अध्याय 7 / 30 पढ़ने में 9 मिनट
चिराग भाटिया
आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi
वैशाली पहली बार चिराग भाटिया को थाने बुलाती है, स्मार्ट और आत्मविश्वासी, हर सवाल का जवाब मुस्कुराकर देता हुआ। उसकी साफ़-सुथरी अलीबाई में वैशाली को दफ़्तर की स्वाइप शीट में एक घंटे का अनसुलझा छेद मिल जाता है, ठीक उतना ही घंटा जितना पिया की टाइमलाइन में भी ग़ायब था।
एक नाम मिलते ही पूरी मशीनरी हरकत में आ गई। रात के उसी थाने में, जहाँ कुछ घंटे पहले तक सिर्फ़ एक "बचपन के दोस्त" जितना सिमटा नाम था, अब एक पूरी फ़ाइल बन रही थी। चिराग भाटिया, अट्ठाईस साल, पुणे का रहने वाला, पेशे से एक आईटी कंपनी में मैनेजर। पिया के परिवार के पुराने बयान में वो सिर्फ़ एक लाइन में दर्ज था, "बचपन का दोस्त, कभी-कभी मिलने आता है।" उसी लाइन को अब वैशाली ने लाल पेन से घेर लिया था, ठीक वैसे ही जैसे कभी वो बेनाम नंबर घेरा था।
"बचपन का दोस्त... जो एक बरनर सिम से रोज़ रात बात करता है, ठीक उसी मिनट पिघल जाता है जब शादी की तारीख़ पास आती है।"
उसी शाम उसकी मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट का रिकॉर्ड निकलवाया गया, और वैशाली ने उसे उसी काग़ज़ से मिलाया जिस पर लोहागढ़ के पिछवाड़े मिले टायर के निशानों का ब्यौरा दर्ज था, हफ़्तों पहले, पहली चढ़ाई के दौरान। मेल पूरी तरह साफ़ नहीं था, पर पैटर्न वही था, वही चौड़ाई, वही मॉडल, वही टायर कंपनी।
उसी रात एक औपचारिक नोटिस चिराग भाटिया के पते पर भेजा गया, थाने आकर बयान दर्ज कराने के लिए। दो दिन का इंतज़ार लंबा खिंचा, हर घंटा वैशाली की मेज़ पर एक नई फ़ाइल के साथ बीता, पर उसका दिमाग़ सिर्फ़ एक ही सवाल पर अटका रहा, ये आदमी सामने आकर क्या कहेगा। क्या वो घबराएगा, या वही रटा हुआ सुकून लेकर आएगा जो पिया की गवाही में हर बार दिखता था।
तीसरे दिन सुबह, लोनावला रूरल थाने के गेट पर एक चमकती काली मोटरसाइकिल आकर रुकी। उतरने वाले के गले में एक हेडफ़ोन झूल रहा था, और चेहरे पर वो मुस्कान थी जो किसी को डर छुपाने के लिए नहीं, बल्कि यक़ीन दिखाने के लिए आती है।
खिड़की के पीछे से वैशाली ने उसे हेलमेट उतारते, बाल सँवारते, और थाने के भीतर की तरफ़ इत्मीनान से चलते देखा। न कोई हड़बड़ी, न कोई घबराहट, बस एक ऐसा आदमी जो जानता था कि उसकी कहानी हर सवाल का सामना कर सकती है, एक ऐसी कहानी जो महीनों से रिहर्सल की गई हो।
"मोटरसाइकिल... हेडफ़ोन। ठीक वैसा ही जैसा भाजे के ढाबे वाले और रीचार्ज दुकान वाले ने बताया था। पर आज पहली बार, इस परछाईं का एक चेहरा भी है।"
भीतर, पूछताछ वाले उस छोटे कमरे में, चिराग यूँ कुर्सी पर बैठा जैसे किसी पुराने दोस्त के घर आया हो, न घबराहट, न झिझक, बस एक इत्मीनान से भरी सीध।
"चिराग भाटिया? मैं सब-इंस्पेक्टर वैशाली कदम। बैठिए, कुछ सवाल हैं, बस औपचारिकता है।"
"बिल्कुल मैडम, पूछिए। वैसे मुझे कुछ अंदाज़ा नहीं कि मुझे यहाँ किसलिए बुलाया गया है, पर मुझे कोई परेशानी नहीं।"
"पिया मित्तल को जानते हैं?"
"बचपन से मैडम। हम एक ही सोसाइटी में बड़े हुए हैं, स्कूल भी साथ था। उसकी शादी की बात चल रही थी, फिर ये हादसा हो गया... बहुत बुरा लगा सुनकर।"
"उस दिन, जिस दिन केयूर मलपानी की मौत हुई, आप कहाँ थे?"
