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Chapter 26 of 30 10 min read

अमेय की गवाही

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

जज का सवाल अभी भी कमरा नंबर छह की हवा में लटका हुआ था, जब अगली सुनवाई की सुबह शिवाजीनगर अदालत के गलियारे में भीड़ आम दिनों से कहीं ज़्यादा घनी उमड़ आई। हर कोई जानता था कि आज कठघरे में कौन खड़ा होने वाला है।

अमेय गोखले गलियारे से कठघरे तक चला, हर क़दम पर उसके हाथ की उँगलियाँ काँप रही थीं, माथे पर पसीने की एक हल्की परत। उसने एक पल के लिए कठघरे के उस पार बैठे चिराग की तरफ़ देखा, फिर तुरंत नज़र हटा ली।

पिछली क़तार में वैशाली आज सबसे आगे झुककर बैठी थी, जैसे हर लफ़्ज़ को अपने हाथों से पकड़ लेना चाहती हो। सुष्मा और नरेश एक तरफ़, आँखों में एक अजीब सी उम्मीद, जिसे वो ख़ुद भी शब्दों में बाँधने से डर रहे थे।

अख़बारों ने आज की सुनवाई को पहले से ही 'सरकारी गवाह का दिन' कहकर छाप दिया था, और गैलरी की हर सीट पर पत्रकार, वकील और अजनबी तमाशबीन ठसाठस भरे थे।

"माननीय, अमेय गोखले ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत सरकारी गवाह बनने की अर्ज़ी दी थी, जो मंज़ूर हुई। आज वो अपनी शर्तों के तहत, अदालत के सामने पूरा सच बताने आए हैं।"

"माननीय, अभियोजन आज चश्मदीद और सरकारी गवाह अमेय गोखले को बुलाना चाहेगा।" "श्री गोखले, घबराइए नहीं, बस वही बताइए जो आपने ख़ुद देखा और सुना।"

"जी... मैं कोशिश करूँगा।" उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि जज को माइक पास खिसकाने का इशारा करना पड़ा।

जज ने आगे झुककर धीमी आवाज़ में कहा कि गवाह जब चाहे रुककर पानी पी सकता है, कोई जल्दी नहीं। अमेय ने सिर हिलाया, एक गहरी साँस ली, और कठघरे की लकड़ी को हल्के से पकड़ लिया।

"अमेय, चिराग भाटिया आपका कॉलेज का पुराना दोस्त है। सगाई के कुछ हफ़्तों बाद क्या उसने आपसे केयूर मलपानी के बारे में कुछ कहा था?"

"हाँ माननीय। एक रात वो मेरे कमरे पर आया, बहुत पी रखी थी उसने। वो पिया की शादी की बात कर रहा था, ग़ुस्से में, बेचैन, जैसे कोई चीज़ अंदर ही अंदर उसे खाए जा रही हो।"

अदालत में हर साँस मानो थम गई, जैसे सब उसी कमरे में पहुँच गए हों, महीनों पहले, उस रात की उस टूटी हुई रोशनी में।

"अगर वो आज़ाद हो जाए ना... बस एक हादसा।" चिराग की आवाज़ अमेय की याद में आज भी उतनी ही ठंडी थी जितनी उस रात थी।

अमेय ने आँखें बंद करके एक पल के लिए साँस रोकी, फिर कठघरे की लकड़ी को कसकर पकड़ लिया।

"उस रात के बाद क्या चिराग ने कभी साफ़-साफ़ शब्दों में कोई योजना बताई?"

"हफ़्ते भर बाद उसने कहा था, 'हम भाग जाएँगे' अब काफ़ी नहीं है, 'एक और रास्ता है, और वो रास्ता आसान है।'" "मुझे उसी दिन समझ आ जाना चाहिए था माननीय, पर मैंने ख़ुद को समझाया कि वो बस बहक रहा है, शराब बोल रही है, आदमी नहीं।"

"क्या चिराग ने कभी ये बताया कि वो 'रास्ता' किस दिन अपनाया जाएगा?"

"हाँ माननीय। उसने कहा था, 'जन्मदिन का दिन सबसे सही है, कोई शक नहीं करेगा, सब जश्न समझेंगे, कोई पहाड़ पर हुई मौत को साज़िश नहीं मानेगा।'"

कुछ दिन बाद चिराग ने फिर फ़ोन किया, इस बार शराब में नहीं, एक शांत, ठंडी आवाज़ में, जैसे कोई फ़ैसला सुना रहा हो, नशा नहीं।

"तू किसी को कुछ नहीं बताएगा अमेय। दोस्ती का यही मतलब होता है।"

अमेय ने अदालत में आँखें नीचे झुका लीं। "मैंने हाँ कह दिया माननीय," उसने कहा, "और वही मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी।"

"क्या आप केयूर मलपानी को व्यक्तिगत रूप से जानते थे?"

