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Chapter 12 of 28

संजना जान गई

बर्फ़ का बादशाह by Avni Oberoi

सारी रात बादशाह के केबिन की वो अकेली रौशनी जलती रही। मेज़ पर अब भी वही दो फ़ाइलें खुली पड़ी थीं, एक ही नाम पर आ कर मिलती हुई, निर्मला वर्मा। और बारह साल पुराने उस स्टील के टिफ़िन का ढक्कन अगस्त्य की मुट्ठी में रात भर बंद रहा, जैसे उसे छोड़ते ही ये पूरी रात सच में हो जाएगी। सुबह की पहली किरन शीशे पर उतरी, और बर्फ़ के बादशाह ने एक फ़ैसला कर लिया।

"बारह साल पहले तूने मेरा काँपता हाथ थामा था... और मैं आज तक नहीं जानता था कि वो हाथ किसका था।" "निर्मला वर्मा। जिसे मेरे अपने घर की मौत का क़ातिल कहा गया। और जिसकी बेटी के हाथ का एक कौर मुझे बारह साल बाद ज़िंदा कर गया।" "महिका... मेरा ज़ख़्म भी तू है, और मेरा मरहम भी। और ये बात मैं तुझे कभी नहीं बता सकता।"

उधर त्रिलोकपुरी में नौकरी छोड़े महिका को अभी एक ही रात बीती थी कि हिमराज से बुलावा आ गया। चिंटू की फ़ीस, नानी की दवाई, सिर पर चढ़ा क़र्ज़... इनकार करने की गुंजाइश किसी कंगाल के पास कहाँ होती है। और दोपहर तक वो फिर उसी काँच के केबिन में खड़ी थी, पर अब उसकी आँखों में पहले वाली धूप नहीं थी।

"आपने बुलाया, साहब? ... इस्तीफ़ा तो मैं दे चुकी हूँ।" "अगर हिसाब-किताब बाक़ी है तो बंसी काका से करवा दीजिए। मुझे और कुछ नहीं चाहिए इस टावर से।"

"हिसाब बाक़ी है, पर वो नहीं जो तुम समझ रही हो।" "तुम्हारा इस्तीफ़ा मंज़ूर नहीं हुआ। तुम्हें वापस रखा जा रहा है, दुगुनी तनख़्वाह पर। और तुम्हारे घर पर जो क़र्ज़ है, वो आज शाम तक ख़त्म हो जाएगा।"

"क्यों?" "उस दिन छत पर संजना मैडम ने सगाई के छपे हुए कार्ड आपके क़दमों में बिखेरे थे, और आप मेरे लिए एक लफ़्ज़ नहीं बोल पाए थे।" "और आज दुगुनी तनख़्वाह? माफ़ कीजिए साहब, मैं बिकाऊ नहीं हूँ। मैं कोई दवाई नहीं हूँ जो आप ख़रीद लें।"

"तुम दवाई नहीं हो।" "तुम... तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं कि तुम मेरे लिए क्या हो, महिका।" "मुझे बस तुम्हारा यहाँ रहना चाहिए। इससे ज़्यादा मैं अभी कुछ नहीं कह सकता।"

"तो फिर क्या हूँ मैं, साहब? बता दीजिए।" "एक कंगाल कैंटीन वाली के लौट आने से बर्फ़ के बादशाह की नींद क्यों उड़ जाती है? ... या ये भी उन्हीं बातों में है जो आप 'कह नहीं सकते'?"