"पुणे में, मैडम। दफ़्तर की एक मीटिंग थी, सुबह से शाम तक। मेरे मैनेजर से पूछ लीजिए, वो कन्फ़र्म कर देंगे, हर बात दर्ज है वहाँ।"
जवाब बहुत सफ़ाई से आया, बहुत तैयार-शुदा, बिल्कुल पिया की उस पहली गवाही की तरह। पर वैशाली की नज़र चिराग के जवाब पर नहीं, उसके हाथ पर टिकी थी, जो बार-बार बेवजह गले में लटके हेडफ़ोन के तार को छू रहा था, जैसे किसी पुरानी आदत से लड़ रहा हो।
"क्या आपके पास एक से ज़्यादा फ़ोन नंबर हैं, चिराग जी? कभी कोई दूसरा सिम, ऑफ़िस का, बैकअप का?"
"नहीं मैडम, बस एक ही नंबर, बरसों से वही। मुझे एक ही फ़ोन सम्भालना मुश्किल लगता है, दो का क्या करूँगा।"
एक और झूठ, उतनी ही सफ़ाई से बोला गया। हमें पता था कि यही आदमी महीनों तक एक बरनर नंबर से रात-रात भर जागता रहा था, तकिये के नीचे छुपे एक फ़ोन से बात करते हुए।
"और पिया से आख़िरी बार कब बात हुई?"
"याद नहीं ठीक से... महीनों पहले शायद। हम बहुत नियमित तो नहीं मिलते, मैडम, बस त्योहारों पर, या किसी पारिवारिक मौक़े पर।"
"महीनों पहले" का ये जवाब, हमारे लिए, एक और झूठ था, जो बहुत आराम से, बहुत सफ़ाई से बोला गया था। चिराग की मुस्कान एक पल के लिए भी नहीं डगमगाई।
"और आपकी कोई सगाई या शादी की बात नहीं चल रही, चिराग जी?"
"अभी तक नहीं मैडम... जब वक़्त आएगा, घर वाले देख ही लेंगे कोई। फ़िलहाल तो बस काम है, ज़िंदगी में और कुछ नहीं।"
"आपको ट्रेकिंग का शौक़ है, चिराग जी? पहाड़ों का, लोहागढ़ जैसी जगहों का?"
"ट्रेकिंग? नहीं मैडम, मुझे तो एसी कमरे और बाइक की स्पीड पसंद है। पहाड़ चढ़ना मेरे बस का नहीं।"
एक और सफ़ाई से बुना जवाब। पर वैशाली को याद था, भाजे के ढाबे वाले ने कहा था, हुडी वाला आदमी बिना रुके, बिना डरे, सीधा पहाड़ की तरफ़ चला गया था, जैसे रास्ता पहले से जाना-पहचाना, बरसों पुराना हो।
"पिया की सगाई में आए थे आप?"
"आया था मैडम... दोस्त की सगाई थी, न आता तो अजीब लगता। अच्छी रस्म थी, सब ख़ुश थे।"
"सब ख़ुश थे," उसने कहा। पर हमने वही सगाई की रात देखी थी, तकिये के नीचे से निकलता वो दूसरा फ़ोन, और एक पैग़ाम जिसमें ख़ुशी की जगह सिर्फ़ मजबूरी थी।
एक झूठ की परतें कभी अकेली नहीं आतीं। ये जवाब भी उतनी ही सफ़ाई से बुना गया था जितना बाक़ी सब।
"ठीक है, चिराग जी। अभी के लिए इतना ही। ज़रूरत पड़ी तो दुबारा बुलाएँगे।"
चिराग मुस्कुराते हुए उठा, हाथ मिलाया, और दरवाज़े तक यूँ चला जैसे जीत उसी की हुई हो। वैशाली ने कुछ नहीं कहा। उसने बस उसकी पीठ को दरवाज़े से ओझल होते देखा, और अपनी नोटबुक में एक शब्द लिख दिया, "मीटिंग?"
कई महीने पीछे। मानसून की एक शाम, पुणे की एक छत पर, जब पिया और चिराग के बीच अभी सिर्फ़ हँसी थी, कोई ख़तरा नहीं, कोई गिनती नहीं। बारिश की बूँदें छत की मुँडेर पर उछल रही थीं, और दोनों भीगते हुए, चाय के दो कप थामे बैठे थे।
पिया चाय की भाप में उँगली घुमाते हुए हँस पड़ी थी, "देखो न, बादल कैसे घिर आए हैं... कभी-कभी लगता है हम भी कहीं दूर, किसी समंदर किनारे बैठे हैं, है न?"
"समंदर... तो फिर आज से बस यही नाम है तुम्हारा, मेरे लिए। 'समुद्र'। जब भी मैसेज करूँ, समझ लेना कोई और नहीं, बस मैं हूँ।"
पिया हँस पड़ी, कप को दोनों हाथों में थामे हुए, "और तुम? तुम्हें क्या बुलाऊँ फिर?"
