अध्याय 6 / 30 पढ़ने में 10 मिनट
बरनर नंबर
आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi
वो छुपा नंबर एक बरनर सिम निकलता है, फ़र्ज़ी पते पर, नक़द ख़रीदा हुआ। वैशाली उसे कॉल पैटर्न, रीचार्ज दुकान और एक धुंधला सीसीटीवी फ़्रेम से ट्रेस करते हुए एक कॉलेज फ़ोटो तक पहुँचती है, जहाँ से एक नाम फूट पड़ता है, चिराग भाटिया।
"उस दूसरे फ़ोन की दूसरी तरफ़, कौन था।" वैशाली का अपना ही सवाल रात भर उसके साथ जागता रहा। मेज़ पर वही काग़ज़ पड़ा रहा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड का वो पुलिंदा जिसमें एक ही बेनाम नंबर बार-बार धड़कता था... एक फ़ोन जो पिया मित्तल के अपने नाम पर था, पर पिया की गवाही में कभी नहीं आया। सुबह टेलीकॉम नोडल दफ़्तर से जवाब आ गया, वो सिम किस पते पर, किस काग़ज़ पर ख़रीदा गया था।
"पता... भाजे गाँव की एक गली, मकान नंबर सात। पर यहाँ तो मकान नंबर सात है ही नहीं, मैंने ख़ुद वहाँ पूछताछ की थी, पिछले हफ़्ते।"
पता फ़र्ज़ी था, काग़ज़ पर एक नाम था जो कहीं वजूद नहीं रखता था। पर हर फ़र्ज़ी सिम को ज़िंदा रहने के लिए रीचार्ज चाहिए होता है, और रीचार्ज हमेशा एक ही जगह से हुआ था, भाजे की एक छोटी सी मोबाइल दुकान से, हमेशा नक़द, कभी ऑनलाइन नहीं।
पर भाजे निकलने से पहले वैशाली ने एक बार फिर वही पूरी सीडीआर शीट सामने बिछाई, इस बार सिर्फ़ पते के लिए नहीं, वक़्त के लिए। हर कॉल का दिन, हर कॉल का घंटा, उसने कैलेंडर पर एक-एक करके निशान लगाना शुरू किया।
"सगाई की रात... एक कॉल। शादी के कार्ड छपने भेजे जाने वाले दिन... दो कॉल। जिस दिन तारीख़ आख़िरी बार पक्की हुई... तीन कॉल, देर रात तक।"
पैटर्न साफ़ था। जब भी पिया की ज़िंदगी में कोई फ़ैसला होता, कोई रस्म, घर वालों का कोई दबाव, कोई नई तारीख़, ये बेनाम नंबर उसी शाम जाग उठता था। जैसे किसी और की धड़कन, पिया की हर मजबूरी पर, अपने आप तेज़ हो जाती हो।
"जो आदमी अपना नाम छुपाता है... वो अपने पैरों के निशान नहीं छुपा पाता। चलो, भाजे।"
घंटे भर बाद वैशाली उस छोटी सी रीचार्ज दुकान के सामने खड़ी थी, टूटा हुआ शटर, अंदर एक पीला बल्ब, और दुकानदार बीड़ी सुलगाते हुए काउंटर पर बैठा। उसने CDR की शीट मेज़ पर रख दी, उस एक बेनाम नंबर पर उँगली रख दी।
दुकानदार ने शीट को घुमाकर देखा, माथे पर बल डाले, फिर सिर हिलाया। "हाँ मैडम, ये नंबर याद है... महीनों तक हर हफ़्ते आता था, हमेशा नक़द, कभी ज़्यादा बात नहीं करता था। चेहरा ठीक से याद नहीं, पर एक बात याद है, हमेशा मोटरसाइकिल पर आता था, और कानों में हेडफ़ोन लगाए रखता था।"
"हेडफ़ोन... काली हुडी वाला आदमी। दुकान में कोई कैमरा है?"
एक पुराना, धुंधला सीसीटीवी कैमरा दुकान के कोने में टंगा था, जिसकी रिकॉर्डिंग बमुश्किल हफ़्ते भर की बचती थी। पर एक फ़्रेम बच गया था, धुंधला, दानेदार, चेहरा साफ़ नहीं, बस एक हुडी वाले आदमी की परछाईं, मोटरसाइकिल पर, ठीक उसी दुकान के बाहर।
"इतना काफ़ी नहीं अदालत के लिए... पर इतना काफ़ी है कि मुझे यक़ीन हो जाए कि मैं सही दिशा में हूँ।"
एक हुडी, एक मोटरसाइकिल, गले में हेडफ़ोन, यही तीन चीज़ें भाजे के ढाबे वाले ने भी बताई थीं, हफ़्तों पहले, जब उसने लोहागढ़ की तरफ़ जाते एक अजनबी को देखा था। अब वही तीन चीज़ें, इसी छोटी सी रीचार्ज दुकान में, दुबारा उभर आई थीं। दो अलग-अलग गवाह, दो अलग-अलग जगह, एक ही परछाईं।
"संयोग एक बार होता है... दो बार नहीं। चेहरा भले धुंधला हो, पर उसका ढाँचा अब साफ़ होता जा रहा है।"
उसी दोपहर पिया मित्तल को दुबारा थाने बुलाया गया, इस बार बिना किसी नरमी के, सिर्फ़ एक कड़क कुर्सी और वैशाली की मेज़ के आर-पार फैली ख़ामोशी। इस बार वैशाली के हाथ में वही काग़ज़ था, और उस काग़ज़ पर एक नंबर सुर्ख़ घेरे में क़ैद था।
"पिया, ये नंबर पहचानती हो?"
