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अध्याय 15 / 30 पढ़ने में 11 मिनट

दो गिरफ़्तारियाँ

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

मजिस्ट्रेट के कमरे में क़लम की वो आख़िरी खरखराहट अभी थमी भी नहीं थी कि थाने के दूसरे छोर पर वैशाली का फ़ोन बज उठा। दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई, "वारंट तैयार है, कदम। दस्तख़त बस बाक़ी हैं।"

उस रात वैशाली ख़ुद अदालत जाकर दोनों वारंटों पर मजिस्ट्रेट की मुहर लगवा लाई, और फिर कुछ पल के लिए काग़ज़ को यूँ ही हाथ में थामे बैठी रही, जैसे महीनों का सारा वज़न आख़िर उन दो पन्नों में सिमट आया हो।

पर क़ानून का एक तक़ाज़ा अभी बाक़ी था। एक औरत को सूरज ढलने के बाद गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता, सिवाय बहुत ख़ास हालात के, इसलिए वैशाली ने रात भर इंतज़ार किया और सूरज की पहली किरण के साथ अपनी टीम को लेकर निकल पड़ी।

पुणे के एक पॉश इलाक़े में मित्तल परिवार का बंगला अभी नींद में डूबा था, जब पुलिस की दो गाड़ियाँ, बिना सायरन के, गली के मोड़ पर आकर रुकीं।

एक महिला कांस्टेबल वैशाली के साथ आगे बढ़ी, क़ानून का एक और तक़ाज़ा, कि किसी औरत को गिरफ़्तार करते वक़्त एक महिला अफ़सर का वहाँ मौजूद होना ज़रूरी है।

दरवाज़े पर दस्तक हुई। कुछ पल की ख़ामोशी, फिर अंदर क़दमों की आहट, और दरवाज़ा खुला। सामने पिया खड़ी थी, बालों में तेल, नाइटी पहने, जैसे अभी-अभी नींद से उठी हो, पर उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था।

"इतनी सुबह, इंस्पेक्टर साहिबा?" "कुछ नई बात मिल गई क्या?"

"पिया मित्तल?" "मैं तुम्हें भारतीय दंड संहिता की धारा तीन सौ दो और एक सौ बीस-बी के तहत गिरफ़्तार करने आई हूँ। क़त्ल, और क़त्ल की साज़िश।"

एक पल के लिए पिया का चेहरा बिल्कुल नहीं हिला। जैसे उसने ये लफ़्ज़ महीनों से अपने अंदर किसी दराज़ में बंद करके रखे हों, और आज बस वो दराज़ खुल गई हो।

"आपको ग़लतफ़हमी है, मैडम।" "मैं तो सिर्फ़... सिर्फ़ अपने मंगेतर को खो चुकी एक लड़की हूँ।"

"एक लड़की, जिसका दूसरा फ़ोन मलावली टावर पर ठीक उसी मिनट पिंग करता है जिस मिनट वो लड़का गिरता है।" "कपड़े बदल लो, पिया। तुम्हारे साथ एक महिला कांस्टेबल जाएगी।"

अंदर से एक दबी हुई सिसकी सुनाई दी, विनोद मित्तल दहलीज़ पर आ खड़े हुए, चेहरा राख जैसा सफ़ेद, और उनके पीछे एक साया दीवार थामे खड़ा था, जो शायद खड़ा भी नहीं रह पा रहा था।

पिया कुछ पल उस दहलीज़ पर रुकी, अपने पिता की तरफ़ देखा, फिर बिना कुछ कहे कमरे की तरफ़ मुड़ गई। महिला कांस्टेबल साये की तरह उसके पीछे गई।

दस मिनट बाद पिया बाहर आई, सलवार-कमीज़ में, बाल जूड़े में बँधे, चेहरा फिर से वही रटा हुआ नक़ाब पहन चुका था जो वैशाली महीनों से देखती आई थी।

