झूठ था, चिराग ने अभी एक लफ़्ज़ नहीं बोला था। पर वैशाली जानती थी, डर सच से कहीं ज़्यादा तेज़ भागता है।

"उसने... उसने क्या कहा?" "मैडम, वो झूठ बोल रहा होगा। वो हमेशा... वो बहुत होशियार है।"

पहली बार, महीनों में पहली बार, पिया ने चिराग के बारे में कोई बात कही थी जो ग़म का हिस्सा नहीं थी, डर का हिस्सा थी।

"मैंने अभी तक ये नहीं कहा कि उसने क्या कहा, पिया।" "पर तुमने अभी मान लिया कि उसने कुछ कहा होगा। दिलचस्प है।"

पिया का चेहरा एक पल को सफ़ेद पड़ गया, फिर उसने जल्दी से ख़ुद को सँभाला, आँखें फिर नीचे झुका लीं, ग़म का मुखौटा वापस चढ़ाने की कोशिश में।

"मुझे कुछ नहीं कहना, मैडम। मेरे वक़ील ने मना किया है।" "आप मुझसे और सवाल मत पूछिए।"

"मैडम, मेरा भी घर बर्बाद हो गया... मेरा भी नाम मिट्टी में मिल गया।" "...मैं भी तो हार गई हूँ, इसमें। आप सिर्फ़ मुझे ही मुजरिम की तरह क्यों देखती हैं?"

"मैं तुम्हें मुजरिम की तरह नहीं देखती, पिया, मैं तुम्हें सबूत की तरह देखती हूँ।" "और सबूत रोता नहीं, टूटता है। आज नहीं तो कल।"

वैशाली उठ खड़ी हुई, फ़ाइल बंद करके, वैसे ही जैसे कोई शतरंज की चाल के बाद बोर्ड से हट जाता है, अगली चाल का इंतज़ार करते हुए। कमरा एक का दरवाज़ा बंद हुआ, कमरा दो का दरवाज़ा खुला।

कमरा दो में चिराग कुर्सी पर पीछे झुका बैठा था, टाँगें फैलाई हुईं, जैसे ये पूछताछ नहीं, कोई मामूली फ़ॉर्मैलिटी हो। उसकी आँखों में वो पुरानी मुस्कान अब भी थी, पर उसके किनारे थोड़े थके हुए लग रहे थे, और उसका एक पैर मेज़ के नीचे बेवजह हिल रहा था।

"चौदह दिन हो गए, चिराग। और तुम अब भी वही तीन लाइनें दोहरा रहे हो।" "मैं पुणे में था, पिया बचपन की दोस्त है, मुझसे बात करो मेरे वक़ील के ज़रिए।"

"क्योंकि यही सच है, मैडम।" "आप जितनी बार पूछेंगी, जवाब उतना ही एक जैसा मिलेगा। सच बदलता नहीं है।"

बिल्कुल वही लफ़्ज़ जो वैशाली ने अभी पिया से कहे थे, सच बदलता नहीं, पर पिया का सच रटा हुआ लगता था और चिराग का सच घिसा-पिटा।

"मैडम, मेरे पिता के वक़ील ने बड़े-बड़े केस जितवाए हैं।" "आपकी ये तरकीबें फ़िल्मों में अच्छी लगती हैं, असल ज़िंदगी में नहीं।"

"शायद। पर फ़िल्मों में भी, और असल ज़िंदगी में भी, एक चीज़ एक जैसी होती है।" "जो बेगुनाह होता है, वो जल्दी थकता नहीं। तुम थके हुए लग रहे हो, चिराग।"

"पिया बग़ल के कमरे में है, चिराग।" "और आज वो बहुत कुछ बता रही है, तुम्हारे बारे में, उस सुबह के बारे में। तुम्हें नहीं लगता, अब अकेले सारा बोझ उठाने का कोई मतलब नहीं?"

चिराग की मुस्कान एक पल को ठहर गई, ठीक वहीं, आँखों तक नहीं पहुँची। पहली बार उसकी टाँगें फैली हुई नहीं रहीं, वो थोड़ा आगे झुक आया।

"वो क्या बोल रही है?" "...मेरा मतलब है, वो कुछ बोल ही नहीं सकती, क्योंकि कहने को कुछ है ही नहीं।"

वो झिझक, वो आधा वाक्य जो उसने बीच में रोक लिया, वैशाली के कान में एक घंटी की तरह बजा।

"'कुछ है ही नहीं' कहने से पहले तुमने पूछा, 'वो क्या बोल रही है।'" "एक बेगुनाह आदमी को इसकी फ़िक्र नहीं होती कि उसकी 'बचपन की दोस्त' पुलिस को क्या बता रही है, चिराग।"

चिराग की उँगलियाँ मेज़ पर धीरे-धीरे टैप करने लगीं, वो पुरानी बेफ़िक्री की एक्टिंग अब पूरी तरह मेकअप की तरह उतर रही थी।

"मुझे वक़ील से बात करनी है, अभी।" "इस बातचीत का कोई मतलब नहीं जब तक वो साथ न हो।"

वैशाली ने सिर हिलाया, जैसे उसे यही उम्मीद थी, और दरवाज़ा खोलकर निकल गई। पर इस बार, उसने जो सुना था, वो पहले से कहीं ज़्यादा क़ीमती था, एक आदमी की झिझक, जो एक औरत की चिंता से मेल खा रही थी।

दस मिनट बाद वैशाली फिर कमरा एक में लौटी, इस बार हाथ में सचमुच कुछ लेकर, फ़ोरेंसिक लैब की एक पर्ची, जिस पर सिर्फ़ दो नंबर और दो तारीख़ें लिखी थीं, कुछ और नहीं, पर काग़ज़ का वज़न पिया की नज़र में उससे कहीं भारी था।

"पिया, एक बात बताओ।" "तुम्हारा फ़ोन किसने रीसेट किया, तुमने या चिराग ने?"

