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Chapter 23 of 28

उस रात का हाथ

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

बारह साल पुरानी वो रात अब भी उन दोनों के बीच हवा में टँगी थी, गिरने और न गिरने के बीच। झूलते बल्ब की रौशनी में अगस्त्य खड़ा था, होंठ पर ख़ून की सूखती लकीर लिए, और महिका दीवार से चिपकी, माँ की डायरी सीने से लगाए। और उन दोनों के बीच ज़मीन पर गिरी वो बूढ़ी औरत उठने लगी, इस कमरे में अकेली जो सब जानती थी।

"कैसा हक़, अगस्त्य जी? मुझ पर आपका कौन सा हक़ है जो मैं ख़ुद नहीं जानती? बारह साल का दफ़्न सच, आधा आपके सीने में, आधा उस डायरी में... मैं ये पहेलियाँ और नहीं सुन सकती। जो कहना है साफ़ कहिए, वरना इस दरवाज़े से चले जाइए।"

अगस्त्य ने कहने को होंठ खोले, पर बारह साल पुराना वो ताला उसके गले में ही अटक गया। वो लफ़्ज़ जो उसने आज तक किसी के सामने नहीं कहा था, आज भी ज़ुबान पर आ कर काँप गया। और तभी, ज़मीन से, उस राज़ से भी पुरानी एक आवाज़ उठी।

"रुक जा, बेटा... ये आँखें... मैंने ये आँखें पहले भी देखी हैं। उसी दर्द से भरी, उसी तरह अकेली। महिका, इसे जाने मत दे। बैठ, और जो ये कहने आया है वो सुन ले। बारह साल से जो मैं तुझसे छुपाती रही, वो आज ये आदमी ख़ुद तेरे सामने खड़ा है।"

"नानी... आप क्या कह रही हैं? आप इन्हें जानती हैं? इन आँखों को आपने कहाँ देखा? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, कोई तो सीधा बताओ, इस रात में आख़िर हो क्या रहा है।"

नानी ने अपना काँपता हाथ उस अमीर अजनबी की तरफ़ बढ़ाया, जैसे किसी बरसों खोए बच्चे को छूना चाहती हों। उन्होंने अगस्त्य को वो रास्ता दे दिया जिस पर वो अकेला कभी क़दम न रख पाता।

"तू बता, बेटा। या मुझमें अब इतनी जान नहीं कि ये कहानी दोबारा जी सकूँ। उस बरसात की रात की कहानी... अस्पताल के उस गलियारे की। तू बता, कि तू कौन है।"

"बारह साल पहले, एक बरसाती रात थी, महिका। मैं बीस साल का था। एक फ़ोन आया, कि फ़्लाईओवर पर एक गाड़ी गिरी है... मेरे पापा की गाड़ी। मैं भागता हुआ उस अस्पताल पहुँचा, बारिश में भीगता, बस यही दुआ करता कि सब झूठ हो।"

पर उस रात कोई दुआ क़ुबूल नहीं हुई। अगस्त्य के लफ़्ज़ों में वो लंबा ठंडा गलियारा फिर से जी उठा, वो सफ़ेद रौशनी, और वो लफ़्ज़ जो एक बीस साल के लड़के की पूरी दुनिया राख कर गए। तीन नाम, एक ही रात में छिन गए।

"मेरे पापा, अविनाश मल्होत्रा। मेरी माँ, सुधा। और मेरी छोटी बहन, नित्या, सिर्फ़ नौ साल की थी वो। उस एक हादसे में मेरा पूरा घर उस फ़्लाईओवर से नीचे चला गया, और मैं उस गलियारे में अकेला खड़ा रह गया।"

"मेरे पैर वहीं जवाब दे गए, महिका। मैं उस ठंडे फ़र्श पर गिर पड़ा, और सँभालने वाला कोई नहीं था। और तभी नाइट शिफ़्ट की एक अजनबी नर्स मेरे पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने मेरा सिर थामा, अपना टिफ़िन मेरे काँपते हाथों में रख दिया, और कहा, खा ले बेटा, वरना तू भी हार जाएगा।"