इसी बीच तलाशी लेती एक कांस्टेबल को पिया की अलमारी में एक पुरानी डायरी मिली, जिसके आख़िरी पन्नों पर शादी की तैयारियों की फ़ेहरिस्त के बीच, हाशिये पर, बार-बार एक ही लफ़्ज़ उकेरा हुआ था, "समुद्र।" उस लफ़्ज़ को अब सिर्फ़ वैशाली और रुतुजा ही पढ़ पातीं, बाक़ी दुनिया के लिए वो अब भी बस एक मासूम डूडल था।

गली के मोड़ पर तब तक दो न्यूज़ वैन खड़ी हो चुकी थीं, किसी ने लीक कर दिया था। कैमरों की चमक ने सुबह के धुँधलके को चीर दिया, और पिया मित्तल, बिल्डर की बहू बनने वाली लड़की, अब सुर्ख़ियों में हथकड़ी के बिना, पर गाड़ी के अंदर हमेशा के लिए एक "आरोपी" बनकर बैठ गई।

गाड़ी में बैठते वक़्त एक आख़िरी बार पिया ने पीछे मुड़कर देखा, अपना घर, अपनी माँ की सिसकियाँ, अपने पिता की झुकी हुई गर्दन। फिर उसने आँखें बंद कर लीं, जैसे इस तस्वीर को हमेशा के लिए मिटाना चाहती हो।

गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए वैशाली ने अपना फ़ोन निकाला, अभी एक और काम बाक़ी था, जो गिरफ़्तारी की ख़बर लीक होते ही सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो गया था।

"हवलदार, अमेय गोखले के घर के बाहर आज से चौबीसों घंटे एक सिपाही तैनात करो।" "जिस पल ये गिरफ़्तारियाँ सुर्ख़ी बनेंगी, हमारा गवाह ही सबसे कमज़ोर कड़ी बन जाएगा।"

दूसरी तरफ़ से हामी भरी गई। वैशाली ने फ़ोन जेब में रखा और खिड़की से बाहर देखने लगी, एक गवाह को बचाना अब उसकी लड़ाई का उतना ही हिस्सा था जितना दो मुजरिमों को पकड़ना।

उसी वक़्त, पुणे के दूसरे छोर पर, एक पॉश अपार्टमेंट में चिराग भाटिया की सुबह एक अलग तरीक़े से शुरू हो चुकी थी। उसका फ़ोन लगातार बज रहा था, नोटिफ़िकेशन पर नोटिफ़िकेशन।

एक स्थानीय न्यूज़ चैनल का "ब्रेकिंग" अलर्ट स्क्रीन पर चमका, "लोहागढ़ हादसा केस, मंगेतर हिरासत में।" चिराग की उँगलियाँ फ़ोन पर जम गईं।

"नहीं... नहीं, अभी नहीं।" "पिया, फ़ोन उठाओ, पिया..."

उसने पिया का नंबर मिलाया, बार-बार, पर हर बार वही ठंडी, बेजान आवाज़, "ये नंबर अभी उपलब्ध नहीं है।" उस एक आवाज़ में उसे अपनी पूरी दुनिया खिसकती हुई महसूस हुई।

एक पल को उसने अपने ही फ़ोन को हाथ में तौला, जैसे उसे दीवार पर दे मारना चाहता हो, सारे सबूत, सारी चैट, हमेशा के लिए मिटा देना चाहता हो। पर वो जानता था, बहुत देर हो चुकी थी, फ़ोन पहले ही उसकी जेब से ज़्यादा पुलिस की फ़ाइल में जी रहा था।

अगर पिया का फ़ोन बंद है, तो पिया अब उसकी नहीं, पुलिस की हिरासत में है। चिराग की साँसें तेज़ हो गईं, उसने अलमारी खोली, एक बैग निकाला, कुछ कपड़े, कुछ नक़द।

और आख़िर में वो हुडी वाली जैकेट, जिसे फेंक देने की उसने महीनों पहले क़सम खाई थी, फिर भी अभी तक क़ैद कर रखी थी। जैसे कोई डूबता आदमी भी उसी पत्थर को थामे रहता है जिसने उसे डुबोया था।