"नहीं मैडम... मैंने ये नंबर पहले कभी नहीं देखा।"
जवाब वही था जो पहले भी आया था, वही रटे हुए शब्द, वही सपाट लहजा। पर इस बार वैशाली ने कुछ और भी देखा, पिया की उँगलियाँ मेज़ के नीचे काग़ज़ के किनारे को धीरे-धीरे नोच रही थीं।
"ये नंबर तुम्हारे ही नाम के एक दूसरे सिम से जुड़ा है, पिया। एक ऐसा सिम जो तुम्हारे बरामद फ़ोन में कहीं दर्ज नहीं। और ये ठीक उसी मलावली टावर पर, ठीक सवा छह बजे पिंग करता है।"
"मुझे... मुझे नहीं पता आप क्या कह रही हैं मैडम। मेरा सिर्फ़ एक ही फ़ोन है, हमेशा से एक ही रहा है।"
आवाज़ काँप गई, बस एक बार, एक सेकंड के हज़ारवें हिस्से के लिए। हमने वो दूसरा फ़ोन तकिये के नीचे देखा था, हर रात जागता हुआ। वैशाली को अभी सिर्फ़ इतना पता चला कि एक पत्थर सी सपाट आवाज़ में पहली दरार आ गई थी।
"अगर ये नंबर तुम्हारा नहीं, तो बताओ पिया... किसका है ये? रात के चार बजे किससे बात होती थी इस पर?"
"हो सकता है... मेरे नाम पर कोई ग़लत सिम एक्टिवेट हो गया हो, मुझे कुछ पता नहीं मैडम। मैं किसी को नहीं जानती।"
"मुझे कुछ पता नहीं" और "मैं किसी को नहीं जानती," दो जवाब, एक ही साँस में, एक-दूसरे पर गिरते हुए। झूठ जब जल्दी में बोला जाता है, तो अक्सर अपने ही पैरों पर गिर पड़ता है।
"पिया, एक बार और पूछती हूँ... उस सुबह, लोहागढ़ की उस बुर्ज पर, तुम दोनों सच में बिल्कुल अकेले थे?"
इस बार पिया ने जवाब नहीं दिया। कुछ सेकंड की एक ख़ामोशी, जो किसी भी शब्द से ज़्यादा कुछ कह गई। फिर उसने नज़रें नीचे झुका लीं।
"ठीक है पिया... अभी के लिए इतना ही। पर याद रखना, झूठ को याद रखना पड़ता है, सच को नहीं।"
पिया उठकर चली गई, चेहरा फिर से पत्थर हो चुका था। पर जो एक कँपकँपी वैशाली ने पकड़ ली थी, वो अब उसकी नोटबुक में दर्ज हो चुकी थी, सुर्ख़ स्याही में, एक तारीख़ और एक वक़्त के साथ।
कुछ हफ़्ते पीछे। पुणे के एक शांत कैफ़े की आख़िरी मेज़, जहाँ पिया और चिराग अक्सर मिलते थे, जब दुनिया की नज़र इधर नहीं होती थी। सगाई की तारीख़ अब हफ़्तों में गिनी जा रही थी, और हर मुलाक़ात में सुकून थोड़ा कम, बेचैनी थोड़ी ज़्यादा होती जा रही थी।
"आज पूरे दिन बस शादी की बातें हुईं, चिराग... कार्ड का डिज़ाइन, हलवाई की लिस्ट, रिश्तेदारों के नाम। मुझे साँस लेने का भी वक़्त नहीं मिलता आजकल।"
"मुझे पता है... बस थोड़े दिन और, फिर हम दोनों यहाँ से बहुत दूर होंगे। याद है न वादा?"