"..." "एक दिन शायद बता दूँ। ... आज नहीं।"

"यही तो मुसीबत है आपकी। कह ही नहीं सकते।" "और ये क्या... आज भी सुबह से कुछ नहीं खाया आपने? वो सामने रखी थाली वैसी की वैसी ठंडी पड़ी है।" "बारह साल का बादशाह, और अपना पेट तक नहीं सँभाल सकता।"

"किसी और के हाथ का खाया नहीं जाता।" "तुम चली गई थीं, तो हर थाली फिर से राख हो गई थी।"

"पता है, कल रात मुझे भी एक बात पता चली, अपनी माँ के बारे में।" "मेरी माँ नर्स थीं, बहुत अच्छी वाली। और मरने से पहले आख़िरी दिनों में वो किसी अजनबी लड़के के लिए रोती रहती थीं।" "किसी हादसे वाली रात, अस्पताल के गलियारे में एक काँपता हुआ लड़का, जिसका उसी रात सब कुछ उजड़ गया था। माँ ने उसे अपने हाथ से खाना खिलाया, पर बचा न पाईं। ... मैं आज तक नहीं जानती वो लड़का कौन था।"

"एक... एक लड़का? गलियारे में?" "...तुम्हारी माँ ने उसे अपने हाथ से खाना खिलाया था? उस रात?"

"हाँ। कहती थीं, भूखे को अपने हाथ से खिलाना सबसे बड़ी दुआ है।" "शायद इसीलिए मुझे भी लोगों को खिलाने की ऐसी बुरी आदत है। माँ का ही तो हाथ है मेरे इस हाथ में।" "ख़ैर, छोड़िए। मैं वापस काम पर आ जाऊँगी, साहब। पर अपने घर के लिए, आपकी किसी दवाई के लिए नहीं।"

और महिका चली गई, ये जाने बिना कि जिस अजनबी लड़के के लिए उसकी माँ मरते दम तक रोई, वो अभी-अभी उसके ठीक सामने, बर्फ़ की तरह जमा खड़ा था। बादशाह के पास अब वो पूरा सच था जो महिका के पास आधा भी नहीं था, और वो समझ गया कि इस लड़की के हाथ का हर निवाला अब उसके लिए दुआ भी है और सज़ा भी। ... उसका राज़ अब उसकी ख़ामोशी से भी भारी हो चुका था।

पर उस काँच के महल में एक और जोड़ी आँखें थीं, जो महीनों से इस कैंटीन वाली को नाप रही थीं। संजना राणा। उस रात सूनी पार्किंग में उसने ख़ुद से कहा था, बादशाह को इस लड़की की सिर्फ़ खाने की नहीं, कोई बहुत गहरी और ख़तरनाक ज़रूरत है। और अब जब वो कैंटीन वाली इस्तीफ़ा दे कर भी लौट आई थी, संजना ने ठान लिया कि आज वो जान कर रहेगी, ये लड़की आख़िर बादशाह की है क्या।

"आज साहब की टेस्टिंग मैं ख़ुद देखूँगी।" "दो कटोरियाँ लगाओ, बिल्कुल एक जैसी। एक में शहर के सबसे बड़े शेफ़ की बनाई खीर, और एक में... वो कैंटीन वाली के हाथ की। कोई नाम नहीं, कोई निशान नहीं। बादशाह को पता न चले कौन सी कौन है।" "फिर देखते हैं, ये मशहूर ज़ुबान किसे पहचानती है।"

और दोपहर की मेज़ पर बादशाह के सामने दो हूबहू एक जैसी कटोरियाँ रखी गईं। एक ही रंग, एक ही ख़ुशबू, एक ही चाँदी की तश्तरी। संजना शीशे के उस पार खड़ी, साँस रोके देखती रही। अगस्त्य ने पहली कटोरी उठाई।

" राख।" "ये किसने बनाई? ले जाओ इसे। ... दूसरी लाओ।" "...ये। ये ठीक है।" "बस यही एक चीज़ है इस पूरे टावर में जो मेरे हलक़ से नीचे उतरती है।"

"मैंने कटोरियाँ ख़ुद बदलवाई थीं। शेफ़ की खीर बाईं तरफ़, कैंटीन वाली की दाईं।" "...और उसने बिना सोचे, बिना सूँघे, ठीक दाईं वाली उठा ली। और बाईं को छुआ तक नहीं।"

