Chapter 13 of 28
ज़हर का इल्ज़ाम
बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi
राणा के एक फ़ोन की मशीन सुबह चल पड़ती है, अँधेरे में महिका की भट्टी के पीछे ज़हर की शीशी और छेड़ा हुआ रजिस्टर रख दिया जाता है, और जब बेख़बर महिका सबके सामने अपने हाथ से बादशाह को खिलाती है तो अगस्त्य को बीमार दिखा कर उस पर ज़हर देने का इल्ज़ाम मढ़ दिया जाता है, बोर्ड रूम में एक कंगाल का लफ़्ज़ राणा ख़ानदान के सामने बेमोल हो जाता है, ठीक उसी झूठ की शक्ल में जिसने बारह साल पहले उसकी माँ निर्मला वर्मा को कुचला था, और अकेला अगस्त्य जो सच जानता है एक लफ़्ज़ नहीं बोल पाता, आख़िर में राणा पुलिस बुलवा देता है और डरी हुई महिका समझ जाती है कि उसे बचाने वाला अकेला हाथ उसी आदमी का है जिसे वो छोड़ आई थी, औ
हिमराज की कैंटीन अभी अँधेरे में डूबी थी। और उसी अँधेरे में एक दस्ताना पहना हाथ, जो महिका का नहीं था, चुपके से अंदर उतरा। मसालों की अलमारी के पीछे एक छोटी काँच की शीशी सरका दी गई, और रजिस्टर का एक पन्ना बदल दिया गया। कल रात लुटियंस की कोठी से जो फ़ोन उठा था, उसकी पहली आहट अब इस रसोई तक पहुँच चुकी थी। और ये सिर्फ़ हम जानते थे।
और ठीक सात बजे, उसी दरवाज़े से दिन की पहली धूप अंदर आई, आस्तीनें चढ़ाए, बालों का जूड़ा बाँधे, इस पूरे पत्थर के टावर की अकेली सच्ची गरमाहट। महिका। उसे कुछ नहीं पता था। वो सीधी अपनी भट्टी की तरफ़ बढ़ी, उसी अलमारी के पास से गुज़री जिसके पीछे अभी-अभी उसकी बरबादी रख दी गई थी, और मुस्कुरा कर बंसी काका को आवाज़ दी।
"काका, आज राजमा रात से भिगोए थे ना? ऊपर वाले बादशाह ने फिर सुबह से कुछ नहीं खाया होगा, मुझे पक्का पता है।" "भूखे को अपने हाथ से खिलाना सबसे बड़ी दुआ है, माँ कहती थीं। और वो ऊपर बैठा आदमी इस पूरी दुनिया का सबसे बड़ा भूखा है।"
"दुआ-वुआ छोड़ बेटी, और बंसी काका की एक बात कान खोल कर सुन।" "तू इस्तीफ़ा दे कर लौटी है, और अब ऊपर वालों की नज़र सीधी तुझ पर है। इस टावर में जो ऊपर वालों के बहुत क़रीब चला जाता है ना, वो एक सुबह यूँ ग़ायब हो जाता है जैसे कभी था ही नहीं।"
"आप ना, काका, हर बात में मुझे डराते रहते हो।" "मैं किसी की क़रीब नहीं जाती, मैं तो बस साहब का पेट भरने जाती हूँ। कोई और उनकी थाली को हाथ भी लगा दे तो वो राख कह कर फेंक देते हैं। अब इसमें मेरा क्या क़ुसूर, बताओ?" "बर्फ़ का बादशाह... और ढंग से दो कौर नहीं खा पाता।"
"हँस ले, हँस ले, मेरी माँ।" "पर आज सुबह से कुछ ठीक नहीं लग रहा मुझे। ये सिक्योरिटी वाले बार-बार कैंटीन के चक्कर क्यों काट रहे हैं? और ये दो नए चेहरे कौन हैं? मैंने तीस साल इसी रसोई में काटे हैं बेटी, मुझे बू आ जाती है जब कुछ पकने वाला होता है, खाने में भी और आदमियों में भी।"
"बू तो आपको तब भी आती है जब पड़ोस की बिल्ली रसोई में झाँक ले।" "छोड़िए काका, ये देखिए राजमा कैसा खिला-खिला बना है। ऐसा खाना खा कर तो पत्थर भी पिघल जाए। और वो ऊपर वाला तो फिर भी इंसान ही है, कहीं अंदर से।"
"ले, ये दो लड्डू रख अपने पास, ऊपर जा कर तू भी कुछ मुँह में डाल लेना, सुबह से बस दूसरों को खिलाती रहती है।" "और सँभल कर जाना बेटी। ऊपर वाला जो असली है ना, वो तेरा भला करे।"
