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Chapter 1 of 30 12 min read

आख़िरी सुबह

आख़िरी ट्रेक by Avni Oberoi

कुछ पहाड़ सिर्फ़ पहाड़ नहीं होते। ... वो ख़ामोश गवाह होते हैं।

सह्याद्रि की इन ढलानों ने सदियों से बहुत कुछ देखा है। मराठा तलवारें, मानसून की मूसलाधार बारिशें, और लाखों बार सूरज को उगते और डूबते। पर उस भोर, लोहागढ़ किले की विंचू काटा बुर्ज पर जो हुआ, वैसा इन पुराने पत्थरों ने बहुत कम देखा था।

सुबह के पाँच बजकर चालीस मिनट। लोनावला के घाटों पर धुंध की एक पतली, नीली चादर बिछी थी। और उस गहरी ख़ामोशी को चीरती हुई, बुर्ज की चोटी से एक हँसी गूँज रही थी।

वो दोनों रात के अँधेरे में मलावली स्टेशन से निकले थे, टॉर्च की रोशनी में एक-एक पत्थर चढ़ते हुए। केयूर आगे-आगे, हर तीखे मोड़ पर पीछे मुड़कर पिया का हाथ थामता हुआ।

"बस थोड़ा और, जान। ऊपर से जो नज़ारा दिखेगा न, तू पैरों का दर्द भूल जाएगी। मैंने अपने जन्मदिन के लिए ये पूरी सुबह चुराई है, सिर्फ़ तेरे साथ बिताने को।"

"पिया... इधर आ, जल्दी! देख, वहाँ देख। पूरा सह्याद्रि अपने पैरों के नीचे है। ऐसी सुबह तूने पुणे में कभी नहीं देखी होगी, मेरी जान।"

ये था केयूर मलपानी। अट्ठाईस साल का, पुणे के एक बड़े बिल्डर घराने का इकलौता बेटा। और आज, ठीक आज, उसका जन्मदिन था।

वो पहाड़ों का दीवाना था, और अपनी मंगेतर पिया का उससे भी ज़्यादा। अपने जन्मदिन पर उसने कोई बड़ी पार्टी नहीं माँगी थी, कोई तोहफ़ा नहीं। बस यही एक ख़्वाहिश थी ... पिया का हाथ थामे लोहागढ़ की चढ़ाई, और सबसे ऊपर, दिन की पहली किरण।

उसने महीनों पहले से ये दिन सोच रखा था। कौन सी ट्रेल, कौन सा वक़्त, कहाँ से सूरज ठीक पिया के चेहरे पर पड़ेगा। प्यार में डूबा एक आदमी, जिसे ये पता ही नहीं था कि उसकी सबसे ख़ूबसूरत सुबह, दरअसल उसकी आख़िरी सुबह है।

"पीठ वाले बैग में केक है, तेरी पसंद वाला। और एक चीज़ और भी है, एक सरप्राइज़। पर वो नीचे उतरकर, नाश्ते के साथ। अभी बस एक फ़ोटो, बर्थडे वाली, ठीक इस किनारे पर, जहाँ पीछे पूरी वादी आए।"

पिया मुस्कुराई। पर उसकी उस मुस्कान में एक बारीक ठंडक थी, एक ऐसी ठंडक जिसे केयूर तीन साल में भी कभी पढ़ नहीं पाया था।

सच तो ये था कि पिया इस पहाड़ पर आना ही नहीं चाहती थी। फिर भी वो आई थी। क्योंकि आज की इस सुबह के लिए, ठीक इसी किनारे के लिए, हफ़्तों से एक और ही योजना बुनी जा रही थी। एक ऐसी योजना, जिसमें केयूर मेहमान नहीं, निशाना था।

"हैप्पी बर्थडे, केयूर।" "चल, फ़्रेम बनाते हैं। तू थोड़ा और पीछे हो जा, बिल्कुल किनारे पर। तभी तेरे पीछे पूरा सूरज आएगा।"

केयूर हँसते हुए पीछे हटा। एक क़दम। फिर दूसरा। उस लड़की पर उसका इतना यक़ीन था जितना किसी को अपनी साँसों पर होता है। और यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी।

ठीक उसी पल, बुर्ज के पिछवाड़े, चीड़ के पेड़ों की क़तार में, एक परछाईं हिली। एक हुडी में लिपटी, चेहरे-विहीन परछाईं। एक ऐसी परछाईं जिसका ज़िक्र पिया की किसी भी गवाही में कभी नहीं आने वाला था।

"अरे... रुक ज़रा। यहाँ पीछे कोई और भी...?"