पहली कटोरी, दुनिया के सबसे महँगे शेफ़ की, आधी छुई भी न गई। और दूसरी, कैंटीन वाली के हाथ की, चट कर गई। संजना के हाथ में पकड़ा शीशे का गिलास काँप उठा। बारह साल से जो आदमी अपनी ही कुल्फ़ी नहीं चख पाता, वो एक कंगाल लड़की के हाथ का खाना यूँ खा रहा था जैसे प्यासे को पानी मिला हो।

"तो ये सच है।" "बादशाह को सिर्फ़ इसी एक लड़की के हाथ का खाना चखने में आता है। ये कोई आशिक़ी नहीं, कोई सनक नहीं।" "ये लड़की उसकी कमज़ोरी नहीं है... ये उसकी ताक़त है।"

और उसी पल संजना के दिमाग़ में सारे मोहरे अपनी जगह बैठ गए। बारह साल से टूटा, अधूरा, बुझा हुआ अगस्त्य, जिसे राणा ख़ानदान अपनी उँगलियों पर नचाता आया था। और ये लड़की उसे फिर से पूरा, जागा हुआ, ताक़तवर बना रही थी। और एक जागा हुआ बादशाह किसी की मुट्ठी में नहीं रहता। सत्रह तारीख़ की सगाई, हिमराज का मर्ज़र, वो सारा नक़्शा जो उसके पिता ने बुना था, सब इस एक बात पर टिका था कि अगस्त्य टूटा रहे। और ये कैंटीन वाली उसे जोड़े जा रही थी।

"मैंने समझा था ये सिर्फ़ एक दाग़ है, एक मामूली रक़ीब।" "पर ये उससे कहीं बड़ी है। ये लड़की हमारे पूरे खेल को पलट सकती है।" "ये बात अब मेरे अकेले के बस की नहीं। ये पापा को बतानी पड़ेगी।"

उसी शाम, लुटियंस की उस पुरानी कोठी में, जहाँ हिमराज के असली फ़ैसले लिए जाते थे, संजना अपने पिता के सामने बैठी थी। मेज़ पर सत्रह तारीख़ के छपे हुए सगाई के कार्ड रखे थे, वही उलटी गिनती जो संजना ने ख़ुद शुरू की थी। और दिग्विजय राणा, बोर्ड चेयरमैन, अपनी हमेशा वाली पिता जैसी मुस्कान के साथ उसे सुन रहा था।

"पापा, अगस्त्य बदल गया है, पिछले कुछ हफ़्तों से।" "पहले वो आपकी हर फ़ाइल पर बिना पढ़े दस्तख़त कर देता था। और अब? बोर्ड में आपकी हर चाल पकड़ लेता है, सगाई की तारीख़ टाल देता है, हर बात पर सवाल करता है। ... जैसे बारह साल की नींद से अचानक जाग गया हो।"

"बेटा, ये तो अच्छी बात है। लड़का सयाना हो रहा है।" "इसमें परेशान होने की क्या बात? अगस्त्य मेरा अपना बेटा जैसा है।"

"बात इतनी सीधी नहीं है, पापा। मैंने पता लगाया है कि ये जागना किस दिन से शुरू हुआ।" "जिस दिन से हिमराज की कैंटीन की वो लड़की, महिका, उसे अपने हाथ का खाना खिलाने लगी। ... और आज मैंने अपनी आँखों से देखा। दुनिया के सबसे बड़े शेफ़ की खीर उसने राख कह कर ठुकरा दी, और उसी कैंटीन वाली के हाथ की कटोरी चट कर गया।"

"बारह साल से जिस आदमी की ज़ुबान का ज़ायका मर चुका है, पापा, उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ इस एक लड़की के हाथ का खाना चखने में आता है। और उसी खाने ने उसे फिर से ताक़तवर बना दिया है।" "एक टूटा अगस्त्य हमारे काम का था। एक जागा हुआ, पूरा अगस्त्य... हमारे हाथ से निकल जाएगा।"