उसने हेलमेट उठाया, चाबी घुमाई, और बाइक स्टार्ट कर दी, बिना ये सोचे कि भागकर जाएगा कहाँ, बस भागना ज़रूरी था।

उधर पिया को हिरासत में लेते ही वैशाली ने गावडे को फ़ोन लगाया था। "सर, दूसरा गिरफ़्तार होना बाक़ी है। अगर ख़बर लीक हो चुकी है, तो वो भाग सकता है।"

"कदम, मुझे पहले से शक था कि ये भागने की कोशिश करेगा।" "हर भगोड़ा एक ही ग़लती करता है, वो सोचता है रफ़्तार उसे बचा लेगी।"

घंटों पहले, उसी रात, गावडे ने पहले से ही एहतियात बरती थी, एक टीम लोनावला टोल नाके पर, और एक टीम एक्सप्रेसवे के हर बड़े कैमरे की निगरानी पर बिठा दी थी।

मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के घाट खंड पर मानसून की धुंध छाई थी, और उसी धुंध में एक काली बाइक, तेज़ी से, ख़तरनाक ढंग से गाड़ियों के बीच से निकलती हुई भागी जा रही थी।

टोल नाके से पंद्रह किलोमीटर पहले एक कैमरे ने बाइक की नंबर प्लेट पकड़ ली। गावडे के फ़ोन पर सिग्नल आया, और उन्होंने बिना एक पल गँवाए बैरिकेड लगाने का हुक्म दे दिया।

"टोल नाका बंद करो, अभी। कोई बाइक पार न होने पाए।" "और सुनो, हथियार मत निकालना, बस रास्ता रोक देना। वो अपराधी है, पर अभी सिर्फ़ भगोड़ा।"

टोल प्लाज़ा पर उस वक़्त सुबह की पहली गाड़ियाँ लगनी शुरू हो चुकी थीं, दूध की गाड़ी, सब्ज़ी मंडी जाता एक टेम्पो, जल्दी निकले हुए कुछ नौकरीपेशा लोग। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में वो एक हत्या के मुक़दमे का हिस्सा बनने वाले हैं, चश्मदीद के तौर पर नहीं, बस तमाशबीन के तौर पर।

कुछ मिनटों में लोनावला टोल नाके पर तीन पुलिस गाड़ियाँ आड़ी खड़ी हो गईं, बैरिकेड, टॉर्च की रौशनी, और वर्दी में खड़े सिपाही, जो एक तरफ़ इशारा करके गाड़ियों को रोक रहे थे।

दूर से आती वो काली बाइक जैसे ही बैरिकेड के क़रीब पहुँची, चिराग ने एक पल को रफ़्तार धीमी की। उसकी आँखों ने रास्ता ढूँढा, कोई दरार, कोई मोड़, कोई आख़िरी उम्मीद।

कोई नहीं थी। उसने आख़िरी कोशिश में बाइक दाईं तरफ़ मोड़ने की कोशिश की, पर दो सिपाहियों ने उसे रास्ते में ही घेर लिया, और बाइक लड़खड़ाकर सड़क किनारे गिर पड़ी।

"चिराग भाटिया।" "भागकर कहाँ जा रहे थे? समुद्र पार?"

चिराग ज़मीन से उठा, हेलमेट अभी भी सिर पर, हाथ काँप रहे थे, पर उसकी ज़ुबान ने आख़िरी बार वही पुराना अभिनय दोहराने की कोशिश की।

"मैंने कुछ नहीं किया, इंस्पेक्टर।" "मुझे बस... मुझे बस पुणे लौटना था। मेरे वकील से बात कीजिए, इस तरह किसी को रोकना ग़ैर-क़ानूनी है।"

"जो आदमी बेगुनाह होता है, वो भागता नहीं, चिराग बाबू।" "और तुम्हारा वकील अभी सो रहा होगा। उसे जगाने का वक़्त थाने में मिलेगा।"

हथकड़ी की खनक सुबह की ख़ामोशी में गूँजी। चिराग की आँखों में अब वो पुराना आत्मविश्वास नहीं था, सिर्फ़ एक जानवर जैसा, कोना ढूँढता हुआ डर।