उस लड़के की ज़िंदगी की सबसे सर्द रात में, वो एक अजनबी हाथ की गरमाहट अकेली रौशनी थी। पर उस रात के बाद अगस्त्य के भीतर कुछ मर गया। हर ज़ायका राख हो गया, बारह साल तक ज़ुबान पर एक भी स्वाद नहीं उतरा, सिवाय एक के।

"सिर्फ़ एक ज़ायका उस बंद ज़ुबान के पीछे ज़िंदा रह गया, महिका। और बारह साल बाद हिमराज की कैंटीन में एक कंगाल लड़की ने बेहोश होते एक अकड़ू आदमी के आगे दाल चावल की थाली पटक दी। और उसे, बारह मुर्दा सालों बाद, पहली बार कुछ चखने में आया। और उसे नहीं पता था क्यों। वो लड़की तुम थीं।"

झूलते बल्ब की रौशनी में बारह साल के टुकड़े एक दूसरे की तरफ़ सरकने लगे। महिका के सीने से लगी वो डायरी, और अगस्त्य की जेब में एक चीज़ जो उसने बारह साल से अपने सीने के पास सँभाल कर रखी थी।

"बारह साल से मैंने एक चीज़ सँभाली है। उस नर्स के टिफ़िन का ढक्कन। स्टील का पुराना ढक्कन, जो उस रात मेरे हाथ में रह गया था। और जिस दिन मैंने तुम्हारा बनाया खाना चखा, महिका, वो बिल्कुल वही ज़ायका था। वही हाथ। क्योंकि..."

"...क्योंकि जिस नर्स ने उस काली रात मुझे उस गलियारे में बचाया, जिसके खाने ने मेरी ज़ुबान की एक खिड़की खुली छोड़ दी, वो तुम्हारी माँ थीं, महिका। निर्मला। उन्हीं के हाथ का ज़ायका मुझे बारह साल बाद तुम्हारे हाथों से दोबारा मिला।"

"वो लड़का... माँ की डायरी में एक लड़के का ज़िक्र था। एक अकेला लड़का, जिसके आँसू पन्नों पर बह कर मिट गए थे, जिसके लिए माँ मरते दम तक... वो लड़का आप हैं? जिसे मेरी माँ ने उस गलियारे में थामा, जिसके लिए वो रोती रहीं... वो आप हैं?"

"हाँ, बेटा। यही है। मेरी निर्मला उस आख़िरी हफ़्ते घर आती और एक अमीर लड़के के लिए रोती थी। कहती, माँ, उस बच्चे का उस रात कोई नहीं था, मैं उसे बचा न सकी। जिसके लिए मेरी मरती बेटी आख़िरी साँस तक दुआ करती रही, महिका, वो लड़का यही है, तेरे सामने खड़ा है।"

"तो जिस तानाशाह को... जिस अकड़ू 'बर्फ़ के बादशाह' को मैं रोज़ ज़बरदस्ती खिलाती रही, डाँटती रही कि खा लो वरना मर जाओगे... वो वही भूखा लड़का था जिसे मेरी माँ ने उस रात खिलाया था। मैं अनजाने में वही करती रही जो मेरी माँ उस रात कर के गई थीं।"

पर उस रात के सीने में एक आख़िरी पत्थर और दबा था, सबसे भारी। जो दो अलग हादसे लगते थे, वो कभी दो थे ही नहीं। और अगस्त्य ने वो आख़िरी पत्थर भी उठा लिया, जिसके नीचे उसकी अपनी दुनिया दबी थी।

"और अब वो सुनो जो सबसे गहरे दफ़्न है, महिका। जिस परिवार की मौत का झूठा इल्ज़ाम तुम्हारी माँ के सिर मढ़ा गया, जिसके लिए उन्हें बदनाम कर के मिटा दिया गया... वो मरने वाला परिवार मेरा था। वो गाड़ी मेरे पापा की थी। तुम्हारी माँ को मेरे परिवार की मौत का बलि का बकरा बनाया गया।"