और पहली बार दिग्विजय राणा की वो पिता जैसी मुस्कान ज़रा सी ठहर गई। कहीं बहुत गहरे, बारह साल पुरानी एक परछाईं ने करवट ली, एक अस्पताल का गलियारा, एक नर्स, एक स्टील का टिफ़िन। पर उसने उस ख़याल को उतनी ही तेज़ी से दबा दिया जितनी तेज़ी से वो बारह साल पहले एक बेगुनाह औरत का नाम दबा गया था।

"वर्मा?" "इस लड़की का पूरा नाम क्या बताया तूने? ... महिका वर्मा।" "एक कैंटीन की मामूली कुक। और मेरा बेटा जैसा अगस्त्य, बर्फ़ का बादशाह, उसके हाथ का मोहताज हो गया।"

"हाँ, पापा। और जब तक ये लड़की उसके आसपास है, न वो सगाई होगी जैसी हम चाहते हैं, न मर्ज़र।" "मैं इसे रिश्वत दे चुकी, सबके सामने बेइज़्ज़त कर चुकी, फिर भी ये टस से मस नहीं हुई। ये अपने आप नहीं जाएगी, पापा। इसे हटाना पड़ेगा।"

"हटाना पड़ेगा।" "गुस्सा मत कर, बेटा। तू अब भी इसे एक लड़की समझ कर लड़ रही है, रिश्वत, बेइज़्ज़ती, धमकी।" "पर जब कोई काँटा इस ख़ानदान के रास्ते में आ जाए, तो उसे इस तरह नहीं हटाया जाता।"

"तो... फिर कैसे, पापा?" "आप ऐसे क्यों मुस्कुरा रहे हैं?"

"इस घर में मुश्किलें हमेशा एक ही तरीक़े से हल होती आई हैं, बेटा। चुपचाप। साफ़-सुथरे।" "ऐसे कि किसी को कानोंकान ख़बर न हो, और इल्ज़ाम किसी और के माथे बैठ जाए। एक कैंटीन की कुक... न पैसा, न पहुँच, न कोई पूछने वाला। ऐसी लड़कियों का हिमराज के रास्ते से हट जाना दुनिया की सबसे आसान चीज़ है।"

"पापा, मैं बस इतना चाहती थी कि ये लड़की अगस्त्य की ज़िंदगी से निकल जाए।" "...आप जो कर रहे हैं वो बस इतना ही है ना?"

"बस इतना ही, बेटा। इससे ज़्यादा तुझे जानने की ज़रूरत नहीं।" "तू बेफ़िक्र हो जा। सत्रह तारीख़ को तू संजना मल्होत्रा बनेगी, और उस दिन तक इस कैंटीन वाली का नाम भी कोई नहीं लेगा।"

और उस एक जुमले के साथ पूरी कहानी की सबसे सर्द सच्चाई कमरे में उतर आई। सिर्फ़ हम जानते थे कि 'चुपचाप, साफ़-सुथरे, इल्ज़ाम किसी और के माथे', यही वो तरीक़ा था जिससे बारह साल पहले इसी आदमी ने एक बेगुनाह नर्स, निर्मला वर्मा, को कुचला था। और अब वही मशीन दोबारा चल पड़ी थी, उसी औरत की बेटी की तरफ़, जिसे इस बात की कानोंकान ख़बर तक नहीं थी।

"तू जा कर आराम कर।" "बाक़ी सब मैं देख लूँगा। ... बस एक फ़ोन की बात है, बेटा।"

और दिग्विजय राणा ने वो फ़ोन उठा लिया, उसी सर्द इत्मीनान से जैसे कोई माली एक सूखे पत्ते को डाली से तोड़ता है। उधर त्रिलोकपुरी में महिका अपने नन्हे भाई चिंटू को खाना खिला रही थी, अपनी माँ के उसी हाथ से, ये जाने बिना कि जिस अमीर ख़ानदान ने उसकी माँ को उजाड़ा था, उसी घर के एक कमरे में उसका नाम अभी-अभी एक फ़ोन की नोक पर रख दिया गया है। ... बादशाह के पास पूरा सच था, पर आवाज़ नहीं। और राणा के पास सिर्फ़ एक फ़ोन था, जो उसके लिए काफ़ी था।

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