"मुझे कुछ मत बुलाओ... बस याद रखना, समंदर कभी शांत नहीं होता, पिया। वो हमेशा धड़कता रहता है, दूर से भी, बिना दिखे भी।"
उस शाम, ये सिर्फ़ एक प्यारा-सा खेल था, दो दिलों का एक भोला-सा राज़, जिसे किसी और के सामने कभी नहीं खोलना था। पिया ने उस रात अपनी डायरी में सिर्फ़ इतना लिखा था, "आज एक नया नाम मिला, सिर्फ़ मेरे लिए।" फिर उसने डायरी तकिये के नीचे उसी जगह रख दी, जहाँ महीनों बाद एक दूसरा फ़ोन भी छुपेगा।
हमें पता था कि यही लफ़्ज़, यही "समुद्र", एक दिन किसी और मतलब में इस्तेमाल होगा। उस बारिश भरी शाम, न पिया को पता था, न चिराग को, कि उनका ये भोला कोड एक दिन एक चीख़ के ठीक बाद भेजे गए एक मैसेज में बदल जाएगा, और वो मैसेज, महीनों बाद, एक साइबर सेल की स्क्रीन पर सबूत बनकर उभरेगा।
थाने वापस, गावडे साहब वैशाली की मेज़ पर आ खड़े हुए, चेहरे पर वही पुरानी थकान और एक नई चिंता। उन्होंने दरवाज़ा बंद किया, आवाज़ नीची रखी, जैसे दीवारों को भी सुनने की इजाज़त न हो।
"कदम... बड़े घर का पोरगा है, वकील रखेगा, मीडिया बुलाएगा. सबूताशिवाय हात लावला, तर नोकरी जाईल तुझी, आणि माझीही. सबूत आण, पक्का सबूत, तेव्हाच पुढे जा."
"सर, मुझे पता है ये ख़तरा है... पर मुझे बस थोड़ा और वक़्त चाहिए। मैं उसकी अलीबाई खंगाल रही हूँ, क़दम-दर-क़दम।"
"थांब जरा... मी वरून ऐकलं, बिल्डर मलपानींनी सुद्धा फ़ोन केला होता कमिशनरना. सगळे 'हादसा' म्हणतायत, कदम. तुझ्या एकटीच्या शब्दावर केस टिकणार नाही."
"शब्दों पर नहीं टिकेगा सर... सबूत पर टिकेगा। और वो सबूत मैं ला रही हूँ, एक-एक करके, धीरे-धीरे ही सही।"
"वक़्त कमी आहे, कदम. वरून रोज फ़ोन येतोय, कोणीतरी वर बोलतंय. सांभाळून, पोरी."
गावडे साहब के जाते ही वैशाली ने रुतुजा साळुंके की मदद से एक औपचारिक चिट्ठी भेजी, चिराग के दफ़्तर की पूरी अटेंडेंस शीट, स्वाइप कार्ड का लॉग, और उस दिन की मीटिंग का कैलेंडर इनवाइट माँगते हुए। शाम तक जवाब आ गया, एक मोटी सी फ़ाइल, स्टेपल की हुई, कंपनी की मुहर के साथ। काग़ज़ पर सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था जैसा चिराग ने बताया था, सुबह नौ से शाम छह, दफ़्तर में मौजूद।
"स्वाइप इन... सुबह आठ पचास। मीटिंग शुरू, नौ बजे। मीटिंग ख़त्म, साढ़े दस।"
उँगली नीचे बढ़ती गई, अगला स्वाइप ढूँढते हुए, कैंटीन का, लिफ़्ट का, कुछ भी। पर साढ़े दस बजे के बाद, अगला दर्ज स्वाइप साढ़े ग्यारह बजे का था। ठीक एक घंटे का एक सन्नाटा, काग़ज़ पर, जिसमें चिराग भाटिया कहीं दर्ज नहीं।
"साढ़े दस से साढ़े ग्यारह... एक पूरा घंटा जिसमें चिराग भाटिया का कोई निशान नहीं। न स्वाइप, न कैमरा, कुछ नहीं।"
यही वो एक घंटा था, ठीक उतना ही जितना पिया की टाइमलाइन में भी ग़ायब था, लोहागढ़ की उस भोर। दफ़्तर के काग़ज़ पर चिराग भाटिया पूरे दिन मौजूद दिखता था, हस्ताक्षर, स्वाइप, सब कुछ करीने से भरा हुआ। पर उसी काग़ज़ के बीचोंबीच, एक घंटे का एक ऐसा छेद था, जिसका जवाब न उसकी अलीबाई देती थी, न कोई गवाह, न कोई कैमरा।
"एक घंटा, गावडे साहब... जिसमें केयूर मलपानी गिरा, और जिसमें चिराग भाटिया कहाँ था, इसका कोई जवाब नहीं। मुझे बस यही एक घंटा साबित करना है, फिर कोई अलीबाई, कोई मुस्कान, उसे नहीं बचा पाएगी।"
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