"याद है... पर पापा हर हफ़्ते तारीख़ और पास लाते जा रहे हैं, चिराग। हम कोई रास्ता ढूँढ लेंगे न... बस थोड़ा और वक़्त चाहिए मुझे।"
"वक़्त? पिया, हर बार वक़्त माँगती हो, और हर बार तारीख़ पास आ जाती है। जब तक वो ज़िंदा है, तू कभी मेरी नहीं होगी।"
मेज़ पर दोनों की चाय ठंडी पड़ी रही, और एक ख़ामोशी उतर आई जो पहले कभी उनके बीच नहीं थी। ये वो ख़ामोशी नहीं थी जो प्यार में आती है। ये वो ख़ामोशी थी जिसमें कोई पहली बार एक ख़तरनाक ख़्याल को ज़ुबान तक ला चुका होता है, और फिर डर जाता है कि कहीं कह न बैठे कि उसका असली मतलब क्या था।
"ऐसे मत बोलो... चिराग, प्लीज़, ऐसे मत बोलो। मुझे डर लगता है जब तुम ऐसे बात करते हो।"
"छोड़ो... मज़ाक़ था, पिया, बस मज़ाक़। पर सोचना ज़रूर, कि हर मुश्किल का एक ही हल नहीं होता।"
उस रात पिया अपने कमरे में अकेली बैठी रही, दरवाज़ा बंद, बत्ती बुझी हुई। उसने वही तकिये के नीचे छुपा फ़ोन निकाला, स्क्रीन जलाई, फिर बिना कुछ लिखे बुझा दी। शायद पहली बार, उसे ख़ुद अपने चुने हुए रास्ते से डर लगने लगा था।
हमने वो लफ़्ज़ सुन लिए थे, "जब तक वो ज़िंदा है।" उस दोपहर, उस चाय की मेज़ पर, पहली बार एक इरादा बिना नाम के बैठ गया था। पिया को लगा शायद वो सिर्फ़ ग़ुस्सा था। हमें पता था, वो कुछ और था।
अगली सुबह वैशाली पिया के कॉलेज पहुँची, जहाँ को-ऑर्डिनेटर ने पुरानी अलमारी से एक लैमिनेटेड ग्रुप फ़ोटो निकाली, 2019 के एनुअल डे की, हर चेहरे के नीचे छोटे अक्षरों में एक नाम छपा हुआ। दर्जनों चेहरे, दर्जनों नाम, और कहीं बीच में पिया मित्तल भी हँसती हुई खड़ी थी।
को-ऑर्डिनेटर ने बताया कि हर साल की एनुअल डे फ़ोटो कॉलेज के रिकॉर्ड रूम में सालों तक रखी जाती है, धूल खाती, कभी किसी काम की न समझी जाती। आज, पहली बार, वो धूल भरी फ़ाइल किसी जाँच का हिस्सा बनने जा रही थी।
"अगर एक चेहरा उस रीचार्ज दुकान से मेल खा गया... तो एक नाम भी मिल जाएगा।"
दोपहर तक वैशाली उस रीचार्ज दुकान के सामने फिर से खड़ी थी। उसने फ़ोटो की कॉपी मेज़ पर खोल दी, बिना किसी एक चेहरे की तरफ़ इशारा किए, और दुकानदार से बस इतना कहा, "देखो, इनमें से कोई पहचान में आता है?"
एक सेकंड के लिए दुकान में सिर्फ़ पंखे की घरघराहट सुनाई दी। वैशाली की नज़र दुकानदार की उँगली पर टिकी थी, जो अब भी फ़ोटो पर धीरे-धीरे रेंग रही थी, चेहरा दर चेहरा, जैसे वक़्त भी उसके साथ ठहर गया हो।
दुकानदार ने बीड़ी नीचे रख दी और अपनी उँगली फ़ोटो पर धीरे-धीरे घुमाई, एक चेहरे से दूसरे तक, जब तक वो एक जगह जाकर रुक न गई। "अरे... यही है मैडम। यही आदमी दुकान पर आता था। यही चेहरा है, पक्का।"
"पक्का? ग़लती तो नहीं हो रही?"
"पक्का मैडम। चेहरा पहचानने में मुझसे ग़लती नहीं होती, पैंतीस साल से यही धंधा है।"
"आख़िरी बार कब आया था ये आदमी आपकी दुकान पर?"
दुकानदार ने माथा सिकोड़ा, याद्दाश्त पर ज़ोर डालते हुए। "शायद... उसी हफ़्ते जिस हफ़्ते लोहागढ़ वाली घटना अख़बार में छपी थी, मैडम। उसके बाद वो कभी नहीं दिखा, न रीचार्ज करवाने आया, न कुछ और।"
वैशाली ने फ़ोटो पलटी। उसी चेहरे के नीचे, छोटे, साफ़ अक्षरों में एक नाम छपा था। एक नाम, जो अब तक सिर्फ़ चंद रटी हुई गवाहियों में एक "बचपन के दोस्त" जितना सिमटा था, फ़र्ज़ी पते और बेनाम नंबर की धुंध में छुपा हुआ। अब वो नाम वैशाली की उँगली के नीचे, काग़ज़ पर, हमेशा के लिए दर्ज हो चुका था।
"चिराग भाटिया।" ... अब तुम सिर्फ़ एक बेनाम नंबर नहीं रहे। अब तुम्हारा एक चेहरा है, और एक पता भी मिलेगा।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले अपने विचार साझा करें।