"जिस रात मेरी दुनिया उजड़ी, महिका, ठीक उसी रात तुम्हारी माँ की दुनिया भी उजाड़ी गई। एक ही रात, एक ही झूठ, और उसके पीछे एक ही आदमी। मेरे पापा को रास्ते से हटाया भी उसी ने, और उस जुर्म को दफ़नाने को तुम्हारी माँ को कुचला भी उसी ने। दिग्विजय राणा।"

"इसलिए... इसलिए आप चुप रहे। मैं समझती रही कि आप मुझे इस्तेमाल कर रहे हैं, कि मैं आपकी बस एक दवाई हूँ, एक हथियार। पर आप इसलिए चुप थे कि जिस लड़की का खाना आपको ज़िंदा रखे था, वो उसी औरत की बेटी थी जिसे आपके अपने घर की मौत ने बरबाद किया।"

"मैं कैसे कहता, महिका। रोज़ तुम्हारे हाथ से वो निवाला लेता, जिसमें तुम्हारी माँ की मोहब्बत घुली थी, वो माँ जिसे मेरे उस बाप जैसे राणा ने मिटा दिया। हर कौर के साथ मैं तुम्हारा गुनहगार होता जाता, और फिर भी वही कौर मुझे जिला रहा था। पर आज मैं और नहीं छुपाऊँगा।"

और बारह साल की वो बर्फ़ आख़िरकार पिघलने की कगार पर आ खड़ी हुई। जो सच उन्हें तोड़ने आया था वो उन्हें जोड़ रहा था, क्योंकि वो एक ही ग़म था, दो सीनों में बँटा हुआ। और महिका को पहली बार वो समझ आया जो उसकी माँ बरसों से करती आई थी।

"मेरी माँ का प्यार, अगस्त्य जी, बारह साल से आपको ज़िंदा रखे हुए है। उस गलियारे में जो हाथ आपको खिला गया, वही हाथ मुझमें उतरा, और मेरे हाथों से वही आपको फिर मिलता रहा। आपकी बर्फ़ को मेरी माँ की गरमाहट ने कभी पूरी तरह जमने नहीं दिया।"

"हर थाली, महिका। वो कभी मेरी दवाई नहीं थी, कोई इलाज नहीं जो मैं तुमसे छीन रहा था। वो तुम्हारी माँ थीं, जो तुम्हारे हाथों से मुझ तक पहुँचती रहीं। और अब मैं उसी हाथ का क़र्ज़ चुकाऊँगा। तुम्हारी माँ का नाम, निर्मला वर्मा का नाम, मैं इस पूरी दुनिया के सामने साफ़ कर के रहूँगा।"

और फिर उन दोनों के बीच सिर्फ़ एक क़दम का फ़ासला रह गया, और वो भी मिट गया। महिका का आटे से सना हाथ अगस्त्य के ख़ून से सने चेहरे तक उठा, और उस सूखती लकीर को धीरे से पोंछ गया। बारह साल की बर्फ़ और एक गरम हाथ, आख़िरकार, एक दूसरे को छू गए।

"बस, बेटा, बस। बारह साल से ये बोझ मेरे सीने पर पत्थर बना बैठा था, आज ये उतर गया। जा, मेरी निर्मला का नाम साफ़ कर। जिस आदमी ने मेरी बेटी को और तेरे घर को उजाड़ा, उसे उसके किए की सज़ा दिला। और मेरी बच्ची को अब अकेले मत लड़ने देना।"

"अब हम अकेले नहीं लड़ेंगे, नानी। महिका, तुम्हारे पास तुम्हारी माँ की डायरी है, उसमें राणा का नाम उन्हीं के हाथ से लिखा हुआ। मेरे पास हिमराज के काग़ज़ हैं, अस्पताल की फ़ाइलें, और अब खोने को कुछ नहीं। दोनों सच मिला कर, हम राणा को सबके सामने बेनक़ाब करेंगे।"