बस इतना ही कह पाया वो। फिर एक चीख़।

एक लंबी, फटती हुई चीख़ जो घाटी की एक दीवार से टकराई, फिर दूसरी से, फिर तीसरी से। और फिर, एकदम से, कुछ नहीं।

घाटी के सारे पंछी एक साथ फड़फड़ाकर आसमान में उड़ गए। फिर वो धीरे-धीरे लौट आए, और सह्याद्रि पर वही पुरानी, गहरी ख़ामोशी दुबारा बैठ गई। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

विंचू काटा की उस अंधी खाई ने केयूर मलपानी को एक ही घूँट में निगल लिया। उसका अट्ठाईसवाँ जन्मदिन अभी सिर्फ़ सात मिनट पुराना था।

और उस पूरे पहाड़ पर सिर्फ़ एक इंसान ऐसा था जो जानता था कि ये कोई हादसा नहीं है। वो इंसान गिरा नहीं था। वो किनारे पर, सही-सलामत, खड़ा था।

पिया मित्तल किनारे पर खड़ी थी, खाई में झाँकती हुई। उसके होंठ काँप रहे थे। पर उसकी आँखें ... उसकी आँखें बिल्कुल सूखी थीं। अभी तक एक भी आँसू नहीं।

तभी उसके दुपट्टे के नीचे, पसली से सटे एक दूसरे फ़ोन ने हौले से थरथराहट भेजी। एक छुपा हुआ फ़ोन, जिसके होने का पिया के सिवा किसी को पता नहीं था। स्क्रीन पर सिर्फ़ एक शब्द जगमगा रहा था।

"समुद्र..."

उसने वो एक शब्द पढ़ा। फ़ोन को वापस दुपट्टे की तह में छुपाया। और फिर ... तभी उसकी आँखों से आँसू बहने शुरू हुए। जैसे किसी ने भीतर कोई नल खोल दिया हो।

घंटे भर बाद। मलावली की तलहटी में हलचल मच चुकी थी।

भाजे गाँव के कुछ लोग, एक स्थानीय रेस्क्यू टीम, और मावळ पुलिस की एक जीप। रस्सियों और स्ट्रेचर के सहारे केयूर का शरीर उस गहरी खाई से ऊपर लाया गया। कीचड़ में सना, पत्थरों से टूटा।

कुछ ही घंटे पहले जो नौजवान हँसते हुए ये पहाड़ चढ़ा था, अब उसे चार अजनबी अपने कंधों पर उठाकर नीचे उतार रहे थे।

तलहटी पर भीड़ जमा हो गई थी। किसी ने फ़ोन निकाल लिया, किसी ने हाथ जोड़ लिए। हवा में एक ही शब्द तैरने लगा, धीरे-धीरे, एक कान से दूसरे कान तक। ... "हादसा।" और जब कोई शब्द इतनी आसानी से सबको मंज़ूर हो जाए, तो अक्सर उसके पीछे कोई झाँकता ही नहीं।

उसके पीठ वाले बैग से एक कुचला हुआ केक निकला। और उसके साथ, एक छोटी मख़मली डिबिया, और एक तह किया हुआ ख़त। एक ख़त, जो अब कभी खुलने वाला नहीं था।

और पिया मित्तल? पिया रो रही थी। इस तरह रो रही थी कि आस-पास खड़े हर अजनबी का कलेजा फटा जा रहा था।

"हम... हम दोनों अकेले थे, साहब। बस मैं और वो। वो किनारे पर फ़ोटो खींच रहा था, और उसका पैर फिसल गया। मैंने हाथ बढ़ाया... मैंने सच में बढ़ाया... पर मैं उसे पकड़ नहीं पाई।"

आस-पास खड़ी औरतों की आँखें भी भर आईं। एक बूढ़े किसान ने अपनी पगड़ी उतार ली। किसी को शक की कोई गुंजाइश ही नहीं दिखी। एक जवान लड़की, अपने मंगेतर की लाश के पास, बिलख रही थी। इससे सच्ची तस्वीर भला और क्या हो सकती थी।

वो कहानी बिल्कुल सीधी थी। साफ़, सरल, और हर एक आँसू के साथ और सच्ची लगती हुई।

मावळ पुलिस ने वही दर्ज किया जो सामने था। दो मंगेतर, एक जन्मदिन का ट्रेक, एक फिसलता क़दम, एक अंधी खाई। फ़ाइल के माथे पर तीन शब्द लिख दिए गए। ... "ट्रेकिंग हादसा।"

