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अध्याय 27 / 30 पढ़ने में 11 मिनट

आख़िरी बहस

आख़िरी ट्रेक द्वारा Avni Oberoi

शिवाजीनगर अदालत की सीढ़ियों पर धूप अभी उतरी ही थी, जब कई हफ़्तों की गवाहियों के बाद आख़िरकार वो दिन आ गया जिसका सबको इंतज़ार था, अंतिम बहस का दिन। कमरा नंबर छह की हर सीट भरी हुई थी, जैसे कोई आख़िरी अंक देखने आया हो।

अमेय की काँपती गवाही के बाद से महीने बीत चुके थे, तारीख़ पर तारीख़, दलील पर दलील, हर हफ़्ते एक नई पेशी और वैशाली के थाने की मेज़ पर एक और फ़ाइल जो इंतज़ार में पड़ी रही। अब दोनों पक्षों के पास कहने को सिर्फ़ एक आख़िरी मौक़ा बचा था।

गैलरी में वैशाली आज भी उसी कोने में बैठी थी, हाथ में वही पुरानी नोटबुक, जिसके पन्ने अब मुड़े-तुड़े और लगभग भर चुके थे। सुष्मा और नरेश एक-दूसरे का हाथ थामे, आँखों में महीनों की थकान और एक बहुत छोटी सी उम्मीद, सुष्मा की गोद में अब भी वही तस्वीर।

जज ने घड़ी देखी, फिर वृंदा आप्टे की तरफ़ देखा। "अभियोजन पक्ष, अपनी अंतिम दलील शुरू कर सकता है, और याद रहे, अदालत आज हर धागे को एक साथ जोड़कर देखना चाहती है, टुकड़ों में नहीं।"

"माननीय, ये मुक़दमा एक 'हादसे' की फ़ाइल से शुरू हुआ था, वो फ़ाइल जिसे बंद करने का हुक्म था। आज मैं अदालत को दिखाना चाहती हूँ कि वो फ़ाइल झूठ पर खड़ी थी, कड़ी दर कड़ी।"

"पहली कड़ी, वो दूसरा फ़ोन, जो अभियुक्त पिया मित्तल के नाम पर छुपा हुआ चल रहा था, और जो केयूर मलपानी के गिरने के ठीक उसी मिनट लोहागढ़ के मलावली टावर पर पिंग करता है, वो नंबर जिसके वहाँ होने का कोई स्पष्टीकरण आज तक नहीं आया।"

गैलरी में एक हल्की सरसराहट दौड़ी, जैसे हर कोई फिर एक बार उस मिनट को याद कर रहा हो, वही मिनट जिस पर पूरा केस पहली बार मुड़ा था।

"दूसरी कड़ी, टावर का पूरा डंप, जो साबित करता है कि पिया का बरनर और चिराग भाटिया का बरनर, दोनों उसी आधे घंटे में उसी टावर पर मौजूद थे, जब पिया की गवाही क़सम खाकर कहती है वो पहाड़ पर बिल्कुल अकेली थी।"

"तीसरी कड़ी, रिकवर की गई चैट, 'समुद्र,' 'पंछी उड़ गया,' शब्द जो ऊपर से इश्क़ लगते हैं, पर जिनका असली मतलब इस अदालत के सामने पहले ही साबित हो चुका है, हर कोड शब्द एक तारीख़ से, एक घटना से बँधा।"

"चौथी कड़ी, भाजे की पुलिया के नीचे मिली काली हुडी, जिस पर चिराग भाटिया का डीएनए और केयूर मलपानी के बाल दोनों मिले, दो आदमी जो कभी मिले ही नहीं होने का दावा किया गया था।"

"पाँचवीं कड़ी, वज़न वाला पुतला, जो हर बार पास की चट्टान पर रुका, जबकि असली शरीर बाईस मीटर आगे मिला। डॉक्टर मोरे और भौतिकी दोनों ने अदालत को बताया, ये सिर्फ़ फिसलने से मुमकिन नहीं।"