पर महिका के हाथ रुके नहीं। वो अपनी माँ के उसी हाथ से खाना बाँधती रही, वही हाथ जिसका ज़ायका बादशाह की अकेली दवा भी था और वही वजह भी कि ताक़तवर लोग उसे रास्ते से हटा देना चाहते थे। उसने गरम टिफ़िन एक कपड़े में बाँधा, बंसी के दिए लड्डू जेब में रखे, और लिफ़्ट की तरफ़ बढ़ गई, इस बात से बेख़बर कि वो अपने ही हाथों अपनी बरबादी ऊपर ले जा रही थी।
काँच के उस फ़्लोर पर आज बादशाह की नई कुल्फ़ी की एक टेस्टिंग सजाई गई थी। और बादशाह की कुर्सी के ठीक पीछे, हमेशा की तरह पॉलिश की हुई मुस्कान लिए संजना राणा खड़ी थी। महिका को अंदर आते देख उसकी आँखों में एक बर्फ़ीली चमक तैर गई, पर होंठों पर शहद ही रहा।
"आओ, महिका। अच्छा हुआ तुम आ गईं, तुम्हारा ही इंतज़ार था।" "साहब सुबह से कुछ नहीं खा पाए हैं। और इनके हलक़ से तो बस तुम्हारे ही हाथ का उतरता है ना... तो आज तुम्हीं अपने हाथ से खिला दो इन्हें।" "यहीं, सबके सामने।"
"देखा, ये बात तो मैं रोज़ कहती हूँ।" "लीजिए साहब, राजमा-चावल। और आज कोई बहाना नहीं चलेगा, पूरा खाना है आपको, ठंडा होने से पहले।" "बर्फ़ के बादशाह को गरम खाना खिलाना भी अपने आप में एक जंग है।"
और अगस्त्य ने खाया। बारह साल में वही अकेला ज़ायका जो उसकी ज़ुबान पहचानती थी, वही नमक, वही गरमाहट, वही दुआ। पर मुश्किल से दो कौर के बाद, कुछ हुआ। बादशाह का हाथ अचानक अपने गले तक गया, साँस लड़खड़ाई, चेहरा सफ़ेद पड़ने लगा। हाथ से चम्मच छूट कर काँच की मेज़ पर खनका, और वो कुर्सी का सहारा ले कर झूल गया।
"साहब? ... साहब, क्या हुआ आपको?" "कोई पानी लाओ, जल्दी! साहब, मेरी तरफ़ देखिए, बताइए क्या हुआ?"
और जैसे इसी एक पल का इंतज़ार था, पूरे कमरे में हड़बड़ी मच गई। पर संजना ज़रा भी नहीं घबराई। उसकी आवाज़ में डर नहीं, एक अजीब सी तैयारी थी, जैसे उसे पहले से पता हो कि अब क्या कहना है और किस तरफ़ उँगली उठानी है।
"साहब! ... अरे कोई डॉक्टर बुलाओ, जल्दी! सिक्योरिटी!" "इसने अभी-अभी अपने हाथ से क्या खिलाया इन्हें? सब ने देखा! बरसों से सिर्फ़ इसी के हाथ का खाते हैं साहब, और आज खाते ही ये हाल हो गया इनका?"
और उसी पल, जैसे किसी ने पहले से हर पुर्ज़े में तेल भर रखा हो, सिक्योरिटी अंदर आ गई। किसी ने महिका की अलमारी की तलाशी की बात कही, और मसालों के पीछे से वही काँच की शीशी बरामद कर ली गई जो सुबह अँधेरे में वहाँ रखी गई थी। रजिस्टर खोला गया, एक छेड़ा हुआ पन्ना, महिका के नाम पर एक ऐसी माँग जो उसने कभी नहीं की थी। एक मामूली कुक, चंद साँसों में, बादशाह की क़ातिल बना दी गई।
"सबने अपनी आँखों से देख लिया? ज़हर, इसी की रसोई से। रजिस्टर, इसी के हाथ का।" "जिस हाथ को तुम दुआ का हाथ बताती फिरती हो, महिका, आज उसी हाथ ने इस कंपनी के मालिक की जान लेने की कोशिश की है।"
"ये... ये शीशी मेरी नहीं है! मैंने ये अपनी ज़िंदगी में कभी देखी तक नहीं!" "मैंने तो सिर्फ़ खाना बनाया है, राजमा-चावल, अपनी माँ के हाथ से। मैं भला साहब को क्यों... ये सब क्या हो रहा है, कोई तो बताए?"