सवाल सीधा था, छोटा था, पर उसने कमरे की हवा बदल दी। पिया की आँखें पहली बार सीधे वैशाली की आँखों में उठीं।

"मुझे नहीं पता किसने... मेरा मतलब है, मेरा फ़ोन तो बस ख़राब हो गया था।" "मैंने कुछ रीसेट नहीं किया।"

"मैंने ये नहीं पूछा कि तुमने रीसेट किया या नहीं।" "मैंने पूछा, किसने किया। और तुम्हारा जवाब है, तुम्हें नहीं पता। तो फिर तुम कैसे जानती हो कि तुमने ख़ुद नहीं किया?"

पिया की साँस फिर अटकी, इस बार लंबी। मुखौटे के नीचे कुछ हिल गया।

"...चिराग ने कहा था, कोई निशान मत छोड़ना।" "मेरा मतलब, मैंने ऐसा कुछ नहीं सुना... मैं बस थक गई हूँ, मैडम।"

पिया की नज़र एक पल को दरवाज़े की तरफ़ भागी, जैसे उसे डर हो कि दीवार के उस पार कोई उसकी बात सुन ले। पर दीवार मोटी थी, और उसका डर, अब सिर्फ़ उसके अपने भीतर गूँज रहा था।

वो लफ़्ज़ हवा में लटक गए, "कोई निशान मत छोड़ना," लफ़्ज़ जो पिया ने अभी-अभी ख़ुद अपनी ज़ुबान से निकाले थे, फिर वापस निगलने की कोशिश की। पर एक बार बोला हुआ लफ़्ज़ वापस नहीं जाता।

"थकान सच बोलती है, पिया। झूठ को याद रखने में मेहनत लगती है।" "आराम करो। मैं वापस आऊँगी।"

गलियारे में वापस आकर वैशाली ने अपनी नोटबुक में सिर्फ़ तीन लफ़्ज़ लिखे, 'निशान, आदेश, इनकार,' कुछ ऐसा जो कल किसी और पूछताछ में काम आएगा। हर टूटा हुआ जुमला एक ईंट था, और वो धीरे-धीरे एक दीवार बना रही थी, ईंट दर ईंट, जो एक दिन इन दोनों को अलग कर देगी।

वैशाली सीधे कमरा दो में गई, इस बार बिना किसी झिझक के, पिया के लफ़्ज़ अभी भी उसके कानों में गूँज रहे थे।

"चिराग, पिया ने अभी बताया कि फ़ोन में कोई निशान न छोड़ने की बात किसी और ने कही थी।" "अंदाज़ा लगाओ, किसका नाम आया।"

ये आधा-झूठ था, वैशाली ने नाम नहीं लिया था, पिया ने भी सीधे नाम नहीं लिया था। पर चिराग के चेहरे पर जो उतरा, वो किसी बेगुनाह आदमी का चेहरा नहीं था।

"झूठ है, मैडम, बिल्कुल झूठ।" "अगर किसी ने फ़ोन साफ़ करने को कहा था, तो वो पिया थी, मैंने तो बस... मैंने तो बस वो किया जो उसने कहा।"

और वहीं, एक ही साँस में, चिराग भाटिया ने वो कर दिया जो महीनों से इन दोनों में से किसी ने नहीं किया था, अपने प्रेमी को बचाने के बजाय, ख़ुद को बचाना।

"...मेरा मतलब, मैं कुछ नहीं कह रहा।" "आप मुझे उलझा रही हैं, मैडम। मुझे वक़ील चाहिए, अभी के अभी।"

"आप ये मेरे ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, मैंने कुछ माना नहीं है।" "ये सिर्फ़ एक ग़लतफ़हमी है, मैडम, बस एक ग़लतफ़हमी।"

बहुत देर हो चुकी थी। वो लफ़्ज़ पहले ही हवा में तैर चुके थे, "जो उसने कहा," जो सीधे पिया की तरफ़ इशारा करते थे, ठीक वहीं जहाँ दस मिनट पहले पिया ने चिराग की तरफ़ इशारा किया था।

वैशाली धीरे से बाहर निकली, कमरा दो का दरवाज़ा बंद करते हुए, और एक पल के लिए दोनों बंद दरवाज़ों के बीच खड़ी रही, कमरा एक, कमरा दो, दो अलग-अलग कहानियाँ, जो अब एक-दूसरे को काटती थीं। पिया कहती थी, चिराग ने कहा था। चिराग कहता था, पिया ने कहा था। और वैशाली जानती थी, जिस पल इश्क़ ख़ुद को बचाना सीख जाता है, उसी पल एक साज़िश टूटना शुरू करती है। उसने जज की चेतावनी याद की, सीधा सबूत चाहिए, और सोचा, शायद ये पहली दरार ही वो पहला दस्तावेज़ है जो आख़िरकार अदालत में टिकेगा।

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