"और आख़िरी कड़ी, वो दोस्त जो जानता था, अमेय गोखले, जिसने डर के बावजूद इसी कठघरे में सच बोला, जब झूठ बोलना कहीं आसान था।"

"माननीय, हर कड़ी अकेली एक इत्तेफ़ाक़ हो सकती है। पर सातों कड़ियाँ मिलकर सिर्फ़ एक ही कहानी कहती हैं... ये हादसा नहीं था, ये एक सोची-समझी साज़िश थी, जो एक जन्मदिन की सुबह को हथियार बना लेती है।"

सुष्मा की आँखें भर आईं, नरेश ने चुपचाप उनका हाथ दबाया। वैशाली ने अपनी नोटबुक बंद कर ली, जैसे अब उसमें कुछ जोड़ने को बचा ही न हो, महीनों की मेहनत आख़िर एक पंक्ति में सिमट आई हो।

"बस थोड़ा और सुष्मा जी... अब सारे धागे उनके हाथ में हैं, अपने आप नहीं टूटेंगे। हमने अपना काम कर दिया है।"

गावडे आज अदालत में नहीं थे, थाने के काम में उलझे, पर उनकी मेज़ पर अब भी वो पुरानी फ़ाइल पड़ी थी, वैशाली के तबादले की सिफ़ारिश, जो महीनों से न मंज़ूर हुई, न ख़ारिज।

वृंदा बैठ गई। खानविलकर धीरे से खड़ा हुआ, अपनी फ़ाइल हाथ में लिए, चेहरे पर वही पुरानी, तैयार मुस्कान, जो महीनों से उसका हथियार रही थी।

"माननीय, अभियोजन ने सात कड़ियाँ गिनाईं, बड़े आत्मविश्वास से। मैं अदालत को दिखाना चाहता हूँ कि हर कड़ी अकेले में टूट जाती है, एक-एक करके।"

"'समुद्र,' 'पंछी,' ये तो दो प्रेमियों की निजी भाषा है माननीय, हर जोड़ा अपनी दुनिया में कोई न कोई कोड बना लेता है, कुछ शर्मीले शब्द जो सिर्फ़ उन दोनों को समझ आते हैं। इसमें हत्या कहाँ लिखी है?"

"पुतले का प्रयोग एक तमाशा है, एक नाटक, जो असली पहाड़ की मिट्टी, असली हवा, असली पैर की पकड़ को कभी दोहरा नहीं सकता। एक पुतला इंसान नहीं होता, माननीय, वो सिर्फ़ रबर और कपड़ा है।"

"सीसीटीवी में कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता माननीय, सिर्फ़ एक हुडी, एक बाइक। और कोई चश्मदीद, कोई भी, ये गवाही नहीं देता कि उसने अपनी आँखों से किसी को धक्का देते देखा।"

"किसी ने धक्का नहीं देखा माननीय... पूरा मुक़दमा इत्तेफ़ाक़ों की एक कतार पर खड़ा है, सबूत पर नहीं, और इत्तेफ़ाक़ पर किसी को फाँसी तक नहीं भेजी जाती, सज़ा तो दूर की बात है।"

"और अमेय गोखले, माननीय, एक डरा हुआ आदमी, जिसे सज़ा से छूट का सौदा मिला है। उसकी गवाही पर पूरा मुक़दमा नहीं टिक सकता, एक ऐसा आदमी जो ख़ुद बचने के लिए बोल रहा हो।"

"और माननीय, मेरी मुवक्किल पिया मित्तल एक सदमे में डूबी हुई मंगेतर है, जिसने अपना मंगेतर खोया, और अब उसी ग़म की सज़ा भुगत रही है, दोहरी सज़ा, एक बार पहाड़ पर, एक बार इस कठघरे में।"

जज की क़लम एक पल के लिए रुक गई, आँखों में शक की एक बहुत महीन लकीर खिंच गई, इतनी महीन कि शायद सिर्फ़ वैशाली ने ही उसे पढ़ा। जज ने खानविलकर से पूछा, "तो वकील साहब, आपके मुताबिक़ ये सातों संयोग सिर्फ़ बदक़िस्मती हैं?"