"हाँ माननीय, दो-तीन बार मिला था चिराग के साथ। बहुत सीधा आदमी था, दिल खोलकर हँसता था। जब मुझे पता चला कि वो मर चुका है, और मुझे पहले से शक था, तो मैं रात भर सो नहीं पाया।"

सुष्मा की आँखों से आँसू बह निकले, नरेश ने चुपचाप उनका हाथ थाम लिया। गैलरी में एक हल्की सिसकी गूँजी, फिर ख़ामोशी।

"क्या चिराग ने कभी आपसे कोई मदद माँगी, जन्मदिन वाली उस सुबह के बारे में?"

"हाँ माननीय। ट्रेक के एक दिन बाद उसने मुझसे कहा था, अगर कभी पुलिस पूछे तो कह देना कि हम दोनों उस सुबह पुणे में साथ थे। मैंने मना कर दिया, मैंने कहा मैं झूठ नहीं बोलूँगा, चाहे कुछ भी हो जाए।"

गैलरी में एक हल्की सरगोशी दौड़ गई, जज ने यह बात अपने नोट्स में अलग से रेखांकित की।

"अमेय, आपने पुलिस को पहले क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि मुझे डर था माननीय। डर था कि चिराग मुझे भी लपेट देगा, डर था कि मैं ग़लत साबित हो जाऊँ, डर था अपने ही दोस्त के ख़िलाफ़ खड़ा होने का।" "मैं चुप रहा, और वो चुप्पी आज भी मुझे खाती है।"

वृंदा बैठ गई, और खानविलकर धीरे-धीरे खड़ा हुआ, इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं, एक नपा-तुला ग़ुस्सा था।

"माननीय, एक सरकारी गवाह की गवाही अकेले किसी को दोषी ठहराने के लिए काफ़ी नहीं होती, क़ानून ख़ुद यही कहता है।"

"सही कहा वकील साहब, इसीलिए अभियोजन इसे टावर डेटा, डीएनए और पुतले के प्रयोग के साथ जोड़कर पेश कर रहा है, अकेले नहीं।"

"श्री गोखले, आप कह रहे हैं आपको हफ़्तों पहले पता था कि आपका दोस्त एक आदमी को मारने की सोच रहा है। और आप चुपचाप बैठे रहे? क्यों?"

"मैंने सोचा था वो बस ग़ुस्से में बोल रहा है वकील साहब, मैंने... मैंने उसे रोकने की कोशिश की थी, फ़ोन पर, बहस में।"

"या शायद सच यह है कि आप ख़ुद इस साज़िश का हिस्सा थे, और अब पुलिस से डील करके ख़ुद को बचाने के लिए अपने दोस्त को बलि का बकरा बना रहे हैं?"

"आपत्ति माननीय, बचाव पक्ष गवाह को डरा रहा है, तथ्य नहीं पूछ रहा।"

जज ने सिर हिलाकर आपत्ति सुनी, फिर खानविलकर की तरफ़ देखा। "वकील साहब, सीधे सवाल पर आइए, गवाह की नीयत पर टिप्पणी नहीं।"

"बहुत अच्छा माननीय। श्री गोखले, आप आज इसलिए सच बोल रहे हैं क्योंकि सरकारी गवाह बनने पर आपकी सज़ा माफ़ हो जाएगी, है ना? यह सच नहीं, यह एक सौदा है।"

"नहीं! मैंने कभी हाथ नहीं बँटाया, कभी योजना में शामिल नहीं हुआ। मैं सिर्फ़ जानता था, और मैं बोला नहीं, यही मेरा गुनाह है, हत्या नहीं।"

"आप एक पढ़े-लिखे इंजीनियर हैं श्री गोखले, समझदार आदमी। और आप अदालत से कहना चाहते हैं कि आपको 'हादसा' और 'रास्ता' जैसे शब्दों का मतलब समझ ही नहीं आया?"