"उस गलियारे के लड़के के लिए भी, जिसे मेरी माँ बचा न सकीं। ठीक है, अगस्त्य, साथ लड़ेंगे। पर एक शर्त पर, कि अब कोई सच हमारे बीच दफ़्न नहीं रहेगा। न आपका, न मेरा।"

पर जिस घर का दरवाज़ा अभी अभी टूटा हो, जिस गली में राणा का आदमी अभी अभी आ कर गया हो, वहाँ रुकना मौत को बुलाना था। और बर्फ़ का बादशाह, जो बारह साल से जमा हुआ था, अब तेज़ी से हरकत में आ गया।

"तुम लोग यहाँ एक रात और नहीं रुक सकते, महिका। राणा का आदमी लौट कर आएगा, इस बार अकेला नहीं। मैं अभी बंसी काका को फ़ोन करता हूँ। नानी और चिंटू को आज रात ही हिमराज के कोल्ड चेन कॉम्प्लेक्स के स्टाफ़ क्वार्टर भिजवा देते हैं। वहाँ पहरा है, बंसी काका ख़ुद उन्हें सँभाल लेंगे। सबसे महफ़ूज़ जगह वही है।"

और यूँ उस बीमार बुढ़िया और नींद में डूबे उस बच्चे को उस जगह की तरफ़ भेज दिया गया जो सबसे महफ़ूज़ लगती थी। एक भरोसे की गाड़ी उन्हें ले गई, और दूसरे छोर पर बंसी काका थामने को तैयार खड़े थे। महिका एक पल रुक कर बिखरे बक्से से माँ का सामान, वो डायरी समेटने लगी, और रात धीरे धीरे सुबह की तरफ़ सरकने लगी।


सुबह होने को थी। खाली कमरे में अब सिर्फ़ वो दोनों थे, और बारह साल में पहली बार कोई झूठ नहीं, कोई बर्फ़ नहीं। अगस्त्य ने महिका को अपनी बाँहों में भर लिया, और वो, जो हफ़्तों से हर गरमाहट पर ताला लगाए बैठी थी, इस बार पीछे नहीं हटी। भाप, ग़म, और कुछ नया, तीनों उस दहलीज़ पर आ कर ठहर गए।

"अगस्त्य... कल जब हम राणा के सामने खड़े होंगे, तो मैं अकेली नहीं होऊँगी, है ना? मेरी माँ ने आपको उस रात अकेला नहीं छोड़ा था। और अब मैं आपको अकेला नहीं छोड़ूँगी।"

"तुम्हारी माँ ने मुझे एक बार ज़िंदगी दी थी, महिका, और तुमने मुझे दोबारा। अब मैं वो बादशाह नहीं रहा जिसे कोई ज़ायका नहीं आता था। अब मुझे हर चीज़ का स्वाद आता है। ये डर भी, और ये... ये जो अभी इस पल में है, ये भी।"

और ठीक उसी एक गरम साँस में, अगस्त्य की जेब का फ़ोन पूरी रात को चीरता हुआ बज उठा। इस पहर स्क्रीन पर बंसी काका का नाम चमकना सिर्फ़ एक बात कह सकता था। अगस्त्य ने फ़ोन कान से लगाया, और दूसरी तरफ़ से एक चीख़ फूट पड़ी।

"साहब! साहब, जल्दी आओ! कोल्ड स्टोरेज में... एक हादसा हो गया है! नानी को एक घंटे पहले यहाँ लाया गया था, और वो अंदर हैं, फ़्रीज़र के अंदर, और दरवाज़ा नहीं खुल रहा, साहब! ये दरवाज़ा किसी तरह नहीं खुल रहा!"

और जिस बर्फ़ को वो दोनों अपने पीछे छूटा हुआ समझ रहे थे, वो असल में उनके आगे, हिमराज के उसी जमे हुए साम्राज्य में, मुँह खोले खड़ी थी। बर्फ़ का वो बादशाह जिस साम्राज्य से आज रात आज़ाद हुआ था, वही अब एक बीमार बुढ़िया को अपने जमे हुए जबड़ों में दबाए बैठा था। और फ़ोन पर बंसी की चीख़ बीच में ही कट गई।

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