उसे गाड़ी में धकेला गया, और खिड़की के काँच से आख़िरी बार उसने घाटों की उस धुंध को देखा, जिन पहाड़ों में उसने एक "हादसा" रचा था, वही पहाड़ अब उसे वापस अपनी पकड़ में ले चुके थे।

रात गहरी हो चुकी थी। लोनावला के थाने की महिला हवालात में पिया अकेली एक कोने में बैठी थी, घुटनों को बाँहों में भींचे, दीवार को घूरती हुई।

वैशाली सलाखों के पास आकर रुकी, कुछ पल कुछ नहीं बोली, बस देखती रही। दिन भर की भागदौड़ के बाद ये पहला पल था जब दोनों औरतें, अफ़सर और आरोपी, बिना किसी काग़ज़ी सवाल के आमने-सामने थीं।

"एक बात बताओ, पिया।" "जब तुमने वो आख़िरी सेल्फ़ी ली थी, उस बुर्ज पर... तुम्हारे मन में क्या था?"

पिया ने सिर नहीं उठाया। काफ़ी देर तक कमरे में सिर्फ़ बाहर सड़क पर किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ गूँजती रही।

"मुझे नहीं पता आप किस बात की बात कर रही हैं, मैडम।" "मैं बस... मैं बस एक लड़की हूँ जिसने अपना प्यार खोया।"

वैशाली को अंदाज़ा था कि आज रात वो नक़ाब नहीं उतरेगा। उसने बस इतना कहा।

"ठीक है। रात लंबी है, पिया। और हवालात की रातें आदमी को उसकी अपनी आवाज़ के सिवा कुछ नहीं देतीं।" "सोचना, अकेले में। हम फिर बात करेंगे।"

वहाँ से वैशाली दूसरे थाने की तरफ़ निकली, जहाँ चिराग को अलग रखा गया था। नियम के मुताबिक़ दोनों आरोपियों को हमेशा अलग-अलग जगह रखा जाता है, ताकि वो एक-दूसरे से कोई इशारा, कोई कहानी न मिला सकें।

मर्दाना हवालात में चिराग सलाखों के पास बैठा था, हेलमेट का निशान अब भी उसके माथे पर उभरा हुआ, आँखें छत पर टिकी।

"चिराग, तुम्हारी बाइक की रफ़्तार ने आज तुम्हारी अलीबाई को झूठा साबित कर दिया।" "बेगुनाह आदमी घाट में गाड़ियों के बीच जान जोखिम में डालकर नहीं भागता।"

"मैं डर गया था, मैडम। बस इतना ही।" "आपकी पुलिस बेगुनाहों को भी मुजरिम बना देती है, ये डर काफ़ी नहीं क्या?"

उसकी आवाज़ में फिर वही पुराना आत्मविश्वास लौट आया था, या शायद वो लौटाने की कोशिश कर रहा था। वैशाली जानती थी, ये आदमी आसानी से नहीं टूटेगा।

"तुम दोनों को आज रात अलग-अलग कमरों में रखा गया है।" "और कल से, तुम दोनों एक ही सवाल का सामना करोगे, कि दूसरा क्या बोल रहा है।"

चिराग की आँखों में एक बहुत छोटा, बहुत बारीक कँपन गुज़रा। सिर्फ़ एक पल के लिए, पर वैशाली ने उसे पकड़ लिया।

उस रात, दो अलग-अलग हवालातों में, दो अलग-अलग सलाखों के पीछे, वैशाली ने एक ही सवाल दोनों चेहरों पर पढ़ा। एक ख़ामोश, अनकहा सवाल, जो न पिया की ज़ुबान पर आया, न चिराग की, "क्या दूसरा टूट जाएगा?"

और उसी सवाल के साथ वैशाली को पहली बार यक़ीन हुआ कि असली जंग अब शुरू होने वाली है। गिरफ़्तारी सिर्फ़ दरवाज़ा थी, असली इमारत, दो झूठों को आमने-सामने खड़ा करके गिराने की, अभी बाक़ी थी।

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