डॉक्टर ने अगस्त्य को किसी तरह सँभाल लिया, पर तब तक बात बोर्ड रूम तक पहुँच चुकी थी। महिका को दो सिक्योरिटी वालों के बीच उसी लंबी काँच की मेज़ के सामने ला खड़ा किया गया। मेज़ के सिरे पर बोर्ड चेयरमैन दिग्विजय राणा बैठा था, अपनी हमेशा वाली पिता जैसी संजीदगी ओढ़े। और एक तरफ़, सबसे अलग, सफ़ेद पड़ा हुआ अगस्त्य बैठा था। बिल्कुल ख़ामोश।
"बैठ जाइए सब।" "आज हिमराज के इतिहास का सबसे काला दिन है। मेरे अपने बेटे जैसे अगस्त्य को, इसी कंपनी की एक मामूली मुलाज़िम ने ज़हर दे कर मार डालने की कोशिश की है।" "और सबूत आपके सामने है। ये ज़हर की शीशी इसी की रसोई से निकली, और ये रजिस्टर इसी के अपने हाथ का।"
"साहब, ये झूठ है, ख़ुदा क़सम झूठ है।" "मैं रोज़ बारह घंटे उस भट्टी पर खड़ी रहती हूँ ताकि मेरे भाई की फ़ीस और नानी की दवाई आ सके। मैं भला किसी की जान क्यों लूँगी? मैंने तो साहब को बचाने के लिए खिलाया था, मारने के लिए नहीं।"
"बचाने के लिए?" "ये देखिए सब, इसी हफ़्ते इसने स्टोर से वो चीज़ मँगवाई जिसकी एक कुक को कोई ज़रूरत नहीं, और इस पन्ने पर इसके अपने दस्तख़त हैं।" "एक कंगाल कैंटीन वाली के हाथ में जब अचानक बादशाह की थाली आ जाए, तो समझ जाना चाहिए कि कहीं ना कहीं कोई उसे ख़रीद चुका है।"
"वो दस्तख़त मेरा नहीं है! ये पन्ना बदला गया है!" "पर मैं ये साबित कैसे करूँ? मैं ग़रीब हूँ, इसलिए मेरा हर लफ़्ज़ झूठ, और आपका हर लफ़्ज़ सच? ... इस पूरे कमरे में मेरी बात का कोई मोल ही नहीं क्या, सिर्फ़ इसलिए कि मेरे पास पैसा नहीं है?"
"मेरी माँ नर्स थीं। सारी-सारी रात जाग कर वो अजनबियों की जान बचाती थीं, बेगानों के लिए अपना खाना तक छोड़ देती थीं।" "मैं उन्हीं की बेटी हूँ, उन्हीं का हाथ है मेरे इस हाथ में। जिस हाथ ने ज़िंदगी भर जान बचाई हो, उसकी बेटी किसी की जान लेगी? ये इल्ज़ाम मुझ पर नहीं, मेरी मरहूम माँ पर लग रहा है।"
और यहीं, इस काँच के कमरे में, वो सबसे सर्द सच उतरा जो सिर्फ़ हम जानते थे। एक छेड़ा हुआ रजिस्टर, एक झूठी शीशी, और इल्ज़ाम उस इंसान के माथे जिसका ना पैसा था ना कोई पूछने वाला। बिल्कुल यही शक्ल थी उस मशीन की जिसने बारह साल पहले एक बेगुनाह नर्स निर्मला वर्मा को कुचला था। और आज वही मशीन घूम कर उसी नर्स की बेटी पर आ खड़ी थी, जो अपनी माँ की ये कहानी जानती तक नहीं थी, और अनजाने में अपनी ही सफ़ाई में अपनी माँ का नाम ले बैठी थी।
"मरी हुई माँ की क़समें और आँसू यहाँ किसी काम के नहीं आते, लड़की।" "इस दुनिया में लफ़्ज़ों का नहीं, सबूतों का मोल होता है। और सबूत तेरे ख़िलाफ़ है। तेरी माँ जो भी रही हो, आज उसका नाम भी तुझे नहीं बचा सकता।"
"रुकिए। एक मिनट रुकिए, प्लीज़।" "ये इल्ज़ाम बहुत संगीन है। किसी के माथे क़ातिल होने का ठप्पा लगाने से पहले उस शीशी की जाँच तो हो, ये पता तो चले कि उसमें था क्या, और वो रजिस्टर सच में इसी के हाथ का है भी या नहीं।" "अगस्त्य... तुम कुछ कहोगे? ये लड़की महीनों से तुम्हारे सामने है। तुम कुछ बोलोगे?"