"जी माननीय, बदक़िस्मती और एक ऐसा जोड़ा जिसकी निजी ज़िंदगी को पुलिस ने साज़िश का रंग दे दिया।"

"माननीय, इत्तेफ़ाक़ एक बार होता है, दो बार संयोग होता है। सात कड़ियाँ एक साथ इत्तेफ़ाक़ नहीं, नक़्शा होती हैं, एक ऐसा नक़्शा जो सिर्फ़ एक ही मंज़िल की तरफ़ इशारा करता है।"

"नक़्शा या डर में लिखी एक कहानी, माननीय... ये तय करना अदालत का काम है, अभियोजन का नहीं। मैं बस इतना कहूँगा, शक का फ़ायदा अभियुक्त को मिलना चाहिए, हमेशा मिलता आया है।"

कठघरे में पिया और चिराग आज एक-दूसरे की तरफ़ एक बार भी नहीं देखे, दोनों की नज़रें अपने-अपने वकील पर टिकी, जैसे बीच की वो दूरी अब हफ़्तों पुरानी हो चुकी हो, इश्क़ की जगह सिर्फ़ एक ठंडी, साझा चुप्पी बची थी।

चिराग की उँगलियाँ मेज़ पर बेचैन थीं, जबकि पिया की नज़र एक पल के लिए उस पर टिकी, फिर तुरंत हट गई, जैसे उसे डर हो कि देखने भर से कोई और राज़ छलक जाएगा।

जज ने कुछ देर दोनों दलीलें अपने काग़ज़ पर लिखीं, फिर घड़ी की तरफ़ देखा और आधे घंटे के अवकाश का ऐलान कर दिया।

अवकाश की उस ख़ामोशी में, वैशाली की आँखें बंद हुईं, और हम आख़िरी बार उस भोर में लौटते हैं, ट्रैक-बी की आख़िरी साँस।

लोहागढ़ की तलहटी में तब अभी अँधेरा हल्का हो रहा था, केयूर की गाड़ी की डिक्की में एक छोटा सा बैग था, जिसमें एक अंगूठी और एक हस्तलिखित ख़त छुपा हुआ था, केक की एक छोटी सी डिब्बी भी, जो वो ऊपर बुर्ज पर खोलना चाहता था।

"पिया, आज का दिन बस मेरे लिए नहीं है... आज का दिन हम दोनों के लिए है।"

पिया ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ हल्का सा मुस्कुरा दी, आँखें कहीं और, एक ऐसी जगह जहाँ केयूर कभी नहीं पहुँच पाया, उसकी उँगलियाँ जेब में उस दूसरे फ़ोन को छूती रहीं जिसे वो कभी दिखा नहीं पाई।

"शादी के बाद हम हर साल यहीं आएँगे, इसी बुर्ज पर, और हर बार मैं तुम्हें याद दिलाऊँगा कि यहीं से हमारी असली शुरुआत हुई थी।"

यहाँ आवाज़ भारी हो जाती है, क्योंकि दर्शक जानते हैं जो केयूर नहीं जानता, कि ये शुरुआत नहीं, आख़िर है, कि जिस हाथ को वो थामे हुए है वही हाथ कुछ मिनटों बाद उसे धकेल देगा।

"चलो... सूरज निकलने से पहले ऊपर पहुँच जाएँ, मैंने तुम्हारे लिए वहीं एक सरप्राइज़ रखा है, कुछ ऐसा जो तुम्हें कभी नहीं भूलेगा।"

"मैंने माँ को भी नहीं बताया कि आज मैं ये अंगूठी लेकर आया हूँ... सोचा था पहले तुम्हें दिखाऊँगा, फिर सबको साथ बुलाकर जश्न मनाएँगे।"

केयूर ने पिया का हाथ थामा और सूरज की तरफ़ मुड़ गया, भरोसे से भरा, बेख़बर, ठीक वैसा ही जैसा वो हमेशा था। और यहीं, इस आख़िरी मुस्कुराते फ़्रेम पर, ट्रैक-बी का पर्दा हमेशा के लिए गिर जाता है।