"समझ आया था वकील साहब, बस मैं मानना नहीं चाहता था। एक दोस्त को हत्यारा मान लेना, उससे कहीं आसान है सिर्फ़ यक़ीन न करना।"

"या शायद वजह कुछ और है श्री गोखले, आप हमेशा से चिराग की कामयाबी से जलते रहे, और आज मौक़ा मिला है उसे बर्बाद करने का?"

"नहीं वकील साहब। मैं उसका दोस्त था, आज भी कहीं न कहीं हूँ। पर दोस्ती सच से बड़ी नहीं होती, ख़ासकर तब जब कोई मर चुका हो।"

"तो फिर आप आज क्यों बोल रहे हैं श्री गोखले? महीनों की चुप्पी के बाद अचानक ये सच्चाई का दौरा कहाँ से आया?"

"मैं डरपोक था वकील साहब... पर झूठा नहीं।" "मैंने उसे रोका था, मैंने सच में रोका था, पर वो नहीं रुका, और अब मैं यहाँ खड़ा होकर सच बोलने के अलावा कुछ नहीं कर सकता।"

अदालत में एक अजीब सी ख़ामोशी उतरी, ऐसी ख़ामोशी जो ग़ुस्से से नहीं, सच के वज़न से बनती है। जज ने अपनी क़लम नीचे रख दी, कुछ पल के लिए सिर्फ़ अमेय को देखता रहा।

"माननीय, एक डरपोक आदमी की गवाही झूठी नहीं होती, वो सिर्फ़ देर से आई गवाही होती है। अभियोजन का यही निवेदन है।"

"माननीय, यही नहीं, आधी रात की जिन कॉल्स का ज़िक्र गवाह ने किया, वो कॉल रिकॉर्ड अदालत में पहले ही पेश हो चुके हैं, तारीख़ें और वक़्त दोनों गवाह की गवाही से पूरी तरह मिलते हैं।"

जज ने धीरे से सिर हिलाया, कुछ लिखा, फिर खानविलकर की तरफ़ देखा, इशारा किया कि आगे कोई सवाल हो तो पूछे। खानविलकर ने सिर हिलाकर मना कर दिया, आज के लिए उसकी जिरह ख़त्म हो चुकी थी।

गैलरी के एक कोने में गावडे भी आज बैठे थे, वर्दी की जगह सादे कपड़ों में, अमेय की हर काँपती लाइन पर हल्के से सिर हिलाते हुए, जैसे किसी हिसाब की एक और कड़ी अपनी जगह पर बैठ रही हो।

जज ने सुनवाई के लिए दिन का समापन घोषित किया, और अमेय कठघरे से उतरने के लिए मुड़ा, टाँगें अब भी काँप रही थीं, पर पीठ महीनों बाद पहली बार सीधी।

कठघरे से उतरते हुए वृंदा ने अमेय की तरफ़ एक छोटा, गर्मजोश सिर हिलाया, जैसे कह रही हो, आज तुमने सही किया, बिना एक शब्द बोले।

ठीक उसी पल कठघरे से हवालात की तरफ़ ले जाए जाते हुए चिराग की नज़र अमेय पर जाकर टिक गई। वो नज़र न ग़ुस्से की थी, न धमकी की, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा ठंडी, जैसे कोई हिसाब लिख रहा हो।

अमेय के क़दम एक पल के लिए ठिठक गए, उसकी रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई, ठीक वैसी जैसी उस रात दौड़ी थी जब चिराग ने वो लफ़्ज़ कहे थे, शराब की गंध और अँधेरे कमरे में।

बाहर गलियारे में जमा पत्रकारों को पहले से पता चल गया था कि आज की गवाही मुक़दमे की दिशा बदल सकती है, कैमरों की कतार पहले से तैयार खड़ी थी, हर कोई अमेय के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था।

गैलरी में वैशाली ने वो नज़र भी देखी, और उसका हाथ बिना सोचे अपनी नोटबुक पर और कस गया, जैसे वो अमेय और उस नज़र के बीच खड़ी होना चाहती हो, पर दूरी उसे रोक रही थी, और उसे पता था कि आज की गवाही जितनी बड़ी जीत थी, चिराग की वो ठंडी नज़र उतनी ही बड़ी चेतावनी।

चिराग के होंठ हिले नहीं, कोई लफ़्ज़ बाहर नहीं आया, बस वो नज़र, वहीं, टिकी हुई, जब तक हवालदार उसे बाहर की तरफ़ मोड़ नहीं ले गया। अमेय ने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा, पर उसे पता था, वो नज़र अब उसका पीछा हमेशा करेगी, अदालत की उस दहलीज़ से बहुत आगे तक।

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