पर बादशाह ने कुछ नहीं कहा। जो आदमी बारह साल में पहली बार इसी लड़की के हाथ से जीना सीख रहा था, जो इस कमरे में अकेला जानता था कि इसकी माँ को भी ठीक ऐसे ही एक झूठ ने बरबाद किया था, वो जमा हुआ बस देखता रहा। उसके सीने का पूरा सच उसकी ज़ुबान से कहीं ज़्यादा भारी था। और वीर का सवाल हवा में ही लटका रह गया।
"वीर, जज़्बात की जगह ये कमरा नहीं है।" "जिस लड़की ने कंपनी के मालिक की जान लेने की कोशिश की हो, उसके लिए जाँच नहीं, सीधा क़ानून होता है। और हाथ तो हम रंगे हुए पकड़ चुके हैं। अब बहस की कोई गुंजाइश नहीं।"
"मैं बस इतना कह रहा हूँ कि किसी बेगुनाह के साथ इतनी जल्दबाज़ी..." "...ख़ैर। पर मैं इसे ठीक नहीं मानता, सर। बिल्कुल भी ठीक नहीं मानता।"
"पापा..." "मैं... मैं तो बस इतना चाहती थी कि ये लड़की यहाँ से चली जाए। इसे नौकरी से निकाल देते, बस। इसे... इसे इस तरह क़ातिल बना कर, पुलिस तक..." "...नहीं। नहीं, आप ठीक कह रहे हैं। जो होना चाहिए, वही हो रहा है।"
एक पल के लिए संजना के भीतर भी वो सर्द लहर दौड़ गई कि ये बात कितनी दूर निकल आई है। उसने एक रक़ीब हटानी चाही थी, एक ज़िंदगी नहीं तोड़नी थी। पर उसने वो ख़याल मोड़ कर रख दिया जैसे उसके पिता ने सिखाया था, और सत्रह तारीख़ की सगाई फिर आँखों के सामने तैर गई, जिससे पहले इस कैंटीन वाली का नामोनिशान मिट जाना ज़रूरी था।
"अब इसे और यहाँ खड़ा रखने का कोई मतलब नहीं।" "सिक्योरिटी, पुलिस को फ़ोन लगाओ। हिमराज के सी.ई.ओ. पर जानलेवा हमले की एफ़.आई.आर. दर्ज होगी, अभी।" "क़ानून अपना काम करेगा, बेटा। हम कौन होते हैं बीच में आने वाले।"
"पुलिस?" "नहीं... नहीं, आप ऐसा नहीं कर सकते, मैंने सच में कुछ नहीं किया! मेरे पीछे एक बूढ़ी नानी है, एक नन्हा भाई है, वो मेरे बिना मर जाएँगे! ... कोई तो मेरी बात का यक़ीन करो, इस पूरे कमरे में कोई एक तो..."
"वीर सर, आपने अभी तो कहा था जाँच होनी चाहिए! आप तो जानते हैं ये सब ग़लत है... आप रोकिए इन्हें, प्लीज़, मैं आपके पैर पड़ती हूँ!"
पर वीर ने धीरे से नज़रें झुका लीं। वो चाहता तो बहुत था, पर एक मुलाज़िम बोर्ड चेयरमैन के सामने आख़िर कहाँ तक जाता। उसका बोला हर लफ़्ज़ इस काँच के कमरे की दीवारों से टकरा कर बेमोल लौट आता था। महिका का आख़िरी सहारा भी उसकी आँखों के सामने बेबस हो गया।
और तभी, उस भरे कमरे में, महिका की डरी हुई नज़र घूमते-घूमते एक ही चेहरे पर आ कर ठहर गई। उसी आदमी पर जिसे वो दो दिन पहले इस्तीफ़ा दे कर छोड़ आई थी। बर्फ़ का बादशाह। इस पूरे टावर में अगर कोई एक लफ़्ज़ में इस पूरे झूठ को राख कर सकता था, तो वो सिर्फ़ यही एक आदमी था।
"साहब..." "आप तो जानते हैं ना कि मैं ऐसी नहीं हूँ। बाक़ी सब नहीं जानते, पर आप... आप तो जानते हैं। ... एक बार, बस एक बार कह दीजिए।"
पर बादशाह की ज़ुबान नहीं हिली। बाहर गलियारे में क़दमों की आहट तेज़ हो चुकी थी, वर्दी की, क़ानून की, हथकड़ी की। एक कैंटीन की मामूली कुक अब बस एक लफ़्ज़ की दूरी पर थी सलाख़ों से। और जिस अकेले हाथ में उसे वापस खींच लेने की ताक़त थी, वो हाथ बारह साल की बर्फ़ के नीचे जमा, ख़ामोश पड़ा था। बादशाह के पास पूरा सच था। पर ठीक उस पल, जब महिका को उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, बर्फ़ के बादशाह ने चुप रहना चुना।
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