अवकाश ख़त्म हुआ, और कमरा नंबर छह फिर भर गया, जज अपनी कुर्सी पर लौट आया, फ़ाइलें सामने सजी हुईं, बाहर गलियारे में पत्रकारों की भीड़ पहले से दोगुनी हो चुकी थी।

दोनों पक्षों ने अपनी आख़िरी बात रखने का एक-एक आख़िरी मौक़ा माँगा, और जज ने सिर हिलाकर इजाज़त दे दी।

"माननीय, एक जवान बेटा, जिसने सिर्फ़ प्यार किया, भरोसा किया, और उसी भरोसे की क़ीमत अपनी जान से चुकाई। इंसाफ़ अब सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं, इस अदालत के फ़ैसले में चाहिए।"

"माननीय, शक की गुंजाइश जहाँ हो, वहाँ सज़ा नहीं, रिहाई इंसाफ़ है। मेरे मुवक्किलों को इसी अदालत से वो रिहाई माँगता हूँ, कोई कम नहीं।"

"और माननीय, अभियोजन को इसी अदालत से सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए, वो सच जो एक माँ को लौटा दे, चाहे वो काग़ज़ पर ही सही।"

अदालत में एक अजीब सी ख़ामोशी उतर आई, वो ख़ामोशी जो हर बड़े फ़ैसले से ठीक पहले उतरती है, जब हर साँस भी अपनी बारी का इंतज़ार करती लगती है।

जज ने अपनी क़लम उठाई, फिर रख दी, दोनों वकीलों की तरफ़ बारी-बारी देखा, और आख़िर में गैलरी की तरफ़, जहाँ एक माँ अभी भी बेटे की तस्वीर सीने से लगाए बैठी थी।

जज ने साफ़, धीमी आवाज़ में कहा, "अदालत ने दोनों पक्षों की पूरी दलील सुन ली है। इतने बड़े मुक़दमे पर फ़ैसला जल्दबाज़ी में नहीं दिया जा सकता।"

"फ़ैसला सुरक्षित रखा जाता है," जज ने कहा, "और अगले महीने की सत्रह तारीख़ को अदालत अपना फ़ैसला सुनाएगी।"

सुष्मा का हाथ काँप गया, नरेश ने उसे कसकर पकड़ लिया, दोनों की आँखों में डर और उम्मीद एक साथ उतर आए, महीनों का इंतज़ार अब एक तारीख़ में बदल गया।

बाहर गलियारे में कैमरे और माइक पहले से तैयार खड़े थे, और जैसे ही वैशाली दरवाज़े से निकली, एक पत्रकार भीड़ चीरकर आगे आया।

"अभी कुछ नहीं कहूँगी। सत्रह तारीख़ को अदालत बोलेगी, मैं नहीं।"

वैशाली ने अपनी नोटबुक बंद की और आख़िरी बार वो तारीख़ लिख ली, सत्रह, अगले महीने, जैसे वो तारीख़ अब उसकी अपनी ज़िंदगी की भी हो गई हो, महीनों की भागदौड़, तानों और एक फ़ाइल जो बंद होने से इनकार करती रही, सब उसी एक दिन पर आकर टिक गया।

कठघरे में पिया का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, चिराग ने आँखें बंद कर लीं, दोनों के बीच अब भी वही दूरी थी, जो हफ़्तों से पड़ी थी, इश्क़ जो कभी उन्हें जोड़ता था, अब बस एक-दूसरे से भागने की वजह बन चुका था।

पूरी अदालत, सुष्मा, वैशाली, वृंदा, खानविलकर, और कठघरे में खड़े दोनों अभियुक्त, सब एक साथ उस एक तारीख़ पर टँग गए। सत्रह तारीख़, जब एक जज की आवाज़ या तो एक माँ को उसका इंसाफ़ देगी, या एक साज़िश को आज़ादी।

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