और बात लगभग यहीं ख़त्म हो जाती। एक अमीर घर का बेटा, एक दर्दनाक हादसा, अख़बार में दो कॉलम की ख़बर, और फ़ाइल पर धीरे-धीरे जमती धूल।

लगभग। क्योंकि हर सीधी कहानी में कहीं न कहीं एक इंसान ऐसा होता है, जिसे चीज़ों का हद से ज़्यादा साफ़ होना ही सबसे ज़्यादा खटकता है।

सब-इंस्पेक्टर वैशाली कदम। उम्र क़रीब अड़तीस साल। लोनावला रूरल थाने की।

पंद्रह साल की पुलिस की नौकरी ने उसकी आँखों में एक ख़ास किस्म की थकान भर दी थी। पर वो थकान सुस्ती नहीं थी। वो उस शिकारी की थकान थी जो जानता है कि जंगल कभी पूरी तरह ख़ाली नहीं होता।

वो देर से पहुँची थी, जब भीड़ छँटने लगी थी। उसने शरीर देखा। फिर उस टूटी डिबिया और उस बंद ख़त को देखा। और फिर उसने पिया को देखा। और कहीं गहरे, कुछ ठीक नहीं बैठा।

वैशाली ने पिया के हाथ देखे। नाख़ूनों में कहीं मिट्टी नहीं थी, हथेलियों पर कोई ख़रोंच नहीं। जिस लड़की ने अभी-अभी अपने मंगेतर को खाई में गिरने से बचाने के लिए हाथ बढ़ाया हो, उसके हाथ इतने बेदाग़ कैसे रह गए? पर उसने कुछ कहा नहीं। बस देखती रही, और याद रखती रही।

"बेटा... पिया। मुझे माफ़ करना, ऐसे वक़्त में पूछ रही हूँ। तुम दोनों ऊपर बुर्ज पर पहुँचे कितने बजे थे?"

"पाँच बजकर बीस मिनट पर, साहब। हम अकेले थे, बस मैं और केयूर। वो किनारे पर फ़ोटो खींच रहा था और उसका पैर फिसल गया।"

वैशाली एक पल को ठिठकी। ये वाक्य वो पिछले एक घंटे में तीसरी बार सुन रही थी। और तीनों बार, शब्द-दर-शब्द बिल्कुल वही। एक भी लफ़्ज़ इधर का उधर नहीं, एक भी विराम अलग नहीं।

वैशाली जानती थी कि सच्चा ग़म कभी एक जैसा नहीं होता। वो हर बार टूटता है, अटकता है, आगे-पीछे होता है, कुछ भूल जाता है। पर पिया की कहानी ... वो एक रिकॉर्ड की हुई आवाज़ की तरह, हर बार हूबहू एक जैसी बजती थी।

और एक बात और थी। पिया एक बार भी ये नहीं पूछ रही थी कि नीचे क्या हुआ, केयूर बचा या नहीं, शरीर कहाँ है, ज़िंदा है या... जैसे उसे पहले से मालूम हो कि इस कहानी का अंत क्या है।

"और वहाँ ऊपर तुम दोनों के सिवा कोई नहीं था? कोई और ट्रेकर, कोई गाइड, कोई राह चलता?"

"कोई नहीं, साहब। बिल्कुल कोई नहीं। पूरे बुर्ज पर हम सिर्फ़ दो थे।"

और तभी वो एक लम्हा आया, जिसने वैशाली कदम की पंद्रह साल के तजुर्बे वाली रीढ़ में एक ठंडी सिहरन दौड़ा दी।

एक फ़ोटोग्राफ़र का कैमरा दूसरी ओर मुड़ा। भीड़ एक पल को हटी। और पिया को लगा कि अब उसे कोई नहीं देख रहा। उसी एक पल में, उसके आँसू रुक गए।

बिल्कुल रुक गए। जैसे किसी ने अंदर कोई स्विच बंद कर दिया हो। और उसका चेहरा ... उसका चेहरा पत्थर हो गया। ठंडा। शांत। एकदम ख़ाली। जैसे किसी ने एक पल के लिए मुखौटा उतार कर असली चेहरा दिखा दिया हो।

फिर, जैसे ही एक कॉन्स्टेबल पानी लेकर पास आया, वो स्विच दुबारा चालू हुआ। कंधे काँपे, होंठ फड़फड़ाए, और आँसू फिर बहने लगे।

उस पूरी भीड़ में से एक भी इंसान ने वो एक पल नहीं पकड़ा। सिर्फ़ एक जोड़ी आँखों ने पकड़ा। सब-इंस्पेक्टर वैशाली कदम की आँखों ने।

"आँसू भी कोई इस तरह रटता है क्या...?"

दोपहर ढलने लगी थी जब बाक़ी सब पहाड़ से नीचे उतर गए। पिया को उसके घरवाले पुणे ले गए। केयूर का शरीर पोस्टमॉर्टम के लिए ससून अस्पताल भेज दिया गया। और फ़ाइल पर "हादसे" की मुहर लगभग लग चुकी थी।

पर वैशाली कदम नीचे नहीं उतरी।

वो अकेली, दुबारा, उस टेढ़ी चढ़ाई से विंचू काटा बुर्ज तक चढ़ी। उसी किनारे तक, जहाँ से केयूर गिरा था। सह्याद्रि की शाम की सुनहरी, तिरछी रोशनी अब उन पुराने पत्थरों पर बिखरी थी।

उसने घुटनों के बल बैठकर ज़मीन को पढ़ना शुरू किया। मानसून के बाद की नरम, गीली मिट्टी। ऐसी मिट्टी जो अपने ऊपर पड़े हर क़दम का निशान थाम लेती है, किसी वफ़ादार गवाह की तरह।

वैशाली ने फ़ोन की टॉर्च तिरछी करके मिट्टी पर डाली, ताकि हर उभार, हर गड्ढा साफ़ उभर आए। पंद्रह साल में उसने एक बात पक्की तौर पर सीखी थी। ज़मीन कभी झूठ नहीं बोलती। ... इंसान बोलते हैं।

पिया के जूतों के निशान थे। छोटे, महिलाओं वाले। और केयूर के, बड़े, ट्रेकिंग शूज़ के, सीधे किनारे की ओर जाते हुए। और फिर वहीं, किनारे पर, रुक जाते हुए।

दो लोग। बस दो। ठीक वैसे ही जैसे पिया बार-बार, रट-रट कर कह रही थी। "हम सिर्फ़ दो थे।"

और तभी वैशाली की उँगली हवा में ही रुक गई। एक तीसरे निशान पर आकर जम गई।

किनारे के बिल्कुल पास, एक चट्टान की ओट में, आधा छुपा हुआ, एक और जूते का निशान था। बड़ा। मर्दाना। भारी, गहरे तलवे वाला। ट्रेकिंग शूज़ का नहीं। किसी मज़बूत बूट का।

बिल्कुल ताज़ा। उसी सुबह का। उसी गीली मिट्टी में, उतनी ही गहराई तक धँसा हुआ जितना बाक़ी के निशान। ना केयूर का, ना पिया का। किसी तीसरे इंसान का।

निशान चट्टान की ओट में था, बुर्ज के पिछवाड़े की तरफ़ मुँह किए हुए। ठीक उसी क़तार में, जहाँ भोर के धुंधलके में चीड़ के पेड़ों के बीच एक हुडी वाली परछाईं हिली थी। पर वो परछाईं वैशाली ने नहीं देखी थी। ... वो सिर्फ़ हमने देखी थी।

और वैशाली के कानों में पिया की वो रटी हुई आवाज़ फिर से गूँज उठी। "हम अकेले थे, साहब। बिल्कुल कोई नहीं था। पूरे बुर्ज पर हम सिर्फ़ दो थे।"

"दो...?"

वैशाली कदम ने उस तीसरे, अजनबी निशान की तरफ़ देखा। फिर उस अंधी खाई की तरफ़, जिसने कुछ घंटे पहले एक हँसते हुए नौजवान को निगल लिया था। और उसके जबड़े की हड्डी धीरे-धीरे सख़्त होती चली गई।

"अगर तुम सिर्फ़ दो थे, पिया मित्तल... तो ये तीसरा निशान किसका है?"

उस शाम, लोहागढ़ के उस सुनसान बुर्ज पर, धीरे से, बिना किसी को ख़बर हुए, एक "हादसा" एक सवाल में बदल गया।

और वैशाली कदम ने वहीं, उस ढलते सूरज के नीचे, तय कर लिया। ये फ़ाइल आज बंद नहीं होगी। ना आज, ना तब तक, जब तक ये तीसरा निशान अपना नाम न बता दे।

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